हे ब्राह्मण! तुम अपना सत्कर्म करो

—विनय कुमार विनायक
हे ब्राह्मण! तुम अपना सत्कर्म करो
तुम्हारे ही कर्म के अनुसरण से
अन्य वर्ण अपने-अपने कर्म करते,
तुम अगर बली विरोधी शाकाहारी बनोगे
तो यजमान भी क्यों बली करेगा!

हे ब्राह्मण तुम निर्णय करो,
तुम अगर गौ-धन-रत्न दान नहीं चाहोगे,
तो रत्नों का मूल्य नीचे गिर जाएगा,
तुम अगर सोने को पीतल से निकृष्ट,
चांदी को एल्यूमिनियम की जाति कहोगे
तो दान दहेज तिलक कुप्रथा मिट जाएगी!

हे ब्राह्मण स्मरण करो
तुम अगर पूर्व की तरह अब्राह्मण से
विवाह संस्कार करोगे तो जातिप्रथा
स्वत: ही लुट-पीट जाएगी!

हे ब्राह्मण कुछ तो विचार करो,
तबके सनातनी झा-सिंह-मंडल-दास नहीं होते थे
फिर क्यों बंदरिया के मरे बच्चे की तरह
चिपकाए हो द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी सी उपाधि को,
जबकि चारों वेदों के कोई एक मंत्र नहीं जानते!

अस्तु अपने अंत:करण का निग्रह करो
दमन करो दसों इन्द्रियों को वशवर्ती बनाओ
अंदर बाहर से शुद्ध बनो, अशुद्ध मत बनो
दूसरे का अपराध क्षमा करो, बदला ना लो
समाज में बदलाव करो ईश्वर का सुमिरन करो!

मन, इन्द्रिय, तन को सरल रखो,वक्र ना करो,
वेद, शास्त्र, ईश्वर व परलोक में श्रद्धा रखो,
वेद शास्त्र का अध्ययन करो, अध्यापन करो,
और परम तत्व ब्रह्म का अनुभव-अनुसरण करो!
ये सब ब्राह्मण मन में उत्पन्न स्वाभाविक कर्म हैं!

अपने कर्म से पलायन मत करो
वेद शास्त्र अध्ययन/अध्यापन को प्रतिबंधित मत करो!
अब्राह्मण चौथे वर्ण को वेदाध्ययन से वंचित ना करो!

हे क्षत्रियो! वीर सैनिकों!
शूरवीर बनो, धैर्य, तेज, चतुरता धारण करो!
अपने कर्म से कदापि पलायन मत करो!
‘अर्जुनस्य प्रतिज्ञै द्वय न दैन्यं न पलायनम्!’
योग्य पात्र को दान दो और सृष्टि पर स्वामीभाव रखो
ये सब क्षत्रिय वीरों का स्वाभाविक गुण कर्म है!

हे कृषक वैश्य वणिक!
कृषि-गोपालन,क्रय-विक्रय में सच्चाई वरण करो,
अपने अनुचित लाभ हेतु अन्न भंडारण ना करो!
ये वैश्य वर्ण के स्वाभाविक कर्म है, सत्कर्म करो!
शेष कर्म, शेष वर्ण विहीन जातियों को छोड़ दो!

‘ब्राह्मण: क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्ण द्विजातय:
चतुर्थो एक जातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पंचम:'(मनु)

ये तीन वर्ण ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य द्विज जाति हैं!
इस तीन द्विजाति वर्णों से निसृत
चौथा शुद्र वर्ण नहीं अपितु जाति समूह है!

हे वर्णाश्रमी अपने-अपने स्वाभाविक कर्म करो,
क्योंकि कर्म वर्ण-वंश-जाति से नहीं,
स्वभाव से उत्पन्न होता!
जो जन त्रिवर्ण में नहीं है वे स्वभाव से
त्रिवर्ण के सहायक कर्म को अपना कर्म समझो!

हरकोई अध्यापक, योद्धा, क्षेत्रपति-कृषक-पशुपालक,
चिकित्सक या अन्य अध्यवसायी नहीं हो सकते!

ऐसी स्थिति में तुम त्रिवर्ण में स्थान ले लो,
ब्राह्मण का सहयोगी होकर गुरु ज्ञानी बन लो,
वीर सैनिक योद्धाओं के मददगार बनो
वीर रस संचार करो,कवि लेखक शब्दकार बनो,
चिट्ठी,पत्री,रसद पहुंचाने का कोई कार्य व्यापार करो!

बनो सहायक कृषक व्यवसायी चिकित्सक आदि के
काश्तकार, वणिक, नर्स,मिश्रक ड्रेसर आदि कार्य करो!

क्योंकि कर्म शूद्र नहीं होता,कर्म का वर्ण नहीं होता,
कर्म स्वभाव से प्रेरित होता,स्वभाव शूद्र नहीं होता!

स्वभाव मानवीय भाव होता सब वर्णो में
अपने-अपने मनोनुकूल कर्म ढूंढ लो,
नित नवीन कर्मों का सृजन हो रहा है
जाति वर्ण से कई गुणा कर्म में बहुलता होती!
—विनय कुमार विनायक

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