गंगा की सेहत पर भारी आस्था और परंपरा

-अरविंद जयतिलक
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य में बहने वाली गंगा नदी के तटों पर उतराते सैकड़ों शवों की बरामदगी ने जहां एक ओर राज्य सरकारों की बदइंतजामी की पोल खोली वहीं भारतीय जनमानस बुरी तरह आहत और असहज हुआ। इस भयावह दृश्य पर सरकारें बैकफुट पर दिखीं और जवाब देते नहीं बना। किस्म-किस्म की कुतर्कों की आड़ में अपनी नाकामी को छिपाती रहीं। यह सच है कि गंगा में उतराने वाले सभी शव कोरोना महामारी से जान गंवाने वाले लोगों के नहीं थे। लेकिन इनमें अनेकों शव कोरोना महामारी में जान गंवाने वाले लोगों के भी थे जिनके शवों को उनके परिजनों ने गंगा में बहा दिया। गंगा में शवों को बहाने का कारण चाहे आर्थिक विपन्नता रही हो या परंपरागत आस्था लेकिन कुलमिलाकर गंगा की शुद्धता और निर्मलता ही प्रभावित हुई है। यह उचित ही है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने गंगा में उतराते शवों का स्वतः संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य के मुख्य सचिवों के साथ-साथ केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के दरम्यान कार्रवाई की रिपोर्ट देने को कहा। आयोग ने तल्ख टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि प्रशासनिक अधिकारी जनता को जागरुक करने और गंगा में अधजली या बिना जली शवों को बहाने में नाकाम हुए हैं। गौर करें तो आयोग की यह टिप्पणी इसलिए उचित है कि शवों को बहाने से न सिर्फ गंगा की निर्मलता प्रभावित हुई है बल्कि उसका सीधा असर जीवनदायिनी गंगा में रहने वाले जलीय जीवों के सेहत के लिए भी खतरनाक है। विशेषज्ञों की मानें तो गंगा में बहाए जाने वाले शवों को विशेष प्रकार की मछलियां और कछुए खाते हैं। अगर ये शव कोरोना से संक्रमित हुए तो फिर मछलियों समेत अन्य जलीय जीवों का संक्रमित होना स्वाभाविक है। चूंकि मछलियां लोगों के खाद्य सामग्री के रुप में इस्तेमाल होती हैं ऐसे में इसका सेवन करने वाले लोगों तक संक्रमण और बीमारी पहुंचती है तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता। शवों को बहाने से गंगा का जल संक्रमित हुआ या नहीं यह कहना तो मुश्किल है लेकिन इससे गंगा की सेहत पर बुरा असर तो पड़ा ही है। विशेषज्ञों की माने तो इसका असर नमामि गंगे जैसे प्रोजेक्ट के लिए चुनौती भी बन सकता है। उल्लेखनीय है कि नमामि गंगे प्रोजेक्ट के जरिए गंगा की निर्मलता और पवित्रता बनाए रखने का प्रयास हो रहा है। इस प्रोजेक्ट पर हर वर्ष हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं। उधर पटना हाईकोर्ट ने भी गंगा नदी में बहाए गए शवों पर बिहार सरकार को ताकीद कर जवाब मांगा। गौर करें तो उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों राज्यों द्वारा अगर गंगा के घाटों पर शवों को जलाने का मुकम्मल इंतजाम किया गया होता तो शव उतराते नहीं दिखते। और न ही जल में रहने वाले जीवों के संक्रमित होने को लेकर आशंका जताया जाता। यह सच्चाई है कि शवों को बहाने की अपेक्षा जलाने पर ज्यादा खर्च आता है। ऐसे में आर्थिक रुप से विपन्न परिवार शवों को जलाने के बजाए उन्हें गंगा में बहा देते हैं। एक सच यह भी है कि आस्था के नाम पर भी शवों को गंगा में बहाने की परंपरा विद्यमान है। वह परंपरा आज तक जारी है। गौर करें तो आस्था के नाम पर अकेले गंगा में ही हर वर्ष लाखों शव बहाए जाते हैं। उसके तटों पर लाखों शव जलाए जाते हैं। दूर स्थानों से जलाकर लायी गयी अस्थियां भी गंगा में विसर्जित कर दी जाती हैं। भला ऐसी आस्था और परंपरा से गंगा की निर्मलता और पवित्रता कैसे सुरक्षित रह सकती है। हद तो यह है कि गंगा एवं अन्य नदियों की सफाई अभियान से जुड़ी एजेंसियां और स्वयंसेवी संस्थाएं भी गंगा और अन्य नदियों से निकाली गयी अधजली हड्डियां एवं राखों को पुनः उसी में उड़ेल देती हैं। क्या इस तरह की सफाई अभियान से गंगा साफ-सुथरी हो सकेंगी? समझना होगा कि जब तक आस्था के उमड़ते सैलाब पर रोक नहीं लगेगा तब तक गंगा समेत अन्य नदियां मैली होती रहेंगी। भारत नदियों का देश है। देश के आर्थिक-सांस्कृतिक विकास में नदियों का