लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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भाषा की क्षमता के क्या निकष (कसौटियां) होने चाहिये? मैंने इस विषय में कुछ विचार, चिन्तन, मनन किया है और भी करता रहूंगा। अभी तक के विचारों की एक झलक पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।

मेरे विचार में-

(१) भाषा सीखने की सरलता और अक्षरों का वैज्ञानिक वर्गीकरण।

(२) सीखने, सिखाने की असंदिग्ध सुस्पष्ट विधि।

(३) अक्षर और शब्द उच्चारण की स्पष्टता और सनातनता।

यह तीन गुण हिन्दी को देवनागरी लिपि के कारण परम्परा से प्राप्त हैं।

इसके अतिरिक्त, नीचे लिखे हुए गुण, हिन्दी को, वह संस्कृतजन्य होने के कारण, जन्मजात प्राप्त हैं।

(१) शब्द सम्पत्ति और वैश्विक तथा भारतीय भाषाओं में योगदान।

(२) शब्द रचना क्षमता।

(३) शब्दों की संवादिता, गेयता और काव्यमयता।

(४) शब्दों की अर्थवाहिता।

(५) पारिभाषिक शब्दों की रचना क्षमत।

(६) परम्परा से और अपरिमित साहित्य से जुडे रहने की क्षमत।

(७) शब्दों की विकास या विस्तार क्षमत।

सभी जानते हैं कि हिन्दी की देव नागरी लिपि शास्त्र शुद्ध है। उसका वर्गीकरण एक विशेष ढंग से किया गया है। किन्तु हिन्दी के संस्कृतजन्य शब्द सुसंवादित एवं अर्थवाही भी होते हैं। हिन्दी में अंग्रेजी, अरबी की भांति स्पेलींग पाठ करना नहीं पडता, उच्चारण के अनुसार उसे लिखा और पढा जाता है।

और यह सारे गुण सभी शिक्षित समाज को सामान्य रूप से ज्ञात होने चाहिए। इसके कारण हिन्दी सीखने की सरलता प्राप्त होती है और भाषा को शीघ्रता से सीखा जाता है।

किन्तु कुछ गुणों के विषय में साधारण हिन्दी प्रेमी को स्पष्ट रूप से जानकारी ना होने के कारण इस लेख में उन गुणों को विशद करने की चेष्टा की है। कुछ त्रुटियां अनवधान से रही हो सकती है। पाठक मुझे क्षमा करेंगे, यह अपेक्षा है।

(१)

एक वैश्विक “धातु’’ व्यापन का उदाहरण:

वैसे तो विश्व की और विशेषकर युरप की कई भाषाओं में संस्कृत/ हिन्दी धातुओं का स्रोत पाया जाता है। यही बिन्दु अपने आपमें एक पूरे प्रकरण में विस्तृत किया जा सकता है। इस लेखक ने इस बिन्दु का व्याकरणीय संधान लगाने का अल्प प्रयास किया है।

वैसे, कौटुम्बिक संबंधों के शब्द, सर्वनाम और धातु भी पर्याप्त मात्रा में भारतीय भाषाओं से प्रभावित हैं।

किन्तु, इस लेख की मर्यादा में इस बिन्दु को उचित न्याय देने के मोह को रोकते हुए केवल एक दो उदाहरण देकर ही संतोष तो नहीं होगा, किन्तु इसके बिना और कोई चारा नहीं है।

एक धातु “स्था’’ लेते हैं। इस धातु पर आधारित अनेक शब्द जैसे कि स्थान, स्थिति, स्थापना, स्थपति, स्थल, स्तब्ध, स्तंभ इत्यादि बनते हैं। धातु से जुडे हुये अर्थ हैं- खडा रहना, होना, उपस्थित होना, सहना, रुकना, स्थिर रहना इत्यादि। और व्युत्पादित अर्थ होते हैं जैसे कि जो खडा होता है, वह स्थिर होता है, फिर दृढ होता है, कडा भी होता है।

अब अंग्रेजी में इस “स्थ’’ धातु का संचार देखिये: यही धातु अपभ्रंशित होकर `स्थ’ से ’”ST” बन जाता है। अर्थ भी समान प्रकार का होता है।

