वे बीच में खड़े हैं

गुजरात के चुनाव आखिरकार सम्पन्न हो ही गये। दो महीने से बड़ा शोर था उनका। उस शोर में बेचारे हिमाचल प्रदेश को तो लोग भूल ही गये। बात ही कुछ ऐसी थी। परिणाम देख-सुनकर शर्मा जी बहुत उदास हैं।

– ये ठीक नहीं हुआ वर्मा।

– क्यों, जो भी हुआ, जनता ने किया है। क्या आपको उस पर विश्वास नहीं है ?

– विश्वास तो है; पर गुजरात जीत जाते तो.. ।

– ठीक कह रहे हैं आप। गुजरात यानि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का घर। कांग्रेस वाले सोचते थे कि यदि इन्हें उनके घर में ही हरा दें, तो नये मालिक का डंका बज जाएगा; और राजनीति में डंके का महत्व डंडे से भी बढ़कर है। इसलिए कांग्रेस ने पूरी जान लगा दी; पर उस किस्मत का क्या करें, जिसे ऊपर वाले ने ऐसी खुरदरी स्लेट पर लिखा है, जिसे पढ़ना ही मुश्किल है। सो गुजरात के साथ-साथ हिमाचल भी हार गये। सूद के चक्कर में मूल भी हाथ से गया।

– तुम तो जले पर नमक छिड़क रहे हो वर्मा। बाबा ने हिन्दू वोटों के लालच में न जाने कितने मंदिरों में नाक रगड़ी। तिलक लगाये, जनेऊ दिखाया। यहां तक कि मस्जिद, मजार और दरगाहों से परहेज भी किया; पर सब बेकार। यदि ऐसे ही चलता रहा, तो देश सचमुच ‘कांग्रेस मुक्त’ हो जाएगा।

– जनता तो ठीक दिशा में चल रही है; पर कांग्रेस के कुछ खानदानी चमचों ने तय कर लिया है कि ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ बनाने में मोदी और शाह भले ही पिछड़ जाएं; पर वे उसे पूरा करके रहेंगे।

– कौन-कौन लोग हैं ऐसे ?

– लोग तो कई हैं; पर उनमें सबसे महान आत्मा हैं मणिशंकर अय्यर। सुना है 1962 में भारत पर चीनी आक्रमण के समय वे कैंब्रिज वि.वि. में कम्युनिस्ट इकाई के महासचिव थे। वहां उन्होंने चीन के लिए चंदा भी जुटाया था। भारत आकर उनकी नियुक्ति विदेश सेवा में हो गयी। इस पर स्थानीय पुलिस ने आपत्ति की; पर वे तमिलनाडु के एक प्रतिष्ठित खानदान से हैं। उन लोगों ने राष्ट्रपति से कहा। उनके हस्तक्षेप से मणि को नियुक्ति मिल गयी।

– यानि वे बड़े विद्वान हैं ?

– जी हां, चूंकि वे विदेश में पढ़े हैं, इसलिए विदेशी मूल वाली कांग्रेस में उन्हें बड़ा विद्वान माना ही जाता है। इससे पहले देहरादून में पढ़ते हुए उनकी राजीव गांधी से दोस्ती हो गयी थी। अतः उनकी कृपा से वे राजनीति में आ गये; पर विदेशी कुसंस्कार नहीं गये। अतः वे कभी-कभी ऐसे धत्कर्म कर जाते हैं कि उनके मुखारविन्द पर थोड़ा कीचड़ और लग जाता है। पिछली सरकार में केन्द्रीय मंत्री रहते हुए उन्होंने अंदमान की सेल्यूलर जेल से वीर सावरकर में सम्मान में लगी पट्टी हटवा दी थी। ठीक भी है, गांधी-नेहरू या उनके खानदान में किसी ने अंदमान जैसी जेल भोगी हो, तब तो उन्हें वहां के कष्टों का अनुमान हो। कहां क्रांतिवीरों के शिरोमणि सावरकर और कहां ये पंचतारा जेलयात्री ? पिछले लोकसभा चुनावों में उन्होंने मोदी को कांग्रेस मुख्यालय में चाय की दुकान के लिए जगह देने का प्रस्ताव किया था। ये सुनकर भा.ज.पा. वालों ने ‘चाय पर चर्चा’ जैसा अद्भुत कार्यक्रम चला दिया। इससे मणि बाबू तो चाय पीते रह गये और मोदी प्रधानमंत्री बन गये। अब उन्होंने मोदी को नीच आदमी कहा है। इसका परिणाम आपने देख ही लिया है।

– लेकिन मणि बाबू ऐसा करते क्यों हैं ?

– आपने करेले पर नीम चढ़ने वाली कहावत सुनी है न। मणि बाबू भी ऐसे ही हैं। पहले कम्युनिस्ट और फिर कांग्रेसी। और अब तो उनके घर पाकिस्तानियों के साथ हुई बैठक की बात भी पता लग गयी है। जब इसकी पूरी कार्यवाही सामने आयेगी, तो शायद पता लगे कि मणि बाबू पर करेले और नीम के साथ गिलोय का कड़वा स्वाद भी चढ़ा है।

– लेकिन वर्मा जी, आप चाहे जो कहें; पर मैं मणि बाबू को देशद्रोही नहीं मान सकता।

– और शर्मा जी, आप चाहे जो कहें; मैं उन्हें देशभक्त नहीं मान सकता।

– तो क्या वे बीच वाले हैं ?

– किसी को बीच वाले कहना तो गाली है। ऐसे शब्द तो लंदन पलट मणि बाबू के मुंह से ही निकल सकते हैं; पर वे क्या हैं, ये आप मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी जैसों से पूछिये, जो उस बैठक में मौजूद थे।

ये सुनकर शर्मा जी की उदासी कुछ और बढ़ गयी।

– विजय कुमार

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