गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-22

गीता का तीसरा अध्याय और विश्व समाज
जब व्यक्ति अपना कार्य तो अधर्म पूर्वक करे अर्थात डाक्टर रोगियों की सेवा न करके उनकी जेब काटे, व्यापारी शुद्घ वस्तु न देकर मिलावट करे इत्यादि और सुबह-शाम मन्दिरों में घण्टे घडिय़ाल बजाये तो ऐसा कार्य अधर्म=निज स्वभाव के अनुसार न होकर भयजनक होता है, पाखण्ड होता है।

निज स्वभाव के विपरीत कर्म होता पाखण्ड।
सदा धर्मानुकूल बरतिये ज्योति रहे प्रचण्ड।।

सही स्थिति ये है कि व्यक्ति हर क्षण उस दिव्य शक्ति को अपने साथ अनुभव करके अपने कार्यों का निष्पादन करता रहे-जिसे परमपिता परमात्मा कहा जाता है, और जिसका निज नाम ओ३म् है। आज के संसार के अधिकांश झगड़े इसलिए हैं कि व्यक्ति निजधर्म को छोडक़र भटकता हुआ घूम रहा है।
योगेश्वर कृष्णजी की बात का अभिप्राय है कि अर्जुन! दुर्योधन निज धर्म को छोडक़र पाखण्डी बन चुका है, अब उसका कर्म संसार के लिए ‘हेय’ हो चुका है, कम से कम तू तो निज धर्म में टिका रह, अर्थात क्षत्रिय धर्म का पालन करने वाला बना रह। समाज और राष्ट्र की सेवा करना तेरे क्षात्रधर्म में सम्मिलित है, तू उसे भूल मत। निज कर्म को यज्ञार्थ बना, यज्ञीय बना और आध्यात्मिकता के रंग में रंग दे-फिर देखना तुझे कितना पुण्य मिलेगा? इससे तू जीवन्मुक्त होने का आनन्द अनुभव करेगा। सचमुच तेरा जीवन धन्य हो जाएगा। कृष्ण जी कर्म को यज्ञीयभाव से करने की भावना पर बल दे रहे हैं-कर्म को यज्ञार्थ बना लेने की भावना को बलवती कर रहे हैं।
तीसरे अध्याय में अर्जुन श्री कृष्णजी से पूछता है कि वाष्र्णेय कृष्ण, यादवों के कुल में उत्पन्न कृष्ण! वह क्या वस्तु है जिससे प्रेरित होकर यह पुरूष न चाहता हुआ भी पापाचरण करता है। उसे ऐसा लगता है कि जैसे कोई बलपूर्वक उसे पाप में धकेल रहा हो, अर्थात कोई उससे पापकर्म कराना चाहता है।
इस पर गीताकार श्रीकृष्णजी से कहलवाता है कि ‘काम’ और ‘क्रोध’ हमारे भीतर ऐसे छुपे हुए दो महाशत्रु हैं जो रजोगुण से उत्पन्न होते हैं और जिनके कारण मनुष्य न चाहते हुए भी पापाचरण में जा फंसता है। इन्हें अन्यत्र मनुस्मृति में क्रोधज और कामज पाप कहकर मनु महाराज ने स्पष्ट किया है। ये दोनों प्रकार के पाप मानव जीवन का अंत कराने में सहायक होते हैं। जो इनकी भेंट चढ़ जाता है या इन्हें पाल लेता है और इनसे अपनी रक्षा नहीं कर पाता-वह जीता हुआ भी मर जाता है। इसीलिए इन्हें श्रीकृष्ण जी ने महाशन=महा-अशन अर्थात सब कुछ खा जाने वाला कहा है। वह कहते हैं कि संसार में इन्हें अपना महावैरी मानना चाहिए।
संसार में बड़े-बड़े राजवंशों का नाश इन दो महावैरियों के कारण हो गया। सम्राटों के विशाल साम्राज्यों को ये दो शत्रु खा गये। किसी के सिर पर काम चढक़र बैठ गया तो किसी के सिर पर क्रोध चढक़र बैठ गया। बड़े-बड़े राजाओं-महाराजाओं के सूने पड़े या उजड़े पड़े भवन, किले आदि हमें बता रहे हैं कि यहां भी कभी मनुष्य के इन दो महावैरियों ने अपनी लीला रची थी, जिसके कारण आज यहां यह उजाड़ आ गया है। इसलिए श्रीकृष्ण जी अर्जुन को समझा रहे हैं कि अर्जुन! इन दो महावैरियों से मनुष्य को सावधान रहना चाहिए। दुर्योधन पर भी क्रोध का भूत चढ़ा हुआ था, तभी तो उसने स्वयं श्रीकृष्णजी का भरी सभा में उस समय अपमान कर दिया था, जब वह विराट नगरी से चलकर पाण्डवों के शान्तिदूत के रूप में हस्तिनापुर की राजसभा में पहुंचे थे। कृष्णजी ने तभी समझ लिया था कि दुर्योधन के लिए उसका क्रोध नाम का शत्रु इस समय महावैरी हो चुका है, इतना ही नहीं हस्तिनापुर की राजसभा में ही जब दुर्योधन ने द्रोपदी को अपनी जंघा पर बैठाने की बात कही थी तो वह क्षण भी उसके विनाश की कहानी लिखने वाले बन चुके थे। कुल मिलाकर कृष्णजी संसार के लोगों को काम और क्रोध नाम के दो शत्रुओं से बचकर रहने की प्रेरणा दे रहे हैं। आज के संसार में सर्वत्र काम और क्रोध का प्राबल्य है। इसका परिणाम क्या होगा?-अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। हम महाभारत तो पढ़ते हैं-पर यह नहीं सोचते कि महाभारतकार हमें अपने पात्रों के माध्यम से बताना क्या चाहता है? वह स्पष्ट करता है कि दुर्योधन का क्रोध और छली कपटी स्वभाव न केवल उसके अपने परिवार के लिए घातक रहा अपितु सारे संसार के लिए भी घातक रहा।
आजकल के सारे समाचार पत्र हमें काम और क्रोध जनित अपराधों से रंगे मिलते हैं। सर्वत्र हिंसा और बलात्कार का बोलबाला है। संसार को चाहिए कि उन्नति और विकास के लिए इन दोनों महावैरियों से बचा जाए। कुल मिलाकर कृष्णजी विषयों का संग न करने की शिक्षा मानवता को दे रहे हैं। जिससे कि विश्व में शान्ति व्यवस्था बनी रहे और संसार के लोग शान्तिपूर्वक अपने अभीष्ट की साधना में लगा रहे। श्रीकृष्णजी का मानना है कि काम अर्थात कामना को मारने का प्रयास व्यक्ति को करते रहना चाहिए। कामना ‘महाशन’ है उसे जितना खिलाओगे उतना खाती जाएगी। इसकी भूख कभी मिटने वाली नहीं है।
योगीराज श्रीकृष्णजी का मानना है कि अर्जुन यह कामना ही है जो सारे ज्ञान को उसी प्रकार ढँके रखती है, जिस प्रकार आग को धुंआ ढक लेता है और जैसे गर्भ जेर से आवृत रहता है या दर्पण को मल मैला कर देता है।
अत: मनुष्य को काम अर्थात कामना पर विजय प्राप्त करने के लिए सदा प्रयासरत रहना चाहिए। कृष्णजी काम को दुष्पूर अर्थात जिसका पेट कभी भरा ही न जा सके और अनल (अग्नि) अलम अर्थात जो ‘और लाओ और लाओ कहता रहे’-कहते हैं। उनका यह कथन पूर्णत: सत्य ही है। वास्तव में भारतीय संस्कृति के ये मूल्य ही हैं जो भारत को ‘विश्वगुरू’ बना सके और आज भी बना सकते हैं। ‘दुष्पूर’ और ‘अनल’ से संसार की रक्षा की जानी ही होगी। यह तभी सम्भव है जब विश्व भारत की शरण में आये। कामना इन्द्रिय, मन और बुद्घि में वास करती है, और वही रहते हुए मनुष्य के ज्ञान को ढंके रखती है। इसलिए अर्जुन तुझे कामना का वध करने का कार्य करना चाहिए। इस समय ‘कामना’ के वशीभूत होकर दुर्योधन सामने खड़ा है जो कामना के कारण पाण्डवों के राज्य को ही हड़पने का कार्य करना चाहता है, तुझे कामना के प्रतीक दुर्योधन को अब मिटाना ही होगा। तुझे याद रखना होगा कि-
इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है मन से बुद्घि श्रेष्ठ।
बुद्घि से भी आत्मा जग में होती श्रेष्ठ।।
इन्द्रियों की अपेक्षा मन अधिक श्रेष्ठ है, मन की अपेक्षा बुद्घि श्रेष्ठ है, तथा बुद्घि की अपेक्षा वह आत्मा श्रेष्ठ है। तुझे आत्मा का आत्मा से नियन्त्रण करना होगा और कामना के दुर्जन शत्रु का संहार करना होगा।
इसके साथ गीता का तीसरा अध्याय समाप्त हो जाता है। मूल सत्तर श्लोकी गीता के विषय को गीताकार विस्तार देता गया, जिससे कि गीता का सनातन सत्य ज्ञान विश्व के लोगों के लिए उपयोगी बन सके। गीता पर चिन्तन मनन करते हुए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि गीता का मूल विषय संक्षिप्त ही रहा होगा। पर वैदिक मूल्यों को और वैदिक मान्यताओं को श्रीकृष्णजी जैसे मर्मज्ञ योगीराज के मुख से कहलवाना गीताकार का उद्देश्य है, क्योंकि श्रीकृष्णजी जैसा विद्वान कर्मयोगी उसे मिलना दुर्लभ ही नहीं असम्भव था, उन्होंने जो कुछ कहा वह थोड़ा था उसे विस्तार दिया गया पर विस्तार देने में भी कृष्णजी के मौलिक चिन्तन का ध्यान रखा गया, अर्थात वेद विरूद्घ कोई बात नहीं कहलवायी गयी और यदि कहीं आयी है तो उसे मानना चाहिए कि यह गीता का भी भाग नहीं है। क्रमश:

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