“गुरुकुल ब्रह्मचारियों को विद्या देने के साथ उन्हें तपस्वी बनाता हैः स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
दिनांक 11-8-2019 को देहरादून स्थित गुरुकुल पौंधा में 28 नये
प्रविष्ट ब्रह्मचारियों के वेदारम्भ एवं उपनयन संस्कार सम्पन्न किये गये।
प्रातः 7.00 बजे संस्कार विधि में दिये गये विधि विधान के अनुसार उपनयन
एवं वेदारम्भ संस्कार अनेक आचार्यों, विद्वानों, गुरुकुल के ब्रह्मचारियों के
अभिभावकों एवं स्थानीय निवासियों की उपस्थिति में सोल्लास सम्पन्न
हुआ। संस्कार के मध्य में गुरुकुल के संस्थापक स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती
जी का सम्बोधन हुआ। उन्होंने कहा कि हमारे देश का संविधान डा0 भीमराव
अम्बेडकर जी ने बनाया है। सृष्टि के आरम्भ में एक संविधान राजर्षि महर्षि
मनु ने भी दिया है जिसे मनुस्मृति के नाम से जाना जाता है। स्वामी जी ने
कहा कि मनु जी के संविधान की बहुत सी बातें भारत के संविधान में भी हैं।
मनु के संविधान की एक विशेषता यह है कि इसमें विधान है कि गृहस्थी बनने का उस व्यक्ति, कन्या व युवक को अधिकार है
जिसने चारों वेद पढ़े हों। चार नहीं तो तीन, तीन नहीं तो दो अथवा न्यूनातिन्यून एक वेद तो अवश्य ही कन्या व युवक द्वारा पूरा
पढ़ा होना चाहिये। स्वामी जी ने बताया कि विद्या स्नातक वह होते हैं जिन्होंने वेद एवं वेदांगों का अध्ययन किया हो और इन
ग्रन्थों में दक्षता व प्रवीणता प्राप्त की हो। विद्या स्नातक तभी होते हैं जब कि पूरी विद्या प्राप्त कर ली जाती है। व्रत स्नातक
वह ब्रह्मचारी होते हैं जो विद्या में तो कमजोर हो सकते हैं परन्तु वह जो भी व्रत व संकल्प धारण करते हैं उनका पूरा पूरा पालन
करते हैं। स्वामी जी ने आगे कहा कि पुराने ब्रह्मचारी कठोर परिश्रम करने वाले होते थे। वह पहाड़ की कठोर चट्टानों में भी निद्रा
का सुख प्राप्त करते थे। आजकल के विद्यार्थियों व युवकों को बिना कोमल गद्दों के नींद नहीं आती। स्वामी जी ने कहा कि
गुरुकुल ब्रह्मचारियों को विद्या देने के साथ तपस्वी बनाता है। स्वामी जी ने कहा कि तीसरे स्नातक विद्या-व्रत-स्नातक
कहलाते हैं। यह वह स्नातक होते हैं जिन्होंने विद्या एवं ब्रह्मचर्य आदि व्रतों का पूरा पूरा पालन किया होता है। स्वामी
प्रणवानन्द जी ने आगे कहा कि यज्ञ करने से पूर्व ब्रह्मचारियों को यज्ञोपवीत दिया जाता है। यज्ञोपवीत विद्या का सूत्र है। यह
ज्ञान का प्रतीक होता है। स्वामी जी ने यज्ञोपवीत के तीन धागों की चर्चा की तथा इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला।
स्वामी जी ने यह भी बताया कि परमात्मा मनुष्यों के कल्याण के लिये वह क्या-क्या करता है? उन्होंने सब मनुष्यों को
ईश्वर का ध्यान वा सन्ध्या करने की प्रेरणा की। स्वामी जी ने कहा कि माता-पिता सब सन्तानों के पूजनीय होते हैं। प्रत्येक
सन्तान को अपने माता-पिता की सेवा हर स्थिति में करनी चाहिये। स्वामी जी ने छोटे बच्चों के विवाह को हानिकारक बताया।
स्वामी जी ने समाज के ऋण की चर्चा की और कहा कि समाज के विद्वान व अन्य लोगों जिनसे हमें किसी भी प्रकार का लाभ