उदाहरण: जैसे To “st’and, be st’able, to ”st’op, be “st’ill, or to “st’ay , दृढ और कडा इस अर्थ में जैसे stone, steel, और जो वस्तुएं खडी रहती हैं जैसे, stick, a stake, a staff, a stalk, a station, a stamen इत्यादि।

फिर रुकने, रहने, एकत्रित होने के स्थान, इस अर्थ में, जैसे कि stall, stadium और to step, to take a stand, जुडे हुए अर्थ के शब्द हैं sturdy या strong फिर व्युत्पदित अर्थ के शब्द जो sturdy या strong होता है- प्राणियों में नर होने से उसको भी stallion या steer या stag कहते हैं।

फिर नकारात्मक अर्थ में या, व्युत्पादित अर्थ में जो बहुत समय से रुका होता है उसे stagnant या stale कहा जाता है और फिर, stiff या तो sticky होता है और फिर stink करने लगता है। फिर sterile होना stagnant होने के समान है। अब एक शब्द देखिये- stare अर्थ होता है दृष्टि स्थिर करना। stonic का अर्थ है स्थिर रहकर (सम बुद्धि) विचलित ना होने वाला।

विद्यालय में जो पढाता हूं, structure (निर्माण) और statics (स्थिर वस्तुओं का विज्ञान) इसमें भी यह ”ST” धातु, विद्यमान है।

STATE और STREET ऐसे ही उदाहरण है। और भी उदाहरण आप केवल ”st” को लक्ष्य में रखते हुए अंग्रेजी का शब्दकोष ढूंढने का पुरुषार्थ करेंगे तो प्राप्त कर पायेंगे।

इसी प्रकार “ज्ञ’’ या “जम’’ या “दिव’’ धातुओं पर और धातुओं पर संशोधन किया जा सकता है।

ध्यान रहे कि धातु कुछ संक्रमित होकर अंग्रेजी में जाते हैं। ज्ञ का ”GN” या ”KN” बनता है।

“जन’’ ”GEN” बनता है इत्यादि, इत्यादि।

(२)

शब्द रचना क्षमता-

देशी भाषाओं में, (जैसे गुजराती, मराठी, बंगला, उडीया, तेलगु, तमिल…इ.) नये नये शब्द, और पारिभाषित शब्द हिन्दी/संस्कृत के आधार पर गढे जाते हैं।

भारत की प्राय: सारी प्रादेशिक भाषाएं संस्कृतजन्य संज्ञाओं का प्रयोग करती हैं। वैज्ञानिक, औद्योगिक, शास्त्रीय इत्यादि क्षेत्रों में पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग सरलता से हो इसलिये और अधिकाधिक शोधकर्ता इस क्षेत्र को जानकर कुछ योगदान देने में समर्थ हो, इसलिये शब्द सिद्धि की प्रक्रिया की विधि इस लेख में संक्षेप में इंगित की जाती है।

यह लेख उदाहरणसहित उपसर्गोंकाऔर प्रत्ययों के द्वारा मूल धातुओं पर, संस्कार करते हुये किस विधि नये शब्द रचे जाते हैं इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न करेगा।

हिन्दी/ संस्कृत में २२ उपसर्ग हैं। शाला में एक श्लोक सीखा था।

प्रहार, आहार, संहार, प्रतिहार, विहार वत्

उपसर्गेण धात्वर्था: बलात् अन्यत्र नीयते।।

अर्थ: प्रहार, आहार, संहार, प्रतिहार, विहार की भांति उपसर्गो के उपयोग से धातुओं के अर्थ बलपूर्वक अन्यत्र ले जाये जाते हैं।

उपसर्ग: प्र, परा, अप, सम, अनु, अव. नि: या निऱ्, दु:, या दुर, वि, आ. नि, अधि, अपि, अति, सु, उद. अभि, प्रति, परि और उप- इनके उपयोग से शब्द नीचे की भांति रचे जाते हैं। कुछ उदाहरण: हृ हरति इस धातु से,

प्र+हर = प्रहार, सं+हर = संहार, उप+हर = उपहार, वि+हर =विहार, आ+हर = आहार, उद+हर =उद्धार, प्रति+हर =प्रतिहार इत्यादि शब्द सिद्ध होते हैं।

प्रत्यय: प्रत्ययों का उपयोग, कुछ उदाहरण

(क) योग प्र+योग – प्रयोग, प्रयोग+इक – प्रायोगिक, प्रयोग+शील – प्रयोगशील, प्रयोग+वादी – प्रयोगवादी,

