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    Homeसाहित्‍यकविताहे हंसवाहिनी माँ

    हे हंसवाहिनी माँ

    हे हंसवाहिनी माँ
    हे वरदायिनी माँ

    अज्ञान तम से हूँ घिरा
    अवगुणों से हूँ मैं भरा
    सुमार्ग भी ना दिख रहा
    जीवन जटिल हो रहा

    ज्योति ज्ञान की जलाकर
    गुणों की गागर पिलाकर
    सत्पथ की दिशा दिखाकर
    जीवन सफल बना दो माँ

    हे हंसवाहिनी माँ
    हे वरदायिनी माँ

    तू ही संगीत तू ही भाषा
    तुम ही विद्या की परिभाषा
    तेरी शरण में जो भी आता
    बुद्धि की निधि वो है पाता

    विनती सुनो माँ भारती
    लेकर पूजा की आरती
    तुझे संतान पुकारती
    प्यार से निहार लो माँ

    हे हंसवाहिनी माँ
    हे वरदायिनी माँ

    ✍️ आलोक कौशिक

    आलोक कौशिक
    शिक्षा- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य) पेशा- पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखन सम्पर्क सं.- 8292043472

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