लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

प्रवक्‍ता ब्यूरो

Posted On by &filed under लेख.


डॉ आशीष वशिष्ठ
मिषन यूपी 2012 के तहत दलित मतदाताओं को रिझाने और उन्हें यह समझाने के लिये कि केवल कांग्रेस ही उनकी हमदर्द, दोस्त और हितेषी है, के लिये पिछले काफी समय से यूपी में घूम-घूमकर पसीना बहा रहे हैं। दलित बहुल गांवों की गुप-चुप यात्राएं, दलितों की झोपड़ी में बैठने, खाने और सोने तक की राहुल की सारी कवायदे केवल दलित वोटों को कांग्रेस के पाले में लाने के लिये ही हैं। राहुल, उनके सिपाही और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के फौज राहुल के मिशन यूपी को पूरा करने के लिये दिन-रात एक किये हुये है। दरअसल 2007 के विधानसभा चुनावों में जिस सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के तहत मायावती ने सूबे में लंबे समय के बाद पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी उस फार्मूले के प्राण ब्राह्मण और दलित मतदाताओं को गठजोड़ ही था, अर्थात मायावती ने अपने दलित वोटों के साथ स्वर्ण जाति खासकर ब्राहमण वोटों को मिलाकर यूपी की गद्दी पर महारानी की तरह कब्जा जमा लिया था।

गौरतलब है कि किसी जमाने में दलित, ब्राहम्ण, मुसलमान और पिछड़ी जातियां कांग्रेस का मजबूत वोट बैंक हुआ करती थी लेकिन क्षेत्रीय दलों के बढ़ते जनाधार और प्रभाव ने कांग्रेस के मजबूत वोट बैंक में जमकर सेंध लगायी। कांग्रेस को ये बात बखूबी मालूम है कि यूपी में पैर जमाने के लिये उसे सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के दो महत्वपूर्ण घटकों दलित और ब्राहम्णों को अपने पाले में येन-केन-प्रकरेण लाना होगा लेकिन राहुल की सारी कवायद केवल दलित वोटरों तक ही सीमित दिखाई देती है। राहुल को यह लगता है कि रीता बहुगुणा जोशी और प्रमोद तिवारी जैसे ब्राहम्ण चेहरे ब्राहम्णों रिझाने में कामयाब रहेंगे। वहीं ब्राहम्ण मतदाताओं को अपने पाले में लाने की कांग्रेसी कोशीशे अभी पालने में ही दिखाई दे रही है। वहीं राहुल की यह सोच की उनकी दलित यात्राएं, खाना खाने और दलितों के घर रात बिताने से वो मायावती को चुनौती दे पाएंगे तो उनकी ये सोच मुंगेरी लाल के सपने से अधिक नहीं है।

कांग्रेसी मुख्यमंत्री नारायण दत तिवारी के बाद आजतक यूपी में एक भी ब्राहम्ण मुख्यमंत्री नहीं बना है। क्षेत्रीय और जातिवाद की दिनों दिन तगड़ी होती राजनीति ने ऐसे समीकरण बनाये कि चाहते हुये भी किसी ब्राहम्ण को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। जब कलराज मिश्र सीएम बनने के लिये हवन, यज्ञ और पाठ-पूजा करवाने में दिन-रात एक किये हुये थे तो उस समय बीजेपी गैर ब्राहमण उम्मीदवार को मुख्यमंत्री बनाकर अपने ऊपर सांप्रदायिक ठप्पा लगने से बचाया था। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद से सोशल इंजीनियरिंग के फामूले की हवा चारों ओर इस कदर फैली की मानों बसपा और मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग के लिये पसीना बहाया था। बसपा का पूर्ण बहुमत की सरकार बनना बिल्ली के हाथों छींका टूटने से अधिक कुछ भी नहीं था। 2007 के विधानसभा चुनाव से पूर्व लगभग हर पार्टी स्वर्ण जाति के नेताओं से दूरी बनाये रखने में ही भलाई समझ रही थी। स्वर्ण जातियों में खासकर ब्राहम्ण खुद को राजनीतिक रूप से अलग-थलग और वंचित मान रहे थे। राजनीतिक उपेक्षा के शिकार ब्राहम्ण नेताओं ने मरता क्या न करता की तर्ज पर बसपा का दामन थामने में ही भलाई समझी।