उप+योग – उपयोग+इता – उपयोगिता

उद+योग – उद्योग+इता – औद्योगिकता

(ख) उसी प्रकार रघु से राघव, पाण्डु – पाण्डव, मनु – मानव, कुरु – कौरव, इसी प्रकार और भी प्रत्यय हमें विदेह – वैदेहि, जनक – जानकी, द्रुपद – द्रौपदी – द्रौपदेय, गंगा – गांगेय, भगीरथ – भागीरथी, इतिहास – ऐतिहासिक, उपनिषद – औपनिषदिक, वेद – वैदिक, शाला – शालेय,

(ग)

संस्कृत के पारिभाषिक शब्द, विशेषण का ही रूप है, इसलिये अर्थ को ध्यान में रखकर रचे जाते हैं। इसलिये शब्दकोष से ही उस अर्थ का शब्द प्राप्त करना पर्याप्त नहीं। हरेक संज्ञा का विशेष अर्थ होने से, परिभाषा को रचने के काम में उन्हीं व्यावसायिकों का योगदान हो, जो एक क्षेत्र के विशेषज्ञ है, साथ में पर्याप्त संस्कृत का भी ज्ञान रखते हैं।

संस्कृत भाषा में २२ उपसर्ग, ८० प्रत्यय और २००० धातु हैं। इनकी ही शब्द रचने की क्षमता २२x८०x२०००=३,५२०,००० – अर्थात ३५ लाख शब्द केवल इसी प्रक्रिया से बनाये जा सकते हैं।

इसके उपरान्त सामासिक शब्द, और सन्धि शब्द को जोडे तो शब्द संख्या अगणित होती है।

पारिभाषिक संज्ञाएं-

(३)

पारिभाषिक संज्ञाओं की रचना का उदाहरण:

तीन प्रकार की संज्ञाएं दिखाई देती हैं। (१) शब्दकोष में पाई जाती है। (२) दूसरी प्रादेशिक भाषा में पाई जाने वाली (३) जो monier williams और आपटे इत्यादि कोषों में पाई जाने वाली। आवश्यकता है कि चुने हुए शब्द का वैशेषणिक अर्थ अभिप्रेत संज्ञा के योग्य हो।

सबसे बडा योगदान उपसर्ग, प्रत्यय, समास और सन्धि प्रक्रिया से प्राप्त होता है।

उदाहरणार्थ- moment in mechanics is the product of

force and distance.

समास प्रक्रिया के उपयोग से “बलान्तर’’ संज्ञा बनती है।

व्याख्या: बलं च अन्तरस्य गुणाकार: स बलान्तर:।

Bending moment प्रत्यय के उपयोग से वक्रक बलान्तर:

Twisting moment व्यावर्तक बलान्तर:

Turning moment आवर्तक बलान्तर:

concrete – वज्र पदार्थ

steel – लोह

steel structure – लोह निर्माण, लोह पिंजर

Inertia – जडता,

Moment of Inertia – जड बलान्तर

Reinforced cement concrete – बलवर्धित वज्र इत्यादि

(इस विषय की लंबी सूची है, उदाहरण मात्र दिए हैं। यह मेरा अपना मौलिक योगदान, विनय पूर्वक रखा है।)

(४)

सुसंवादी, गेय, अर्थवाही शब्द रचना।

हर राग में जैसे एक स्वर होता है, जिसे संवादी स्वर कहा जाता है। उसी प्रकार किसी विशेष क्षेत्र में सुसंवादी पारिभाषिक शब्द रचना की जा सकती है। उदाहरण: मुख पेशियों के नाम (अभिनवं शारीरम्)

भ्रूसंकोचनी: Corrugator supercilli

नेत्र निमीलनी: Orbicularis Oculi

नासा संकोचनी: Compressor naris

नासा विस्फारणी: Dilator naris

नासा सेतु: Dorsum of the nose

नासावनमनी: Dopressor septi

{संस्कृत शब्द अर्थवाही, बिना स्पेलिंग, व्याख्याको अपने में समाए हुए प्रतीत होते हैं, या नहीं ?, कितना समय बचता?या आप अंग्रेजी में शीघ्रता से पढ पाएंगे, स्पेलिंग याद करते करते बरसों व्यर्थ गवांएंगे?}

(५)

