शहीद भगत सिंह के दादा सरदार अर्जुन सिंह की आर्यसमाज की विचारधारा को पुष्ट करने के  लिए लिखी पुस्तक ‘हमारे गुरु साहिबान वेद के पैरोकार थे’ और उसकी पृष्ठभूमि

-मनमोहन कुमार आर्य

इतिहास की हर छोटी बड़ी बात सभी ऋषि भक्तों को स्मरण हो, यह सम्भव नहीं है। इसके लिए समय समय पर इस विषय के ग्रन्थों को पढ़ना उपुयक्त रहता है। स्वाध्याय से हमें सबसे बड़ा लाभ यही प्रतीत होता है कि इस प्रवृत्ति से मनुष्य के ज्ञान में निरन्तर वृद्धि होती जाती है और उसे इतिहास सहित अनेक विषयों का ज्ञान हो जाता है। शहीद भगत सिंह जी के देश भक्ति के कार्यों व उनके बलिदान से सभी देशवासी मुख्यतः आर्यसमाज के अनुयायी परिचित ही हैं। उनके दादा जी का नाम सरदार अर्जुन सिंह जी था। वह ऋषि दयानन्द जी के भक्त थे और सत्यार्थप्रकाश आर्यसमाज के समस्त साहित्य का उन्होंने अध्ययन किया था। वह दोनों समय अग्निहोत्र यज्ञ भी करते थे। उनके पास एक थैला होता था जिसमें छोटा यज्ञकुण्ड व समिधायें आदि होती थी। हमारे एक भजनोपदेशक ने सुनाथा  िकवह जब रेलयात्रा में भी होते थे तो भी यज्ञ अवश्य किया करते थे। उनकी ऋषिभक्ति एवं यज्ञ के प्रति प्रेम प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय है। अपनी भावी सन्तति पर उनके संस्कारों का ही परिणाम था कि उनके तीनों पुत्र श्री किशन सिंह, श्री अजीत सिंह जी और श्री स्वर्ण सिंह जी भी आर्यसमाजी विचारधारा के थे और शहीद भगत सिंह भी आर्यसमाजी विचारधारा के देशभक्त और ऋषि भक्त मृत्युंजय पुरुष थे।

 

प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी आर्यसमाज के प्रखर वययोवृद्ध विद्वान एवं इतिहास मर्मज्ञ हैं। आपने 300 से अधिक छोटी बड़ी पुस्तकें लिखकर एक रिकार्ड बनाया है। वर्तमान में भी उनकी लेखनी से वैदिक सिद्धान्तों पर लेख एवं ग्रन्थ मिलते रहते हैं। आपका एक ग्रन्थ है ‘तड़पवाले तड़पाती जिनकी कहानी’ है। इस पुस्तक से हम आज एक घटना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस घटना में उन्होंने वैदिक सिद्धान्तों की रक्षार्थ लिखी सरदार अर्जुन सिंह जी एक पुस्तक का उल्लेख किया है जिसे उन्होंने भीषण ज्वर में लिखा था। पुस्तक का नाम था ‘हमारे गुरु साहिबान वेद के पैरोकार थे।’ उनके अनुसार यदि इस पुस्तक का हिन्दी रूपान्तर कर प्रकाशित किया जाये तो यह लगभग 100 पृष्ठों की पुस्तक बनेगी। इसका पूरा विवरण हम उन्हीं की लेखनी से प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं ‘1898 ई. तक सिखों मे पृथकता का विष प्रविष्ट नहीं हुआ था। यत्न किया जा रहा था कि सिखों में पृथकत्व का विष फैलाया जाए। एक पुस्तक लिखी गई जिसमें सिखों को हिन्दुओं से पृथक् व आर्य संस्कृति तथा धर्म से सर्वथा न्यारा सिद्ध करने के लिए कुतर्क दिये गये।

 

इस पुस्तक को एक देशभक्त साहसी विद्वान् ने पढ़ा। वे सज्जन सिख साहित्य के मर्मज्ञ थे। आर्य सिद्धान्तों का उन्हें गहरा ज्ञान था उन्हें उस समय भीषण ज्वर था। उसी अवस्था में खटिया पर पडे़-पड़े आपने प्रतिवाद करने के लिए प्रमाणों से भरपूर एक उत्तम पुस्तक रच दी, जिसका नाम था ‘हमारे गुरु साहिबान वेद के पैरोकार थे।’

 

यह पुस्तक आज देवनागरी में छपे तो कोई एक सौ पृष्ठ की बनेगी। इसका कुछ सार हमने ‘यज्ञ योग ज्योति’ में वीर भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरु की बलिदान अर्ध शताब्दी पर दिया था।

 

आर्य पुरुषो! जानते हो यह पुस्तक किसने लिखी? वे थे श्रीमान् बाबा अर्जुनसिंह जी। आप वीर भगतसिंह के दादाजी थे। आपको ऋषिजी ने स्वयं वैदिक धर्म में दीक्षित किया था। इन विभूतियों के हम सदैव ऋणी रहेंगे।’

 

जिज्ञासु जी के अनुसार सरदार अर्जुन सिंह जी की आर्य सिद्धान्तों के समर्थन में लिखी गई उक्त पुस्तक की सामर्गी लगभग 100 पृष्ठों की होगी। अनुमान है कि यह पुस्तक उर्दू या गुरुमुखी लिपी में हो सकती है। हमारा श्री जिज्ञासु जी के शिष्यों, मुख्यतः www.aryamantavya.in नैट साइट के संचालकों से, अनुरोध है कि यदि वह इस पुस्तक के हिन्दी अनुवाद की पीडीएफ तैयार कराकर अपनी साइट पर डाल दें तो यह लम्बे समय तक के लिए सुरक्षित हो सकती हैं और देश विदेश के पाठकों तक पहुंच सकती है। भविष्य में भी इसकी आवश्यकता पड़नी है, ऐसा हमें लगता है। हम नहीं जानते कि हमारा यह परामर्श देना उचित है या नहीं, परन्तु हमारी यह हार्दिक इच्छा है। यदि ‘यज्ञ योग ज्योति’ का लेख भी “aryamantavya” की साइट पर डाल दें तो यह भी उपयोगी होगा। हम पहले इससे लाभान्वित न हो सके, अब हो सकेंगे।

 

हम श्री राजेन्द्र जिज्ञासु जी की पुस्तक से उपर्युक्त जानकारी प्रस्तुत करने के लिए उनका हार्दिक धन्यवाद करते हैं। हम आशा करते हैं कि पाठकों को यह जानकारी लाभदायक प्रतीत होगी। ओ३म् शम्।

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