लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

Posted On by &filed under समाज.



दिल्ली में राष्‍ट्रमंडल खेल होने जा रहे है. खेल के पहले भ्रष्टाचार के तरह-तरह के जो महान खेल हो रहे है, उनसे पूरा देश परिचित हो चुका है. लेकिन एक नया तथ्य यह सामने आया है कि राष्ट्रकुल खेलों में शामिल होने आ रहे अनेक विदेशी खिलाडियों के स्वागत में हमारी गौ माताए भी अपनी कुर्बानियां देंगी. विदेशी खिलाडियों का कहना है कि हमें गो-माँस चाहिए. अगर गो माँस नहीं मिलेगा तो हम शामिल नहीं होंगे. यह एक तरह से ब्लैकमेल है किसी देश के साथ. ऐसे देश के साथ जो अहिंसा का पुजारी है. जहाँ के राष्ट्रपिता की जयन्ती पूरी दुनिया में ”अहिंसा दिवस” के रूप में मनाई जाती है. ऐसे महान देश से कोई यह कहे कि ”हमें गो माँस खिलाओ, वर्ना हम तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार नहीं करेंगे”, तो यह सोचनीय बात है.

कोई देश यह कहने की हिम्मत कैसे कर सकता है कि हम तुम्हारे देश में आ कर गो माँस खायेंगे? इसके पीछे कारण साफ़ है. दरअसल जिस तेजी के साथ भारत गो-मांस का निर्यात कर रहा है, उसे देख कर अनेक देश यह अंदाज़ा लगा रहे है, कि अब भारत अहिंसक-भारत नहीं रहा. यह नैतिकता, करुणा, अहिंसा, मानवता, जीवन-मूल्य इन सबकी रोज ही तो हत्याएं होती रहती है. गाय को जो देश माता कहता है. जहाँ के भगवान् (कृष्ण) गायों के दीवाने थे, वह देश आज दुनिया का सबसे बड़ा माँस-निर्यातक बना बैठा है, उस देश में आने वाले खिलाड़ी या लोग गो माँस की ख्वाहिश करते हैं, तो गलत नहीं करते. यह इस देश का संस्कृतिक पतन नहीं है तो और क्या है कि हम इस बात के लिये तैयार हो जाएँ कि ‘आओ, अतिथि, तुम्हारा स्वागत है. हम तुम्हे गायें परोसेंगे’. गायें ही क्यों, बकरे-बकरियां, मुर्गे, खरगोश और न जाने कितने ही पशु-पक्षी इन खेलों के कारण जान गवां देंगे. दिल्ली की यमुना नदी में निरीह जानवरों का कितना खून बहेगा, इसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते.

आज भारत के अनेक राज्यों में कसाईखाने चल रहे है. इस कारण वहां की नदियाँ, वहां का वातावरण प्रदूषित होता जा रहा है. लोग विरोध करते है,लेकिन उनकी सुनवाई नहीं होती. यह वही दिल्ली है, जहाँ चालीस साल पहले अनेक गो भक्त गोलियों से भून दिए गाये थे. गो भक्तों की यही माँग थी कि देश में गो हत्या पर रोक लगे. कसाईखाने बंद हो. गो भक्तों की मांगें तो पूरी नहीं हुई, अलबत्ता उनकी ह्त्या कर दी गई .

अजब देश है यह. कई बार मुझे लगता है, कि इस देश में गुलामी जस की तस है. केवलसत्ता का हस्तांतरण हुआ है. अँगरेज़ चले गाये, अब भारतीय राज कर रहे है. आज भी अंगरेजों के दौर का दमन-चक्र चल; रहा है. अगर ऐसे नहीं है तो क्यों प्रदर्शनकारियों पर लाठी-गोलियाँ चलती हैं? क्यों? अपनी जायज मांगो के लिये सडकों पर उतारने वालों के साथ नाजायज और शर्मनाक व्यवहार होता है. पता नहीं कब वह सरकार आयेगी जो गोली नहीं, बोली से काम लेगी. राष्ट्रकुल खेलों के दौरान गाये कटेंगी, इस मुद्देको लेकर अगर लोग सडकों पर प्रदर्शन करने के लिये उतार जायेंगे तो कोई बड़ी बात नहीं कि लोगो को भून दिया जाये. तर्क यही दिया जाएगा,कि देश की इज्ज़त का सवाल था. और हजारों निरीह पशु काटेंगे, राष्ट्रमाता गायें कटेंगी, उससे देश की अस्मिता को झटका नही लगेगा? दरअसल गाय का सवाल हमारी प्राथमिकता में है ही नहीं, जबकि अनेक शोधों से यह स्पष्ट हो गया है कि गाय की ह्त्या से भूकंप के झटके भी आते है. गाय हमारे अर्थ-तंत्रा की रीढ़ है. ग्रामीन अर्थ व्यवस्था इसी से चलती रही है, आज भी चल रही है,लेकिन अब हमारी सरकारों का गाय से मोह भंग हो गया है, इसीलिए वह ट्रैक्टरों की खरीदी कोप्रोत्साहित कर रही है. बैल बेकार हो रहे है. इसलिए लोग उसे कसाईयों को बेच देते है. हम धीरे-धीरे भयंकर किस्म के निर्मम होते जा रहे है. हमारी काया तो इंसानों जैसी है, पर भीतर एक हैवान जगा हुआ है. यही कारण है कि जब गे को बचने का सवाल आता है, या जीव हत्या के विरोध में बाते की जाती है तो तथाकथित विकसित लोग चिढ़ जाते है. ये अमानुष लोग माँस के इतने प्रेमी होते है, कि यह सोच कर ही सिहर उठते है, कि अगर गो माँस नहीं मिला, अगर दूसरे किसी जानवर का माँस नहीं मिला तो जीवन किताना निस्सार हो जाएगा. मुझे तो लगता है, कि राष्ट्रकुल खेलों में गायें न कटे, इस बात को लेकर देश में कोई बड़ा आन्दोलन नहीं होगा. यह देश धीरे-धीरे मुर्दों का देश बनता जा रहा है. विरोध के नाम पर यह ज़रूर होगा कि कि कुछ लोग मुख्यमंत्री से मिलें या प्रधानमंत्री से मिल लेन खानापूर्ति हो जायेगी, बस. जबकि होना यही चाहिए, कि पूरा देश उठ खडा हो, गाय की ह्त्या नहीं होगी.शर्त यही होनी चाहिए. अगर गो ह्त्या ही शर्त हो तो आयोजन ही रद्द कर दिया जाये. कहीं तो हम अपने भारतीय होने का सबूत दे. बातें दुनिया को, कि हमारे लिये गाय केवल पशु नहीं है, वह हमारी माँ है. हमारे अर्थ-तंत्र की रीढ़ है. लेकिन ऐसा शायद होने से रहे. क्योंकि अब अपना देश मूल्यों वाला देश नहीं रह गयाहै. यहाँ शराब से पैसे कमाने की छूट है, माँस का निर्यात करके डालर-अर्जन की छूट है. देश व्यापार को मान्यता है. समलैंगिक संबंधों को स्वीकृति है. लिव-इन-रिलेशनशिप की कानूनन बल्ले-बल्ले है. तो जो देश इतनी तेज़ी के साथ ”आधुनिक” होने पर तुला है, वहा अगर गायें कट रही है, तो कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन एक बात तय है कि अगर गो हत्याएं नहीं रुकी तो यह बात तय है कि भविष्य मे प्राकृतिक तबाहियों को हम रोक नहीं पायेगे.

दिल्ली के ही तीन वैज्ञानिको के शोध को दुनिया ने मान्यता दी थी, जिसमे उन्होंने निष्कर्ष निकाला था कि गायों की अनवरत हत्याओं के कारण भूकंप आ रहे है. अन्य प्राकृतिक आपदाएं झेल रहे हैं हम लोग. इसे ”बिस थ्योरी” कहा गयाथा. आज भी दिल्ली में रोज़ हजारों गाये, कटती है. वहां के कसैखाने से बहाने वाला खून यमुनानदी को प्रदूषित कर रहा है. ऐसे में क्या फर्क पड़ता है, कि राष्ट्रकुल खेलों के दौरान कुछ और गायें कट जाएँ. शर्म तो दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को आनी ही चाहिए, कि उनके रहते दिल्ली में गाये कट रही है. रोज कट रही है. अब खेल आयोजन के दौरान बेहिसाब कटेंगी. हमें अपना पद प्यारा है. जीवन मूल्य नहीं. शीला दीक्षित चाहे तो रातोंरात मदर टेरेसा की तरह ख्याति प्राप्त कर सकती है. वे बस इतना साहस दिखाएँ, कि दिल्ली में गो हत्याएं नहीं होंगी. आदेश जारी कर दे. वे केंद्र से भी साफ़ कह दे कि ‘राष्ट्रकुल खेलों के दौरान हम गायें काटने नहीं देंगे’. लेकिन मेरी यह बात एक मुगालता है. एक भ्रम है. ऐसा होने से रहा. कुल मिला कर होगा यही कि बेहिसाब गायें कटेंगी. गौ माताऑं की चीखे, खेलों की हार-जीत के शोरों में दब जायेंगी. गो भक्त गोली खाने के डर से बाहर निकलेंगे भी नहीं. और यह देश हमेशा की तरह रिमोट पकडे खेल-आयोजन और विज्ञापन देखते हुए अपना यह कीमती समय भी यूं ही निकल देगा. जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा, जब नैतिकता, अहिंसा को बहिष्कृत कर दिया गया हो, तब गो ह्त्या पर रुदन कुछ लोगों को मध्य-युगीन मानसिक-प्रलाप से ज्यादा कुछ नहीं लगेगा भी नहीं.

53 Responses to “हाय गाय, अब तुम फिर कटोगी…? / गिरीश पंकज”

  1. U.kamal

    बहुत प्यारे देश वासियौं
    बुद्धिजीवियौं से मेरा सवाल
    गाये की अहमियत भैंस से कम मै भी मानता हूँ और मै जानकारी चाहता हूँ आप बुद्धिजीवियौं से के
    जब गायें दूध देना बंद कर देतीं हैं तब उनका क्या करते हो और जब वो बूढी हो जाती हैं तो उनका क्या करते हो .
    कुछ मै बता दूँ फिर भी
    बहुत बड़ी संख्या गौ माता का जब वो दूध देना बंद कर देती है तो गलियौं चौराहौं पर आवारा धूमते गन्दगी खाते और तो और अक्सर गंभीर घायल अवस्था में दयनीय स्थिति में दिखती हैं
    इस तरह की गायौं की संख्या बहुत ज़्यादा हैं
    ज़ाहिर है इनके मालिक ९९% हमारे हिन्दू भाई ही होते हैं
    आगे आप लोग बहुत समझदार लोग है सवाल उठते जाएँ गे जवाब खुद बखुद मिलता जाये गा अगर आप सब ने चश्मा मानवता और ईमानदारी का लगाया होगा
    बस इतना कहूँ गा पहले अपने अंदर कमी निकाल और सही करें हम सब
    क्यूंकि उन ९९% गायौं का जो कुछ भी होता है इसका जवाब उसके मालिक ही से पूंछना चाहिए पहले
    ९९% मालिको में तो कुछ इसी व्यापार में बड़े व्यापारी हैं .

    Reply
  2. Sandeep K. Upadhyay

    कपूर जी, के विचार काफी सराहनिये है, “जिस आदमी की मानसिक इश्थिति ठीक नहीं होती है वो हत्या, या मांस भक्षण का विरोध करता है”, तो इस कड़ी में सबसे पहले हमारे बापू, यानि रास्ट्रपिता महात्मा गाँधी आते है, सबसे बड़ी विडम्बना ये है, की एक तरफ हम प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की बात करते है , जिसमे जंगली पसु से लेकर विषधर सप भी आते है, और दूसरी तरफ जो पचपन से लेकर बुढ़ापे तक अपनी अमृत (दूध) हमको पिलाती है, उसकी कोई रक्षा करने वाला कोई नहीं है,
    कई जगह पढने और सूनने में भी आता है की जीस तरह का भोजन आप करते है, आपमे उसी तरह के विचार आते है,
    कपूर जी मेरा आग्रह है की आप अपना इलाज किसी डॉक्टर के बजाय किसी कौन्सीलर से कराये, क्यों की अगर सारगर्भित और सच से प्रेरित गिरीश जी का लेख आपको कुंठित लेख लगता है तो इससे दुर्भाग्य और क्या होगा.

    Reply
  3. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    प्रो. मधुसुदन जी की दी उपयोगी जानकारी के समर्थन कथनीय है कि ——-
    – मांसाहार पर २२ देशों में किये गए एक सर्वेक्षण से यह जानकारी सामने आई है कि–
    * गोमांस की सबसे अधिक खपत करने वाले ऑस्ट्रेलिया में आँतों का कैंसर संसार में सबसे अधिक पाया गया है.
    * एस्कीमो के बाद सबसे कम आई क्यू ऑस्ट्रेलियन का है. यानी गोमांस की सबसे अधिक खपत के परिणाम स्वरूप सबसे कम बुधी और आँतों के कैंसर के सर्वाधिक रोगी होने का सम्मान आज ऑस्ट्रेलिया को प्राप्त है.
    * २२ में से १७ देशों में कैसर का % सबसे अधिक, ३ देशों में माध्यम तथा २ देशों में किन्ही अज्ञात कारणों से कम पाया गया है. यानी मांसाहार की अधिक खपत और कैंसर व मानसिक क्षमता घटने का सीधा सम्बन्ध होने के ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं.
    * अतः डा. मधुसुदन जी की सूचना बिलकुल सही है. मांसाहार करने से आँतों में उसकी सडन से जो विषाक्त पदार्थ ( टोक्सिन) पैदा होते हैं वे आँतों द्वारा चूस कर रक्त प्रवाह में पहुंचा दिए जाते हैं.इससे शरीर का सारा रक्त दूषित हो जाता है. यही दूषित रक्त शरीर के हर अंग में प्रवाहित होता है तो पूरा शरीर रोगों का घर बनाता है. दूषित रक्त की अधिकता होने पर कार्सीनोमा सेल अर्थात कैंसर की उत्पत्ती होजाती है.