एक और उदाहरण: Constitution, Law, Legistation code, Bill, Act इत्यादि शब्द अंग्रेजों के साथ ही भारत पहुंचे।

संस्कृत की क्षमता देखिये

Constitution संविधान

Law विधान

Legislation विधापन

Bill विधेयक

Illegal अवैध

Legal वैध

मूल अंग्रेजी शब्द एक दूसरे से स्वतंत्र है। Law का अर्थ जानने से Constitution, Legislation, Bill, Illegal, Legal यह सारे शब्द स्वतंत्र रूप से सिखना पडते हैं। किन्तु संस्कृत/ हिन्दी पर्याय एक “धा’’ धातु पर “उपसर्ग’’ और “प्रत्यय’’ लगाकर नियमबद्ध रीति से गढे गये हैं। जिसे संस्कृत शब्द सिद्धी की प्रक्रिया की जानकारी है, उसे ये शब्द आप ही आप समझ में आते हैं।

परकीय शब्दों के संस्कृत प्रतिशब्द रचने का शास्त्र जीवित और ज्वलन्त रखने का कार्य सहस्रों शोधकर्ताओं को करना अनिवार्य है। तो हीनग्रंथि से पीडित यह (मेरी) पीढी जन्म ही ना लेती।

अर्थवाहिता-

(६)

एक और गुण जो संज्ञाओं को इस लोक से, परे ले जाता है, वह हिन्दी के उन शब्दों में है, जो वैसे शास्त्रों से जुडे हुए हैं। उदाहरणार्थ व्यक्ति, ब्रह्मांड, संसार, ब्रह्म, निसर्ग,

व्यक्ति: हमारे जन्म से पहले हम अव्यक्त थे, जन्मे तो अन्त तक व्यक्त रहे, और मृत्यु के अनन्तर फिर अव्यक्त में विलीन हुए। यह अर्थ व्यक्ति शब्द में निहित है। या तो यूं मानिये कि ईश्वर की परम, लौकिक सत्ता जिस निर्मित कृति में व्यक्त हो रही है, वह व्यक्ति है।

ब्रह्म: मूल शब्द बृहत् है। जिससे अंग्रेजी के Broad, Breadth इत्यादि शब्द बनते हैं। अर्थ है सदा विस्तरित होते रहना। ब्रह्मांड: उसका अंडाकार व्याप।

संसार: सम् सरति इति संसार: सम का अर्थ है “साथ’’ जैसे समाज, समिति (English में committee) तो संसार का अर्थ हुआ “जो साथ में सरते जाते हैं व ’’ इसीलिये इसे संसार कहा जाता है। पहले “अप्रकट’’ बीच में प्रकट होकर साथ चले फिर अप्रकट में चले गये। इसी प्रकार से अर्थवाही शब्द है- नदी, सरिता, मानव, निसर्ग।

नदी: या नादते (कल, कल कल नाद करने वाली, नदी कहाती है।) सा नदी।

सरिता: या सरति सा सरिता। जो सरते सरते (नाद किये बिना) चलती है वह सरिता है।

मानव: मन: अस्ति स मानव:। (जिसको सोचने के लिए विधाता ने मन दिया है, वह मानव हैं) Man भी उसीसे निकला है।

निसर्ग: य निसृत: स निसर्ग: इत्यादि

संस्कृतजन्य होने के कारण, हिन्दी को भी यह गुण प्राप्त है। यह गुण इसे वैश्वीकरण से भी ऊपर उठाता है। मैं इस गुण को, जो हिन्दी को इस पृथ्वी से भी उपर उठाकर अंतरिक्ष में विस्तरित करता है, उसे आकाशीकरण या अंतरिक्षीकरण कहूंगा।

एक लेख की मर्यादा में इससे अधिक विस्तार करने की क्षमता, विषय की सामग्री में होते हुये भी, यहीं उसका अन्त करना उचित रहेगा। किन्तु हिन्दी भाषा की एक झलक, उसके वैभव का अनुमान पाठकों के समक्ष रखने की आकांक्षा कुछ अंशत: भी सफल हुई या नहीं? इसे सूज्ञ पाठक ही बता पायेंगे। अस्तु।