मिलता है, वह हमारे पूजनीय होते हैं। स्वामी जी ने आगे कहा कि ब्रह्मचारियों पर समाज, माता-पिता तथा परमेश्वर का ऋण
होता है। वेदाज्ञाओं का पालन करने की स्वामी जी ने ब्रह्मचारियों को सलाह दी। वेद पढ़ कर ही गृहस्थी बनने की महत्ता व
आवश्यकता पर स्वामी जी ने प्रकाश डाला। स्वामी जी ने उस कहावत की ओर भी श्रोताओं का ध्यान आकर्षित किया जिसमें
कहा जाता है कि यदि किसी परिवार का कोई व्यक्ति संन्यासी बन जाये तो उससे पहले और बाद की सात-सात पीढ़िया तर
जाती हैं। स्वामी जी ने यह भी कहा कि अनध्याय हमारी संस्कृति में नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि मनुस्मृति का संविधान लागू
हो जाये तो देश व संसार में कोई समस्या न रहे।

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कार्यक्रम का संचालन गुरुकुल के आचार्य डा0 धनंजय जी ने किया। आचार्य जी ने ब्रह्मचर्य का महत्व बताया। उन्होंनें
कहा कि जिस देश व समाज की युवा पीढ़ी ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करती, उस देश का पतन हो जाता है। जिस देश व समाज में
ब्रह्मचर्य का पालन होता है वह देश व समाज उन्नति करता है। आचार्य धनंजय जी ने कहा कि संसार की सभी सभ्यताओं का
आरम्भ भारत की संस्कृति व सभ्यता के प्रचार से हुआ है। उन्होंने स्वामी दयानन्द जी के वचनों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि
भारत के छूने से विदेशी दरिद्र समृद्ध हुए हैं। आचार्य जी के अनुसार हमारे देश के गृहस्थी अपनी सन्तानों का निर्माण नहीं कर
पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश के युवा धन तो कमा रहे हैं परन्तु वह अपने माता-पिता की सेवा से दूर हो रहे हैं। आधुनिक सन्तानें
माता-पिता की सेवा व उनकी आज्ञाओं की उपेक्षा करती हैं। उन्होंने वृद्धाश्रमों की संख्या में वृद्धि का प्रमुख कारण सन्तानों की
अपने माता-पिताओं की उपेक्षा को बताया।
आचार्य धनंजय जी ने कहा कि जहां सन्तानें सुसंस्कृतज्ञ हैं वहां परिवार में सुख व शान्ति है। आचार्य जी के अनुसार
ब्रह्मचर्य का पालन करने से हमारा जो कल्याण होता है वह अन्य किसी प्रकार से नहीं होता। हमें गायत्री मन्त्र के अर्थ व भावना
के अनुसार अपने जीवन को बनाना होगा। आचार्य जी ने कहा कि गुरुकुल की विशेषता है कि यहां आचार्य और सभी ब्रह्मचारियों
का हृदय व चित्त एक जैसा होता है। उन्होंने आगे कहा कि आचार्य की अपने ब्रह्मचारियों को यह शिक्षा होती है कि तुम सदा सत्य
बोला करो तथा प्रिय बोला करो। उन्होंने आह्वान किया कि कि हम सबको मिलकर गुरुकुल की परम्परा को आगे बढ़ाना है और
महर्षि दयानन्द जी के स्वप्न को पूरा करना है। आचार्य धनंजय जी के उपदेश के बाद भी संस्कार यज्ञ की प्रक्रिया जारी रही।
प्रसिद्ध एवं वरिष्ठ वैदिक विद्वान डा0 रघुवीर वेदालंकार ने गायत्री मंत्र के तीनों पादों का सभी ब्रह्मचारियों को
उपदेश किया। आचार्य रघुवीर जी के कहने पर आचार्य धनंजय जी ने गायत्री मन्त्र का ऋषि दयानन्द कृत अर्थ पुस्तक से पढ़कर
सुनाया। डा0 रघुवीर जी ने उस वेदमन्त्र का पाठ भी किया जिसमें कहा गया है कि आचार्य और उसके ब्रह्मचारी का हृदय व चित्त
