लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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 प्रवीण दुबे

भारत जैसे धर्म प्रधान देश में जिस प्रकार पाश्चात्य सभ्यता अपना प्रभुत्व कायम करती जा रही है निश्चित ही यह एक चिंता की बात है। इस सभ्यता की चकाचौंध जिस प्रकार हमारी नई पीढ़ी को प्रभावित कर रही उससे देश नैतिक पतन की ओर अग्रसर होता दिखाई दे रहा है। स्थिति इतनी गंभीर और आपे के बाहर होती जा रही है, कि अब पाश्चात्य सभ्यता में रचे बसे लोग खुलेआम बेहूदगी, अश्लीलता और निर्लज्जता करते देखे जा सकते हैं। इसी परिपेक्ष्य में कुछ घटनाओं का उल्लेख करना उचित है। पूर्वोत्तर के आसाम प्रदेश की राजधानी गुवाहाटी में 12 जुलाई को एक 11वीं कक्षा की छात्रा के साथ जो कुछ हुआ उससे पूरा हिन्दुस्तान शर्मसार हुआ है। नशे में चूर एक दर्जन से अधिक युवकों ने भरे बाजार में भूखे भेडिय़ों की तरह एक छात्रा के साथ मारपीट की, छेडख़ानी की ओर उसके कपड़े तक फाड़ डाले। इसी घटना से जुड़ा एक ओर पहलू देखिए जब यह सब हो रहा था तमाम राहगीर तमाशबीन बने हुए थे वहीं मीडिय़ा कर्मियों की भीड़ ब्रेंकिंग न्यूज के लिए वीडियो शूट कर रही थी। जरा सोचिए यह वह देश है जब त्रिलोक विजेता रावण भगवान राम की पत्नी सीता को अपहरण कर ले जा रहा था तो एक पक्षी गिद्धराज जटायु ने अपनी जान की बाजी लगाकर रावण से संघर्ष किया था और सीता को बचाने की कोशिश की  थी। जरा तुलना कीजिए उस घटनाक्रम की आज से एक लडक़ी की सरेराह इज्जत लूटी जा रही थी फिर उसे बचाने कोई भी आगे नहीं आया। क्या समाज इतना डरपोक और कायर हो गया है कि वह अपनी बहू बेटियों की सरेआम लुटती इज्जत तक की रक्षा नहीं कर पा रहा। धिक्कार है ऐसे समाज को और ऐसी आधुनिकता को। आखिर समाज की इस मनोदशा के लिए कौन जिम्मेदार है? यह अकेली गुवाहाटी की बात नहीं शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब हमें इस तरह की घटनाएं सुनने को नहीं मिलती हों। कभी बलात्कार, कभी छेडख़ानी, कभी लूटपाट तो कभी हत्या। जो पीढ़ी इस काम को अंजाम दे रही है उनमें अधिकांश बीस से तीस वर्ष के बीच के युवा और कॉलेज, स्कूल के छात्र पाए जाते हैं, इनमें से अधिकतर धनाढ्य परिवारों के युवा होते हैं। क्यों यह वर्ग अपनी भावनाओं को काबू नहीं कर पा रहा? आखिर रास्ते चलती युवतियों के साथ बदसलूकी, छेडख़ानी जैसी घटनाएं करते समय इन्हें अपने घर परिवार का ध्यान क्यों नहीं रहता? उत्तर स्पष्ट है हमारे समाज में चरित्र निर्माण, व्यक्ति निर्माण जैसे शब्द विलुप्त होते जा रहे हैं। हम तो खाओ पीओ और मौज करो की पाश्चात्य सभ्यता की नकल में जुटे हैं। इसके अंधानुकरण में हमारी युवा पीढ़ी सारी नैतिकता और सद्चरित्रता को भुला बैठी है। उसे ख्याल ही नहीं है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना, इसी भटकाव का यह परिणाम है कि भूखे भेडिय़ों की तरह राह चलती लड़कियों की इज्जत लूटी जा रही है, उनके साथ गैंगरेप जैसी घटनाएं घटित हो रही हैं। यही तो है पाश्चात्य संस्कृति के दुष्परिणाम। घटना घटित होने के बाद कुछ दिन हो-हल्ला होता है, पुलिस पर दबाव बनाया जाता है, महिला आयोग जैसी संस्थाएं अपने वही रटे-रटाए वाक्य दोहराती हैं। कुछ आरोपी पकड़े भी जाते हैं और मामला शांत हो जाता है फिर कोई नई घटना घटती है और पूरी कहानी दोहराई जाती है। क्या सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा? जरा विचार करिए इसका क्या समाधान है? सीधा सा जवाब है इस देश को वर्तमान में सबसे अधिक आवश्यकता यदि किसी चीज की है तो वह है नैतिक शिक्षा की। जब तक नैतिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति निर्माण नहीं होगा तब तक समाज में व्याप्त आचरण हीनता को समाप्त नहीं किया जा सकेगा। नैतिक शिक्षा को स्कूल कॉलेजों में एक विषय के रूप में पढ़ाए जाने की आवश्यकता है। साथ ही व्यावहारिक ज्ञान के लिए ऐसे संगठनों संस्थाओं का सहयोग भी लिया जाना आवश्यक है जो इस दिशा में पहले से ही कार्य कर रही है। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, गायत्री परिवार, विवेकानंद केन्द्र, राष्ट्र सेविका समिति, दुर्गावाहिनी जैसे कई संगठन हैं जो समाज को नैतिक और चारित्रिक रूप से बलवान और आचरणवान बनाने के लिए कार्यरत हैं। विश्व के सबसे बड़े सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बात की जाए तो वह अपने स्थापना काल से ही व्यक्ति निर्माण पर जोर देता रहा है। उसने बाकायदा अपने कार्यों के माध्यम से ऐसा करके भी दिखाया है। सूर्योदय से पहले ही देशभर में लगने वाली संघ शाखाओं पर एक घंटे व्यक्ति निर्माण और राष्ट्रनिर्माण के क्रियाकलाप होते देखे जा सकते हैं। गायत्री परिवार भी इसमें पीछे नहीं है वहां भी वैदिक पद्धति के रास्ते उज्जवल व्यक्तित्व निर्माण पर जोर दिया जाता है। जरूरत है कि देश को चलाने वाली सरकार इस दिसा में गम्भीरता से अध्ययन करे और ऐसी नीति तैयार करे कि स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई के साथ-साथ नैतिक शिक्षा को भी बढ़ावा दिया जाए इस दिशा में हमारी बुजुर्ग पीढ़ी और माता-पिता को भी विचार करने की आवश्यकता है कहा भी गया है पहली पाठशाला घर होती है। वे अपने बच्चों को नैतिक और चारित्रिक रूप से मजबूत बनाने के लिए महापुरुषों, क्रान्तिकारियों के जीवन चरित्र जुड़े प्रसंग व कथाएं अपने बच्चों को सुनाएं ताकि उनमें पढ़ाई के साथ-साथ नैतिकता का भी समावेश हो, जरा याद करो वह प्रसंग जब राजवंश होने के बावजूद राजा दशरथ ने अपने पुत्रों को विश्वामित्र के साथ विद्याध्यन करने गुरुकुल भेज दिया था। वह चाहते तो घर पर ही अच्छी पढ़ाई की व्यवस्था कर सकते थे, लेकिन उन्होंने विद्या के साथ व्यक्तित्व निर्माण पर जोर दिया। आज के परिवेश में युवा वर्ग को पाश्चात्य सभ्यता में रचे-बसे संस्थानों में शिक्षा तो मिल रही है परंतु नैतिकता का पाठ कहीं नहीं पढ़ाया जा रहा यही वजह है हमारा युवा वर्ग सरेआम शर्मसार करने वाली घटनाओं को अंजाम दे रहा है। इसको यदि रोकना है और एक मजबूत भारत का निर्माण करना है तो नैतिक शिक्षा का पाठ अनिवार्य किया जाना जरुरी है।

3 Responses to “महान भारत की चरित्रहीन संतानें”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    तिवारी जी, दूसरे की गलतियों से सीखना और दूसरे के बुरी बातों को अपनाना,मेरे बिचार से इन दोनों में बहुत अंतर है.दूसरे देशों में समाज संचालन के लिए जो अच्छाईयाँ हैं,उनसे हम क्यों नहीं कुछ सीखते?

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  2. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    हमें दूसरों की गलतियों से भी सीखना चाहिए,क्योंकि आज की भागम -भाग वाली व्यस्ततम वैयक्तिक और सामाजिक जिन्दगी में इतना समय नहीं बच पाता कि हम खुद गलतियां करें और उन गलतियों से सीखें!

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  3. आर. सिंह

    आर.सिंह

    अभी कहीं पढने को मिला कि पश्चिमी देशों की नक़ल करते समय हम वहां की अच्छाईयों को क्यों नहीं अपनाते?इस क्यों का उत्तर कोई भारत वासी नहीं दे सका है.

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