11 Responses to “हिन्दी का भाषा वैभव – डॉ. मधुसूदन उवाच”

  1. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    आपकी बात में दम है क्योकि moment कहने से बल व् अंतर का गुणन फल नहीं प्रकट होता है लेकिन बलांतर कहने से हो जाता है लेकिन हिंदी में हम लोगो को अघूर्ण ही पढाया गया था अत स्वाभाविक अभ्यास वश अघूर्ण का नाम लिया था लेकिन ये ज्यादा उचित है ,इसे कोई और भी तकनीकी शब्द की हिंदी बताने की कृपा करे

    Reply
  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    abhishek purohit जी —
    (१)आप विषय के जानकार मानता हूं। बहुत बहुत धन्यवाद।
    यह लेख बहुत संक्षेपमें लिखने के कारण बहुत सारे बिंदुं अस्पष्ट रहे हैं।स्पष्टता करने का प्रयास करता हूं। और मित्रता का अधिकार लेकर, कुछ संकोच ना करते हुए, मुक्तता से विचार रखता हूं। अधो लिखित बिंदु ओं पर विचार करने बिनती भी करता हूं। संवाद करते रहेंगे। मुझे निश्चित लाभ होगा।
    (२) Concrete और Steel के लिए विचार निश्चित करूंगा।
    शब्द रचना पर मेरी पूर्वावश्यकताएं/धारणाएं वरीयता की दृष्टिसे निम्न सोची हैं।
    (क) संज्ञाएं रचते समय उस संज्ञाका अभिप्रेत अर्थ यदि व्यक्त हो सकता है, तो उस संज्ञाकी व्याख्या सरलता से स्मरण में रखी जा सकती है।यह संस्कृत व्याख्याओंका बहुत, बहुत सशक्त बिंदु है। प्रचलित शब्द पहले स्वीकारा जाए। अर्थ का विस्तार करते हुए। आवश्यकता पडने पर नवीन, अर्थ भरते हुए। (एक दीर्घ लेख में यह लिया जाएगा)
    (ख) जो आप शरीर शास्त्र की संज्ञाओं में भी देख सकते हैं। और संविधान, विधान, विधेयक — इत्यादि में भी। इस बिंदु की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा।
    (ग) (अंग्रेज़ी तो बडी जटिल होंगी। पहले स्पेलिंग, फिर उच्चारण, फिर व्याख्या पाठ करते करते घंटे लग जाते हैं।)
    अब देखिए–> (१) Moment शब्द लें। इसका अंग्रेज़ी का अर्थ Moment इस संज्ञांसे प्रकट नहीं होता। पर “बलांतर” से प्रकट होता है। यह स्मरण रखने के लिए बडी ही सहायता है। व्याख्या को पाठ करने में बहुत बहुत सहायक सिद्ध हो सकती है।
    (२) यह बल और अंतर (व्याख्यायित अंतर) का गुणाकार होनेसे मैं बलांतर (बलं च अंतरस्य गुणाकारः स बलांतरः) यह सामासिक संज्ञा है। यह Moment से भी अधिक उपयुक्त मानता हूं।मुझे, “आघूर्ण” का अर्थ सामान्य छात्र के लिए सरल प्रतीत नहीं होता।उसकी व्याख्या पाठ ही करना पडेगी।
    (३) अर्थवाही संज्ञाएं, हिंदी या प्राकृत भाषाओं में इस विषय को सीखने, सीखाने में तीव्र गति ला देगी। (इस पर बहुत कुछ सोचकर यह अभिगम अपनाया है।)
    (४) अब जड-बलांतर संज्ञा (स्वयं अर्थ-वाहक, प्रतीत होती है) “जड” “बल” और “अंतर” –इत्यादि “आघूर्ण” से मेरी जानकारी में अधिक सरल है।कुछ दैनिक बोल चाल के शब्द हैं।
    Inertia की moment –> जडता का बलांतर–> जड बलांतर (सारा अभिप्रेत अर्थ कुछ संकेत से व्यक्त हो गया)
    (३) वैसे दो शोध सम्मेलनों में कुछ प्रस्तुति की है। और अभियांत्रिकों का भी कुछ मंतव्य आ रहा है।
    आपके चिंतनसे लाभ देते रहिए।
    विषयको आगे बढाने में आपका मंतव्य सहायक है।
    सप्रेम ऋणी॥

    Reply
  3. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    moment of inertia को “जड़त्व आघूर्ण ” कहते है व् concret व् steel के लिए कोई और शब्द प्रयोग में लेंगे तो ज्यादा उचित लगेअगा

