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    Homeराजनीतिभागवत के विजय-उद्बोधन में नये भारत के सुखद संकेत

    भागवत के विजय-उद्बोधन में नये भारत के सुखद संकेत

    -ललित गर्ग-

    विजयदशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख श्री मोहन भागवत के वार्षिक विजय-उद्बोधन का न केवल राष्ट्रीय बल्कि सामाजिक एवं राजनीतिक महत्व है। सर संघचालक ने अपने विजय-उद्बोधन में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों का उल्लेख करते हुए संघ सोच को एक बार फिर से स्पष्ट किया है। उन्होंने देश में साम्प्रदायिक सद्भाव पर अपना विस्तृत दृष्टिकोण पेश करते हुए न केवल हिन्दू शब्द का विरोध करने वालों पर करारा प्रहार किया है, बल्कि देश में अराजकता का माहौल पैदा करने वाले मुस्लिम संगठनों पर भी सीधी चोट की है। उन्होंने देश के समग्र एवं त्वरित विकास के लिये जनसंख्या नियंत्रण की नीति पर जोर दिया है। यह विजय-उद्बोधन देकर उन्होंने जहां देश की जनता को जगाया वहीं राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी। सरकार को कुछ जरूरी कार्यों का दिशा-निर्देश भी दिया गया। संघ की नजरों में धर्मांतरण और घुसपैठ से जनसंख्या का संतुलन बिगड़ा है और देश का विकास बाधित हुआ है, भागवत इन समस्याओं से निपटने और उनके खिलाफ जनमत का निर्माण करने के लिए संकल्प ले चुके हैं। उन्होंने देश के सामने कुछ ऐसी बड़ी चुनौतियों को रेखांकित किया, जिसे लेकर राजनीतिक दलों एवं साम्प्रदायिक संगठनों की भृकुटि कुछ तन गई है।
    भागवत का विजय-उद्बोधन एक छोटी-सी किरण है, जो सूर्य का प्रकाश भी दे रही है और चन्द्रमा की ठण्डक भी। और सबसे बड़ी बात, भागवत जो हो रहा है और जो होना है उसकी स्पष्ट दृष्टि से तटस्थ विश्लेषण करते हुए सरकार की रक्षा, आर्थिक नीतियों से काफी संतुष्ट दिखाई दिए। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया का भरोसा बढ़ा है। भारत की ताकत बढ़ी है। दुनिया में भारत की आवाज सुनी जा रही है। दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा और साख बढ़ी है और आत्मनिर्भर भारत की आहट सुनाई दे रही है। उन्होेंने बच्चों को संस्कारवान बनाने के लिए स्कूलों, कालेजों पर निर्भरता की बजाए घरों और समाज के वातावरण को स्वस्थ बनाने का संदेश  दिया। निश्चित ही विजय-उद्बोधन कोई स्वप्न नहीं, जो कभी पूरा नहीं होता। यह तो भारत को सशक्त एवं विकसित बनाने के लिए ताजी हवा की खिड़की है।
    अनेक विशेषताओं वाले इस वर्ष के विजय-उद्बोधन में संघ प्रमुख ने देश के मुस्लिम समुदाय को अराजकता फैलाने वाले तत्वों से सतर्क रहने की नसीहत भी दी। संघ और मुस्लिम समाज में संवाद की आज सकारात्मक कोशिशें हो रही हैं। संघ इस संवाद को कायम रखेगा क्योंकि समाज को तोड़ने के लिए बहुत सी कोशिशें हो रही हैं। संघ को इस बात के लिए बार-बार निशाना बनाया जाता रहा है कि वह मुस्लिम समाज को नजरंदाज करता है। लेकिन ऐसा नहीं है। देश में कई जगह हुई जघन्य घटनाओं का जिक्र करते हुए भागवत ने मुस्लिम समुदाय से यह आग्रह किया कि वे अन्याय, असत्य, अत्याचार के खिलाफ खड़े हों। हम सबको मिलकर संविधान का पालन करना चाहिए और ऐसी क्रूरतम घटनाओं का विरोध मुखरता से किया जाना चाहिए। इसके लिये जरूरी है कि संघ को संकीर्ण नजरिये से देखने की बजाय व्यापक देशहित में देखा जाना चाहिए। जरूरी यह भी है कि जब भी कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ जैसे अराष्ट्रीय संगठनों के़ खिलाफ कोई कदम उठाया जायें तो उसे सकारात्मक लेने की जरूरी है। जब मोहन भागवत किसी मस्जिद में जा सकते हैं और उन्हें इमामों के एक संगठन के प्रमुख द्वारा ‘राष्ट्रपिता’ संबोधन दिया जाये तो संघ को मुस्लिम विरोधी कैसे कहा जा सकता है?
    संघ की राष्ट्रवादी विचारधारा से अनेक मुस्लिम संगठन एवं लोग सहमत है। संघ की राष्ट्रभक्ति पर तनिक भी संदेह नहीं किया जा सकता। प्राकृतिक आपदाएं हों या युद्ध काल संघ का एक-एक स्वयंसेवक राष्ट्र के लिए हमेशा तैयार रहा। इसी शिक्षा, सेवा, जन-कल्याणा के लिये भी संघ गतिशील है। यही कारण है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर पंडित जवाहर लाल नेहरू को संघ की सराहना करनी पड़ी थी। संघ को बेवजह बदनाम करने की साजिशें होती रही हैं। संघ पर पूर्व की सरकारों ने कई बार प्रतिबंध लगाए लेकिन यह प्रतिबंध ज्यादा दिन ठहर नहीं पाए। संघ प्रमुख ने आज के संबोधन में भी संघ को बदनाम करने की कुचेष्टाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि संघ तो विश्व में सब जगह और सबके साथ भाईचारा और शांति का पक्षधर है।