    Reply
  4. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    ॥स्वास्थ्य के लिए॥
    (१)ककडी, सेब, टमाटर या कोई शाक यदि खुलेमें रख छोडे, तो १२ घंटेके बाद भी वह ज्यादा सडा हुआ नहीं पाएंगे।
    किंतु एक मांसका टुकडा यदि १२ घंटे वैसे ही रखा जाय, तो वह सडा होगा।
    अर्थ: मांस जलदी सडता है। हानिकारक है।
    (२) मांस जब आंतोमें पहुंचता है, तो मांस में उपस्थित सूक्ष्म जंतु कूदकर आंतोपर भी (दोनो मांस ही होने से) बैठ कर कॅंसर फैलाते पाए गए हैं।
    मांसाहारी को आंतोंका कॅंसर अधिक होता है। (कँसर का कारण)
    (३) हमारी आंतोंकी लंबाई २२ से २६ फुट होती है। मांसाहारी प्राणियोंकी छोटी (१०-१२ फुट) होती है। मांसाहारी प्राणी मांसको एकाध दिनमें विष्टा द्वारा निकाल देता है। मनुष्य उसे २ से ३ दिन बाद निकाल सकता है।
    यह २-३ दिन तक मांस का आंतों में रहना, कॅंसर की संभावना बढाता है।(कॅंसर)
    (४) बाघ, सिंह, कुत्ता, बिल्ली जो मांसाहारी प्राणी है; वे जीभ से लप लपा कर पानी चाटकर पीते देखे होंगे।
    पर शाकाहरी प्राणी जैसे गौ, हाथी, हिरन, (और आदमी) मुंहमें चूसकर, या कश लगाकर पीते हैं।
    यह बताता है, कि मनुष्य़ भी शाकाहारी प्राणी होने के लिए सर्जा गया है।
    (५) सालो पुराने दाने/बीज भी नया पौधा उगा सके हैं।
    आप चाहे तो किसी आर्यसमाजी कार्यालयमें जाकर पुस्तकको देखे/खरिदे/पढे।{उसमें आप १५ कारण, और सूक्ष्म जानकारी पाएंगे}
    (स्मृति के आधार पर कुछही जानकारी संक्षेप से प्रस्तुत की है)

    Reply
  5. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    girish- pankaj says:
    गिरीश जी,के समर्थन में। “मांसाहार पीछडापन है” प्रगति का लक्षण कदापि नहीं।
    वैसे तटस्थता से वास्तविक प्राकृतिक इतिहास जाननेकी इच्छा रखनेवालों के लिए कहा जा सकता है, कि–
    (१) पहले पाषाण युग में मानव जंगलो में बसता था। तब अन्य पशुओं की शिकार कर, उनका मांस भक्षण करता था। (उस समय ऍग्रिकल्चर का शोध नहीं हुआ था।)
    तो मांसाहार का सही अर्थ “जंगली” ही हुआ।(खेद है, शब्द प्रयोगसे), पर और कैसे कहा जाय?
    (२) उसके बाद जल की प्राथमिक ज़रूरत के कारण “नदियों के किनारे” बसना प्रारंभ हुआ। भारतके सारे “पट्टन” जिनका अर्थ नदीके पटपर बसे हुए नगर होता है। मराठी में पैठण, गुजरातीमें पाटण, हिंदीमें पटना, —औ भी आपको अन्य भाषाओंमे शब्द मिल जाएंगे।
    (३) जल की सुविधासे फिर ऍग्रिकल्चर (खेती) प्रारंभह हुयी, इस ऍग्रि”कल्चर” से “कल्चर” विकसित हुआ, और मनुष्य़ भी कल्चर्ड (सुसंस्कृत) हुआ। तब धान खाने लगा। गौ का दूध जो हत्त्या बिना मिलता है, वह भी बछिया को पिलाने के बाद, उसका उपयोग मनुष्य़ करने लगा।
    (४) सार: मांसाहार प्रगति का लक्षण नहीं है। वह वास्तवमें जंगल कल्चर का अवशेष है। वैसे कोई भी मांसाहार गलत है। पर न्यूनतम शर्त के नाते गौमांस वर्ज्य है। हिंदू की एक व्याख्या है, “वह जिसे हिंसासे दुःख होता है”। (हिंसा दूयते सः हिंदू) इसी तार-तम्य (तर-तम-वरीयता) के कारण,हमारे यहां समाजमें Gradation हुई है। आपकी आध्यात्मिक उन्नति में आपका आहार भी योगदान देता है।(गीता में भी तो श्र्लोक है, ही)
    यह एक कारण भी हमारे समाजमें अलग अलग प्रथा वाले गुटोंका है। (हीनता-कनिष्ठता का भाव त्याग दें)
    “आर्य समाज” के मुंबई कार्यालय ने एक पुस्तक छापी हुयी है। शाकाहार के पक्षमें १५-२० नितांत, किसी को भी जचे ऐसे कारण दिए हुए हैं।(कभी ढूंढकर टिप्पणी दे सकता हूं।)
    अन्न आपकी प्रवृत्ति भी सुनिश्चित करता है।आपका चारित्र्य भी आप क्या आहार करते हैं, उसपर निर्भर करता है।जब आप एक अच्छा काम करते हैं, तो प्रसन्न ज़रूर होते होंगे? यह ऐसे ही सोचा जा सकता है।

    Reply
  6. गिरीश पंकज

    girish pankaj

    मैंने अनेक तरह की प्रतिक्रियाएं पढ़ी. कुछ में करुणा का समावेश था, तो कुछ इतनी निर्मम कि मत पूछिए. गो माँस की वकालत करने वाले लोगो को देख कर हैरत होती है. गो माँस ही क्यों, किसी भी पशु का मांसक्यों खाया जाए..? जब सभ्यता विकसित नहीं हुई थी, हममे खाने-पीने की तमीज़ विकसित नहीं हुई थी, हमने खाने-पीने की सात्विक चीज़े नहीं खोजी थी (जिसे अनाज, दूध आदि ) तब तक कोई बात नहीं थी. हमें पता ही नहीं था, कि क्या खाना है और क्या नहीं खाना. विवेक ही नहीं था. मगर बाद में विवेक जगा, हम सभ्य हुए. पहले नंगे थे फिर अकल आई कि यह ठीक नहीं, तो कपडे पहने लगे. लेकिन हम क्या फिर जंगली हो रहे है? वही खून खराबा , वही हिंसा. और अपनी हिंसा के पक्ष में अनेक कु-तर्क भी. जीव हत्या करना और उसे स्वादिष्ट बता कर आनंद लेने वाले लोग भी इस भारत में है, यह देख कर हैरत होती है. खैर, अंतहीन सिलसिला है यह. मै कुछ लिखूंगा तो हिंसा को ‘प्रगतिशीलता’ मानने वाले लोग जायज ठहराते हुए उदाहरण देने भिड जायेंगे. लेकिन चाहे लाख तर्क दिएँ जाएँ, हिंसा बुरी है तो बुरी है.

    Reply
  7. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    रविन्द्र जी पुस्तक का पूरा पता तो स्पष्ट लिखा हुआ है. खेद है की पुस्तक के ऊपर कोई फोन न. नहीं छापा हुआ और न ही कोई इ-मेल है अन्यथा और आसानी हो जाती. अतः दिए पते पर पत्र लिखें जो की ३१ अगस्त की मेरी उपरोक्त पोस्ट में है.

    Reply
    • Ravindra Nath

      धन्यवाद राजेश जी, मै प्रयत्न करता हूं।

      Reply
  8. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    * बार-बार केवल नकारात्मक टिप्पणियाँ करने वालों को मेरा सुझाव है की वे अपने व्यक्तित्व की थोड़ी सी चिंता कर लें. यदि हमें हर चीज़ का केवल नकारात्मक पक्ष ही नज़र आता है तो यह एक गंभीर मानसिक रोग है जिसका एक इलाज आर्ट ऑफ़ लीविंग का प्राणायाम कोर्स हो सकता है, बैच फ्लावर रेमेडी की ‘जिनशीयन’ नामक दवा हो सकती है, होमियिपैथी में भी इसका इलाज है.
    * देश विरोधियों का तो १५०-२०० साल पुराना एजेंडा है कि भारत की हर बात को बुरा बताना है, हीन भाव को जगाना है. पर हम भी तो कहीं इसी मानसिकता के शिकार अनजाने में नहीं बन गए? हमें भारत की केवल बुराई ही बुराई तो नज़र नहीं आती ? फिरतो यह भारत विरोध का मैकाले द्वारा फैलाया घातक सींडरोम है.
    * स्मरणीय है कि पी.जी.आई. के प्रो. यशपाल शर्मा के अनुसार नकारात्मक संवेगों में जीने वाले को आसानी से कैंसर होने की प्रबल संभावना होती है. अतः ठीक समझें तो सकारात्मक सोच बनाने का प्रयास करें. अछे- बुरे पक्षों को संतुलित रूप से देखें और बुरे के प्रती भी सकारात्मक ढंग से सोचने कहने का प्रयास करें.
    # आयुर्वेद में एक और कमाल की जानकारी दी गयी है. भारतीय गो को यदि विषाक्त प्रभाव वाला आहार ( पचने योग्य मात्रा) दी जाए तो गोबर में वह आहार जब बाहर निकलता है तो उसमें विष-प्रभाव समाप्त हो चुका होता है. कुछ रोगों में इसी कारण से गो को खिलाया अन्न दिया जाता है. यथा गेहूं खिलाने के बाद उसके दाने जब गोबर में निकलते हैं तो उन्हें चुनकर, धो-सुखाकर पीसते हैं और उसकी रोटी रोगी को देते हैं.
    -दूध में भी उस विष का प्रभाव नहीं आता.
    -इस पर विस्तृत शोध करने की आवश्यकता है की गो कितना विष पचा लेती है और ऐसा उसकी शरीररचना की किस विशेषता के कारण होता है.
    * जिन्हें लगता है की भारत सदा से ही भ्रष्ट रहा, उन्हें तो अपने दिमाग का इलाज ज़रूर करवा लेना चाहिए. इतनी बड़ी गाली वे भारत को दे रहे हैं और सम्पादक ऐसे गैरजिम्मेवार लोगों के कथनों को छाप रहे है ? कितने घमंडी, मूढ़ और हठधर्मी हैं वे लोग जो बार-बार कहने पर उन ऐतिहासिक तथ्यों को नहीं पढ़ते जो विदेशियों के द्वारा भारत की अतीतकालीन प्रगती व महानता पर लिखे गए हैं. मानो वे विदेशी तो झूठे हैं और सत्य को जानने वाले ये भारत के निंदक ही हैं. क्योंकि २००-,४००,५००,१०००,१०००० साल पहले ये महानुभाव जीवित रहे होंगे . अतः जो सच ये जानते हैं वह इतिहास के सच से अलग है और वही सही है.
    ऐसों की दिमागी हालत पर शक करने में क्या गलती है ? धन्य हैं ये भारत के कुंठित निंदक जो अपनी जननी भारत माँ की निंदा में ही सुख और गौरव मानते हैं.
    हे ईश्वर इन्हें थोड़ी तो सदबुधी दो !

    Reply
  9. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    उन लोगों का में शुक्रया अदा करता हूँ जो मांस भक्षण करते हैं .क्योंकि वे आहार संतुलन स्थिर रखने में प्रकारांतर से उन सभी की परोक्ष रूप से मदद करते हैं ;जो निरामिश्भोगी हैं ..मेने कभी मांस नहीं खाया और न कभी खा सकूँगा .किन्तु जिस तरह मनुष्य से इतर कई प्राणी एक दुसरे का या ताकत्बर द्वारा कमजोर के भक्षण पर मेरा कोई काबू नहीं उसी तरह दुनिया भर की बिभिन्न कबीलाई संस्कृति के किसी भी तरह के मांस भक्षण पर मेरा जोर नहीं .रही गाय की बात तो निसंदेह वह jinda रहकर jitna bhal is maanav jaati का kar sakti hai utna markar नहीं .atev गाय की raksha honee chaahiye .गाय sirf fasiston को hi नहीं jantaantrik को भी doodh deti hai .

    Reply
  10. Indian

    महोदय डा कपूर जी ने कुछ बिमारियों का उपचार बताया है –
    SEE – http://www.pravakta.com/?p=१२२२९
    Dr. Rajesh Kapoor says:
    August 13, 2010 at 7:41 pm

    AIDS को लेकर कुछ प्रश्न उठाये गए हैं जो की आज के सन्दर्भ में बड़ा महत्व का विषय है. इस बारे में मेरी दृष्टी में जानने योग्य जो ज़रूरी बातें हैं वे ये हैं——–
    *१* AIDS का इलाज अत्यंत आसान है. मेरी इस बात पर आसानी से विश्वास नहीं आयेगा. पर पूरी बात के बाद आशा है की आप विश्वास करने लगेंगे.
    *यदि तुलसी, नीम, बिल्ब या बेल गिरी के पत्ते ( प्रत्येक के ५-७ पत्ते) प्रातः काल ४-७ काली मिर्च के साथ चबाये जाएँ तो एड्स रोग ठीक हो जाएगा. इसका वायरस वास्तव में अत्यंत दुर्बल होता है जो आसानी से मारा जा सकता है.
    * अत्यधिक कामवासना व भोगों के कारण जिनका रज-वीर्य या सत्व समाप्त हो गया हो, ओज क्षय हो गया हो, वे लोग इस बीमारी का आसानी से शिकार बनते हैं और उनका इलाज कठिन या असंभव सिद्ध हो सकता है. इस रोग को आयुर्वेदिक ग्रंथों में ‘ओजक्षय’ कहा गया है. चरित्र वान लोगों को ये रोग नहीं हो सकता.
    * अमेरिका की गुप्तचर एजेंसी द्वारा ये वायरस डैट्रिक की प्रयोगशाला में बड़ी मेहनत और भारी खर्च करके तैयार किया गया है जिस से विश्व की फ़ालतू ( उनकी नज़र में ) जनसंख्या को समाप्त किया जा सके . साथ ही भरपूर कमाई भी हो.
    * अफ्रीका में पोलियो के टीकों में एड्स का वायरस डालकर टीकाकरण किया गया था. फलस्वरूप ७० % लोगों को एड्स हो गया. अमेरिकनों पर यह प्रयोग हैपेटाईटिस के सूचीकरण में किया गया. वे भी एड्स का शिकार हो गए पर सफलता केवल ७०% रही. अबतक ये सफलता का प्रतिशत बहुत बढ़ गया होगा.
    * बेचारे अफ्रीकियों को एड्स का कारण बता-बता कर उनके प्रती जुगुप्सा जगाई गई. उपरोक्त तथ्यों पर अनेक स्वतंत्र शोध लेख और प्रमाण इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं. आप चाहें तो देखें Conspiracy Planet. Com थोडा प्रयास करने पर और भी अनेक प्रमाण मिल जायेंगे.
    # हम भारतीयों के लिए अत्यंत महत्व की जानने की बात है कि लाख प्रयास करने पर भी आप लोग एड्स, तपेदिक, कैंसर, मधुमेह, ह्रदय रोगों के शिकार उतनी तेज़ी से नहीं बन रहे जितना कि आपको बनाने का प्रयास हो रहा है. कारण है आप लोगों की अद्भुत रोग निरोधक शक्ती जो हमें मिली है अपने पूर्वजों के कारण. संयम पूर्ण जीवन, विवाहित जीवन में भी संयम का अभ्यास करते रहने के आदर्श पालन करना, आहार में संयम, आदर्श दिनचर्या, अत्यंत विज्ञान सम्मत पाक व आहार शास्त्र जिसका मुकाबला आज भी विश्व में नहीं है.
    -इन रुकावटों को दूर करने के लिए हमारे आहार, विहार, दिनचर्या, विचार, चरित्र सबकुछ बदलने के अभूतपूर्व प्रयास चल रहे हैं. उसी कड़ी में है हमको अत्यधिक वासना का गुलाम बना देने का, वासना की नाली में डूबा देने का प्रयास. फिर हम आसानी से एड्स तथा anya अनेक रोगों का शिकार बन सकेंगे.
    फिर हम nistej , सत्वहीन लोगों से कभी भी कोई ख़तरा १९४७ या १८५७ जैसा नहीं होगा. तो कुल मिलाकर अगर स्वाभिमान से स्वस्थ होकर जीना है तो चरित्रवान बनकर अपने भारतीय जीवन मूल्यों का पालन करते हुए जीना होगा. तभी इस भयानक और गुप्त aakramno का सामना हम कर पायेंगे.
    धन्यवाद् कपूर जी के लिए
    प्रो मधुसूदन उवाच