    Reply
  4. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    सभी प्रबुद्ध पाठकों की टिप्पाणियां पढी। सर्वश्री, श्रीराम तिवारीजी, हरपालजी, प्रेम सिल्हीजी, अनिल सहगलजी,और शैलेंद्र कुमारजी,– आप सभी बंधुओं का बहुत बहुत आभारी हूं।शैलेंद्र जी आपकी टिप्पणी के बिना मुझे इस विषयको सौम्य बनाने की बात पता ना चलती।आपका अप्रत्यक्ष सुझाव ध्यानमें निश्चित रहेगा।
    आगे, इसी विषय पर एक एक बिंदू लेकर लेखन करूंगा।(और भी पर्याप्त विशेषताएं हैं, जो समयानुकूलता से लिखनेका प्रयास होगा।) और बिंदुओं को अधिक विस्तारसे और सरलता से उदाहरणों सहित, प्रस्तुत करनेका प्रयास करूंगा।
    विशेषमें यह सुझाव मुझे सम्मेलनों में भी प्रस्तुति के लिए उपयुक्त होगा, बहुत धन्यवाद। पर,आप अपनी प्रतिक्रियाएं बिना संकोच देते रहें।प्रवक्ता ना होता तो यह वार्तालाप संभव ना होता। लेख लिखे जा सकते हैं, नियतकालिकों में भी, पर वार्तालाप के लिए प्रवक्ता ही चाहिए।
    सभीका आभारी हूं, और आगे के लिए कृपाभिलाषी हूं।

    Reply
  5. प्रेम सिल्ही

    बहुत सुन्दर लेख है| कृपया इसी प्रकार विचार, चिंतन, और मनन करते रहिये और हिंदी भाषा के विषय पर लिखते रहिये| मेरी स्वयं की परम्परा से और परिमित साहित्य से जुडे रहने की क्षमता मुझे प्रवक्त्ता.कॉम तक ले आई है| अब इन पन्नों पर हिन्दी भाषा में व्यक्त उन उच्च विचारों की खोज है जो अनावश्यक विषय विवाद को रोकते हुए सार्वजनिक हित के लिए हों, जन साधारण की उन्नति के लिए हों, और व्यक्तिगत धर्म से ऊपर उठे लोगों में देश प्रेम जगाने में समर्थ हों|

    Reply
  6. हरपाल सिंह

    harpal jee sewak

    इस क्षेत्र मे मै अभी नया हूँ कोशिश करुगा सुधार करू और शुद्ध हिन्दी तो बहुत ही कठिन है बोलने में तो मैने काफी सुधार किया है

    Reply
  7. शैलेन्‍द्र कुमार

    शैलेन्द्र कुमार

    मधुसुदन जी अपने तो ये बस के बाहर है खूब मन लगा के २ बार पढ़ा तब भी बहुत थोडा ही समझ पाया
    क्षमाप्रार्थी हूँ

    Reply
  8. Anil Sehgal

    हरपाल जी की टिप्पणी (१) रोमन में –

    जो हिंदी हरपाल जी रोमन में लिखते हैं (रोमन में होने के कारण) कम से कम मुझे तो समझ ही नहीं आती.

    बुरा न मनाएं – Roman akshr bhains brabar (रोमन अक्षर भैंस बराबर)

    – अनिल सहगल –

    Reply
  9. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    आदरणीय मधुसूदन जी को विषद हिंदी भाषा तुलनात्मक अध्यन सम्बन्धी आलेख के लिए धन्यवाद .
    हरपाल जी आप कोशिश करें की कम से कम हिंदी आलेख की टिप्पणी तो हिंदी में हो …

    Reply
  10. हरपाल सिंह

    harpal jee sewak

    aapka hindi par lekh achchha laga internet ko paida karne ka kam to sankrit ne hi kiya log apni man ko hi bhul jate hai japan me to sankrit bolne walo ki sankhya barh rahi hai sara kam sanskrit me karane ka prayas horaha hai taki haig se bacha ja sake kuchh log buddheetark se hi sochate hai vikek se nahi aaj kal to rsiya aur amerika me bhi hindi ke prati divanagee hai kuch saal aur ruk jaeye vigyan me sanskrit hi rahegi bharat ka darshan bahut gahara hai

    Reply

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