हैवानियत का सिलसिला

अरविंद जयतिलक

हैदराबाद में महिला डाॅक्टर की दुष्कर्म के बाद नृशंस हत्या और शव को जलाने की घटना ने देश उद्वेलित और मर्माहत है। यह घटना 2012 के उस निर्भया कांड की याद दिला दी है जब देश उबल पड़ा था। आज भी सड़के से लेकर सोशल मीडिया पर वैसा ही उबाल है। तब केंद्र सरकार ने लोगों के गुस्से को देखते हुए यौन शोषण से जुड़े कानून में बदलाव के लिए जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में समिति गठित की और उनकी सिफारिशों पर कानून में बदलाव किया। उसके बाद महिला अत्याचार विरोधी निर्भया कानून और ‘क्रिमिनल लाॅ (अमेंडमेंट) आॅर्डिनेंस, 2018’ के तहत 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म मामले में फांसी की सजा मुकर्रर की गयी। लेकिन इसके बावजूद भी बेटियां दिन के उजाले और रात के अंधेरे में महफूज नहीं हैं। यह रेखांकित करता है कि समाज और सिस्टम नींद की गोलियां लेकर सो रहा है और बेटियों की अस्मत के लूटेरे चील-कौवें आजाद है। यह घटना महज कुछ शैतानों की दरिंदगी की इंतेहा भर नहीं है। यह घटना सड़-गल चुके सिस्टम और कानून-व्यवस्था की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा भी है। सत्ता और समाज भले ही इस घटना पर छाती पीटे अथवा आंसू टपकाए लेकिन सवाल जस का तस है कि इससे क्या फर्क पड़ता है? फर्क तो तब पड़ता न जब समाज के भेड़िए कानून से डरते और उनके मन में खौफ पैदा होता। फर्क तब पड़ता जब राजसत्ता के जिम्मेदार नुमाइंदे बेटियों की सुरक्षा व सलामती की गारंटी लेते। फर्क तो तब पड़ता जब अदालतें गुनाहगारों को शूली पर लटका दुष्कर्मियों को उनके किए की सजा देती। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। आज उसी का नतीजा है देश में प्रतिदिन पांच दर्जन से अधिक बच्चियों के साथ दुष्कर्म हो रहा है। यह वह आंकड़ा है जो पुलिस द्वारा दर्ज किए जाते हैं। अधिकांश मामले में तो पुलिस रिपोर्ट ही दर्ज नहीं करती है। या यों कहें कि लोकलाज के कारण लोग मुकदमा दर्ज कराने से बचते हैं।

समझना होगा कि जब तक यौन उत्पीड़न के मामले में शत-प्रतिशत गुनाहगारों को सजा नहीं मिलेगी तब तक बेटियों पर अत्याचार का सिलसिला थमने वाला नहीं है। आंकड़ों पर गौर करें तो दुष्कर्म मामलों में सजा की दर बेहद कम है। चिल्ड्रेन फाउंडेशन की ओर से बाल यौन उत्पीड़न पर जारी रिपोर्ट में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि विगत कुछ वर्षों में बच्चों के खिलाफ अपराध की घटनाओं में 84 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसका सीधा तात्पर्य यह हुआ कि कानून और पुलिसिया तंत्र अपना काम ठीक से नहीं कर रहा है। आंकड़े बताते हैं कि पुलिस को 2017 में 46,965 मामलों की जांच करनी थी। इनमें 14,406 केस पहले से लंबित थे और 32,559 नए दर्ज हुए। पुलिस ने इनमें से 4364 केस बंद कर दिए और 28750 में चार्टशीट लगाए। बाकी 13,765 केस अगले साल के लिए लंबित छोड़ दिए। दुष्कर्म के बाद हत्या वाले मामलों में भी 2016 के 108 मामले लंबित थे। 2017 में 223 नए मामले दर्ज हुए। यह आंकड़ा दर्शाता है कि पुलिस की कार्यशैली कितनी सुस्त और निराशाजनक है। अदालतों की बात करें तो 2017 में निचली अदालतों में दुष्कर्म के 1,46,201 मामले थे जिनमें से 1,17,451 पुराने मामले थे। इनमें ट्रायल कोर्ट में सिर्फ 18099 मामलों में ही सुनवाई हो सकी। 5,822 यानी 32.2 प्रतिशत मामलों में ही दोष सिद्ध हुए। वर्ष 2016 में यौन अपराध से बच्चों के संरक्षण संबंधी कानून पोस्को के तहत 48060 मामले जांच के लिए दर्ज किए गए जिनमें से सिर्फ 30851 मामले सुनवाई के लिए अदालत भेजे गए। यानी गौर करें तो 36 प्रतिशत मामले जांच के लिए लंबित रह गए। वर्ष 2014-16 के दौरान पोस्को के तहत सिर्फ 30 प्रतिशत दोष सिद्ध हुए। हालांकि राहत की बात यह है कि 2015 के मुकाबले 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई। आंकड़ों पर गौर करें तो 2006 में यौन उत्पीड़न मामले में सजा की दर 51.8 प्रतिशत, 2007 में 49.9, 2008 में 50.5 और 2009 में 49.2 प्रतिशत रही। यह रेखांकित करता है कि अदालतों में यौन शोषण से जुड़े मामलों की सुनवाई की गति बेहद सुस्त है और सजा की दर भी कम है।

