जा, तू टमाटर हो जा  

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विजय कुमार

बात उन दिनों की है, जब मैं चौथी-पांचवी कक्षा में पढ़ता था। तब टी.वी. भारत में आया नहीं था। रेडियो और टेलिफोन अति दुर्लभ और विलासिता की चीज मानी जाती थी। अखबार भी पूरे मोहल्ले में एक-दो लोग ही मंगाते थे। दोपहर में बुजुर्ग लोग अखबार पढ़ने के लिए उनके घर पहुंच जाते थे। इस दौरान बुजुर्ग महिलाएं कमर सीधी कर लेती थीं, जबकि युवा बहुएं पड़ोस में गप लगाने चली जाती थीं। वहां उन्हें सास और जेठानी के निंदा रस में पगी मोहल्ले भर की खबरें एक साथ मिल जाती थीं।

रात में भी आकाशवाणी से पौने नौ बजे की खबरें सुनने के लिए रेडियो वाले के घर महफिल लग जाती थी। उसके बाद सब लोग वहीं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाचारों की ऐसी चीरफाड़ करते थे कि बड़े-बड़े विशेषज्ञ शरमा जाएं। मुझे ध्यान है कि जब पहली बार नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर चहलकदमी की थी, तो हमारे गांव के बुजुर्गों ने इसे अमरीकी अफवाह बताकर सर्वसम्मति से खारिज कर दिया था।

पर अब कहां वो दिन ? मोबाइल फोन ने सबकी खाल में भुस भर दिया है। टेलिफोन की इज्जत दो कौड़ी से भी कम हो गयी है। बीमार बूढ़े की तरह रेडियो को कोई पूछता नहीं। टी.वी. अभी घरों में जरूर हैं; पर जिस तरह से मोबाइल ने रेडियो और पुराने टेलिफोन को आम आदमी की जिंदगी से बेदखल किया है, उससे लगता है कि उसके दिन भी गिने-चुने ही हैं।

अब तो हर व्यक्ति जेब में दो मोबाइल और उसमें भी चार सिम घुसेड़े है। रेडियो हो या टी.वी, अखबार हो या बैंक, स्कूल हो या दफ्तर और घर हो या बाजार, सब उस जादुई पिटारे में समा गया है। मोबाइल इन्सान की इतनी बड़ी जरूरत बन गया है कि पति और पत्नी एक-दूसरे के बिना रह सकते हैं, पर मोबाइल के बिना नहीं। हे भगवान, तुझे ऐसी सर्वसुलभ चीज बनाकर क्या मिला ?

आप कहेंगे कि इस बेसिर-पैर की चर्चा का आज क्या अर्थ है ? असल में कल शाम पड़ोसी चिंटू मेरा सिर खाने आ गया। उसे अपने विद्यालय में सुलभ और दुर्लभ प्राणियों के बारे में बताया गया कि मौसम परिवर्तन और प्रदूषण की वृद्धि से गोरैया और मेंढक जैसे कई प्राणी जो पहले हर जगह दिखायी दे जाते थे, अब दुर्लभ हो गये हैं। विदेशी बीज आने से चावल, मक्का, बाजरा और गन्ने जैसी घरेलू फसलों की कई प्रजातियां भी अब देखने को नहीं मिलतीं।

चिंटू बहुत तेज बुद्धि का बच्चा है। वह मुझसे पूछना चाहता था कि जो चीजें उसे स्कूल में बताई गयी हैं, क्या उसके अलावा और कुछ चीजें भी सुलभ और दुर्लभ होती हैं ? जो चीज आज सुलभ या दुर्लभ है, क्या कल उसकी स्थिति पलट भी सकती है ?

मैंने उसे मोबाइल सहित बहुत से उदाहरण दिये। एक उदाहरण राजनीति से भी दिया कि पिछले कुछ समय से खानदानी और भ्रष्टाचारी नेताओं का प्रभाव घटा है। इसलिए ईमानदार नेता, जो किसी समय दुर्लभ प्राणी की श्रेणी में आ गये थे, अब धीरे-धीरे फिर सुलभ होने लगे हैं।

चिंटू मेरी बात से काफी संतुष्ट हुआ। उसने कई उदाहरण अपनी कापी में नोट भी कर लिये; लेकिन चलते-चलते वह बोला, ‘‘चाचा जी, आप एक ताजा उदाहरण देना तो भूल ही गये।’’

– वो क्या चिंटू बेटे ?

– चाचा जी, वह चीज है टमाटर। मेरी मां बता रही थी कि टमाटर आजकल 100 रु. किलो मिल रहा है। कल तक सब्जी मंडी में वह सुलभ था; पर आज वह दुर्लभ हो गया है।

बात तो उसकी बिल्कुल ठीक थी; पर जिस तरह से उसने मेरे जैसे बुद्धिवादी व्यक्ति को शीशा दिखाया, उससे मुझे गुस्सा आ गया, ‘‘चिंटू, आजकल तुम बहुत बोलने लगे हो। ये भी नहीं सोचते कि बड़ों से बात कर रहे हो या छोटों से। खबरदार, जो अब एक मिनट भी यहां रुके। मेरी नजरों से टमाटर की तरह दूर हो जाओ।’’

चिंटू हंसते हुए चला गया। मैडम बाजार से लौटीं, तो थैले में आलू, बैंगन और प्याज तो थे, पर टमाटर नहीं। अब मेरे पास बाल नोचने के अलावा कोई काम नहीं बचा था।

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