    Reply
  11. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    गौ को बचाने में कौटिल्य सूचित कूट नीति का अवलंब करना अनुचित नहीं है।
    (१) गौ हत्त्या की सारी प्रक्रिया का जहां आरंभ होता है, वहांसे लेकर जिन होटलो में गौ मांस परोसा जाता है। वहां तक की सारी (कडियां) प्रक्रिया को सोचकर (कुछ अंदर वाले लोगों को) प्रलोभन इत्यादि देकर भी, जानी जाए। (२) इसकी सबसे अधिक, ( हमारे लिए){soft targets} और {least costly} सरल/सुविधापूर्ण कडी/कडियां, और शत्रुके लिए भारी पडनेवाली कडियां/कडी चुनी जाए।(३) उन कडियोंपर कैसे काम करनेसे सफलता मिलेगी? यह सोचकर एक कर्म योग की मानसिकता से काम किया जाए। (४) हिंसा को होते रोकना, कोई अनैतिक नहीं है।(क) कडियां एक कागज़पर लिख ले। फिर–
    (ख) दुर्बलातिदुर्बल कडी या कडियां ढूंढना। (ग) दर्शकोंको भी बडे विज्ञापन देकर सचेत करना या ना करना सोचा जाए। (घ) साथमें जन जागरण अभियान, जिससे समाज भी जागेगा, चलाया जाए। (च) व्यवहार्य वही हो सकता है, जिसमें कोई प्राण हानि से बचा जा सकता है।(छ) और जो करनेमें सरल हो।
    ==कहीं और पढा हुआ है, कि, जिन ट्रको में भरकर गौएं कत्तल खाने, लायी जाती है, उनकी जानकारी के आधारपर, ट्रकों को रोका गया, और पुलिस कारवाई से उन्हे बचाया गया। या होटल को निदर्शन की सूचना देना। (आप सोचे) ==।माता के दूध समान गौमाता का भी दूध ही पीकर सामान्यतः सभी बडे होते हैं। यह हमारा ऋण है गौ के प्रति, जो चुकाना अनिवार्य है।
    कुछ Trade Secret बताए ना जाएं।
    सोचनेका समय समाप्त हो जाएगा, कुछ करनेका समय आएगा।औरों के भी विचार, यह काम कैसे, कम से कम हानि उठाकर किया जा सकता है, इसी बिंदुपर आमंत्रित हैं।अहिंसक मार्गसे जब आप हिंसा को रोकते हैं, तो किसी प्रकारकी दुविधा मनमें ना रखें।यह भगवानका काम है, कृष्ण कन्हैया प्रसन्न ही होंगे।आश्वस्त रहें।
    N B: बाकी लोग अपनी टिप्पणियां लिखते रहे, उन्हे और पाठक चाहे तो उत्तर दे सकते हैं।
    ॥अहिंसा परमोधर्मः॥

    Reply
  12. आर. सिंह

    R.Singh

    आलेख और उसके साथ ही पूरी प्रतिकिरियायें पढ़ना तो ज़रा मुश्किल ही है,पर जहां तक मेरी समझ में आता है आप सब लोग मिल कर यह कहना चाहते हैं की पहले तो राष्ट्रकुल खलों के आयोजन ने हमें भ्रष्ट किया और आब हमारी गिनती मांसाहारियों में कराने जा रहा है,जबकि आज तक हम बहुत ही नेक और अहिन्साबादी लोग थे.जबकि जमीनी हालात इसके एकदम विपरीत है.हम सदा से अनैतिक और भ्रष्ट रहे हैं और मांसाहार भी हमारे जीवन का अभिन्न अंग रहा है.ऐसे शिला दीक्षित कह चुकी है की सरकार या ओलिम्पिक असोसिएसन की तरफ से खाने में गोमांस नहीं दिया जायेगा,पर मुझे उनलोगों की बात का कोई ज्यादा भरोसा तो नहीं ,पर गोमांस परोसा भी जाता है,तो ऐसा कौन सा पहाड़ टूट जाएगा?हम यह सब हमेशा करते रहें हैं और करते रहेंगे. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजी फ़ौज के लिए गोमांस का ठेका लेने वाले बहुत लोग प्रकांड शाश्त्रियों में से थे,यह बात और थी,की वे लोग परोक्ष में थे.धनबाद में एक समय एस पि सिये के अधकारी एक ऊच कुलीन हिन्दू थे. उन्होंने गायों के पुरबी पाकिस्तान में गैरकानूनी सप्लाई से बहुत पैसा कमाया था.ऐसे बहुत से उदाहरणों से आप का इतिहास या आज का भारत भी भरा पडा है.ऐसे इस पर केवल चर्चा या बहस केवल समय की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं.हम लोगों की बहस का मुद्दा तो यह होना चाहिए की हम सब मिलकर इन सबका समाधान ढूंढे . हम लोग वह राह सुझाएँ, जिसपर चल कर भारत वासी अपनी छवि सुधार सके और हम वास्तविक रूप में अछे इंसान बन सके.इस बात को दुहराने से कोई phayadaa नहीं की हम ऐसे थे,वैसे थे..इसका भी कोई ठोस प्रमाण नहीं की हम वास्तव में वैसा कभी थे भी?

    Reply
  13. Indian

    जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो गाय पर निबंध में गुरूजी को लिखते थे –
    गाय हमारी माता है
    हमको कुछ नहीं आता है
    गुरूजी कहते थे –
    बैल हमारा बाप है
    नंबर देना पाप है
    हम सब बैल बनकर जुत रहे हैं,हम सब बैल बनकर भेड चाल से चले जा रहे हैं.
    बैल ही तो हैं हम नांदिया बैल , ब्रह्मण ने जिधर मुट्ठी की उधर ही मुंह कर दिया और दीपा अमिता प्रियंका रश्मि जी का भविष्य बताने लगते हैं. अब इंडियन बैल दीपा जी का भविष्य बता रहा है-
    दीपा जी ने स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज को कहाँ गड़गड़ा दिया है अब आपको कथित राष्ट्रवादी लोग कीड़ानवी, वामपंथी, जिहादी, पाकिस्तानी, ईसाई, जैसे उपनामों से संबोधित किया जायेगा. और हमारे हिंदूवादी, ब्राह्मणवादी, जातिवादी, मधूसूदनवादी, कपूरवादी, चिपलूवादी, पुरोहितवादी, नाथवादी, वगैरहवादी, अन्यवादी, इत्यादि सभी सत्यवादी लोग आपको स्वमस्तिष्क उपज आधारित तथ्यों के आधार पर इस्लाम और ईसाइयत की दीक्षा देंगे.
    क्या आपको नहीं लगता दीपा जी कितने “समन्वयवादी” हैं ये लोग! ये गंगा जमुना की संस्कृति है हिन्दू ब्राह्मण लोग वेद और मनुस्मृति को छोड़कर दुसरे ब्राह्मण को इस्लाम और ईसाइयत हेतु दीक्षित करेंगे.
    भारत माता की जय,

    -अनिल सहगल

    Reply
  14. डॉ. सुभाष राय

    डा सुभाष राय

    गिरीश भाई, पिछले दो दशकों से हमारा देश पश्चिम की महान अपसंस्कृति को जिस तरह अपने कंठ के नीचे उतार रहा है, उससे वह नीलकंठ बन जाने का भ्रम भले पाले हुए हो पर सचाई यह है कि उसे पचा पाना भारत के बूते की बात नहीं है। हम गर्व से कहते आये हैं कि हजार साल की गुलामी हमें मिटा नहीं पायी पर अब कोई भी आश्वस्त नहीं हो सकता कि ज्यादा से ज्यादा 50 साल में यह देश पहचान में आने लायक नहीं रह जाने वाला है। यहां चारों ओर हिन्दुस्तानी अंग्रेजों की बस्तियां होंगी और हमने अगर अपने संस्कारों को बचाने की लड़ाई नहीं छेड़ी तो हम विकृति की काली नदी के शिकार होकर रह जायेंगे. अच्छे लेख के लिये बधाई.

    Reply
  15. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    हार या जीत के लिए, नहीं, सत्य को ढूंढने के लिए चर्चा चले। आप असहमत हो, तो पढनेका कष्ट ना करें।
    (१) प्रकृति उत्क्रांतिशील है, विकसन शील है(ऍमिबासे मनुष्य तक)।बदलते परिवेश में मनुष्य़ भी बदलते आया है।
    (मेरी समजमें) इस लिए, हिंदू धर्म उत्क्रांतिशील है। वह हर पौराणिक और ऐतिहासिक कालसे समयानुसार बदलते, सुधार करते आया है। इसके कई उदाहरण आपको मिलेंगे।आपत्‌ धर्म भी अल्प काल चलता है।
    इस बदलावका निकष है, निम्न श्र्लोक।
    ॥यस्तर्केण अनुसंधते स धर्मो वेद नेतरः॥ {महाभारत(?) का है} =>॥हिंदी अन्वयार्थ:=> जो तर्क के आधारपर परखा और सिद्ध किया जा सकता है, वही धर्म है,दूसरा नहीं।
    इस लिए हिंदू धर्मको कोई भी पौराणिक या ऐतिहासिक (Frozen in time) घटनाओ से बांध रखना, अनुचित है। अच्छी घटनाओ से ज़रूर सीखे।
    उदा: द्रौपदी के पांच पति थे, इस लिए आज हर लडकी को पांच पतिओं से ब्याहा नहीं जाता।
    इस लिए जिस के अनुसार वह जिएगा, वह स्मृति भी बदलेगी। हमारी १८ स्मृतियां लिखी गई है। मैने नीचे गुजराती सूचि को(समय बचाने) नागरी/गुजराती मिश्रित लिपिमें उतारा है।
    (१) मनु, (२) आत्रेयी (३) वैष्णवी (४) हारितकी (५) याज्ञवल्कि (६) शनैश्वरी (૭) अंगिरा, (૮) आपस्तंबी (९)सांवर्तिकी સ્મૃતિ, (૧૦) कात्यायनी (૧૧) बृहस्पति સ્મૃતિ, (૧૨) પારાશરી સ્મૃતિ, (૧૩) શંखी સ્મૃતિ, (૧૪) लिखीता સ્મૃતિ, (૧૫) दाक्षी સ્મૃતિ, (૧૬) ગૌતમી સ્મૃતિ, (૧૭) શાતાતપી સ્મૃતિ, और (૧૮) વાસિષ્ઠી સ્મૃતિ.
    ==आजके लिए नयी स्मृति (मनु नहीं) ११५० वर्षके गुलामीके कारण बनी नहीं है, पर विवेकानंदजी के विचारों के आधार पर बन सकती है।=हिंदीमें भी बन सकती है।
    ऊर्ध्व दिशामें ही सभीको उपर उठना है। विवेकानंदजी: हिंदू के केवल दो आदर्श (१) ब्रह्म तेज, और (२) क्षात्र वीर्य।
    हम इसी युगांतरी काम में जुटे हुए हैं। ११५० वर्षों की मलिनता, दूर करने में समय लगेगा। डॉ. हेडगेवार जी ने इसे प्रारंभ किया है। आप सचमें तो इस युगांतरी कार्यमें चाहे तो हाथ बटा सकते हैं।बहुत काम है। आपने गिनाया, वह भी।
    ॥अभिव्यक्ति कर्म से हो, न शब्दों से॥हां सत्यको उद्‌घाटित करने चर्चा की जाए।
    सच्चाई के शोधमें हम भी हैं।

    Reply
  16. अनुज कुमार

    anuj kumar

    अग्रज ज्ञानी बंधुओं को अनुज का प्रणाम
    कपूर साहब ने एड्स की दवा खोजी है इसके लिए आप बधाई के पत्र हैं आपने आज एक नया खुलासा किया है की गाय के गोबर में मीथेन गैस नहीं बनती है, यह एक कुतर्क है मैं आप सभी ज्ञानी बंधुओं को बताना चाहूँगा कि हरिद्वार ऋषिकेश में कम से कम १००-१५० गोशालाएं हैं जहाँ के गोपालको ने बायोगैस बनाये हुए हैं जिनसे आश्रम का खाना बनता है और मैं आपकी जानकारी मैं लाना चाहूँगा कि बायोगैस में मीथेन गैस बनती है,
    समस्त अग्रज बंधुओं से निर्देशन की अभिलाषा में
    आपका अनुज

    Reply
  17. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    अनुज जी से निवेदन है की उनके द्वारा उद्दृत मन्त्र या श्लोक का सन्दर्भ उद्धृत करें कि वह कहाँ से लिया गया है और उसका क्रमांक, अध्याय क्या है. तभी उनके उठाये गए प्रश्न का उत्तर संभव है. इतना तो निश्चित है कि जो अर्थ आपने दिया है वह सन्देश वैदिक साहित्य में होना संभव नहीं है, ये केवल भारत विरोधियों की एक पुरानी चाल है, षड्यंत्र है. स्कूली पाठ्यक्रम में इसप्रकार की बात लिखी गयी थी जिसपर श्री दिनानाथ बत्रा जी(दिल्ली) व उनकी साथियों द्वारा न्यायालय में चुनौती दी गयी थी. न्यायालय के आदेश से इस प्रकार की बहुत सी सामग्री पाठ्य पुस्तकों से ‘एन.सी.ई.आर.टी.’ को हटानी पडी थी. यदी इस बात के प्रमाण होते तो गोमांस खाने के वर्णन को पाठ्य क्रम से न हटाया जाता. सरकार इस कथन के पक्ष में सबूत नहीं दे पाई थी.
    आपको प्रश्न करने का अधिकार है और उसका जवाब देना हम अपना नैतिक दायित्व समझते हैं. पर एक प्रश्न आप से भी है . इस प्रश्न का जवाब देना चाहें तो दें और न देना चाहें तो न दें. इस प्रश्न से स्पष्ट हो जाएगा कि आपकी मानसिकता और नीयत क्या है.
    * आपने एन नकारात्मक सन्देश वाला श्लोक काफी प्रयास के बाद प्राप्त किया होगा क्यूंकि आप वेदों के विद्वान तो होंगे नहीं. क्या आपको संस्कृत साहित्य में कोई उत्तम, अमूल्य ज्ञान के सन्देश, विचार और दर्शन की कोई बातें भी मिली हैं या आपने कभी उनके बारे में कभी जानने का प्रयास किया है? यदि नहीं तो क्यों नहीं ? केवल नकारात्मक बात को ही उजागर करने में आपकी रूचि का कारण क्या है, उद्देश्य क्या है ?

