राजनीति

छात्रों ने घेरा विधानसभा, लाठीचार्ज और बड़ा सवाल

कुमार कृष्णन

रांची में प्रतियोगी परीक्षाओं की कथित धांधली के खिलाफ छात्र आंदोलन अब परीक्षा से बड़ा सवाल बन चुका है। सोमवार को हजारों छात्र विधानसभा घेराव के लिए निकले। पुलिस ने बैरिकेडिंग की, पानी की बौछार की, आंसू गैस छोड़ी और लाठीचार्ज किया। कुछ प्रदर्शनकारी विधानसभा की सीमा तक पहुंच गए। पुलिस के अनुसार कुछ स्थानों पर पथराव और बैरिकेड तोड़ने की कोशिश हुई, जबकि छात्रों का कहना है कि आंदोलन का बड़ा हिस्सा शांतिपूर्ण और अनुशासित रहा। इन विरोधी दावों के बीच स्पष्ट है कि यह आंदोलन भर्ती व्यवस्था और सरकार की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है।

सरकार कह रही है कि उसने छात्रों की लगभग 98 प्रतिशत मांगें मान ली हैं। 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा तथा 2023 और 2025 की बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय लिया गया है। जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष एल. खियांगते के इस्तीफे के बाद आयोग के तीन अन्य सदस्यों के इस्तीफे भी स्वीकार किए गए। कथित अनियमितताओं की सीआइडी और ईडी जांच, मामलों के त्वरित निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक अदालत तथा 90 दिनों में जांच पूरी करने की बात कही गई है। भर्ती प्रक्रिया में सुधार के लिए आइआइएम रांची, आइआइटी-आइएसएम और एक्सएलआरआइ के विशेषज्ञों की समिति बनाने की योजना भी सामने आई है।

फिर आंदोलन क्यों जारी है? सबसे बड़ा कारण जेएसएससी-सीजीएल सहित कुछ मामलों में सीबीआई जांच की मांग है। सरकार का तर्क है कि जिस परीक्षा पर न्यायिक प्रक्रिया का असर है और जिसके आधार पर नियुक्तियां हो चुकी हैं, उसे राज्य सरकार अपनी ओर से रद्द नहीं कर सकती। यह कानूनी तर्क विचारणीय है। लेकिन छात्रों का सवाल भी गंभीर है—अगर व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहा तो जांच की ऐसी कौन-सी संस्था होगी जिसकी निष्पक्षता पर उन्हें विश्वास हो? सरकार को इस प्रश्न का उत्तर केवल अधिकार बताकर नहीं, विश्वसनीय विकल्प देकर देना होगा।

यहां दोनों पक्षों की परीक्षा है। छात्रों को समझना होगा कि सीबीआई जांच ही निष्पक्षता की एकमात्र कसौटी नहीं है। यदि स्वतंत्र जांच, न्यायिक निगरानी, स्पष्ट समयसीमा और रिपोर्ट सार्वजनिक करने की गारंटी हो तो वैकल्पिक रास्ते पर विचार किया जा सकता है। दूसरी ओर सरकार को यह समझना होगा कि आंदोलनकारियों की जिद को केवल राजनीतिक उकसावे का परिणाम बताना आसान है, लेकिन उससे मूल अविश्वास दूर नहीं होता।

सबसे गंभीर प्रश्न पुलिस कार्रवाई का है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन अपराध नहीं है। धरना, नारेबाजी और विधानसभा तक मार्च करना असहमति व्यक्त करने के लोकतांत्रिक साधन हैं। यदि कुछ लोगों ने पत्थर फेंके, पुलिस पर हमला किया या सुरक्षा घेरा तोड़ा, तो उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन कुछ लोगों की कथित उग्रता के आधार पर पूरे आंदोलन को उग्र मान लेना उचित नहीं होगा। पुलिस का दावा है कि अधिकांश प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण थे, लेकिन एक हिस्से ने पथराव किया और बैरिकेड तोड़े। आंदोलनकारियों का पक्ष इसके विपरीत है। इसलिए बल प्रयोग की आवश्यकता और उसकी सीमा पर निष्पक्ष जांच जरूरी है।