एक समान हो। मन्त्र और उसके अर्थ को ब्रह्मचारियों ने भी दोहराया। आचार्य जी व ब्रह्मचारियों ने कहा कि उन दोनों के मन,
हृदय व विचार एक हो जायें। ब्रह्मचारियों को डा0 रघुवीर वेदालंकार जी ने कहा कि उन्हें अपने आचार्यों की बातों को ध्यान
लगाकर वा दत्तचित्त होकर सुनना चाहिये। इसी बीच नये ब्रह्मचारियों की कमर में मेखला बांधी गयी। विद्वान वक्ता ने बताया
कि मेखला धारण करने से ब्रह्मचारियों को हर्निया रोग नहीं होता। यह भी कहा कि यह हमारी प्राचीन परम्परा है जो कि अब छूट
गई है। मेखला बांधते हुए आचार्य धनंजय जी ने कहा कि मेखला ब्रह्मचर्य की रक्षा करने में सहायक होती है। इसके बाद
ब्रह्मचारियों को दण्ड प्रदान किये गये। महर्षि के वचनों को भी स्मरण किया गया जिसमें उन्होंने कहा है कि यह आर्ष परम्परा
ऐसी है कि जैसे समुद्र में एक गोता लगाना और बहुमूल्य मोतियों का पाना है। इसके बाद उड़ीसा के आचार्य योगेन्द्र उपाध्याय
जी ने संस्कार विधि से पितृोपदेश पढ़कर सुनाया। उन्होंने अपना उपदेश संस्कृत में पढ़ा। आचार्य योगेन्द्र उपाध्याय व्याकरण
एवं निरुक्त आदि शास्त्रों के वरिष्ठ व प्रामाणिक विद्वान माने जाते हैं। बाद में हमारा उनसे वार्तालाप भी हुआ। आचार्य योगेन्द्र
उपाध्याय अप्रैल 2019 में पुणे में डीएवी स्कूल एवं कालेज प्रबन्ध समिति की ओर से वैदिक विद्वान के रूप में सम्मानित हुए हैं।
आचार्य धनंजय जी ने उपाध्याय जी द्वारा संस्कृत में पढ़े उपदेश का हिन्दी में भाव स्पष्ट करके ब्रह्मचाचरियों को बताया।
उन्होंने ब्रह्मचारियों को अपने आहार पर नियंत्रण रखने का उपदेश भी किया। इसके बाद संस्कार विधि के अनुसार भिक्षा
मांगने की परम्परा का निर्वाह किया गया। इस परम्परा के बाद संस्कार यज्ञ की शेष आहुतियां दी गई। पूर्णाहुति सम्पन्न की
गई। यज्ञ सम्पन्न होने के बाद गुरुकुल के कुछ उच्च कक्षाओं के ब्रह्मचारियों ने संस्कृत में एक गीत का उच्चारण किया। इसके
अनन्तर यज्ञ प्रार्थना का पाठ सबने मिलकर किया।
डा0 रघुवीर वेदालंकार जी ने संस्कार यज्ञ में नये ब्रह्मचारियों के आचार्य की भूमिका का निर्वहन किया। आचार्य के रूप
में उपदेश करते हुए उन्होंने सभी ब्रह्मचारियों से अपने अपने गोत्र का उच्चारण करने को कहा। जिनको अपना गोत्र पता नहीं
था उन्होंने दयानन्द को गोत्र मानकर उसका उच्चारण किया। डा0 रघुवीर वेदालंकार जी ने कहा कि प्रिय ब्रह्मचारियों! तुम
आत्मिक बल से युक्त हो। तुममें किसी प्रकार का अभाव न हो। तुम सदैव प्रसन्न रहो। तुम ब्रह्मचर्य का पूरी सजगता से पालन

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करो। ब्रह्मचारी को रोग नहीं होते हैं। आहार, निद्रय, संयम आदि नियम तोड़ने से रोग होते हैं। आप सांगोपांग वेद को ग्रहण
करने का संकल्प लो और उसे पूरा करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहो। आप लोग जब विद्या पूरी कर ले तो हमें पुनः आपके
दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हो।
डा0 रघुवीर वेदालंकार जी ने बताया कि सन् 1960 में हम गुरुकुल झज्जर पढ़ने के लिये गये थे। स्वामी ओमानन्द जी
ने हमारा उपनयन एवं वेदारम्भ संस्कार किया था। उन्होंने कहा था कि यह गुरुकुल तपस्या की स्थली है। तुम तपस्या करोगे तो
