गुलमर्ग हिमस्खलन : रोक लगाना जरूरी है पहाड़ों पर अवांछित दखलंदाजी पर

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लिमटी खरे

उत्तर एवं पूर्वोत्तर भारत में पिछले लगभग एक दशक से ज्यादा समय से जिस तरह बर्फबारी और हिमस्खलन की घटनाएं तबाही मचा रही हैंवह चिंता की बात मानी जा सकती है। सरकार को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। दरअसल पहाड़ी क्षेत्रों में सैलानियों के मोह के चलते जिस तरह का अनियंत्रित विकास या अवांछित दलखलंदाजी हो रही हैवही इस तरह की आपदाओं का प्रमुख कारक बनकर उभर रही है।

पहाड़ों पर हर साल बर्फबारी होना या हिमस्खलन कोई नई बात नहीं है। कुछ सालों से इस तरह की घटनाएं तबाही भी लेकर आ रहीं हैं जो चिंताजनक मानी जा सकती है। हाल ही में काश्मीर में सोनमर्ग के करीब पहाड़ से चट्टाने खिसलीं, जिससे एक नाला अवरूद्ध हो गया। नाला अवरूद्ध होते ही पानी सड़क से बहने लगा और सड़क को बुरी तरह क्षति पहुंची। यही कारण था कि आवागमन घंटों तक के लिए थाम दिया गया।

इसके पहले मनाली हो, जोशीमठ हो या और कोई पर्वतीय क्षेत्र, हर जगह इसी तरह की घटनाएं घटती आई हैं। उत्तराखण्ड में बादल फटने से आई तबाही इसकी एक मिसाल मानी जा सकती है। दरअसल, पहाड़ों पर विकास के नाम पर जिस तरह बेतरतीब तरीके से निर्माण, विशेषकर होटल, सड़क, पुल, रिसोर्टस, शापिंग मॉल्स आदि का निर्माण हो रहा है वह इसके लिए जिम्मेदार माना जा सकता है। लोग अपने स्वार्थ के लिए पहाड़ तोड़ रहे हैं, नदी नालों को अवरूद्ध कर रहे हैं या उनकी धारा को परिवर्तित कर रहे हैं जो उचित नहीं माना सकता है।

जम्मू काश्मीर क्षेत्र के गुलमर्ग में बर्फीले तूफान में दो लोगों के लापता होने की खबरें हैं और एक की मौत की आशंकाएं भी फिजा में तैर रही है। पर्याटकों के लिए बर्फबारी का नजारा बहुत ही दिलकश हो सकता है पर पहाड़ों की भी अपनी सीमाएं हैं। सैलानियों को आकर्षित करने व्यापारी तो यहां तरह तरह के जतन करते हैं, पर यक्ष प्रश्न यही खड़ा हुआ है कि नियम कायदों का पालन करवाने वाले जनता के गाढ़े पसीने से संचित राजस्व से वेतन पाने वाले सरकारी नुमाईंदे क्या आंखों पर पट्टी बांधे ही बैठे हैं। क्या उनकी जवाबदेही कुछ भी नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के द्वारा जम्मू काश्मीर में 220 परियोजनाओं का शिलान्यास किया गया है। इसमें 32 हजार करोड़ रूपए से ज्यादा खर्च आएगा। इन निर्माण से पर्वतीय क्षेत्रों को नुकसान तो नहीं पहुंच रहा है यह देखने की जवाबदेही आखिर किसकी है! जाहिर है उन क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों और सरकारी नुमाईंदों के कांधों पर ही यह जवाबदेही आहूत होती है। इसके बावजूद भी आशंकाओं का अध्ययन किए बिना ही आकाओं को खुश करने की गरज से पहाड़ों पर जो निर्माण हो रहे हैं उन्हें पहाड़ों की पीड़ा माना सकता है।

कुछ माहों पहले जोशीमठ के आसपास के पहाड़ों की मिट्टी भुरभरी होने की बात सामने आई थीउस वक्त भी इस सबके लिए बेतरतीब विकास को ही जवाबदेह माना गया था। विडम्बना ही कही जाएगी कि उस बेतरतीब विकास के लिए जवाबदेही तय नहीं की गई। पहाड़ी क्षेत्रों में चाहे सड़क निर्माण होभवनहोटलबाजार या अन्य निर्माण की अनुमति साल दर साल किसके द्वारा दी गई अथवा जब इनके निर्माण हो रहे थे तब जिम्मेदार मौन क्यों रहे! इसके लिए जवाबदेही तय किए जाने की महती जरूरत हैअन्यथा आने वाले समय में कमजोर हो रहे सिसकते पर्वतों की पीड़ा में अगर इजाफा हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होन चाहिए . . .

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लिमटी खरे
हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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