रांची का दृश्य दिल्ली के जंतर-मंतर जैसा नहीं बना। यहां तक कि जब कुछ छात्र विधानसभा की सीमा तक पहुंच गए, तब भी आंदोलन का बड़ा हिस्सा संयमित रहा। इसका अर्थ यह नहीं कि सुरक्षा व्यवस्था को नजरअंदाज किया जाना चाहिए था। विधानसभा की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। लेकिन लोकतंत्र की विडंबना होगी कि अपनी ही व्यवस्था से न्याय मांगने आए युवाओं को समझाने से पहले लाठी दिखाई जाए। रात में बल प्रयोग की आशंकाओं और कार्रवाई की खबरों ने बेचैनी बढ़ाई। हर घटनास्थल पर प्रत्यक्ष उपस्थिति संभव नहीं, इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकलेगा।

राहुल गांधी ने झारखंड में छात्रों पर बल प्रयोग की निंदा की और कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा गलत है। उनका बयान महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे राजनीतिक सवाल भी उठता है। यदि किसी राज्य सरकार की पुलिस छात्रों पर कार्रवाई करती है, तो राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की प्रतिक्रिया राजनीतिक सुविधा पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से रांची की घटना पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया न आने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह कहना जल्दबाजी होगी कि उनकी चुप्पी किसी नीति का संकेत है; फिर भी युवाओं के सवाल पर राष्ट्रीय नेतृत्व की आवाज अपेक्षित है। जिस तरह दूसरे छात्र आंदोलनों पर राष्ट्रीय राजनीति प्रतिक्रिया देती है, उसी कसौटी पर रांची को भी देखा जाना चाहिए।

लेकिन आलोचना का अर्थ यह नहीं कि हर जिम्मेदारी केंद्र की है। भर्ती परीक्षाएं राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी हैं। झारखंड की मौजूदा सरकार को अपने हिस्से की जवाबदेही स्वीकार करनी होगी। भर्ती परीक्षाओं को लेकर विवाद केवल वर्तमान सरकार तक सीमित नहीं रहे हैं। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन परीक्षा व्यवस्था पर अविश्वास बना रहा। इसलिए इसे केवल हेमंत सोरेन सरकार बनाम विपक्ष का प्रश्न बनाना असली समस्या से बचना होगा।

सरकार ने परीक्षाएं रद्द करने और जांच का रास्ता अपनाया है, लेकिन अगला कदम कठिन है। जिन युवाओं ने वर्षों तैयारी की है, उनके लिए नई परीक्षा केवल तारीख घोषित करने से नहीं हो सकती। उम्र सीमा में राहत, पाठ्यक्रम, परीक्षा कैलेंडर, आवेदन और परिणाम की समयसीमा तय करनी होगी। परीक्षा रद्द होने से जिनकी उम्र निकल रही है, उनके लिए स्पष्ट राहत जरूरी है। वरना न्याय का फैसला दूसरे अन्याय में बदल सकता है।

जेपीएससी अध्यक्ष और सदस्यों के इस्तीफे को जवाबदेही का अंत नहीं माना जा सकता। पद छोड़ना और दोष सिद्ध होना अलग बातें हैं। जांच यह तय करे कि गड़बड़ी हुई या नहीं, हुई तो किस स्तर पर और कौन जिम्मेदार था। दोषी अधिकारी, बिचौलिया या प्रभावशाली व्यक्ति पर कार्रवाई होनी चाहिए। फास्ट ट्रैक अदालत और समयबद्ध जांच तभी सार्थक होगी जब रिपोर्ट सार्वजनिक हो।