कुन्दन बन जाओगे। लोहे पर जंग लग जाता है। हम यह तो नहीं कहते कि हम स्वर्ण बने हैं अपितु यह कहते हैं कि हम ऐसे लोहे
बने हैं जिन पर जंग नहीं लगा व लगता। हम शुद्ध लोहा तो बने ही हैं। डा0 रघुवीर वेदालंकार जी ने आगे कहा कि कुछ ब्रह्मचारी
पढ़ लिखकर सफल होते हैं कुछ नहीं। अपने आचार्य के उपदेश को ध्यान में रखने पर तुम सफल हो सकते हो। परमात्मा व
आचार्य दोनो अग्निस्वरूप हैं। उनकी तरह हम भी तेजस्वी बनें। आचार्य रघुवीर जी ने कहा कि हमने वेद को समझने की
योग्यता तो प्राप्त की है। मनुष्य को अपना कोई न कोई लक्ष्य तो बनाना ही चाहिये।
आचार्य डा0 रघुवीर वेदालंकार जी ने ब्रह्मचारियों को कहा कि तुम्हें अपने आचार्य के अनुरूप अपना जीवन बनाना है।
अपने आचार्यों से शिक्षा लीजिये और उनके गुणों को ग्रहण करें व उनका अनुकरण करें। आचार्य जी ने कहा कि गायत्री मन्त्र
सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है। यह मैं पूरे विश्वास से कहता हूं कि यदि आप एक वर्ष तक पूरी निष्ठा से गायत्री मन्त्र का जप करेंगे तो आपकी
बुद्धि बदल जायेगी। गायत्री मन्त्र के जप वा पाठ से सबका कल्याण होता है। आचार्य जी ने ब्रह्मचारियों को गायत्री मन्त्र का
अर्थ भी बताया। उन्होंने कहा कि हम परमात्मा का ध्यान करें और उसके तेज को भी धारण करें। परमात्मा का ध्यान करने से
जीवन शुद्ध बन जाता है। आचार्य जी ने श्रद्धापूर्वक गायत्री मन्त्र की उपासना करने की सलाह दी। हम परमात्मा से प्रार्थना करें
कि वह हमारी बुद्धियों को श्रेष्ठ मार्ग पर चलायें।
विद्या सब मनुष्यों को पढ़नी चाहिये। व्रतों का पालन सब कर सकते हैं। व्रत का पालन करने वाला मनुष्य कभी चरित्र
व नैतिकता से नहीं गिर सकता जबकि विद्वान गिर सकता है। विद्वान सब नहीं हो सकते परन्तु धर्मात्मा सभी हो सकते हैं।
आचार्य रघुवीर जी ने स्वामी दयानन्द के विद्यागुरु दण्डी स्वामी विरजानन्द जी के किशोर वा युवावस्था में ऋषिकेश में गंगा
नदी में आकण्ठ जल में खड़े होकर गायत्री मन्त्र का जप करने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वह ऐसे विद्वान बने जिन्होंने
स्वामी दयानन्द जी जैसे योग्यतम शिष्य को बनाया। आचार्य जी ने ब्रह्मचारियों से कहा कि तुम भी व्रती और विद्वान बनों।
गायत्री मन्त्र का पाठ मुनष्य को जीवन में आगे बढ़ाता है। अपने उपदेश को विराम देते हुए आचार्य जी ने कहा कि आप मन से
और शरीर दोनों से पवित्र हों तथा ब्रह्मचारी हों। आचार्य जी ने ब्रह्मचर्य का महत्व बताया। सभी ब्रह्मचारियों को उन्होंने
आशीर्वाद दिया।
आचार्य डा0 यज्ञवीर जी ने अपने सम्बोधन में व्रत के विषय में विचार व्यक्त किये। उन्होंने व्रत धारण करने और
उसका पालन करने की महत्ता बताई। उन्होंने ब्रह्मचारियों को कहा कि आप जब तक यहां रहकर वेद नहीं पढ़ लेते, तब तक
आपको यहां से अपने घरों को जाने का अधिकार नहीं है। ऋषि पतंजलि का उल्लेख कर उन्होंने कहा कि सच्चे ब्राह्मण को बिना
किसी कारण व प्रयोजन के, बिना लोभ व स्वार्थ के, वेद व वेदांगों का अध्ययन करना चाहिये। आचार्य जी ने कहा कि ऋषि