    Reply
  18. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    परम प्रिय मित्र पंकज जी एक अद्भुत तथ्य की जानकारी मिली है कि भारतीय गोवंश के गोबर और वायु विसर्जन से ‘मीथेन गैस’ पैदा नहीं होती. पश्चिमी देश बड़े जोर-शोर से पशु पालन का विरोध कर रहे हैं और कह रहे हैं कि भारत के पशु धन के कारण पर्यावरण विनाश हो रहा है जिसका कारण वायु व मल विसर्जन से पैदा मीथेन है. ओजोन के विनाश का प्रमुख कारण इस मीथेन गैस को माना गया है. हमारे लिए एक कुटिलतापूर्ण सन्देश है कि भारत के गोवंश के काटने में भारत और विश्व का कल्याण है. यह बात धीरे से हमारे मन में बिठाने का प्रयास किया जा रहा है. पर ये अद्भुत जानकारी गोवंश विनाशकों की कुटिल चालाकी को उजागर कर देते है कि हमारा गोवंश तो मीथेन पैदा नहीं करता अपितु पर्यावरण प्रदूषण को समाप्त करता है. यह जानकारी जीरो बजट फार्मिंग के विशेषग्य श्री सुभाष पालेकर जी द्वारा दी गयी है.

    Reply
  19. दीपा शर्मा

    deepa sharma

    अब महोदय ये भी बताते चलें की आप महँ लोगो के पास जो आये दिन इस प्रकार की ख़बरें आती हैं और प्रत्येक खबर को जो आप राष्ट्रमंडल खेलों से जोड़ कर बना देते हैं उसका प्रमाण क्या होता है , मान्यवर अभी एक परिचर्चा हुई थी उसका भी कोइ आधार नहीं बताया गया और ये जो आपने लेख लिखा है इसका भी कोई आधार नहीं होगा, अब अगर कोई जनहित याचिका दायर करना भी चाहे जेसा की राजेश कपूर जी कह रहें है तो मित्र किस आधार पर करे ………….
    आप से निवेदन है की वो आधार उपलब्ध करा दें तो में खुद जनहित याचिका दायर करूंगी
    दीपा शर्मा अजब पुर कलां , धरमपुर देहरादून उत्तराखंड

    Reply
  20. दीपा शर्मा

    deepa sharma

    लेकख महोदय जी
    जो सर्वविदित है | शाकाहार और मांसाहार अपनी निजी पसंद है, और इन मुद्दों पर विवाद होते रहते है | कोई किसीको भला फला आहार ही करो और ढिमका आहार ना करो ऐसा कैसे थोप सकता है? अपनी पसंद है!! वनस्पति हो या मांस, अलग अलग देशकाल, प्रकृति, युग, युगपरिवर्तन, हवामान, कर्तव्य और कर्म अनुसार पोषण की मांग और पूर्ति, क्या और कितना हजम कर पाते है, कितना उसका उपयोग कर पाते है, कितना दिमाग और अन्य अंग पर चढाना है, कितना दिमाग पर चढ़ता है, कितना बल आता है, कितना ह्रदय में आता है, कितना वाणी व्यवहार और वर्तन में आता है, ला पाते है, यह शायद अधिक कठिन, महत्वपूर्ण और पेचीदा सवाल है |
    ab sawaal uthta hai ki वेदों me gaay ke maans खाने का वर्णन है या नहीं है तो इस सम्बन्ध में आप पाएंगे की ………….
    ऋग्वेद में दो प्रकार के प्रमाण है; एक जिनमें गो को अवध्य कहा गया है और दूसरा जिसमें गो को पवित्र कहा गया है। चूँकि धर्म के मामले में वेद अन्तिम प्रमाण हैं इसलिये कहा जा सकता है कि गोमांस खाना तो दूर आर्य गोहत्या भी नहीं कर सकते। और उसे रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहन, अमृत का केन्द्र और यहाँ तक कि देवी भी कहा गया है।

    शतपथ ब्राह्मण (३.१-२.२१) में कहा है; “..उसे गो या बैल का मांस नहीं खाना चाहिये, क्यों कि पृथ्वी पर जितनी चीज़ें हैं, गो और बैल उन सब का आधार है,..आओ हम दूसरों (पशु योनियों) की जो शक्ति है वह गो और बैल को ही दे दें..”। इसी प्रकार आपस्तम्ब धर्मसूत्र के श्लोक १, ५, १७, १९ में भी गोमांसाहार पर एक प्रतिबंध लगाया है। हिन्दुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया, इस पक्ष में इतने ही साक्ष्य उपलब्ध हैं।

    मगर यह निष्कर्ष इन साक्ष्यों के गलत अर्थ पर आधारित है। ऋग्वेद में अघन्य (अवध्य) उस गो के सन्दर्भ में आया है जो दूध देती है अतः नहीं मारी जानी चाहिये। फिर भी यह सत्य है कि वैदिक काल में गो आदरणीय थी, पवित्र थी और इसीलिये उसकी हत्या होती थी। श्री काणे अपने ग्रंथ धर्मशास्त्र विचार में लिखते हैं;”

    ऐसा नहीं था कि वैदिक काल में गो पवित्र नहीं थी। उसकी पवित्रता के कारण ही वजसनेयी संहिता में यह व्यवस्था दी गई है कि गोमांस खाना चाहिये। ”

    ऋग्वेद में इन्द्र का कथन आता है (१०.८६.१४), “वे पकाते हैं मेरे लिये पन्द्र्ह बैल, मैं खाता हूँ उनका वसा और वे भर देते हैं मेरा पेट खाने से” । ऋग्वेद में ही अग्नि के सन्दर्भ में आता है (१०. ९१. १४)कि “उन्हे घोड़ों, साँड़ों, बैलों, और बाँझ गायों, तथा भेड़ों की बलि दी जाती थी..”

    तैत्तिरीय ब्राह्मण में जिन काम्येष्टि यज्ञों का वर्णन है उनमें न केवल गो और बैल को बलि देने की आज्ञा है किन्तु यह भी स्पष्ट किया गया है कि विष्णु को नदिया बैल चढ़ाया जाय, इन्द्र को बलि देने के लिये कृश बैल चुनें, और रुद्र के लाल गो आदि आदि।

    आपस्तम्ब धर्मसूत्र के १४,१५, और १७वें श्लोक में ध्यान देने योग्य है, “गाय और बैल पवित्र है इसलिये खाये जाने चाहिये”।

    आर्यों में विशेष अतिथियों के स्वागत की एक खास प्रथा थी, जो सर्वश्रेष्ठ चीज़ परोसी जाती थी, उसे मधुपर्क कहते थे। भिन्न भिन्न ग्रंथ इस मधुपर्क की पाक सामग्री के बारे में भिन्न भिन्न राय रखते हैं। किन्तु माधव गृह सूत्र (१.९.२२) के अनुसार, वेद की आज्ञा है कि मधुपर्क बिना मांस का नहीं होना चाहिये और यदि गाय को छोड़ दिया गया हो तो बकरे की बलि दें। बौधायन गृह सूत्र के अनुसार यदि गाय को छोड़ दिया गया हो तो बकरे, मेढ़ा, या किसी अन्य जंगली जानवर की बलि दें। और किसी मांस की बलि नहीं दे सकते तो पायस (खीर) बना लें।

    तो अतिथि सम्मान के लिये गो हत्या उस समय इतनी सामान्य बात थी कि अतिथि का नाम ही गोघ्न पड़ गया। वैसे इस अनावश्यक हत्या से बचने के लिये आश्वालायन गृह सूत्र का सुझाव है कि अतिथि के आगमन पर गाय को छोड़ दिया जाय ( इसी लिये दूसरे सूत्रों में बार बार गाय के छोड़े जाने की बात है)। ताकि बिना आतिथ्य का नियम भंग किए गोहत्या से बचा जा सके।

    प्राचीन आर्यों में जब कोई आदमी मरता था तो पशु की बलि दी जाती थी और उस पशु का अंग प्रत्यंग मृत मनुष्य के उसी अंग प्रत्यंग पर रखकर दाह कर्म किया जाता था। और यह पशु गो होता था। इस विधि का विस्तृत वर्णन आश्वालायन गृह सूत्र में है।

    गो हत्या पर इन दो विपरीत प्रमाणों में से किस पक्ष को सत्य समझा जाय? असल में गलत दोनों नहीं हैं शतपथ ब्राह्मण की गोवध से निषेध की आज्ञा असल में अत्यधिक गोहत्या से विरत करने का अभियान है। और बावजूद इन निषेधाज्ञाओं के ये अभियान असफल हो जाते थे। शतपथ ब्राह्मण का पूर्व उल्लिखित उद्धरण (३.१-२.२१) प्रसिद्ध ऋषि याज्ञवल्क्य को उपदेश स्वरूप आया है। और इस उपदेश के पूरा हो जाने पर याज्ञ्वल्क्य का जवाब सुनने योग्य है; “मगर मैं खा लेता हूँ अगर वह (मांस) मुलायम हो तो।”

    वेदों और ब्राह्मण ग्रंथों के बहुत बाद रचे गये बौद्ध सूत्रों में भी इसके उल्लेख हैं। कूट्दंत सूत्र में बुद्ध, ब्राह्मण कूटदंत को पशुहत्या न करने का उपदेश देते हुए वैदिक संस्कृति पर व्यंग्य करते हैं, ” .. हे ब्राह्मण उस यज्ञ में न बैल मारे गये, न अजा, न कुक्कुट, न मांसल सूअर न अन्य प्राणी..” और जवाब में कूटदंत बुद्ध के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है और कहता है, “.. मैं स्वेच्छा से सात सौ साँड़, सात सौ तरुण बैल, सात सौ बछड़े, सात सौ बकरे, और सात सौ भेड़ों को मुक्त करता हूँ जीने के लिये.. ”

    अब इतने सारे साक्ष्यों के बाद भी क्या किसी को सन्देह है कि ब्राह्मण और अब्राह्मण सभी हिन्दू एक समय पर न केवल मांसाहारी थे बल्कि गोमांस भी खाते थे।
    डा० अम्बेदकर रचित पुस्तक “अछूत:वे कौन थे और अछूत कैसे बन गए” का सार संक्षेप

    Reply
  21. दीपा शर्मा

    deepa sharma

    न केवल प्राचीन शास्त्रों में अपितु हर युग की सन्तवाणियों में भी गो का अर्थ इन्द्रिय ही है। सन्त कबीर तो गाय को काटने की बात करते हैं-

    माता मारि परमपद पावै, पिता बधे सुख होय।
    गो काटे बैकुण्ठ सिधावै, सन्त कहावै सोय।।

    श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस संसार में त्रिगुणमयी प्रकृति ही माता है और मैं ही परम चैतन्य बीजरूप पिता हूं। इसी स्वर में कबीर भी कहते हैं कि जो इस प्रकृतिरूपी माता का दमन कर लेता है वह उस परमपद को पा सकता है। उसी का नाम है पिता और वह पद है परमात्मा। उसकी जानकारी के साथ ही वह भी भिन्न नहीं रह जाता, उसी में विलीन हो जाता है, जहां वह सदा रहनेवाली शाश्वत शान्ति, शाश्वत सुख को पा जाता है। लेकिन इन सबकी प्राप्ति के लिए गो काटना ही एकमात्र कु॰जी है। गो माने इन इन्द्रियों की दौड़ को जो न केवल काट देता है बल्कि संयत इन्द्रियों के स्वरूप को भी जो मिटा देता है, वह उस प्रभु की प्राप्तिवाला होता है और वही सन्त कहलाने का अधिकारी है। यही कारण है कि तुलसीदासजी गोस्वामी कहे जाते हैं। एक चरवाहे को घड़ी देखना सिखाया गया। वह साढ़े तीन को तो बता सकता था; किन्तु तीन चालीस नहीं बता सका। बुद्धि का यह हाल है तो उनके पास समृद्धि कहां से होगी। समृद्धि की जड़ तो बुद्धि है, स्मृति है और यहां वही साफ है। पशु चराते-चराते मस्तिष्क पशुवत् हो गया, कारण कि संगत नहीं मिली। प्रचार किया जाता है कि गाय समृद्धि और मोक्ष देगी, तो इन्हें क्यों नहीं दे देती ?आज तो जो ग्वाल-बाल खुशहाल हैं वे सत्तर प्रतिशत भैंस पालते हैं, गाय नहीं।

