सतीश कुमार

ऐ लड़की !
तुम हो बड़ी ज़िद्दी ,
अपनी ही कहती रहती हो, सुनती नहीं कभी किसी की,
हर बात में तर्क- वितर्क ,
हर बात में लॉजिक ,
हर बात में टांग अड़ाना,
बड़ों की बातें काटना ,
अपने सुर को ऊंचा रखना,
किसी की बात न मानना ,
अपनी ही बातें मनवाना,
लड़कियां तो ऐसी नहीं होती!
छुईमुई ,सहमी सहमी ,
डरी डरी ,
आज्ञाओं को ढोती ,
जुल्म सहन करती,
ताने सुनती,
मुँह से आह तक ना निकालती,
उफ तक ना करती ,
बस सर झुकाए,
अज्ञाएं मान करती ,
वो सब कुछ करती,
जो-जो कहते हैं उससे ,
जैसा कहते हैं उसको ,
वैसा ही, क्यों नहीं,
स्वीकार कर लेती तुम भी।
तुम क्यों हो ऐसी ,
जो करती हर बात पर बहस ,
जिसने सीखा तू- तू, मैं-मैं करना,
सवाल करना,
जवाब देना
क्यों जरुरी है तुम्हारे लिए,
थोड़ी देर भी,
चुप नहीं रह सकती तुम,
चुप रहना ,
स्त्रियों का है गहना,क्या ये कभी सुना नहीं तुमने ?

तुम एकदम
अलग, अनोखी,
क्यों बनना चाहती हो तुम,
तोड़ना क्यों चाहती हो
वर्जनाएं समाज की।
आखिर क्यों ?

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