इस पूरे विवाद में गांधी की अहिंसा की कसौटी भी सामने आती है। सत्याग्रह केवल सरकार के विरोध का नाम नहीं था; वह अनुशासन, आत्मसंयम और सत्य पर आग्रह का रास्ता था। छात्रों के लिए इसका अर्थ है कि बैरिकेड तोड़ना, पत्थर चलाना या पुलिस से टकराव आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर करता है। सरकार के लिए इसका अर्थ है कि असहमति को दुश्मनी न समझे। लाठी से भीड़ पीछे हट सकती है, लेकिन अविश्वास नहीं। पानी की बौछार सड़क खाली कर सकती है, लेकिन उस युवक का प्रश्न नहीं मिटा सकती जिसने वर्षों मेहनत इस भरोसे पर की कि चयन निष्पक्ष होगा।

इसीलिए छात्र नेताओं का यह कहना महत्वपूर्ण है कि वे मंत्रियों से नहीं, सीधे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से बातचीत करेंगे। इसे टकराव की नई सीढ़ी बनाने के बजाय संवाद का अवसर बनाया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री को छात्र प्रतिनिधियों से सीधे मिलकर स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-सी मांग स्वीकार हो चुकी है, कौन-सी कानूनी अड़चन में है और किस पर सरकार क्या समयसीमा दे सकती है। बातचीत लिखित और समयबद्ध हो तो अविश्वास कम होगा। छात्रों को भी बताना होगा कि यदि सरकार स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच का रास्ता देती है, तो आंदोलन की अगली दिशा क्या होगी।

अब असली प्रश्न विधानसभा के बाहर का नहीं, भर्ती व्यवस्था के भीतर का है। प्रश्नपत्र से परिणाम तक हर चरण में जवाबदेही तय करनी होगी। शिकायत आने पर जांच की प्रक्रिया पहले से निर्धारित होनी चाहिए। आयोगों को तकनीकी रूप से सक्षम और राजनीतिक दबाव से मुक्त बनाने की जरूरत है। विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें लागू होनी चाहिए।

मुख्यमंत्री को छात्रों से बात करनी चाहिए। सरकार को लिखित रोडमैप देना चाहिए। छात्रों को अहिंसक अनुशासन बनाए रखना चाहिए। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को भी बताना चाहिए कि युवाओं के प्रश्न केवल राज्य का विषय नहीं हैं। राहुल गांधी की निंदा के बाद जरूरत ऐसी राष्ट्रीय बहस की है जिसमें लोकतंत्र को सुविधा के हिसाब से नापा न जाए।

आज की सबसे बड़ी परीक्षा 14वीं जेपीएससी की नहीं है। परीक्षा यह है कि क्या झारखंड ऐसी भर्ती व्यवस्था बना सकता है जिसमें अगली पीढ़ी को न्याय मांगने के लिए विधानसभा घेरने की जरूरत न पड़े। सरकार इसे केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानेगी तो अवसर खो देगी; छात्र इसे केवल शक्ति प्रदर्शन मानेंगे तो नैतिक जमीन खो देंगे।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की स्मृति भी यहां प्रासंगिक है। तब औपनिवेशिक सत्ता ने आंदोलन को कुचलने के लिए गिरफ्तारियां और दमन का सहारा लिया था। लोकतांत्रिक भारत में सरकार और नागरिक के संबंध अलग हैं। असहमति को देशद्रोह या अराजकता के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। लोकतंत्र की शक्ति यही है कि सत्ता अपने आलोचकों को सुन सके और आंदोलनकारी संविधान की सीमाओं में रहकर बात रख सकें।

लोकतंत्र में जीत उस दिन होगी जब विधानसभा के बाहर खड़ा छात्र और भीतर बैठी सरकार एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं, जवाबदेह नागरिक और जनप्रतिनिधि मानें। रास्ता खुला है। शर्त इतनी है कि लाठी की जगह बातचीत और आरोप की जगह भरोसा चुना जाए।

कुमार कृष्णन