    शास्त्रों का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि भगवान गो और द्विज के लिए अवतार लेते हैं; किन्तु उस गो का अर्थ गाय नामक पशु नहीं बल्कि मनसमेत इन्द्रियां हैं। इन्द्रियजन्य विकारों को दूर करने के लिये भगवान का अवतार होता है। इसी प्रकार जगजामिनी में से जब योगी जाग जाता है, गर्भवास की यातनाओं से भिन्न आत्मस्वरूप की ओर अग्रसर होने लगता है, वह द्विज है। द्वितीय जन्म पाया है इसलिए वह द्विज है। इन्हीं भक्तों, साधकों, विरही अनुरागियों के लिए भगवान का अवतार होता है, न कि किसी जाति या पशु के लिए। हम यह नहीं कहते कि आप गाय को न मानें। जब गो-रक्षा न तो आप्तपुरूषों की वाणी में है और न वरिष्ट शास्त्रों में ही इसका उल्लेख है, तब क्यों लकीर पीटते हैं ?यदि कहीं है तो मानें, बतायें तो हम भी मानेंगे। यदि यह पहले से चली आ रही है जो भूलमात्र है, तो सुधारने के लिए हम सारे समाज का आवाहन करते हैं कि आप साहस के साथ आगे आयें अन्यथा गाय के प्रति यह पूर्वाग्रह हमें, आपको, सबको नष्ट करके छोड़ेगा। निःसन्देह गाय उपयोगी पशु है, मूल्यवान् धन है, धन की सरुक्षा कौन नहीं चाहेगा ? आप रक्षा करें; किन्तु ‘गाय धर्म है’, ‘गाय ही सनातन धर्म है’- ऐसा कहकर समाज को गुमराह न करें। विचार-विमर्श हेतु आपका एवं आपके सुझावों का सदैव स्वागत है।

    विशेष- उन प्रत्यक्षदर्शी महापुरूषों का यह निर्णय अक्षरशः सत्य है कि भगवान गो और द्विज के लिए ही अवतार लेते हैं’ किन्तु न तो उस गो का अर्थ गाय नामक पशु है और न द्विज का अर्थ ब्राह्मण। यदि यही दो अवतार के कारण और रक्षा के पात्र हैं तो अन्य सभी जातियों का क्या होगा? तब तो अन्य सबाको परमात्मा का संरक्षण पाने के लिए उनके दर्शन और प्रवेश के लिए किसी अन्य उदार धार्मिक संघ को पकड़ना पड़ेगा; क्योंकि भगवान केवल गाय और ब्राह्मण के लिए ही उतरते हैं किन्तु शास्त्र और पूर्णत्व प्राप्त महापुरूष की वाणी में ऐसा धोखा नहीं है।

    शास्त्रों में गो का अर्थ मनसमेत इन्द्रियां हैं। इन्द्रियां प्रमथन स्वभाववाली हैं। ये सदैव विषयों की ओर भागती हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह और अनन्त वासनाओं द्वारा ये विकृत हो जाती हैं, अनन्त योनियों का कारण बन जाती हैं- यही गो-हत्या है। यही सनातन परमात्मा से दूरी पैदा करती हैं इसलिए सनातन की रक्षा का उपाय गो-रक्षा से है। इसके विपरीत शम, दम और नियमों द्वारा इन्द्रियों को इष्ट के आदेश के अनूरूप संयमित रखना गो-रक्षा है। यही हमारा दायित्व है, धर्म है। गो-रक्षा हमारा सनातन धर्म हैं क्योंकि विवेक, वैराग्य, धारणा, ध्यान, सतत् चिन्तन तथा उस परमात्मा के निर्देशनों के अनुसार इन्द्रियों को ढालने से वह सनातन शाश्वत कहलानेवाला अमृततत्व विदित हो जाता है। इष्ट के अनुरूप संयत इन्द्रियां ब्रह्मपीयूष धारण करने लगती हैं, उनसे ईश्वरीय आनन्द की अनुभूति होने लगती है तो यही नन्दिनी है। जिसमें ईश्वरीय आनन्द जागृत है, ऐसे महापुरूष का सान्निध्य और उसके द्वारा निर्दिष्ट टूटी-फूटी सेवा से कामनाओं की स्वाभाविक पूर्ति होने लगती है (जैसा कि पूर्व महापुरूषों की गाय राजा लोग चराया करते थे) और जब यही संयत इन्द्रियां ईश्वर के तद्रूप खड़ी हो जाती हैं तहां ये सभी कामनाओं की पूर्ति करनेवाली हो जाती हैं इसलिए कामधेनु हैं। उस महापुरूष की इच्छा-शक्ति में बदल जाती है। यहां तक कि भगवान स्वयं उसकी इच्छा की पूर्ति करने लगते हैं-

    जो इच्छा करिहहु मन माहीं।
    हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।। (मानस, 7/113/4)

    कामधेनु कोई पशु नहीं है जो मनचाहा व्य॰जन परसने लगे या कल्पवृक्ष वृक्ष जैसा कोई काल्पनिक वृक्ष नहीं है। वस्तुतः ‘सुनु सेवक सुरतरू सुर धेनु’- भगवान ही सेवक के लिए कल्पवृक्ष और कामधेनु बन जाते हैं। उसकी कामनायें पूरी होने लगती हैं। निःसन्देह गो-विकृति से (इन्द्रियों की विकृति से) नरक है, अनन्त योनियां हैं और गो को भली प्रकार संयत रखने से ही शाश्वत धाम है। इसी पर हमारा शाश्वत, सनातन धर्म टिका है, क्योंकि यही सनातन परमात्मा के उपलब्धि का तरीका है और संसार भर में यही है।

    (स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज द्वारा रचित पुस्तक ‘शंका समाधान’ से सादर।)
    एस.ए. अस्थाना द्वारा प्रस्तुत लेख द्वारा लेकर लिखा गया है जो मेने यहाँ पर लिख दिया है ताकि कुछ और सपष्ट हो सके धन्यवाद
    दीपा शर्मा

    Reply
  22. दीपा शर्मा

    deepa sharma

    प्राचीनकाल में गाय विनिमय का माध्यम भी थी। आज के रूपयों की तरह उन दिनों गाय के माध्यम से वस्तुएं आपस में बदली जाती थीं। वैदिककालीन सामाजिक व्यवस्था में इसका व्यवहार अपने उत्कर्ष पर था। इतना ही नहीं, ‘सोमयाग’ के प्रकरण में तो गाय के द्वारा सोम का लिया जाना आवश्यक माना जाता था। इसका संग्रह समृद्धि का प्रतीक था। अतएव उस समय के बुद्धिजीवी वर्ग ने इन्हें अािधक से अधिक पाने का नयी-नयी स्मृतियों के माध्यम से उद्योग किया। सामाजिक स्मृतियां न्यायशास्त्र हैं।

    दैनिक जीवन के प्रत्येक क्रिया-कलाप को पाप की संज्ञा देना और प्रत्येक पाप के निवारण के लिये गाय का दान देने का विधान उन्हीं की देन है। क्योंकि उनकी जीविका के लिये निर्धारित तीन साधन भिक्षा, शीलोंछवृत्ति और दान में से केवल दान का क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है और उन्होंने बढ़ाया भी। नेवला मारने पर कम से कम दस गाय के दान का विधान है मनुस्मृति में। प्रशासन को अपने शिकंजे में रखकर अधिकांश जनता को निरक्षर बनाकर वे ही धर्म के व्याख्याता बन बैठे। उन्होंने परिभाषाएं बदल दीं, जैसे- ऋषि उसे कहते हैं जो गुरूकुल में पढ़ाता हो। इन्द्रियों के स्थान पर गो का समीकरण पशु में बैठाना, पशु गाय को धर्म के नाम पर उछालना, महाराजाओं या महापुरूषों का नाम लेकर नये-नये नियम गढ़ना उनकी देन है। ये स्मृतियां एक वर्ग-विशेष की भोजन-व्यवस्था के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हैं।

    स्वतन्त्र भारत के प्रत्येक नागरिक से, जिन्हें सौभाग्य से अब पढ़ने का अधिकार मिला है उन सबसे हमारा निवेदन है कि इन स्मृतियों को एक बार पढ़ें; क्योंकि न्यायालयों में आज भी हिन्दू-विधि के मामले में हिन्दू धर्मावलम्बियों को न्याय देने के लिए स्मृतियों को ही प्रमाण माना जाता है। त्याग, तपस्या और साधन की तो बात ही छोड़िये, पूरी की पूरी स्मृति में एक बार भगवान का नाम तक नहीं आया है और यह भी लिख मारा कि पाराशर स्मृति और वेद पढ़ना एक ही बात है। आप इसी को पढ़ें, तब भी आप वेदज्ञ हैं। इन्हीं स्मृतिकारों की देन है कि आज हम गाय के नश्वर पिण्ड में सनातन धर्म देखने लगे। हम घरों में रहते हैं, हमारा धर्म बाड़े में बंधा रहता है। चरवाहे तक पेड़ की छाया में रहते हैं और हमारा धर्म जंगल में घूमता रहता है। शेर खा जाता है मर जाता है हमारा धर्म, कोई भी हमारे धर्म को उठा ले जा सकता है। गाय की पूजा आप करें और वह आशीर्वाद दे रही हैं डेनमार्क में, तब तो हमारा धर्म चला गया वहां, जहां कि गायें दूध देने में कीर्तिमान स्थापित कर चुकी हैं। वहां वे पूजा नहीं करते, नस्ल उत्पन्न करते हैं। यदि गाय धर्म है तो सबसे बड़ा धार्मिक भी वह है जो गाय के अत्यंत समीप है और वह है ग्वाल परिवार, जिसने सैकड़ों वर्षों, पीढ़ियों से उन्हीं गाय की सेवा की है। आज न उनके शरीर पर वस्त्र है और न खाने को भरपेट अन्न। बुद्धि के स्तर पर मूर्ख-चपाट कहकर उनकी खिल्ली आप ही तो उड़ाते हैं।

    Reply
  23. दीपा शर्मा

    deepa sharma

    अब आइये उन चालीस प्रसंगों में से कुछेक देखें, जहां ‘गो’ शब्द इन्द्रियों का प्रतीक है-

    अनवद्य अखंड न गोचन गो।
    सब रूप सदा सब होइन गो।। (मानस, 6/110)

    जो ‘अनवद्य’ अर्थात् निर्दोष हैं, अखण्ड हैं, वे न तो गोचर हैं न तो गो ही हैं। अथात् वह भगवान न तो इन्द्रियां हैं और न इन्द्रियां जहां से अपनी खुराक पाती हैं वह विषय ही भगवान हैं।

    सो नयन गोचर जासु गुन, नित नेति कहि श्रुति गावहीं।
    जिति पवन मन गो निरस करि, मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं।।

    आज मेरी आंखों के समक्ष वही भगवान उपस्थित हैं, ‘न इति न इति’ कहकर श्रुति जिसका गायन करती है, पवन और मन को जीतकर तथा गो को निरस कर मुनि लोग कदाचित् ही उन्हें ध्यान में पाते हैं। गो को निरस करने पर ही वह भगवान ध्यान में आते हैं, तो क्या गाय का दूध, खून तथा हड्डियां सुखा दें तब भगवान ध्यान में आएंगे। गो निरस से तात्पर्य क्या है ? वास्तव में गो का अर्थ है मनसहित इन्द्रियां। जब तक एक भी इन्द्रिय को एक भी विषय में तनिक भी रस मिलता है तब तक ध्यान में वही विषय आएंगे। तब तक ध्यान में भगवान कदापि नहीं दिखायी देंगे, भगवान धूमिल पड़ जायेंगे। तो कैसे करें गो को निरस ?

    बलं अप्रमेय अनादि अजम् अव्यक्त एकं गोचरम्।
    गोविन्द गोपर द्वन्द हर, विज्ञान घन धरणी धरम्।।

    उन भगवान का बल अतुलनीय है। वे अनादि हैं, अजन्मा हैं, अव्यक्त हैं, एक हैं, अगोचर हैं अर्थात् इन्द्रियों के विषय नहीं हैं फिर भी इन्हीं इन्द्रियों के बीच हृदय-देश में उनका निवास है इसलिए वे गोविन्द हैं, वस्तुतः ‘गो’ से परे हैं। वे इन्द्रियों के द्वन्द का अपहरण करनेवाले हैं। हम अपनी बुद्धि से इन विकारों का पार नहीं पा सकते। इन्द्रियों में इतनी क्षमता कहां कि यथार्थ निर्णय ले सकें, कारण कि-

    गो गोचर जहं लगि मन जाई ।
    सो सब माया जानेहु भाई।। (मानस, 3/14/3)

    इन्द्रियाँ और इन्द्रियों के विषय में जहां तक मन जाता है, बुद्धि जहां तक निर्णय लेती है वह सब की सब माया है, इसलिए आप अपने भरोसे गो को निरस नहीं कर सकते। यदि बुद्धि-विवेक या विचार से कोई निर्णय लेंगे तो वह मायिक क्षेत्र का ही छोटा-बड़ा निर्णय होगा; क्योंकि बुद्धि इसके आगे का हाल नहीं जानती। इसलिए मनसहित इन्द्रियों (गो) को निरस करने के लिए भगवान का अवतार होता है। भगवान विज्ञान-घन हैं, अनुभवस्वरूप हैं।

    वह आत्मा से रथी होकर (अनुभव या आन्तरिक निर्देशनों द्वारा) इस पृथ्वी को धरण करते हैं। इसी गाय कीे सुरक्षा के लिए भगवान अवातार लेते हैं। गो या इन्द्रियजनित विकारों को दूर करने के लिए ही अवतार की व्यवस्था साधक के हृदय में प्रसारित है, किन्तु किसी-किसी लगनशील साधक के हृदय-देश में यह घटना घटित होती है, अवतार होता है।

    गीता का उपदेश करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- सात्विक गुण के कार्यकाल में जो शरीर का त्याग करता है, वह देव इत्यादि उन्नत योनियों को प्राप्त करता है।

    राजसी गुण की अधिकता में शरीर त्यागनेवाला मनुष्य मानव होता है और तामसी गुण के कार्यकाल में जो शरीर का त्याग करता है वह पशु-पक्षी, कीट-पतंग इत्यादि अधम योनियों को प्राप्त होता है। गीता के अनुसार पशु एक अधम योनि है। जो स्वयं निकृष्ट योनि भोग रही है, वह गाय आपको शाश्वत धाम कैसे देगी ?जो आपसे गहरे दलदल में फंसा हो, वह आपको निकाल कैसे सकेगा ? योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, जिस प्रकार पुराने वस्त्र को त्यागकर पुरूष नया वस्त्र धारण कर लेता है, ठीक उसी प्रकार भूतादिकों का स्वामी यह आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर संस्कारों के अनुरूप नया शरीर धारण कर लेता है। अर्जुन! यह शरीर अनित्य है। जो स्वयं नश्वर है, वह अधम शरीर शाश्वत धाम कैसे देगा ?उन शरीरों में से गाय का भी एक शरीर है, वह शाश्वत सनातन कैसे बन जायेगी ? आश्चर्य है कि स्मृतियों और पुराणों में गाय की पूंछ पकड़कर उस वैतरणी को पार करने का विधान है जिसमें कोई तरणी काम नहीं करती। दिनभर में सैकड़ों लोग जिसकी पूंछ पकड़कर (खींचकर) उसे अधमरा बना देते हैं, उन पुजारियों को दया नहीं आती। मरियल-सी गाय आपको वैतरणी पार करा देती है, क्योंकि गाय के शरीर में देवताओं का निवास बताया गया है। यदि गाय के मल-मूत्र, रोम-रोम में देवता भी हैं तब तो गाय और बड़ा धोखा है। डूब मरने के लिये गाय ही काफी थी, जिस पर यह देवता, देवता तो स्वयं बह रहे हैं-

    ‘भव प्रबाह संतत हम परे’ (मानस, 6/109/12) आप ही की तरह वे बेचारे बह रहे हैं, आपको क्या तारेंगे ?