ऐसे में अपराधियों के मन में कानून को लेकर भय नहीं है तो यह स्वाभाविक ही है। इन आंकडों से साफ है कि बलात्कार के अधिकतर मामलों में अपराधी सजा से बच निकल जा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं पर होने वाले समग्र अत्याचारों में केवल 30 प्रतिशत गुनाहगारों को ही सजा मिल पाती है। एनसीआरबी के रिपोर्ट की मानें तो बाल यौन उत्पीड़न के लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। यदि इसकी सुनवाई इसी गति से चलती रही तो 2018 तक के लंबित मामलों को ही निपटाने में तीन दशक लग जाएंगे। राज्यवार आंकड़ों पर गौर करें तो पंजाब में लंबित मामलों को निपटाने में दो वर्ष जबकि गुजरात, पश्चिम बंगाल, केरल, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में इनका निपटारा होने में 60 वर्ष से भी ज्यादा समय लग सकता है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2015 और 2016 में बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मात्र दस प्रतिशत मामलों की सुनवाई पूरी हो सकी है। एनसीआरबी के आंकड़ों की मानें तो इस समय देश में डेढ़ लाख से अधिक बलात्कार के मुकदमें अदालतों में लंबित हैं। ध्यान देना होगा कि जब तक यौन उत्पीड़न मामले में सजा की दर में वृद्धि नहीं होगी उत्पीड़नकर्ताओं के मन में खौफ पैदा नहीं होगा। यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि बेटियां सिर्फ सड़कों व सार्वजनिक स्थानों पर ही असुरक्षित नहीं हैं बल्कि अपने घर-परिवार और रिश्ते-नातेदारों की जद में भी असुरक्षित हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करेें तो रिश्तेदारों द्वारा बलात्कार किए जाने की घटनाओं में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि हुई है। दुष्कर्म की घटनाओं में तकरीबन 95 प्रतिशत मामलों में बेटियां दुष्कर्मी को अच्छी तरह जानती-पहचानती है लेकिन उसके खिलाफ अपना मुंह खोलने से डरती हैं। शायद उन्हें भरोसा ही नहीं होता कि कानून ऐसे गुनाहगारों की गर्दन दबोच सकेगा। यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘हिडेन इन प्लेन साइट’ से उजागर हो चुका है कि भारत में 15 साल से 19 साल की उम्र वाली 34 प्रतिशत बेटियां ऐसी हैं, जो अपने साथी के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा झेलती हैं। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 साल से 19 साल तक की उम्र वाली 77 प्रतिशत बेटियां यौन क्रिया में जबरदस्ती का शिकार हुई हैं। इसी तरह 15 साल से 19 साल की उम्र वाली लगभग 21 प्रतिशत बेटियां 15 साल की उम्र से ही हिंसा झेली हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन बेटियों की शादी नहीं हुई, उनके साथ शारीरिक हिंसा करने वालों में पारिवारिक सदस्य, मित्र, जान-पहचान के व्यक्ति और शिक्षक होते हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष तथा वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर पर रिसर्च आॅन वुमेन’(आईसीआरडब्ल्यु) से भी उद्घाटित हो चुका है कि भारत में 10 में से 6 पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी अथवा प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार किया है। रिपोर्ट के मुताबिक 52 प्रतिशत महिलाओं ने स्वीकार किया है कि उन्हें किसी न किसी तरह हिंसा का सामना करना पड़ा है। इसी तरह 38 प्रतिशत बेटियों ने घसीटे जाने, पिटाई, थप्पड़ मारे जाने तथा जलाने जैसे शारीरिक उत्पीड़नों का सामना करने की बात स्वीकारी है। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि उदार और संवेदना युक्त कहा जाने वाला भारतीय समाज अब पूरी तरह संवेदनहीन बन चुका है। जो भारतीय समाज कभी अपनी सहिष्णुता, सहृदयता और दयालुता के लिए जाना जाता था वह आज अपनी नृशंसता, हिंसा, दुष्कर्म और संवेदनहीनता से इंसानी रिश्तों और मानवीय मूल्यों को तार-तार कर रहा है। यह बिडंबना नही ंतो और क्या है कि देश में बेटियों की सुरक्षा व सलामती के सैकड़ों कानून बने हैं इसके बाद भी उन पर अत्याचार का सिलसिला जारी है। बेहतर होगा कि सरकार, समाज और अदालतें बेटियों की सुरक्षा के लिए आगे आएं। दुष्कर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। निर्धारित समय के भीतर न्याय हो।

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