आज बीएसपी और उसके हितेषी सोशल इंजीनियरिंग की चाहे जितनी चर्चा करें लेकिन खुद मायावती को भी पूर्ण बहुमत की सरकार बनने की कोई उम्मीद नहीं थी। जब यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे आ रहे थे तो उस समय खुद मायावती लखनऊ की बजाय दिल्ली में बैठी थी। चुनाव नतीजे बसपा के पक्ष में आने के बाद चम्मचागिरी में सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को हवा दी गयी लेकिन सच्चाई यह है कि बसपा और मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग के लिये कोई खास मेहनत नहीं की थी। लगभग हर राजनीतिक दल की तरह बसपा में भी हर जाति के नेताओं की जमात है, उसी कड़ी में ब्राहम्ण नेतृत्व और मायावती के वकील सतीष चंद्र मिश्र सोशल इंजीनियरिंग का प्रतीक बनकर उभरे थे।

राहुल का यह सोचना कि केवल दलित वोटों को अपने पाले में लाकर वो यूपी की सियासी जंग में रंग जमा देंगे तो वो राजनीति के अखाड़े के कच्चे खिलाड़ी ही साबित होंगे। राहुल ने अपनी टीम में लगभग सभी जातियों के नेताओं को जोड़ तो रखा है सलमान खुर्शीद, बेनी प्रसाद वर्मा, रीता बहुगुणा जोशी, जतिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, जगदंबिका पाल और पीएल पुनिया राहुल की माला के वो मोती है जिनके सहारे राहुल यूपी की चुनावी जंग जीतने को आतुर हैं लेकिन हर जाति और कौम का नेता अपनी शेल्फ मे सजाने के बाद भी राहुल को बसपा और सपा से सीधी टक्कर और चुनौती मिल रही है। माया चुन-चुनकर राहुल के किलों को ढहा रही है असल में यूपी की लड़ाई ब्राहम्ण, मुस्लिम और दलित वोटों के इर्द-गिर्द मंडरा रही है। दलित बसपा को छोड़कर कांग्रेस का हाथ थामेंगे इसी संभावना न के बराबर है तो मुस्लिम भी फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं वहीं बसपा और मायावती के व्यवहार से आहत ब्राहम्ण वोट बैंक इस बार बिखरा हुआ है,ऐसे में कांग्रेस के हाथ ब्राहम्ण, दलित और मुसलमान वोट बैंक की छीजन ही हाथ आएगी। और अगर राहुल ब्राहम्ण, दलित और मुस्लिम वोट बैंक की मलाई खाने की सोच रहे हैं लेकिन राहुल का ये उम्मीद पूरी होती दिखाई नहीं देती है।

कांग्रेस को बसपा, सपा से अगर सीधी चुनौती मिल रही है तो वहीं भाजपा, रालोद और पीस पार्टी भी उसके गणित को बिगाड़ने पर आमादा हैं। वहीं राहुल को दलित प्रेम दूसरी जातियों के अंदर ये भावना भी भर रहा है कि कांग्रेस को केवल दलितों ही की फिक्र है। मुस्लिम वैसे भी काफी समय से कांग्रेस से नाराज चल रहे हैं और स्वर्ण जातियों ने भी कांग्रेस से दूरी बनायी हुयी है। राहुल चाहते तो यह हैं कि स्वर्ण जातियों में से ब्रहाम्ण, दलित, मुस्लिम और पिछड़ी जातियां जो किसी समय कांग्रेस को पक्का और मजबूत वोट बैंक था वो वापिस उसके खेमे में आ जाए लेकिन राहुल की सारी कवायद दलित प्रेम और दलितों के आगे-पीछे ही घूमती नजर आती है। असल में मायावती को पटखनी देने के चक्कर में राहुल अपने असली मकसद अर्थात परंपरागत वोट बैंक और अपनी खोयी राजनीतिक जमीन वापिस पाने की बजाय वर्तमान में बसपा के वोट बैंक दलित वोट को लुभाने में ही आतुर दिखाई देते हैं। राहुल बनना तो देश का पीएम चाहते हैं और ये भी चाहते हैं कि यूपी में कांग्रेस का परचम गर्व से लहराये लेकिन उनकी कार्यशैली और राजनीति ग्राम प्रधान की सोच के स्तर से भी कमतर दिखाई देती है।