    कृतकृत्य विभो सब बानर ए।
    निरखंति तवानन सादर ए।।
    धिग जीवन देव सरीर हरे।
    तव भक्ति बिना भव भूलि परे।। (मानस, 6/110 छन्द)

    इस देव-शरीर को धिक्कार है, आपकी भक्ति के बिना ‘भव भूलि परे’- भव में भूलकर पड़े हुए हैं। महाभारतकार का निर्णय है कि इस सृष्टि में मनुष्य सर्वोत्कृष्ट है,

    ‘गुह्यं ब्रह्म तदीतं ब्रवीमि।
    न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्।’

    श्रीकृष्ण भी कहते हैं, अर्जुन! तू इन्द्रियों को सब ओर से समेटकर मेरा ही चिन्तन कर। मैं प्रतीज्ञा करता हूं कि तू मेरे स्वरूप को प्राप्त होगा। अर्थात् जैसा स्वरूप श्रीकृष्ण का है उसी स्वरूप में अर्जुन भी स्थिर होगा। जो मनुष्य इसी स्वरूप में इस स्थिति को प्राप्त नहीं कर लेता श्रीकृष्ण उसे आत्महत्यारा कहते हैं। स्पष्ट है कि मानव का परमधर्म परमात्मा तक की दूरी तय करना, उन्हें प्राप्त कर लेना है। मनुष्य-शरीर ही साधन-शरीर है। देवता तक मुक्ति के लिये इसी नर-तन से आशावान् हैं जो बड़े सौभाग्य से आपको प्राप्त है। इस शरीर-प्राप्त में आप देवताओं से भी बढ़कर हैं; फिर पत्थर, पानी, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे आपका धर्म, आपका आदर्श कैसे बन सकते हैं ?

    योगेश्वर श्रीकृष्ण की गीता में दो स्थानों पर गाय का स्पष्ट उल्लेख भी मिलता है। एक तो वैश्यश्रेणी के साधक के लिये गो-रक्षा अर्थात् इन्द्रिय संयम के सन्दर्भ में और दूसरा तत्वदर्शी महापुरूष की रहनी के सन्दर्भ में कि ऐेसे पण्डितजन गाय, कुत्ता, हाथी, चाण्डाल में समान दृष्टि रखनेवाले होते हैं। उनकी दृष्टि में गाय न कोई धर्म है और न कुत्ता कोई अधर्म, अथवा न विशालकाय हाथी ही कोई विशेषता रखता है; क्योंकि उस महापुरूष की दृष्टि चमड़ी पर नहीं अपितु इन सबके हृदय में आत्मिक संचार पर पड़ती hai

    Reply
  24. दीपा शर्मा

    deepa sharma

    श्री रामचरितमानस के अनुसार भगवान का अवतार केवल चार के लिए होता है-

    गो द्विज धेनु देव हितकारी।
    कृपा सिन्धु मानुष तनुधारी।। (मानस, 5/38/3)
    निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ, सुर महि गो द्विज लागि।। (मानस, 4/26)
    बिप्र धेनु सुर सन्त हित, लीन्ह मनुज अवतार।। (मानस, 1/192) …इत्यादि।

    जनसाधारण में इन दोहे-चौपाइयों का यह अर्थ प्रचलित है कि भगवान जब भी अवतार लेते हैं तो पशुओं में एक पशु गाय-विशेष के लिए और मनुष्यों में एक वर्ग-विशेष ब्राह्मण के लिए लेते हैं और वह द्विज-समुदाय केवल भारत में ही पाया जाता है। जब गाय और ब्राह्मण पर विपत्ति आती है-

    ‘सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी’ (मानस, 1/120/7) तभी भगवान अवतार लेते हैं। यह विपत्ति ब्राह्मणेतर जाति ही तो डालेगी, भगवान उनको मारकर गो और द्विज को निर्भय बनाते हैं। तब हर देश, हर जाति के लोग ऐसे भगवान से कौन-सी आशा लगाये बैठे हैं ?तो क्या भगवान सबके लिए नहीं हैं ?यह रामचरितमानस कहना क्या चाहता है ? विचारणीय है कि भगवान गाय के लिए अवतार तो लेते हैं किन्तु गाय से परे हैं। यह गाय कौन-सा शिकंजा है जिसमें सारा संसार फंसा है, किन्तु भगवान उससे पार हैं। गाय क्या है ?यहां एक प्रश्न है- माया श्री रामचरितमानस के अनुसार भगवान का अवतार केवल चार के लिए होता है-

    गो द्विज धेनु देव हितकारी।
    कृपा सिन्धु मानुष तनुधारी।। (मानस, 5/38/3)

    तो काली गाय की तरह, किन्तु सियराम का यश इसमें अंकित है इसलिए सभी इसे स्वीकार करेंगे। यहां गाय मात्र उदाहरण है, धर्म नहीं। रामजन्म के अवसर पर ‘हाटक धेनु बसन मनि’ (मानस, 1/193) राजा ने दान में दिया। विशवामित्र की याचना पर दशरथ ने सहरोष कहा- ‘मागहु भूमि धेनु धन कोसा’ (मानस, 1/207/3) जमीन, गाय, धन और खजाना सभी एक श्रेणी में हैं। जनकजी ने ‘गज रथ तुरग दास अरू दासी।

    धेनु अलंकृत काम दुहासी।।’ (मानस, 1/325/4) दहेज में दिया। हाथी-घोड़ा की तरह गाय भी यहां एक वस्तु के रूप में है। पिता की मृत्यु के पश्चात् भरतजी ‘धेनु बाजि गज बाहन नाना’ (मानस, 2/169/8) का दान देकर विशुद्ध हुए। रामराज्य में भी विदेह नगर की तरह ‘मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं।’ (मानस, 7/22/5) मनचाही दूध देनेवाली गायें थीं। कम दूध देने वाली गायों को कहां खपा दिया यह तो नहीं बताया लेकिन थीं एक भी नहीं। तात्पर्य यह है कि हाथी, घोड़ा, गाय, दास, दासी, वस्त्र, सोना और मणि लेन-देन की वस्तुएं थीं, धर्म नहीं।

    Reply
  25. दीपा शर्मा

    deepa sharma

    पशु के रूप में गाय धन है-

    ‘गोधन गजधन बाजिधन और रतनधन खान’। प्राचीनकाल में गोधन एक विशिष्ट सम्पत्ति थी। जुताई, बुआई, मड़ाई, खराई, खाद, पानी, प्रदूषण निवारण, पौष्टिक आहार, वाहन एवं भारवाहक साधन के रूप में इसकी उपयोगिता असंदिग्ध थी। गो-वंश के संवर्द्धन पर समाज की सतर्क दृष्टि थी। जिस प्रकार नागासाकी को फिर से बसाने के प्रयास में उन्तीस बच्चे पैदा करनेवाली महिला को वहां मदरलैण्ड की उपाधि से सम्मानित किया गया, कुछ इसी प्रकार गाय की उपयोगिता को देखते हुए प्राचीनकाल में उसे ‘गो माता’ की पदवी प्रदान की गयी थी। जिस प्रकार आजकल शेर को राष्ट्रीय पशु घोषित कर उसकी हत्या करनेवाले को दण्डित करने का विधान है, कुछ ऐसी ही व्यवस्था प्राचीनकाल में गाय के साथ थी। आज दण्ड-संहिता है, विधान है; तब स्मृतियां थीं।

    वस्तुतः विशेषता गाय में नहीं, मानव मस्तिष्क में है, जिसने गाय में इतनी उपयोगिता का दर्शन किया। विशेषता लोहे में नहीं, अणु में नहीं वरन् उस मनुष्य में है जो उसका प्रयोग कर अन्तरिक्ष में उड़ रहा है, सागर की लहरों पर तैर रहा है। आवश्यकता के अनुरूप नये अविष्कार करना मानव-मस्तिष्क का स्वभाव है। इसलिये आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों के समक्ष गाय धन के स्थान से च्युत हो चली है। गो-वंश के इस अवमूल्यन से मन में कसक चाहे जितनी हो, गाय को धर्म कहने वाले कितने लोग स्वयं गाय पालते, चराते हैं? सात्विक आहार में फलों के पश्चात् गाय के दूध का ही स्थान है तो क्या फल हो गये धर्म ? गाय मात्र सम्पत्ति है और सबकी है।

    Reply
  26. दीपा शर्मा

    deepa sharma

    महोदय आपने लिखा है की ” जहाँ के भगवान् (कृष्ण) गायों के दीवाने थे, वह देश आज दुनिया का सबसे बड़ा माँस-निर्यातक बना बैठा है,”……….
    आप गाय के पीछे इसलिए जान देने के लिए तुले हैं कि श्रीकृष्ण गाय चराते थे। यादव वंश में तो जन्म व पालन-पोषण हुआ था, गाय न चराते तो हाथी-घोड़ा कहां से पाते? रैदास को चमड़ा मिला, कबीर को सांचा, राम को धनुष, तो क्या यह सब धर्म हो गया? श्रीकृष्ण ने तो एक चंचल बलरूपी धेनुकासुर को मारा। द्वारिकाधीश बनने पर वे एक दिन भी गाय नहीं चरा पाये

    Reply
  27. दीपा शर्मा

    deepa sharma

    महोदय नमस्कार,
    यहाँ काफी उतेजित करने वाला मुद्दा ले आये है आप , आप के लिए एक लेख के कुछ अंश यहाँ लिख रही हूँ उम्मीद है सार्थक रहेंगे

    (स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज द्वारा रचित पुस्तक ‘शंका समाधान’ से सादर।
    आये दिन ‘गो-वध बन्द हो’ का नारा लगता है। धर्माचार्यों के अनशन और लाखों रूपये के चन्दे इसी के नाम पर होते हैं। इन सबका परिणाम केवल इतना निकला है कि यदि सन् 1942 में 17,000 गायें नित्य दिन कटती थीं तो आज उनकी संख्या 50,000 तक पहुंच चुकी है। विचारणीय है कि क्या गाय हमारा धर्म है ?क्या इसके समर्थन में हमारे पूर्वजों ने वेद, गीता और रामचरितमानस-जैसे आर्षग्रन्थों में कुछ कहा है ? यदि नहीं कहा तो यह एक धोखा है। इससे हम सबको सतर्क हो जाना चाहिए।

    गाय को धर्म मानने का दुष्परिणाम समूचे भारत को भोगना पड़ा है। गाय की ओट से निशाना लेकर मुट्ठीभर तुर्कों ने वीर राजपूतों को उनके ही देश में हरा दिया। अंग्रेजों ने हिन्दू और मुसलामानों में फूट डालने के लिए इसी गाय को साधन बनाया। स्वतंत्र भारत के साम्प्रदायिक दंगों के पीछे गाय कहीं-न-कहीं अवश्य रहती है। इस पागलपन के पीछे अवधारणा यह है कि गाय हमारा धर्म है, किन्तु क्या आप इसके समर्थन में प्रमाण दे सकते हैं ?