दयानन्द सच्चे ब्राह्मण थे। उन्होंने कहा कि जो ईश्वर व वेद को यथार्थ रूप में जानता है वह ब्राह्मण होता है। उन्होंने मनु का
उल्लेख कर कहा कि जो वेद को छोड़कर दूसरे ग्रन्थों में श्रम करता है वह शूद्रत्व वा अज्ञानता को प्राप्त होता है। ऐसे मनुष्यों को
श्रेष्ठ कामों से पृथक व वंचित करने का विधान है। आचार्य यज्ञवीर जी ने ब्रह्मचारियों से कहा कि वह ब्रह्म-मुहुर्त में उठें और
धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष का चिन्तन करें। उन्होंने ब्रह्मचारियों को वेदाध्ययन करने का संकल्प लेने को कहा।
गुरुकुल के पूर्व ब्रह्मचारी एवं सम्प्रति प्रवक्ता डा0 रवीन्द्र कुमार ने कहा कि हम संस्कार संबंधी अपने कर्तव्यों से
विमुख हो गये हैं। प्रत्येक गृहस्थी को संस्कार विधि पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिये। उन्होंने कहा कि मनु के अनुसार बालक जब
जन्म लेता है तो वह शूद्र वा अज्ञानी होता है। विद्या पढ़कर अर्जित योग्यता के अनुसार उसका वर्ण बनता है। डा0 रवीन्द्र कुमार

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जी ने कहा कि आज विडम्बना है कि हम सदुपदेशों को सुनना ही नहीं चाहते। उन्होंने कहा कि हमारी विद्या पवित्र होनी चाहिये।
उन्होंने बताया कि विद्या वह होती है जो हमें मुक्ति तक ले जाये व उसे प्राप्त भी कराये। उन्होंने यह भी कहा कि आज हम अर्थ
व काम को ही जीवन का लक्ष्य बनाये हुए हैं और हमने धर्म और मोक्ष को छोड़ दिया है। रवीन्द्र जी ने वर्तमान शिक्षा के नाम पर
बच्चों को जो पढ़ाया जाता है उसकी समीक्षा की। उन्होंने कहा कि हमें यह पता ही नहीं है कि हमारे बच्चों को स्कूल में क्या
पढ़ाया जाता है। स्कूलों में संस्कार, नैतिकता, धर्म आदि की शिक्षा नहीं है। माता-पिता के पास अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने
व दिलाने के लिये समय नहीं है। उन्होंने कहा कि माता-पिता का सबसे बड़ा धन उनकी सन्तानें हैं। रवीन्द्र जी ने कहा कि सुपुत्र
व कुपुत्र दोनों के लिये माता-पिता को धन का संचय करने आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि संस्कारों की शिक्षा हमारे
गुरुकुलों में ही मिलती है। आचार्य रवीन्द्र जी ने ध्यान दिलाया और कहा कि हम जितने कठोर अनुशासन में रहेंगे उतना ही
हमारा भविष्य अच्छा होगा। उन्होंने आगे कहा कि वैदिक ज्ञान-विज्ञान सहित संस्कारों से हम अपने जीवनों को सफल व
उपयोगी बना सकते हैं। कार्यक्रम के संचालन डा0 धनंजय आर्य ने कहा कि जिससे शरीर तथा आत्मा की पवित्रता होती है, उसे
संस्कार कहते हैं। आचार्य धनंजय जी ने सब ब्रह्मचारियों को व्यवहारभानु पुस्तक पढ़ने की प्रेरणा की और उसकी महत्ता को
बताया। विद्वान आचार्य धनंजय ने स्वामी श्रद्धानन्द जी का भी उल्लेख किया और उनके जीवन से भी प्रेरणा ग्रहण करने का
सलाह दी।
स्वामी प्रणवानन्द जी ने कार्यक्रम की समाप्ती से पूर्व ब्रह्मचारियों को उपदेश करते हुए कहा कि संस्कार नाम है गुणों
का आधान करने का। इस परिवर्तनशील संसार में कोन है जो आकर जाता न हो और जाकर आता न हो? संसार में संस्कारित
व्यक्ति का जीवन ही सफल होता है। स्वामी जी ने बताया कि गाय के दूध और माता के दूध के गुणों में सामीप्यता है। स्वामी जी