ये सच है कि दलित, मुस्लिम और पिछड़ी जातियों का बड़ा वोट बैंक यूपी की चुनावी जंग में अहम् भूमिका निभाता है लेकिन इस तर्क के आधार पर स्वर्ण और बाकी जातियों को एक किनारे रख देना कोई समझदारी की बात नहीं है। हकीकत यह है कि आज कांग्रेस के हर जाति के थोड़े-बहुत वोट हैं लेकिन कांग्रेस दावे के साथ यह नहीं कह सकती है कि मुस्लिम, दलित, ब्रहाम्ण या फिर पिछड़ी जातियां उसका मजबूत वोट बैंक हैं। और किसी भी स्थिति वो कांग्रेस के झण्डे तले जमे रहेंगे। राहुल और कांग्रेस के रणनीतिकारों को ये भूलना नहीं चाहिए कि मायावाती को ये बखूबी पता था कि दलित वोट उसके पाले में गिरेगा बावजूद मायावती ने ब्राहम्ण, मुस्लिम, पिछड़ी जातियों को भी अपने साथ जोड़ने का काम बखूबी किया और मौके की नजाकत और राजनीतिक कारणों और लाभ की खातिर ‘बहुजन’ का नारा ‘सर्वजन’ में बदलने में मायावती ने परहेज नहीं किया। आज अगर मायावती यूपी की चुनावी जंग को लेकर आश्वस्त है तो उसके पीछे यही सोच है कि आज बसपा का लगभग सारी जातियों में घुसपैठ हो चुकी है और दलित तो उसके साथ हैं ही।

अन्ना और रामदेव के आंदोलनों ने कांग्रेस की हालत खस्ता कर रखी है। वहीं पिछले दो-तीन महीनों में ऐसे कई मौके आये जब राहुल देश की जनता के सामने अपनी प्रतिभा, कौशल और परिपक्वता साबित कर सकते थे लेकिन राहुल ऐसे एक भी मौके का कैश नहीं करवा पाये। और अगर राहुल और उनकी टीम यह समझती है कि केवल दलित मतदाताओं को रिझाकर वो यूपी का चुनावी समर जीत लेंगे तो वो गफलत का शिकार हैं। वहीं कांग्रेस में अभी तक प्रत्याशी चयन में ही उलझी हुयी है जबकि बसपा और सपा प्रत्याशियों के नामों पर मोहर लगा चुके हैं। राहुल ने अपनी माला में मोती तो चुन-चुनकर सजाए हैं लेकिन राहुल की टीम में खींचतान और सीएम बनने की चाहत से पार्टी की सेहत को नुकसान पहुंच रहा है। यूपी चुनाव का अघोषित शंखनाद हो चुका है। राहुल को एक साथ कई मोर्चो पर जूझना है। लेकिन राहुल केवल दलित वोटों को साधने में सारी ऊर्जा खर्च कर रहे हैं। कायदे से राहुल को हर कौम, जाति के वोट बैंक को अपने पाले में लाने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन लगता है मायावती से दुष्मनी और खार निकालने के फेर में राहुल अपना दलित राग जारी रखेंगे। सियासी पैंतरों से अनजान और कच्चे राहुल का दलित प्रेम कांग्रेस की चुनावी नैया को डुबो दे तो कोई हैरानी नहीं होगी।

 

 

 

 

 

One Response to “राहुल का दलित प्रेम कांग्रेस की चुनावी नैया डुबो देगा”

  1. भारत की जय

    वाह क्या राहुल तेरी pmकी कुर्सी तक जाने मे कामयाब हो पाएगा अभी शायद सफलता नही मिलेगी सपने लेने छोड़ दे अभी तो मजा करना था वो तो तरी माँ ने तुझे जनता के खुन कि कमाई के मजा कर लिए है अब तो जनता को कुछ तो समझे यारो खातमा करो कांग्रेस का जय माँ भगवती

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *