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कौशलेन्‍द्र

“हेलो बस्तर” [राहुल पंडिता की पुस्तक पर एक विमर्श]

‘हैलो बस्‍तर’ की एकांगी समीक्षा की है राजीव रंजन प्रसाद ने 

सत्‍य का गला घोट दिया है राहुल पंडिता ने

१- भूमकाल से माओवादी संघर्ष की तुलना नहीं की जा सकती. दोनों में ज़मीन-आसमान का फर्क है. दोनों के उद्देश्यों में फर्क है. दोनों के तरीकों में फर्क है.

२- मेरी जानकारी के अनुसार गोंडी की अपनी लिपि है जो कि द्रविण शैली की है, इसका व्याकरण संस्कृत जैसा है. वर्तमान में गोंडी लिपि के संरक्षण-संवर्धन के लिए कोंडागांव और कांकेर के दमकसा गाँव में (बिना शासकीय सहयोग के) सराहनीय कार्य किया जा रहा है. अब से लगभग ३-४ वर्ष पूर्व फिनलैंड से आये लोगों की एक टीम ने शेर सिंह आचला द्वारा दमकसा में संचालित इस विद्यालय की वीडिओ शूटिंग भी की थी. उस टीम के दुभाषिये के रूप में मैं स्वयं था और मैंने गोंडी लिपि में कुछ साहित्य का अवलोकन भी किया था. मुझे यह भाषा और लिपि दोनों ही अत्यंत समृद्ध लगे.

३- “हेलो बस्तर!” के शीर्षक से ही ध्वनित होता है कि इसे बाहर से आये किसी नवागंतुक द्वारा “हेलो” किया जा रहा है …..तब बस्तर की वास्तविक तस्वीर की अपेक्षा ऐसे व्यक्ति से कैसे की जा सकती है?

४- पुस्तक की समीक्षा और समीक्षा पर पंकज जी की टिप्पणी से प्रमाणित हो गया है कि इस पुस्तक में माओवादियों के संघर्ष के पक्ष में ही वकालत की गयी है अतः इस पुस्तक को पढ़ने की अब कोई आवश्यकता नहीं रह जाती.

५- खेद है कि स्वयं को तथाकथित सभ्य और प्रगतिशील विचारों वाला घोषित करने वाले लोग हिन्दू धर्म, आर्य संस्कृति और भारतीय विरासत के प्रति अपमानजनक शब्दों के प्रयोग से अपनी कुंठा के निंदनीय प्रदर्शन को ही अपनी प्रगतिशीलता मान बैठे हैं. इन्हें भारत से बाहर की सारी सभ्यताएं …सारी भाषाएँ ….सारी संस्कृतियाँ …सारे सिद्धांत अनुकरणीय लगते हैं. पश्चिमी लोगों द्वारा रचित भारतीय इतिहास में परोसी गयी मिथ्या जानकारी में पारंगत इन विद्वानों के अनुसार तो आर्य एशिया माइनर से आये नोमैड्स लोग थे जिन्होंने भारतीय अनार्यों को मारकर उन्हें या तो मार डाला या उन्हें दबाते कुचलते रहे. यह गल्प इस बात की वकालत करता है कि अनार्यों (इन विद्वानों का स्पष्ट संकेत आदिवासियों की और है. हम तो आदिवासियों को अनार्य नहीं मानते) को आज भी उन्हीं नोमैड्स के वंशज दबाने और कुचलने में लगे हैं और अब जिनकी रक्षा चीन में असफल हो गए माओवाद के भारतीय पुजारी कर रहे हैं.

५- दुःख है कि पंकज जी जैसे लोग भारतीय प्राचीन गौरव को गरियाने में ही अपनी शान समझते हैं. श्रीमान जी! आपसे निवेदन है कि एक बार बस्तर आकर कम से कम २-४ महीने यहाँ के गाँवों में रह कर माओवाद को करीब से देखने का प्रयास कीजिये. वनांचल का अर्थ “जंगली” किस शब्द कोष में मिल गया आपको ?

महाभारत और रामायण काल के कई आख्यान इस बात के प्रमाण हैं कि आर्यों के सम्बन्ध आदिवासियों से कैसे थे. उनके साथ सहयोगात्मक और मित्रवत संबंधों के बारे में पंकज जी अनभिज्ञ कैसे हैं? आर्यों ने उन्हें कब दबाया कुचला? हाँ! आज स्थितियां अवश्य प्रतिकूल हैं पर केवल आदिवासियों के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए …पूरे देश के लिए. कोई घोटाला केवल आदिवासियों को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता. आर्यों को अपमानित करने की अपेक्षा यदि पंकज जी इन घोटालेवाजों को अपमानित करने के मिशन पर लग जाते तो देश की कुछ सेवा कर पाते. एक बात और …इन भ्रष्ट घोटालेबाजों में आदिवासी अधिकारी और मंत्री भी शामिल हैं …..इसे किस दृष्टि से देखेंगे आप? क्या आप कहेंगे कि आर्य मानसिकता के शोषक लोगों ने आदिवासी मंत्रियों और अधिकारियों को बल पूर्वक भ्रष्ट होने के लिए बाध्य किया है? पंकज जी! आपकी सोच भारत को अमेरिका या चीन का उपनिवेश बनाने के प्रति इतनी निष्ठावान क्यों है? “हिंदूवादी सोच बाहरी सोच है…! “यह क्या कह रहे हैं आप? बताइये तो ज़रा कहाँ की सोच है? किस देश की सोच है? और तब यह भी बताइयेगा कि कहीं माओवादी सोच को तो आप मूल भारतीय सोच नहीं कहने वाले हैं?

शोषण, अन्याय, हिंसा किसी के द्वारा भी की जाय वह सदा निंदनीय ही कही जायेगी. इसे आप केवल हिन्दुओं से ही क्यों जोड़ रहे हैं? क्या यह सब हिन्दुओं के द्वारा ही किया जा रहा है? भारत में रहने वाले अन्य आयातित धर्मावलम्बियों की इसमें कोई सहभागिता नहीं है? तब तो शायद आपके अनुसार भारत में होने वाले हर दंगे और आतंकवादी घटना के पीछे हिन्दूवादी लोगों का ही हाथ होना चाहिए?

६-हम स्वीकार करते हैं कि आज हममें बहुत सी अक्षम्य कमियाँ आ गयी हैं ..हम अनार्य होते चले जा रहे हैं ….हमारा चरित्र हमारे भारतीय आदर्शों के अनुकूल नहीं रह गया है किन्तु इसके कारण भारत के अतीत को …हमारी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक विरासत को हेय दृष्टि से देखने ….और अपमानित करने का अधिकार किसी को नहीं है. ऐसे लोग भारत का अहित ही कर रहे हैं …समय आने पर ऐसे ही लोग जयचंद बनकर देश को पराधीन बनाने में अग्रणी हो जाते हैं. ऐसे लोगों से पूरे दश को सावधान रहने की आवश्यकता है.

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