    संघ को इस बात के लिए बार-बार निशाना बनाया जाता रहा है कि वह महिलाओं की भूमिका को नजरंदाज करता है और उन्हें उचित सम्मान नहीं देता, लेकिन इस बार संघ के विजयदशमी कार्यक्रम में माउंट एवरेस्ट विजेता पर्वतारोही श्रीमती संतोष यादव बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुईं। उन्हें मुख्य अतिथि बनाकर संघ ने आलोचकों को जवाब दे दिया है। संघ प्रमुख ने कहा कि संघ के कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी डा. हेडगेवार के वक्त से ही हो रही है। अनुसूईया काले से लेकर इंडियन वीमन्स कॉन्फ्रेंस की मुखिया राजकुमारी अमृत कौर, कुमुदताई रांगेनकर आदि कई महिलाओं ने संघ के कार्यक्रमों में भागीदारी की है। उल्लेखनीय है कि संघ की महिला विंग महिलाओं के सशक्तिकरण, उनकी शिक्षा के लिए लगातार काम कर रही है। भले ही संघ की शाखाओं में महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता है, लेकिन महिलाओं से संघ को परहेज भी नही है। निश्चित ही इन स्थितियों एवं संदेशों से भारतीय जन-मानस में संघ की राष्ट्रीयता सम्भलती रही, सजती रही और कसौटी पर आती रही तथा बचती रही। एक बार फिर भागवत ने राजनीति से परे जाकर देश को जोड़ने, सशक्त बनाने एवं नया भारत निर्मित करने का सन्देश दिया है और इस सन्देश को जिस तरह आकार दिया जाना है, उसका दिशा-निर्देश भी दिया गया है।
    संघ प्रमुख भागवत एक सक्रिय, साहसी, चिन्तनशील, राष्ट्रयोद्धा, समाजसुधारक और बदलाव लाने वाले संघ प्रमुख हैं। वे देशहित में अच्छी रचनात्मक एवं सृजनात्मक बातें करते हैं, बदलाव चाहते हैं, राष्ट्र को तोड़ना नहीं जोड़ना चाहते हैं, अच्छी बात यह भी है कि संघ एक जागरूक संगठन है और हर समस्या पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। हर व्यक्ति के दिमाग में एक समस्या है और हर व्यक्ति के दिमाग में एक समाधान है। एक समस्या को सब अपनी समस्या समझे और एक का समाधान सबके काम आए। समाधान के अभाव में बढ़ती हुई समस्या संक्रामक बीमारी का रूप न ले सके, इस दृष्टि से आज का समाधान आज प्रस्तुत करने के लिए आरएसएस निरन्तर जागरूक रहता है। इसीलिये मोहन भागवत ने अपने भाषण में समान जनसंख्याा नीति बनाने पर जोर दिया है। संघ प्रमुख के भाषण को इस मसले पर बारीकी से समझने की जरूरत है। भले ही केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जनसंख्या नियंत्रण पर कानून लाने को लेकर अपनी अनिश्चितता जताई हो लेकिन संघ प्रमुख इस दिशा में तुरन्त कदम उठाने के पक्षधर दिखाई दिए। उन्होंने कहा कि जनसंख्या कम होने से देश में बुजुर्गों की संख्या बढ़ती जाएगी जबकि जनसंख्या को एक सम्पत्ति माना जाता है। दूसरी तरफ जनसंख्या को संसाधनों की आवश्यकता होती है। यदि जनसंख्या बिना संसाधनों का निर्माण किए बढ़ती है तो यह एक बोझ बन जाती है। कहते हैं कि जनसंख्या में असमानता भौगोलिक सीमाओं में बदलाव लाती है। यही देश विकास का बाधक तत्व है, इसी से गरीबी कायम है। लेकिन बावजूद इसके ऐसे ज्वलंत विषयों पर भी राजनीति की जाती है, संकीर्णता दर्शायी जाती है।
    हर बार की तरह इस बार भी मोहन भागवत के उद्बोधन पर अनेक शंकाएं, जिज्ञासाएं और कल्पनाएं अपना रंग दिखा रही हैं। किसी भी नई प्रवृत्ति या नई दिशा को लेकर ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं है। कुछ लोगों की दृष्टि में संघ का कोई उपयोग नहीं है तो कुछ लोगों को उसमें अनेक नई संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। कुछ लोग उसे असफल बनाने का सपना देख रहे हैं और कुछ व्यक्ति उसकी सफलता के लिए पूरे मन से जुटे हुए हैं। इन स्थितियों के बीच संघ प्रमुख ने सामाजिक समता की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि मंदिर, पानी, श्मशान सबके लिए एक हो, इसकी व्यवस्था सुनिश्चित करनी ही होगी। सबको एक-दूसरे का सम्मान करना होगा। किसी भी समाज में बिखराव की स्थिति होती है तो उसकी क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं हो सकता। उपयोग के लिए क्षमताओं को केन्द्रित करना जरूरी है। समाज का हर व्यक्ति अपने आप में एक शक्ति है। इस शक्ति को काम में लेने से पहले उसे एकात्ममुख करना जरूरी है। भागवत के आह्वान का हार्द व्यवस्था को सशक्त बनाते हुए राष्ट्र को नयी शक्ल देने का है। वास्तव में यदि हम भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के अपने सपने को साकार करना चाहते हैं तो हमें अपनी सोच और अपने तौर-तरीके बदलने होंगे। जब संघ-प्रमुख देश को बदलने और आगे ले जाने के लिए संकल्प व्यक्त कर रहे हैं तो फिर देश की जनता का भी यह दायित्व बनता है कि वह अपने हिस्से के संकल्प ले।

    ललित गर्ग
    ललित गर्ग
    स्वतंत्र वेब लेखक

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