अहम योगदान है। नदियां भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पर्याय हैं। नदी घाटियों में ही आर्य सभ्यता पल्लवित और पुष्पित हुई। देश के अधिकांश नगर नदियों के किनारे स्थित हैं। देश के अधिकांश धार्मिक स्थल किसी न किसी रुप में नदियों से संबंद्ध हैं। नदियां देश की बड़ी आबादी को अपने जल से उर्जावान करती हंै। लिहाजा नदियों को निर्मल बनाए रखने के लिए जितना सख्त कानून की जरुरत है उससे कहीं अधिक पर्यावरण पे्रमियों, समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और संत समाज की सार्थक भागीदारी निभाने की जरुरत है। याद होगा अभी गत वर्ष पहले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने प्लास्टर आॅफ पेरिस (पीओपी), प्लास्टिक और थर्मोकाॅल जैसी हानिकारक चीजों से बनी देव प्रतिमाओं के जल विसर्जन पर रोक लगायी। बोर्ड ने यह कदम देश में मूर्ति विसर्जन को पर्यावरण हितैषी तरीके से पूरा करने के उद्देश्य से उठाया। बोर्ड के नए नियमों के मुताबिक अब हानिकारक तत्वों से बनी मूर्तियों का जल विसर्जन नहीं हो सकेगा। यानी अब जलविसर्जन उन्हीं देव मूर्तियों का होगा जिनके निर्माण में केवल सूखे फलों के अंशों और पेड़ों की प्राकृतिक गोंद का इस्तेमाल हुआ है। दो राय नहीं कि बोर्ड के इस पहल से नदियां प्रदूषित होने से बचेंगी और सिंथेटिक पेंट एवं रसायनों के बजाए प्राकृतिक रंगों से रंगी मूर्तियों के उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। भारत उत्सवों एवं त्यौहारों का देश है। देश में गणेश, विश्वकर्मा, दुर्गा, लक्ष्मी, काली और सरस्वती पूजा बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाता है। इन त्यौहारों और उत्सवों पर हर वर्ष नदियों और जलाशयों में लाखों की संख्या में देव मूर्तियों को विसर्जन होता है। एक अनुमान के मुताबिक अकेले मुंबई में ही डेढ़ लाख से अधिक गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। इसी तरह कोलकाता की हुबली नदी में पंद्रह से बीस हजार देव प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। देश के अन्य नदियों के साथ भी ऐसा ही होता है। बिडंबना यह कि विसर्जित होने वाली मूर्तियों में कमी के बजाए हर वर्ष उनमें इजाफा हो रहा है। इन मूर्तियों के निर्माण में जहरीले अकार्बनिक रसायनों का इस्तेमाल होता है। रंग बिरंगे आयल पेंटों में नुकसान करने वाले घातक रसायन होते हैं। जब मूर्तियों का विसर्जन होता है तो कुछ सामग्री तो नष्ट हो जाती है लेकिन प्लास्टर आॅफ पेरिस और पेंट के घातक रसायन पानी में मिल जाते हैं। इससे पानी जहरीला बन जाता है। उसका सीधा असर जलीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं एवं मनुष्यों की सेहत पर पड़ता है। यह सच्चाई है कि नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए किस्म-किस्म के कानून गढ़े गए हैं। लेकिन नदियां अभी भी प्रदूषण से कराह रही है। गत वर्ष पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना नदी को जीवित व्यक्ति सरीखा दर्जा दिए जाने का अभूतपूर्व फैसला दिया। देखें तो गंगा एवं अन्य नदियों की दुगर्ति के लिए सिर्फ उसमें बहाए जाने वाले शव या मूर्तियां ही जिम्मेदार नहीं हैं। सीवर और औद्योगिक कचरा भी उतना ही जिम्मेदार है। किसी से छिपा नहीं है कि इसे बिना शोधित किए बहाया जा रहा है। उचित होगा कि नदियों के तट पर बसे औद्योगिक शहरों के कल-कारखानों के कचरे को इनमें गिरने से रोका जाए और ऐसा न करने पर कल-कारखानों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए। वैज्ञानिकों की मानें तो प्रदूषण के कारण नदियों में आक्सीजन की मात्रा लगातार कम हो रही है। उनका पानी पीना तो दूर नहाने लायक तक नहीं रह गया है। सीवर का गंदा पानी और औद्योगिक कचरे को बहाने से क्रोमियम एवं मरकरी जैसे घातक रसायनों की मात्रा बढ़ी है जो जीवन के लिए बेहद खतरनाक है। उचित होगा कि जीवनदायिनी गंगा एवं अन्य नदियों के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार छोड़ आस्था एवं परंपरा का निर्वहन मानवता के लिए किया जाए।

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