हे! राजनीते , अहम त्वमेव शरणम गच्छामि

 प्रभुनाथ शुक्ल

हे! राजनीते तुझे शत्-शत् नमन। तेरी कोई भाषा और परिभाषा भी है यह मैं आज तक नहीं पढ़ पाया हूं। तेरे व्यक्तित्व की लावण्यता कितनी खूब सूरत है कि हर कोई तुझमें समाहित होना चाहता है। वह सदाचारी हो या दुराचारी। कर्तव्य पथ के प्रगतिवाद का समर्थक हो या चरित्रहीनता के पनामा नहर में डूबकी लगाने वाला तू ऐसी गंगा है कि सब तुझमें समा पवित्र हो जाते हैं। कलयुग के सारे पाप धूल कर धवल हो उठते हैं। सखे! तू रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन, अदृश्य और अरुप होने के बाद भी जगत के सभी प्राणियों में विद्यमान हो। तू ऐसी महामाया है जो अपनी लावण्यता के रुपपास में सबको बांध लेती हो। बंधने वाला इस सृष्टि का चाहे योगी, यती, सन्यासी जो भी हो सब तुझमें समाहित हैं। सावन हो या जेठ की तपती दोपहरी तेरी हरियाली सदाबहार रहती है। संमुद्र मंथन से निकली तू ऐसी सोमरस है जिसे दैत्य हो दानव सब पीना चाहते हैं। भारतखंड के आर्यावर्त के जम्बूद्विप भूभाग में तू अद्भुत, अकल्पनीय, अवर्णनीय गाथा हो जो हर दिन एक नया इतिहास गढ़ती हो। तुझे किसी परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता है।

 तुझमें लोग जितने गिरते हैं उन्हें तू उतना ही सम्मान देती है। सत्ता और सरकार की चाबी तो तेरे पंचत्व हस्त की मुटिठका में कैद है। गठबंधन की सरकार में तो तेरे जलवे की दाग देनी होगी। सत्ता के घमंडिले पताके को तू जब चाहे जब अर्श पहुंचा दे और जब चाहे फर्श पर पटक दे। तेरे लिए नैतिकता, अनैतिकता, विधान, संविधान कोई मायने नहीं रखता। बस तेरे में जो समाहित हुआ वह तेरा बन कर रह गया। तेत्रायुग में तेरी सत्ता सहोदरी ने कुटिल चालों में फंास प्रभु श्रीराम को भी वनवास दिलाया और देवि सीता को अग्नि परीक्षा के लिए बाध्य किया। द्वापर में सुई के अग्रभाग के की भूमि के लिए महाभारत रच डाला। पांडवों को अज्ञातवास में रहना पड़ा। द्रौपदी को कौरवों की सभा में चीरहरण से अपमानित होना पड़ा। कलयुग में तो सबसे  प्रभावशाली देवताओं में तुम्हारी गणना हैं। तुम्हारे यहां न कोई दोस्त है न दुश्मन। हे! सखे जो तुम्हारी शरण में आया तूने सबका साथ दिया और सभी का सर्वांगीण विकास किया। सावन में तू ने कोई श्रृंगार नहीं किया है। हाथों में न मेंहदी भी रचाई है।माथे पर विंदिया और आंखों में काजल भी नहीं लगाया है। फिर भी तेरे नाम में अद्भुत शक्ति और लावण्यता समाहित है। फिल्म स्टार, क्रिकेट स्टार, संगीतकार, नौकरशाह और खिलाड़ी अपने क्षेत्र से अलविदा होने वाला हर व्यक्ति बुद्धम् शरणम् गच्छामि के बजाय राजनीति शरणम् आ गताय होने को व्याकुल रहता है। बस कंधे पर एक अंगवस्त्र धारण करते ही उसकी नीतियां और विचार तेरे सिद्वांतों और शर्तों में ढल जाते हैं। ऐसे मानव श्रेष्ण्ठों, लोकतंत्र के दमनकारियों का तू बेहिचक वरण कर उनकी श्रेष्ठता को सम्मानित करती हो। जिसके लिए किसी प्रशिण की जरुरत नहीं होती है।

 सत्ता के लिए दलबदल और पाला बदल तो तेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे लोग राजनीति का प्रगतिवाद मानते हैं। तू इतनी सर्वशक्तिमान है कि विधान और संविधान तेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाते। तू अपनी इच्छा के अनुसार देश, काल और वातारण के लिहाज से संविधान को गढ़ती या गढ़वाती हो। तेरी नीतियों का जिसने में अपमान किया वह गर्त में चला गया। सत्ता के गलियारों में उसका सेंसेक्स भाग धड़ाम हो गया। इसलिए भी क्योंकि तुम्हारी न कोई नीति और नीयति। तेरी इस इस तंदुरुस्ती का असली राज क्या है आज तक कोई वैज्ञानिक और समाजशास्त्री समझ नहीं पाया। तू परिवर्तनशीला है, तुझमें और तुम्हारे अनुयायियों में स्थायित्व नहीं है, शायद यही सेहत का असली राज है। तेरी महिमा इतनी है कि तू न दोस्त को दोस्त और न दुश्मन को दुश्मन रहने देती हो। वक्त आने पर सारे मिथक तोड़ देती हो। वह अपन का यूप्पी हो, कर्नाटक का नाटक हो या फिर गोवा पालायनवाद। तुझमें जगत की सारी राम और रासलीलाएं समाई है। तू तर्क और वितर्क से परे है। हे! कलयुग की श्रेष्ठ देवि हम तुझे नमन करते हैं। उम्मीद करते हैं कि तेरी माया का विस्तार भारतखंड और आर्यावर्त के साथ जम्मूद्वीप की सीमाओं से परे सप्त द्विपों में विस्तारित होगा। ओम्! राजनीताय नमः।

   ! ! समाप्त! ! 

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