लेखक परिचय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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railway                साहित्यिक‌ गोष्ठी समाप्त हो चुकी थी और मैं अपने गृह नगर वापिसी के लिये ट्रेन पकड़ने कॆ उद्देश्य से स्टेशन आ गया था||ट्रेन करीब दो घंटे लेट थी| हम पति पत्नी समय बिताने के लिये एक बेंच पर बैठ गये|प्लेट फार्म पर बहुत चहल पह‌ल‌ थी| थोड़ी देर में एक सज्जन सपत्नीक आये और मेरे बगल में बैठ गये| औप‌चारिकता वश यूं ही बातचीत का सिलसिला चल पड़ा|चोरी ,बेइमानी और भ्रष्टाचार इत्यादि पर चर्चा होने लगी|वे बहुत ही सभ्रांत और बहुत ही शरीफ व्यक्ति मुझे लगे|सफेद धोती कुर्ते में राजनीति की भट्टी से निकले कोई अतृप्त देव पुरुष प्रतीत हो रहे थे|
“आजकल चैन स्नेचिंग के मामले बहुत हो रहे हैं,महिलाओं का घर से निकलना दूभर हो रहा है”वे बोले|
“पता नहीं लोग क्यों दूसरों का माल हड़प करने में अपनी शान समझते हैं|”मैंने भी अपनी अक्ल का पिटारा खोलकर उनको दिखाया|
“एक जमाना था कि लोग रास्ते में पड़ी किसी वस्तु को उठाकर रख लेना भी अच्छा नहीं समझते थे|
“अजी दूसरों का माल लोग मिट्टी कूड़ा समझते थे| यही तो हमारे संस्कार हैं|”मैंने अपने विचारों का घोड़ा एक कदम और आगे चल दिया|
“ऐसे लोगों को तो बीच चौराहे पर खड़े करके गोली मार देना चाहिये जो दूसरों के माल पर दृष्टि रखते हैं|”वे भावावेश में बोले|
“बिल्कुल साहब बिल्कुल”,मैंने हाँ में हाँ मिलाई|
अचानक मैंने अनुभव किया कि उनका एक पैर जमीन पर कुछ‌ हरकत कर रहा है|मैंने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया|सोचा पैर में कुछ खुजली वगैरह हो रही होगी| या अपने पंजे को आराम दॆने के लिये वे उसे हिला रहे हों|
छोटी सी बेंच पर हम चार लोग बैठे थे और इस कारण  बैठने में में असुविधा हो रही है  यह सोचकर मैं उठा और सामने के चबूतरे पर बैठ गया||बातचीत यथावत जारी थी|मैंने देखा कि उन सज्जन के पैरों के पंजे के नीचे एक पायल झांक रही है जिसे वह पंजे से पूरी तरह ढकने का प्रयास कर रहे हैं|मैं अनजान बना हुआ बातचीत करता रहा|बातचीत का सिलसिला थमा और जैसे ही मैंने आराम देने के लिये अपनी गर्दन दूसरी तरफ  घुमाई, उनका एक हाथ, पैर के पंजे की तरफ चला गया|मैंने महसूस किया कि उन्होंने पलक झपकते ही कोई चीज उठाई और अपने कुर्ते की जेब में डाल ली||मैंने अनजान बनते हुये समान्य सी नज़र उनके पंजे पर डाली|अब उनका पंजा जमीन के ऊपर था और पायल वहां से गायब थी|
इतने में गाड़ी आने की सुगबुगाहट होने लगी|हम अपनी अटेची लेकर ट्रेन में बैठ गये|ट्रेन चल पड़ी थी|”ऐसे लोगों को बीच चौराहे पर खड़ा करके गोली………….जो दूसरों के माल  पर ……..”  उनके द्वारा बोले गये शब्द मेरे भीतर उन काले बादलों से घुमड़ाने लगे जो शीतल जल के बदले तेजाब बरसाने लगे हों|
मैं सोच रहा था ऐसे सज्जनों को बीच चौराहे पर उड़ाने के लियॆ कौन से अस्त्र शस्त्र  उपयोग में लाये जायें ,ए के 47, ए के 56 ,आर डी एक्स अथवा जिलेटिन की छड़ें|

One Response to “ऊंचे विचार वाले”

  1. onkarlal Menaria

    श्रीवास्तव जी ने आज के समाज में व्याप्त तथाकथित भद्र पुरुषों यानी बगुला भक्तों पर बहुत ही करारा एवं सटीक व्यंग किया है.

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