    Reply
  28. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    हरेक प्रक्रिया में बहुत सारे घटक होते हैं।
    जैसे गौ कटती है। तो अब दोष किसके माथे मढ सकते हैं? सोचिए। (१) कानून (२) गौशाला के चालक (३) शासन (४) सर्व साधारण हिंदू (५) कत्तलखाने (६) गौमांसाहारी।(७) कानून को(पुलिस)लागु करना।(८) इत्यादि कुछ छुट गया हो सकता है।
    नीचे में से कोई एक या अनेक विधान किये जा सकते हैं।
    (अ) यदि हर हिंदू एक गौ पालता तो गौवध ना होता।(आ) कानून से बंदी होती तो,……. (इ) शासन कानून बनाता तो….. (ई) गौशालाके चालक जिम्मेदार….. (उ) कत्तल खाने.ना होते तो… (ऊ) गौमांस खानेवाले बंद करे तो……
    वास्तवमें यह एक श्रृंखला है। हर कडी दूसरी कडियोंसे जुडी हुयी है। हर घटक महत्व रखता है, पर कानून (मेरी दृष्टिमें) सबसे अधिक महत्व रखता है, साथमें उसको लागु करना।

    Reply
  29. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    dr.rajesh kapoor सही कहते हैं, कि, वेदों में कहीं भी गो मांस परोसने या खाने का वर्णन नहीं है. मैक्समुलर एंड कंपनी का षड्यंत्र था हमें बदनाम करने का, यह उसी का एक हिस्सा है.
    एक व्याख्यान मैं सुनने गया था। वक्ता थे, Dr. David Frawley जिन्होने “मंत्र दर्शन” नामक पुस्तक लिखी है। इस पुस्तकमें उन्होने, Monier Williams की संस्कृत/अंग्रेजी डिक्षनरी से —एक एक संस्कृत शब्द के अनेक अर्थों मे से अच्छा अर्थ चुनकर ऋगवेद के मंत्रों का –उन्नततम अर्थ निकाल कर दिखाए हैं। जो अर्थ फिर सुसंगत लगते हैं। संदर्भ सहित उन के अर्थ अन्य ऋचांओं से मेल भी खाते हैं। और डॉ. फ्राव्ले के कथन का अर्थ हमारे लिए स्थूल रूप से यह जानकारी है, कि **मॅक्स मूलर भी हमें बुद्धु बनाने ही भेजा गया था।** मुझे तो कालिदास स्मरण होता है। कह गया कि
    ॥मूढाः पर प्रत्ययनेय बु्द्धिः॥ —फिर भी यह भी वही ॥साहेब वाक्यं प्रमाणं॥ ही है।
    “हिंदू” तो कुंडी में उगाया गया बट वृक्ष है, तभी इतना ठींगना प्रतीत हो रहा है। अभी हम जगे ही नहीं, सबेरा हुआ ही नहीं, स्वतंत्रता मिली ही नहीं। हम गुलाम ही है, पर जानते भी नहीं। जिस गौ वध बंदीकी बात गांधीजी ने स्वतंत्रता को जोडकर कही थी, उन्हीकी प्रेरणासे चली कांग्रेस किस कारण गौ हत्त्या बंद नहीं करवाती? समझ नहीं पाता। क्या वोट बॅंक के लिए? छीः छीः धिक्कार हो ऐसे शासन पर।

    Reply
    • अनुज कुमार

      anuj kumar

      हे ज्ञानी अग्रज
      कृपया आप ही इस अनुज द्वारा निचे लिखे श्लोक का अर्थ स्पष्ट करने का कष्ट करेंगे और यह भी बताने का कष्ट करेंगे की क्या यह श्लोक वेदों से है या नहीं
      आपका अल्पज्ञानी अनुज

      Reply
      • डॉ. मधुसूदन

        डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

        हार या जीत के लिए, नहीं, सत्य को ढूंढने के लिए चर्चा चले। आप असहमत हो, तो पढनेका कष्ट ना करें।
        (१) प्रकृति उत्क्रांतिशील है, विकसन शील है(ऍमिबासे मनुष्य तक)।बदलते परिवेश में मनुष्य़ भी बदलते आया है।
        (मेरी समजमें) इस लिए, हिंदू धर्म उत्क्रांतिशील है। वह हर पौराणिक और ऐतिहासिक कालसे समयानुसार बदलते, सुधार करते आया है। इसके कई उदाहरण आपको मिलेंगे।आपत्‌ धर्म भी अल्प काल चलता है।
        इस बदलावका निकष है, निम्न श्र्लोक।
        ॥यस्तर्केण अनुसंधते स धर्मो वेद नेतरः॥ {महाभारत(?) का है} =>॥हिंदी अन्वयार्थ:=> जो तर्क के आधारपर परखा और सिद्ध किया जा सकता है, वही धर्म है,दूसरा नहीं।
        इस लिए हिंदू धर्मको कोई भी पौराणिक या ऐतिहासिक (Frozen in time) घटनाओ से बांध रखना, अनुचित है। अच्छी घटनाओ से ज़रूर सीखे।
        उदा: द्रौपदी के पांच पति थे, इस लिए आज हर लडकी को पांच पतिओं से ब्याहा नहीं जाता।
        इस लिए जिस के अनुसार वह जिएगा, वह स्मृति भी बदलेगी। हमारी १८ स्मृतियां लिखी गई है। मैने नीचे गुजराती सूचि को(समय बचाने) नागरी/गुजराती मिश्रित लिपिमें उतारा है।
        (१) मनु, (२) आत्रेयी (३) वैष्णवी (४) हारितकी (५) याज्ञवल्कि (६) शनैश्वरी (૭) अंगिरा, (૮) आपस्तंबी (९)सांवर्तिकी સ્મૃતિ, (૧૦) कात्यायनी (૧૧) बृहस्पति સ્મૃતિ, (૧૨) પારાશરી સ્મૃતિ, (૧૩) શંखी સ્મૃતિ, (૧૪) लिखीता સ્મૃતિ, (૧૫) दाक्षी સ્મૃતિ, (૧૬) ગૌતમી સ્મૃતિ, (૧૭) શાતાતપી સ્મૃતિ, और (૧૮) વાસિષ્ઠી સ્મૃતિ.
        ==आजके लिए नयी स्मृति (मनु नहीं) ११५० वर्षके गुलामीके कारण बनी नहीं है, पर विवेकानंदजी के विचारों के आधार पर बन सकती है।=हिंदीमें भी बन सकती है।
        ऊर्ध्व दिशामें ही सभीको उपर उठना है। विवेकानंदजी: हिंदू के केवल दो आदर्श (१) ब्रह्म तेज, और (२) क्षात्र वीर्य।
        हम इसी युगांतरी काम में जुटे हुए हैं। ११५० वर्षों की मलिनता, दूर करने में समय लगेगा। डॉ. हेडगेवार जी ने इसे प्रारंभ किया है। आप सचमें तो इस युगांतरी कार्यमें चाहे तो हाथ बटा सकते हैं।बहुत काम है। आपने गिनाया, वह भी।
        ॥अभिव्यक्ति कर्म से हो, न शब्दों से॥हां सत्यको उद्‌घाटित करने चर्चा की जाए।
        सच्चाई के शोधमें हम भी हैं।

        Reply
  30. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    पंकज जी आप सही सोच रहे हैं. वेदों में कहीं भी गो मांस परोसने या खाने का वर्णन नहीं है. मैक्समुलर एंड कंपनी का षड्यंत्र था हमें बदनाम करने का, यह उसी का एक हिस्सा है. डा के.बी.पालीवाल द्वारा लिखित पुस्तक ‘मैक्समुलर द्वारा वेदों का विकृतीकरण’ में अनेकों प्रमाण देकर बतलाया गया है कि उसकी नियुक्ती इसीलिये की गयी थी कि वह वेदों का ऐसा बुरा अनुवाद करे जिससे हिन्दू धर्म की जड़ें उखाड़े जा सकें और इसाईयत का प्रचार हो.
    मैक्समुलर के बारे में इस पुस्तक में बड़ी महत्वपूर्ण जानकारी है जिसे हर देशभक्त को जानना चाहिए क्यों कि यह जानकारी हमारे हाथ में एक हथियार की तरह है जिसका इस्तेमाल हम अपने गुप्त शत्रुओं चेहरों से नकाब उतारने के लिए कर सकेंगे. विद्वान लेखक पालीवाल जी के दिए प्रमाणों के अनुसार ————
    * १६ दिसंबर,१८६८ को मैक्समुलर ने सैक्रेटरी ऑफ़ स्टेट्स ड्यूक ऑफ़ और्गायल को लिखा था, ”…भारत को दुबारा जीता जाना चाहिए और यह दूसरी जीत (ईसायत की) शिक्षा द्वारा होनी चाहिए………भारत का प्राचीन धर्म यहाँ डूब चुका है और यदि फिर भी वहाँ इसाईयत नहीं फैलती तो इसमें किसका दोष होगा.”
    *इसी प्रकार उसने एक और पत्र २३ नवम्बर,१८९८ को सर हेनरी ऑकलैंड को लिखा, ”मेडिकल मिशन या अन्य मिशनरियों का मुझे अधिक विश्वास नहीं है. यदि हम राजा राम मोहन राय या केशवचंद्र सेन जैसे लोग दुबारा भारत भेज सकें और कलकत्ता के लिए एक ऐसा आर्कबिशप मिल सके जो यह जानता हो कि इसाईयत क्या है तो सारा भारत पलक मारते ही ईसाईयत….में धर्मान्तरित हो जाएगा.
    * १८८७ में उसने सैंट जोन्स कॉलेज में भाषण देते हुए स्पष्ट बतलाया था कि वेदों के अनुवाद का उसका उद्देश्य ईसाई मिशनरियों की सहायता करना है.
    ***उपरोक्त कथन व पत्रों से पता चलता है कि वह एक कट्टरपंथी ईसाई पंथ प्रचारक था. उसके द्वारा किया वेदों का अनुवाद पूर्वाग्रहों से ग्रसित और गलत होना ही था. हैरानी की बात तो यह है कि वह न तो अंग्रेज़ी ठीक से जानता था और उसे संस्कृत का अछा तो क्या, माध्यम स्तर का ज्ञान भी नहीं था. वेदों के अनुवाद के लिए पाणिनी व्याकरण के इलावा निरुक्त का भी गहरा ज्ञान होना चाहिए जो कि उसे बिलकुल नहीं था. इसके अनेकों प्रमाण उपरोक्त पुस्तक में हैं.
    ### पंकज जी मेरा विनम्र निवेदन है कि भारतीय संस्कृति के शत्रुओं से भारत की रक्षा के लिए ज़रूरी है कि २०० साल से इनके चेहरों पर पडी नकाब उतार कर दुनिया को इनकी असलियत दिखा दी जाए. यह देश की महान सेवा और हमारी सारी समस्याओं का समाधान है. इसके लिए उपरोक्त पुस्तक बड़े काम की है. अतः इसे प्रचारित किया जाना चाहिए. पुस्तक का पूरा विवरण ये है——–
    ## ”मैक्समुलर द्वारा वेदों का विकृतीकरण” , लेखक-डा. के.वी.पालीवाल, हिन्दू राईटर्स फोरम, 129 -बी., डी.डी.ए.फ्लैट्स, (एम.आई.जी.),
    राजौरी गार्डन, नई दिल्ली-110027 ##
    -पुस्तक का मूल्य केवल 40 रु. है और पृष्ठ 127 हैं.
    * निसंदेह हम सफल होंगे, बस सही ढंग से सही तकनीक और उपायों को मिलकर अपनाना होगा जिसमें हमारी शक्तियां बिखरें नहीं, हम एक-दूसरे को बल देते चलें.
    -आपकी संवेदनशील लेखनी के प्रयास व्यर्थ नहीं जाने वाले. उनका गहरा प्रभाव होता ही है, मेरी शुभकामनाएं.
    -सम्पादक महोदय के संवेदनशील, देशभक्तिपूर्ण समर्पित प्रयासों को देखते हुए मुझे विश्वास है कि वे इस पुस्तक की जानकारी को उचित स्थान देंगे.

    Reply
    • अनुज कुमार

      anuj kumar

      समस्त ज्ञानी अग्रजों को अनुज का प्रणाम
      mahoday yahan par muuddo se bhatakane wali baten kyon karte hain yahan mudda dharmantran nahin hai balki go raksha hai

      Reply
    • Ravindra Nath

      राजेश जी इस पुस्तक को मैं कैसे मंगा सकता हूँ?

      Reply
  31. गिरीश पंकज

    girish pankaj

    अनुज ने जो बातें कही है, वे सार्थक है. मैंने अपने उपन्यास में इन सब बैटन पर विस्तार से प्रकाश डाला है. दुर्भाग्य यही है की गाय के नाम पर अधिकाँश लोग पाखंडी बने हुए है. उनको केवल दूध चाहिए. गाय की सेवा से मतलब ही नहीं. तभी तो गोपालक की गायें लावारिस घूमती है. कचराखाती है. पोलीथिन चबाती है. तिल-तिल कर मरती है गाये. अनुज भाई ने बताया है, की ‘हरिद्वार ऋषिकेश में कम से कम १००० आश्रम हैं १००-१५० गोशालाएं हैं जहाँ के गोपालक सिर्फ पैसा ठिकाने लगाने के लिए गोशालाओं को बनाये हुए हैं यहाँ पर सारे के सारे हिन्दू धर्म के ठेकेदार बने हुए हैं’ . हर जगह यही हालत है. जब तक तथाकथित गौ सेवक ईमानदार नहीं बनेंगे, गायें इसी तरह कटती रहेंगी.

    Reply
  32. अनुज कुमार

    anuj kumar

    समस्त ज्ञानी अग्रजों को अनुज का प्रणाम
    हे अग्रजों, मैं देवभूमि उत्तराखंड से हूँ आप लोगों का स्वागत है इस पावन और स्वछ भूमि में. कभी इस ओर आना होगा तो देखिएगा के महज ऋषिकेश और हरिद्वार में आपको सैकड़ो गाय मिलेंगी जो सड़क पर लावारिस घूमती हैं और खाने के लिए उनको सिर्फ कागज़ और पोलिथीन मिलती है या सडा गला खाती हैं. और कोसती हैं उस मानव सभ्यता को जो आप हम से मिलकर बनी है. यहाँ एक मुख्य बात है की हरिद्वार ऋषिकेश में कम से कम १००० आश्रम हैं १००-१५० गोशालाएं हैं जहाँ के गोपालक सिर्फ पैसा ठिकाने लगाने के लिए गोशालाओं को बनाये हुए हैं यहाँ पर सारे के सारे हिन्दू धर्म के ठेकेदार बने हुए हैं लेकिन गोमाता पर अभी तक दिल से सोचा है तो गिरीश पंकज जी ने. कमोबेश यही स्थिति आपको उत्तराखंड के हर शहर में मिलेगी. आगे जाकर तो ऐसा भी होता है के लोग गाय को बाज़ार में यही सब करने के लिए छोड़ देते हैं और बेचारी गाय को सिर्फ शाम को दूध निकलने के लिए,जो नाम मात्र को निकलता है , ले जाते हैं . ऐसे गाय तिल तिल कर मर जाती हैं इस तरह मरने से तो अच्छा है के अगर वो किसी के काम आती है तो बुरा क्या है? या फिर उनकी दशा सुधारी जाये

    Reply
    • Ravindra Nath

      अनुज आपने शायद कभी मांसाहार नही किया है, मैं पहले मांसाहारी था, मांसाहार के लिये कसाई इन बूढी गायों को नही ले जाते, क्योंकि इनका मांस नर्म नही होता, इसके लिये तो जवान बछिया ही ली जाती है, जिनका गोस्त नर्म होता है।

      Reply
  33. गिरीश पंकज

    girish pankaj

    इस्लाम और मुस्लिम शासकों के मन में गाय के प्रति जो सद्भावना दिखती है, वह प्रेरक है.शहरोज़ की बात सही है. गाय की दुर्दशा पर केन्द्रित अपने उपन्यास में मैंने इसका विस्तार से वर्णन किया है. दुःख की बात है,की अंगरेजों के आने के बाद में इस देश में गायों की ज्यादा दुर्दशा हुई है. राजेश कपूर जी ने गए के कितने लाभ गिनाये है. लेकिन अब गाय माँ-वां नहीं रही. वह स्वादिस्ट मांस देने वाली और डालर उगलने वाली मशीन है. हम लिखते रह जायेंगे और गाय को कटाने वाले अपना काम करते रहेंगे. फिर भी आवाज़ उठ रही है, विरोध हो रहा है, यह बड़ी बात है. पूरी कौम अभी मुर्दा नहीं हुई है. पुँराने समय में लोग कुँए में गिरे थे, तो हम भी गिरेंगे, यह तर्क बड़ा हास्यास्पद है. पता नहीं लोग गो मांस खाते थे या नहीं. किसी ने कोई श्लोक बनाकर चिपका तो नहीं दिया. ऐसा हुआ है. संस्कृति को नष्ट करने की साजिशे भी हुई है. खैर,

    Reply
  34. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    पंकज जी ! सदा के सामान एक मार्मिक, राष्ट्र हित के विषय पर लेखन करके आपने सुप्त समाज को जगाने का प्रयास किया है, अभिनन्दन. सचमुच एक जनहित याचिका दिल्ली में होने वाले गोवंश के हत्याकांड के विरुद्ध दायर की जानी चाहिए. क्या कोई दिली वासी साहस करेंगे ?

