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    Homeसाहित्‍यकवितापाटलिपुत्र का गुप्त राजवंशी सम्राट

    पाटलिपुत्र का गुप्त राजवंशी सम्राट

    —विनय कुमार विनायक
    महान मौर्य के शौर्य सूर्य का
    जब हुआ अवसान
    वैकि्ट्रया के ग्रीक, पार्थिया के पहलव,
    मध्य एशिया के शक-कुषाण से
    क्रमशः देश हुआ आक्रांत
    शुंग-काण्व-सातवाहन-भारशिव-वाकाटक जैसे
    ब्राह्मणी शक्तियों की यद्यपि थी निराली शान
    किन्तु देश खंडित-जर्जर था
    विदेशी दासता का भी डर था
    कौन दिलाए देश को स्थायित्व खुशहाली
    और आक्रांताओं से त्राण?

    तभी एक चन्द्रवंशी वणिक की
    फड़क उठी भुजाएं
    उठा तलवार विद्रोही-आक्रांताओं पर
    देश को किया निडर
    एकीकृत, उर्वर, आत्मनिर्भर!

    महान मौर्य सा शौर्य था
    मगध के महावीर गुप्तों का!

    ईस्वी सन् तीन सौ बीस से पांच सौ चालीस तक
    गुप्त शासकों ने भारत में स्वर्ण युग लाया बेशक
    किन्तु बर्वर हूणों के जुनून ने गुप्तों को नहीं बक्सा-
    “श्री’-“घट’-“चन्द्र’-“काँच’-“समुद्र’ में
    “राम’ सा “विक्रम’ से हो “गयाबन्द’
    तब “कुमार’ पुत्र “स्कंद’ ने “पुर’ उबारा
    दिखला “नरसिंह’ सा पराक्रम!
    (गुप्त शासकों का सिलसिलेवार उतराधिकारी
    श्री=श्रीगुप्त
    घट=घटोत्कच गुप्त
    चन्द्र=चन्द्रगुप्त प्रथम महाराजाधिराज (320-335ई.)
    काँच
    समुद्र=समुद्रगुप्त (335-380 ई.)
    रामगुप्त
    विक्रम=चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (380-415ई.)
    गयाबन्द=गोबिन्दगुप्त
    कुमार=कुमारगुप्त महेन्द्रादित्य (415-455 ई.)
    स्कंद=स्कंदगुप्त शकादित्य (455-467 ई.)
    पुर=पुरुगुप्त प्रकाशादित्य(468-469 ई.)
    नरसिंह गुप्त बालादित्य-कुमारगुप्त2-,
    बुधगुप्त (शकादित्य का पुत्र) (466-500ई.)
    तथागत-भानुगुप्त बालादित्य-वज्र 540 ई.तक)
    गुप्त राजवंश पांच सौ चालीस में हो गया पस्त!

    मगर गुप्त राजवंश साहित्य कला व दर्शन में था
    अभूतपूर्व बेजोड़ विकसित हर लक्ष्य हुआ हस्तगत!

    हिन्दू धर्म संस्कृति और हिन्दुत्व के उत्थान की
    ये इतिहास कथा विश्रुत रोमांचक और जबरदस्त!

    आन्ध्र-सातवाहन के पश्चात दक्कन में
    विन्ध्यशक्ति के नेतृत्व में वाकाटक राजवंश उभरा
    वाकाटक दौर में मगध था मुरुण्ड व लिच्छवी का डेरा
    वाकाटकों ने उन्हें पराजित कर सामंत कोट वंश को संवारा!

    दो सौ पचहत्तर ई.में श्रीगुप्त था प्रयाग अवध का सामंत
    जिनके पौत्र घटोत्कचपुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम ने वैशाली की
    लिच्छवी राजकन्या कुमारदेवी से किया वैवाहिक सम्बन्ध
    और लिच्छवी गण के सहयोग से कोट राजा की हत्याकर
    मगध की राज सत्ता हासिल करने का कर लिया प्रबंध!

    किन्तु वाकाटक प्रवरसेन के समर्थन में
    मगध मंत्रिमंडल ने पुनः कोट राजवंश को बिठा दिया
    पर चन्द्रगुप्त ने कुमारदेवी संग स्वर्ण सिक्का जारीकर
    मगध तक तीन सौ बीस ईस्वी में सिक्का जमा लिया
    और उपाधि धारण कर ली महाराजाधिराज की स्वतंत्र!

    तीन सौ पैंतीस में चन्द्रगुप्त पुत्र समुद्रगुप्त ने सत्ता संभाली
    प्रवरसेन की मृत्यु उपरांत पाटलिपुत्र से कोट को हटा दिया
    समुद्रगुप्त थे कवि संगीतकार उद्भट वीर शासक दिग्विजयी
    समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण ने लिखी प्रयाग प्रशस्ति
    अशोक मौर्य के इलाहाबाद कोसम अभिलेख में खुदवा दिया!

    ये समुद्रगुप्त के सैन्य विजय का घोषणापत्र था ऐसा
    आर्यावर्त के नौ व आटविक वन राज्यों पर जयगाथा!

    समुद्रगुप्त ने अहिच्छत्र के अच्युत, पद्मावती के नागसेन
    मथुरा के गणपति नाग को पराजित किया औ’ शक कुषाण
    सिंहलद्वीप के शासकों से उपहार लिया जबकि दक्षिण से
    नजराना लेके प्रयाग से बंगाल तक राजाओं को जीत लिया!

    समुद्रगुप्त था विष्णुभक्त, अश्वमेध यज्ञ पुनर्जीवित कर्ता,
    विद्यासंरक्षक, जारी किया वीणा बजाते हुए स्वर्ण सिक्का,
    समुद्रगुप्त की अनुमति लेके सिंहलद्वीप राजा मेघवर्मन ने
    बोधगया में सराय बनाया, समुद्रगुप्त नेपोलियन कहलाता!

    विशाखदत्त के देवीचन्द्रगुप्तम् नाटक से ज्ञात होता
    कि समुद्रगुप्त के बाद रामगुप्त बैठा था सिंहासन पर
    रामगुप्त कापुरुष निकला शक आक्रांता की चाव पर
    अपनी महारानी ध्रुवस्वामिनी को लगा दिया दांव पर!

    अनुज चन्द्रगुप्त ने शक आक्रांता और भ्राता को मारकर
    महारानी की अस्मत बचाई, भाभी से विवाह रचा लिया
    चन्द्रगुप्त ने दूसरा विवाह नागवंशी कुबेरनागा से किया
    जिनकी पुत्री प्रभावती बनी वाकाटक रुद्रसेन।।की ब्याहता!

    चन्द्रगुप्त द्वितीय महावीर था विक्रमादित्य उपाधिधारक
    उज्जैन सहित पूरे मालवा, सौराष्ट्र, गुजरात विजय किया
    और उदयगिरि गुहालेख में लिखाया चन्द्रगुप्त के सेनापति
    वीरसेन ने पश्चिमी शक क्षत्रप रुद्रसिंह तृतीय को जीतकर
    मगध में मिलाया उज्जयिनी को द्वितीय राजधानी बनाया!

    चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के दरबार में नवरत्न थे
    खगोलविद वराहमिहिर, संस्कृत के महाकवि कालिदास सा
    कालिदास की कृति अभिज्ञानशाकुन्तलम्, कुमारसम्भवम्,
    मेघदूतम, मालविकाग्निमित्रम, विक्रमोर्वशीयम् व रघुवंशम्!

    रघुवंशम् और कुमारसम्भवम् द्विअर्थी रचना कहलाती
    प्रत्यक्ष: राम पूर्वज चरित्र, शिव पार्वती पुत्र स्कंद जन्म
    परोक्षत: गुप्तों का दिग्विजय और स्कंदगुप्त का वर्णन
    चन्द्रगुप्त।‌। काल संस्कृत पढ़ने आया चीनी फाहियान!

    चन्द्रगुप्त द्वितीय ने महरौली दिल्ली में स्थापना की लौहस्तंभ
    जिसमें लगा नहीं आजतक जंक, चमक हुई नहीं कभी भी कम!

    कुमारगुप्त चार सौ पंद्रह ईस्वी में पाटलिपुत्र की गद्दी में बैठा
    जो था चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य व ध्रुवस्वामिनी का बेटा!

    कुमारगुप्त ने ही नालंदा में विश्वविद्यालय की स्थापना की थी
    जिनका पुत्र स्कंदगुप्त शकादित्य शक और पुष्यमित्रों का विजेता
    चन्द्रगुप्त मौर्य के सुदर्शन झील पर बांध व विष्णुस्तंभ निर्माता!

    फिर पुरुगुप्त महेंद्रादित्य, आगे भानुगुप्त बालादित्य से पराजित
    हुआ मिहिरकुल जो था शिवभक्त पर अत्यंत क्रूर हूण महाराजा
    गुप्तकाल में हुआ पुनरुत्थान वैदिक धर्म संस्कृति व संस्कृत का!
    —विनय कुमार विनायक

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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