ने कहा कि ऐसे कुत्ते देखे गये हैं जो सीखाने पर बहुत सी बाते सीख जाते हैं परन्तु उनके पास मनुष्य के समान अपनी आत्मिक
और सामाजिक उन्नति करने के लिए ज्ञान ग्रहण करने की सामर्थ्य नहीं है। उन्होंने बताया कि एक कुत्ता अपनी स्वामिनी
गृहिणी का वस्त्र पकड़कर बाहर खींच रहा था। वह महिला बाहर आ गई। कुछ ही क्षणों बाद वह भवन भूकम्प के झटकों से गिर
गया और उस कुत्ते सहित उस गृहिणी की जान बच गई। स्वामी जी ने बताया कि कुत्तों में भूकम्प के आने से पहले उसके होने का
ज्ञान हो जाता है। यह परमात्मा की उनको एक अद्भुद देन है। स्वामी जी ने कहा कि पशुओं में स्वाभाविक ज्ञान तो है परन्तु वह
वेद नहीं पढ़ सकते। उन्होंने कहा कि बिना वेद पढ़े, उसे समझे और उस पर आचरण किये बिना किसी मनुष्य की मुक्ति नहीं हो
सकती।
स्वामी प्रणवानन्द जी ने मां के गर्भ में सन्तान पर पड़ने वाले संस्कारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने जन्म के बाद
प्रथम संस्कार जातकर्म संस्कार पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जातकर्म तथा नामकरण संस्कार में बच्चे की जिह्वा पर
सोने की श्लाका से ‘ओ३म्’ शब्द लिखे जाने का विशेष महत्व होता है। स्वामी जी ने अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की आत्मा पर माता
की गर्भावस्था में पड़े संस्कारों का भी उल्लेख किया। स्वामी जी ने बताया कि परमात्मा का मुख्य नाम ओ३म् है। परमात्मा में
अनन्त गुण हैं अतः उसके गौणिक नाम अनन्त हैं। हमारा मुख्य नाम वेद है। हमारा मुख्य काम वेदों को पढ़ना है। उन्होंने कहा
कि हमारे समाज में संस्कारों की परम्परा होगी तो हमारे बच्चे अच्छे बनेंगे। स्वामी जी ने कहा कि केवल विद्या से ही कल्याण
नहीं होगा अपितु इसके लिये व्रती बनना आवश्यक है। उन्होंने ब्रह्मचारियों से कहा कि आप विद्या-व्रत-स्नातक बनना। आप
अविद्यान्धकार का छेदन करने में समर्थ हों। स्वामी जी ने व्यस्त रहने का महत्व भी सबको बताया। स्वामी जी ने बताया कि
मेरी दोनों आंखे अपनी नहीं हैं अपितु मृतक दानियों की प्रदान की हुई हैं। मैं तीन वर्षों तक नेत्र दृष्टि से वंचित रहा। मुझे इन
आंखों का जितना महत्व पता है उतना अपनी आंखे रखने वाले नहीं जानते। इस आधार पर उन्होंने कहा कि हमारा जीवन बहुत
अनमोल है। जीवन में विद्या को प्राप्त कर इस जीवन का सदुपयोग करें। स्वामी जी ने मोक्ष मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी और
कहा कि हम सबको ऋषि दयानन्द के बताये पथ पर चलना है। इसी के साथ ही उपनयन एवं वेदारम्भ संस्कार सम्पन्न हुआ।

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इसके बाद सभी लोगों ने मिलकर स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लिया। कुछ लोगों ने गुरुकुल को दान दिया। कार्यक्रम
अत्यन्त आनन्द देने वाला था। आंखों ने इस कार्यक्रम में बहुत ही भद्र एवं सुखद दृश्यों के दर्शन किये। जो लोग यहां उपस्थित
थे, ऐसा लगता है कि यह उनके किन्हीं शुभ कर्मों का फल था। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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