    Reply
  35. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    इस सत्य और तथ्य को जानना और समझना होगा की गो को समाप्त करना भारत के अस्तित्व और आत्म सम्मान को समाप्त करने की एक दूरगामी कुटिल योजना है. निम्न तथ्यों पर ज़रा ध्यान दें——-
    * भारतीय गोवंश के दूध में ‘बीटा कैसीनए-2’ नामक प्रोटीन पाया गया है जो कैंसर सहित अनेक रोगों को समाप्त करता है.
    *अमेरिकन गोवंश में ‘बीटा कैसीन ए-1’ पाया गया है जिनके दूध से ह्रदय रोग, मधुमेह, ऑटिज्म, कैंसर जैसे भयानक रोग पैदा होते हैं. जर्सी, हौलीस्टीन,फ्रीजियन, रेड डैनिश आदि गौओं में यह खतरनाक प्रोटीन मिला है.
    * डा. ऐपसटीन तथा ऑकलैंड की ‘ए-२’ कारपोरशन सहित विश्व के अनेक विद्वानों ने इस पर खोज की है पर हम भारत के लोगों से जान-बूझ कर इस तथ्य को छुपाया गया है की विदेशी गोवंश विषाक्त है और हमारा भारतीय गोवंश रोगों का नाश करने वाला है.
    *अमेरिका आजकल अपने ‘ए-१’ गोवंश को ‘ए-२’ गोवंश में बदलने का काम तेज़ी से कर रहा है. अपना विषैला ‘ए-१’ प्रोटीन वाला दूध भारत में खपा रहा है. भारत के बाज़ार में खपने वाले दूध का ३३% यही अमेरिकन दूध है जो की मिल्क-पाउडर के रूप में आ रहा है. अमेरिका का प्रयास है कि उसके भारतीय बाज़ार के ७५-८०% दूध की आपूर्ती उसके ज़हरीले दूध से हो. इसके लिए भारतीय गोवंश की समाप्ती के कई हथकंडे अपनाए गये हैं.
    *यह भी एक तथ्य है कि अकेले ब्राजील में ४० लाख से अधिक भारतीय गोवंश तैयार किया गया है जिनमें सबसे अधिक गिर नस्ल और फिर लाल सिंधी और साहिवाल है.
    क्या यह स्पष्टर नहीं कि हमारे रोगनाशक भारतीय गोवंश को समाप्त करके विदेशी विषाक्त गोवंश को हम पर थोंपने के प्रयास हमारी अयोग्य सरकार के सहयोग से चल रहे हैं. देश का दुर्भाग्य ही है कि हम ऐसी सरकार बार-बार चुनते हैं जो आसानी से विदेशी ताकतों के हाथ का खिलौना बन जाती हैं, जिन्हें अपने देश के हित से अधिक प्यारा विदेशियों का हित है.
    ***भारतीय गोवंश के कुछ अमूल्य गुणों को जानकार आप आनंदित होंगे–
    १. इसके गोबर के उपले अपने पाँव के नीचे रख कर १-२ घंटा रोज़ बैठने से उच्च रक्तचाप ठीक हो जाता है. हमने अनेकों पर आजमाया है. निम्न रक्त चाप भी ठीक होगा. और भी अनेक रोग ठीक होंगे, आजमाकर देखें.
    २. धूप के टुकड़े जितना गोबर का सूखा टुकडा लेकर उसपर शुद्ध गोघृत लगाएं और धूप की तरह सुलारने दें. केवल आधे घंटे में रोगाणु, कीटाणु, फंगस, दुर्गन्ध, रंग रोगन का विषैला प्रभाव समाप्त होने लगेगा. प्रातः सायं जलाते रहें, टी.बी., प्लेग, टाईफाईड आदि सभी रोगाणु समाप्त होंगे. इसे भी अजमा लें.
    ३. शुद्ध गोघृत की नसवार दिन में २-३ बार लेते रहने से अधिकाँश अधरंग के रोगी ठीक हो गए. यानी मरे हुए स्नायुकोश दुबारा बनते हैं हमारे गोवंश के घी से.
    ४. आँखों में गो-घृत का अंजन करने से जीवन में कभी भी ऐनक नहीं लगती और न कभी मोतिया होता है. मेरी अतु ६० साल है और मैं अभीतक बिना ऐनक के पढता-लिखता हूँ, गोघृत अंजन के कारन. मुझ जैसे हज़ारों और भी हैं.
    ५. गोघृत के नस्य, अंजन और कान में सरसों का तेल डालने से हमारे स्नायुकोषों में जमा सारे विश निकल जाते हैं, सरवाईकल स्पौंडेलाईटिस आसानी से ठीक होने लगता है.
    ६. केवल आधा सम का गोबर का टुकडा अपने मोबाईल के पीछे चिपका कर देखें, रेडीएशन कम होने से स्नायु कोशों को हानि नहीं पहुंचेगी और आप सुखद अनुभव करेंगे. हमने इस पर अबतक हज़ारों प्रयोग कर डाले हैं, आप भी अजमा लें.
    ७. विदेशी गोवंश के गोबर से धीरे-धीरे खेती भी समाप्त हो जाती है और हमारे गोवंश से उपज खूब बढ़ती है. एक बार विदेशी गो-बैल को खेत में घुमा कर देखें; फसल समाप्त हो जायेगी. जबकि अपनी गो-बैल को घुमाने से उपज बढ़ जाती है. चाहें तो इसे भी परख लें.
    # इतने गुणों की खान हमारी गो के रहते हुए हमें बीमार बना कर अरबों रूपये कमाने की योजना चलनी संभव नहीं. हमारी खेती की समाप्ती नहीं हो सकेगी. अतः उन दानवी ताकतों को ज़रूरी लगता है कि वे हमारी गो माता को समाप्त करें. इस तथ्य को भोले भारतीय नहीं समझ पा रहे. गोवंश की समाप्ती में भारत की समाप्ती है.

    Reply
  36. गिरीश पंकज

    girish pankaj

    राष्ट्रकुल खेलों के दौरान तो गएँ कटेंगी ही. इसे कोई ताकत रोक नहीं पायेगी शायद. वैसे भी दिल्ली में रोज कटती है हजारों गए. लेकिन हमारी चेतना इतनी भोथरी हो गयी है, या कहें कि इतनी ‘भयंकर प्रगतिशील’ हो गयी है की पशु हत्या का सवाल उठाना ही बेमानी है. कुछ के लिए पिछड़ापन है. और गाय का सवाल उठाना तो धार्मिक मामलाहो जाता है. जबकि यह मानवीय मामला है. किसी भी हालत में कोई पशु नहीं कटना चाहिये. लेकिन हमारी सुनेगा कौन? हिंसा इस वक्त सबसे बड़ी प्रगतिशीलता है. इसीलिये जब नक्सली हिंसा करते है तो बुद्धिजीवी खुश होते है…

    Reply
  37. VINAY SHARMA

    “शर्म तो दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को आनी ही चाहिए, कि उनके रहते दिल्ली में गाये कट रही है. रोज कट रही है.

    मित्रों मत होने दो ऐसा,बचाओ अपनी माँ को,बहिष्कार करदो इन राष्ट्रकुल खेलों का,अपनी माँ को मार क़र आप और मै किसी का मनोरंजन नहीं करेंगे…
    सभी से मेरा आग्रह है कि आप किसी भी तरह इन राष्ट्रकुल खेलों का बहिष्कार करो,इन्हें किसी भी तरह की publicity नहीं मिलनी चाहिए,हम इसका कोई प्रचार न करें,यहाँ तक कि अपने television पे भी इसे न देखें…
    अपनी माँ को मार कर हमें किसी भी तरह की कमाई नहीं करनी,न ही किसी अतिथि का स्वागत करना है.

    ये तो गाय की बात है ……… आप देखना . ……….. खेल में हिन्दुस्तान की कई बच्चियों की इज्ज़त भी नीलाम होगी….

    Reply
  38. अनुज कुमार

    anuj kumar

    गोमांसं भक्ष्हयेन्नित्यं पिबेदमर-वारुणीम
    कुलीनं तमहं मन्ये छेतरे कुल-घातकाः

    इस श्लोक का अर्थ करते हुए ऐसा कहा जाता है की कुलीन लोग गौमांस व सोमरस का नित्य सेवन करते हैं और न करने वाले तो कुल-घातक हैं।
    प्राचीन भारतीय में पूजा पद्वति एवं भोजन पद्वति में मांस, खासकर गौ-मांस का, काफी प्रचलन था! वेदों में इसका काफी प्रमाण मिलता हैं! जैसे की इन्द्र को बैल का मांस बेहद प्रिय था तथा अग्नि को बैल अथवा गाय का मांस भोजन के रूप में प्रिय था! रामायण में तो सीता ने हिरण बने मामा मारीच का शिकार कर उसका मांस लाने को कहा! वहीँ महाभारत में अभी एक कथा के अनुसार, एक राजा रंतिदेव का वर्णन मिलता हैं, जिसमे वह एक समारोह के समय ब्राह्मणों को अनाज एवं गौ-मांस देकर सुयश प्राप्त किया!
    कई लोग ऐसा नहीं मानते वे कहते हैं, मांस शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं – मुझे ज़्यादा नहीं पता मगर मनु स्मृति के अनुसार एक अर्थ:
    मांस: = मम + स: = मुझे + यह = यह मुझे वही करेगा जो मैं इसे कर रहा हूँ = मैंने इसे खाया तो यह मुझे खायेगा।
    मगर उपरोक्त कथन इस बात को प्रमाणित नहीं कर सकता की लोग गाये का मांस नहीं खाते थे

    Reply
  39. shahroz शहरोज़

    हम गिरीश जी से सहमत हैं.यह देश के करोड़ों लोगों की आस्था का सवाल है.मैं यह भी स्पस्ट करता चलूँ कि इस्लाम ने गौ मांस के सेवन को पुण्य नहीं कहा है.कुरान की एक सूरत तो उसके गुणगान से भरी है.

    Reply
  40. दिवस दिनेश गौड़

    Er.Diwas Dinesh Gaur

    मित्रों मत होने दो ऐसा,बचाओ अपनी माँ को,बहिष्कार करदो इन राष्ट्रकुल खेलों का,अपनी माँ को मार क़र आप और मै किसी का मनोरंजन नहीं करेंगे…
    सभी से मेरा आग्रह है कि आप किसी भी तरह इन राष्ट्रकुल खेलों का बहिष्कार करो,इन्हें किसी भी तरह की publicity नहीं मिलनी चाहिए,हम इसका कोई प्रचार न करें,यहाँ तक कि अपने television पे भी इसे न देखें…
    अपनी माँ को मार कर हमें किसी भी तरह की कमाई नहीं करनी,न ही किसी अतिथि का स्वागत करना है…

    Reply
  41. anuj kumar

    ये कोई नई बात नहीं है हमारे पूर्वज भी गाय का मांस खाते थे

    Reply
    • Ravindra Nath

      कृपया अंग्रेजो के लिखे इतिहास से भ्रमित न हों।

      Reply
  42. Anil Sehgal

    हाय गाय, अब तुम फिर कटोगी…? लेखक : गिरीश पंकज

    – मेरा सुझाव है कि हताश मत होइये – इस प्रकार तनिक विचार करिए : –

    (१) यह विदित करना कठिन नहीं है कि :

    क्या दिल्ली में गाय काटने पर कानूनी प्रतिबन्ध है ?

    (२) यदि उत्तर है कि गाय हत्या पर कानूनी प्रतिबन्ध है, तो

    (३) इस प्रतिबन्ध को लागू कराने / पालन करवाने के लिए तुरंत दिल्ली सरकार / प्रशासन / अदालत के सम्मुख आवश्यक प्रार्थना पत्र लगा देना चाहिये कि

    ‘राष्ट्रकुल खेलों के दौरान हम गायें काटने नहीं देंगे’

    (४) बस इतना कर दीजीये, देखीये करिश्मे हो जाएँगे; तनिक स्वामी राम देव जी महाराज, हरिद्वार को भी सूचित कर दें.

    Reply
  43. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    सही कहा आपने: कि, “शर्म तो दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को आनी ही चाहिए, कि उनके रहते दिल्ली में गाये कट रही है. रोज कट रही है. अब खेल आयोजन के दौरान बेहिसाब कटेंगी.”
    किस जबान से कांग्रेस गांधी जी का नाम लेते थकती नहीं है?
    सक्रिय विरोध के लिए, कुछ परिणाम दायी योजना बनाकर क्रियान्वयित करनी चाहिए। कोई सूक्ष्म संवेदनशील बिंदू ढूंढकर उसपर प्रहार किया जाए, जिससे कानूनके अंदर रहते हुए, इस गौहत्त्यारोंके विरोधमें, कमर तोड आंदोलन किया जाए, अधिकसे अधिक हानि पहुंचा पाए।

    Reply
  44. deepak.mystical

    deepak dudeja

    कुछ नहीं …………………. सरकार राष्ट्रमंडल (भ्रष्टमन्दल) खेल को पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है…………….

    ये तो गाय की बात है ……… आप देखना . ……….. खेल में हिन्दुस्तान की कई बच्चियों की इज्ज़त भी नीलाम होगी….

    अन्धकार से
    दीपक डुडेजा

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *