जीवन सुखमय है अथवा दु:खमय यह प्रश्न समय समय पर मानव मस्तिष्क में कौंधता रहता है । विशेषकर जीवन के कष्टदायक क्षणों में । ऐसे क्षणों में जब ब्यक्ति ब्यथित होता है‚ किंकर्तब्यविमूढ़ होता है‚ अथवा परेशानियों से अनवरत घिरा होता है । लोगों के पास इससे सम्बन्धित अपने-अपने विचार और तर्क हैं । इस प्रश्न को देखने के दो दृष्टिकोण हो सकते हैं -आत्मनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ । वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोंण से प्रश्न का उत्तर सम्भव नहीं क्योंकि जीवन की ब्याख्या शून्य में नहीं की जा सकती । जीवन स्वयं में कोई वस्तु नहीं जिसका वर्णन सुख अथवा दुख के सन्दर्भ में किया जा सके । जीवन और सुख-दु:ख की ब्याख्या ब्यक्ति के सन्दर्भ में ही सम्भव है और प्रत्येक ब्यक्ति का अनुभव जीवन को लेकर अलग-अलग होता है न कि एकसमान । गतिशीलता‚ अनिश्चितता और सतत परिवर्तनशीलता ही जीवन की वस्तुनिष्ठ विशेषतायें है ।

   वस्तुतः सुख या दु:ख का अनुभव करना मन का कार्य है । मन स्वभावतः चंचल होता है । फलस्वरूप इसे सुख–दुख प्रदान करने वाले स्रोत भी इसकी अपनी दशा के अनरूप परिवर्तित होते रहते हैं । अतः सुख और दु:ख की ब्याख्या ब्यक्ति विशेष और उसके तात्कालिक अनुभवों पर निर्भर करता है । जैसा जिसका अनुभव वैसी उसकी ब्याख्या । जिसका जीवन आनंन्दमय है उसे जीवन सुखमय प्रतीत होता है जिसके जीवन में कष्ट की अधिकता है उसके लिए जीवन दु:खमय होता है । पर ब्यक्ति का यह अनुभव भी स्थायी न होकर परिवर्तनशील होता है । जिन खिलौनों में एक बालक को सुख प्राप्त होता है किशोर होने पर उनका कोई मूल्य नहीं रह जाता; जिन दिवास्वप्नों में एक किशोर को सुख मिलता है; एक वयस्क को वह मिथ्या जान पड़ता है;और जिन सांसारिक प्रपंचों में एक वयस्क सुख ढूंढता है वृद्वावस्था में वे मूल्यहीन हो जाते हैं ।

   सुख–दु:ख के स्रोत भी मन की स्थिति के अनुसार परिवर्तनीय होते हैं । एक ही वस्तु का प्रत्ययक्षीकरण दोनों भावों में सम्भव है । जो वस्तु एक समय विशेष में सुखमय होती है वही अन्य समय में दु:खमय प्रतीत होने लगती है । सुख और दु:ख का वास्तविक समयकाल और प्रतीतिकाल भी भिन्न भिन्न होता है । सुख के पलों में हमें समय जल्दी बीतता हुआ प्रतीत होता है । दु:ख का समय अनन्त काल जैसा प्रतीत होता है । संभवत इसीलिए सुख को क्षणभंगुर कहा गया है । दु:ख के लिए इस शब्द के प्रयोग से बचा गया है । समय चक्र तो वास्तव में अपनी ही गति से घूमता है किंतु हमारा प्रत्यक्षीकरण हमारे भावों के अनुरूप परिवर्तित हो जाता है ।

   देखा जाय तो सुख तथा दु:ख दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । जहां सुख है वहां दु:ख भी होगा । दोनों ही क्षणभंगुर किंतु चक्रिय रूप से जीवन में उपस्थित हैं । कई बार तो ये एक दूसरे के आवरण का सहारा लेकर उपस्थित होते हैं । दु:ख सुख के रूप में और सुख दु:ख के रूप में उपस्थित होता है । जीवन मे कई अवसर आतें हैं जब दीर्घकालिक दुख तात्कालिक सुख के रूप में अथवा दीर्घकालिक सुख तात्कालिक दु:ख के रूप में उपस्थित होते हैं । ऐसे समय में सचेत होना अति आवश्यक होता है । कई बार तो एक दूसरे के ऊपर ऐसे आच्छादित होते हैं कि साधारण बुद्वि से पहचानना मुश्किल होता है कि यह दु:ख है अथवा सुख । एक किशोरवय का बालक जब पहली बार धूम्रपान‚ मदिरापान अथवा जुआ खेलना प्रारम्भ करता है तो संभवत उसे तात्कालिक सुख ही आकर्षित कर रहा होता है ।

   स्वभाववश हम एक को पकड़ना चाहते हैं तो दूसरे से दूर भागना । दोनो को एक दूसरे से विपरीत समझते हैं । जबकि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । प्रकृति अथवा जीवन की कोई भी घटना न तो पूर्णतया सुखमय होती है और न ही दु:खमय । एक ही घटना किसी के लिए सुखमय है तो किसी के लिए दु:खमय । किसी के लिए आपदा तो किसी के लिए अवसर । जो बारिश कुछ स्थानों पर बाढ़ का कारण बनती है वहीं सूखाग्रस्त जगहों के लिए वरदान बन जाती है । एक युद्व कुछ लोगों के विजय और हर्ष तो दूसरे पक्ष के पराजय और विषाद का कारण बनता है । प्राकृतिक आपदा जहाँ विध्वंश और विनाश लाती है वहीं नवनिर्माण का मार्ग भी प्रशस्त करती है । नकारात्मक से नकारात्मक क्षणों में भी धनात्मकता के अंश छुपे रहते हैं ।

   भारतीय मनीषियों नें दोनों ही अवस्थाओं में ब्यक्ति को समान भाव रखने का परामर्श दिया है । निम्नस्तरीय तथा शारीरिक भोगों में सुख ढूँढने के स्थान पर उनका परावर्तन उच्चस्तरीय तथा दीर्घकालिक सुखों के स्रोत आत्मोंन्नति पर करने का मार्गदर्शन दिया है । भावनाओं के अतिरेक से बचने की बात कही है । सुख तथा दु:ख दोनों में ही संयमित भाव से कार्य करने का सुझाव दिया है । दोनों ही समय-समय पर ब्यक्ति के प्रारब्ध तथा कर्मानुसार जीवन में आते रहते हैं और आनन्द अथवा कष्ट की अनुभूति का चक्रिय क्रम गतिमान रहता है । दोनों से ही बचना या भागना सम्भव नहीं । किंतु ब्यक्ति को किसी भी अनुभूति को स्थायी भाव नहीं बनाना चाहिए । दोनों का ही अपना मायाजाल है पर किसी के भी जाल में फॅंसना नहीं चाहिए । सुख में जितनी अधिक आसक्ति होगी‚  दु:ख उतना ही दुखदायी होगा । दु:ख या कष्टों से जितना भयाक्रांत होंगे‚ दु:ख उतना ही भयभीत करेंगे । अतः समभाव से जीवन में इन्हें स्वीकार करें और विश्वास रखें कि यह अस्थायी है ।

डा. प्रदीप श्याम रंजन

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