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    Homeसाहित्‍यकविताहै हिंदी यूं हीन ।।

    है हिंदी यूं हीन ।।

    बोल-तोल बदले सभी, बदली सबकी चाल ।
    परभाषा से देश का, हाल हुआ बेहाल ।।

    जल में रहकर ज्यों सदा, प्यासी रहती मीन ।
    होकर भाषा राज की, है हिंदी यूं हीन ।।

    अपनी भाषा साधना, गूढ ज्ञान का सार ।
    खुद की भाषा से बने, निराकार, साकार ।।

    हो जाते हैं हल सभी, यक्ष प्रश्न तब मीत ।
    निज भाषा से जब जुड़े, जागे अन्तस प्रीत ।।

    अपनी भाषा से करें, अपने यूं आघात ।
    हिंदी के उत्थान की, इंग्लिश में हो बात ।।

    हिंदी माँ का रूप है, ममता की पहचान ।
    हिंदी ने पैदा किये, तुलसी ओ” रसखान ।।

    मन से चाहे हम अगर, भारत का उत्थान ।
    परभाषा को त्यागकर, बांटे हिंदी ज्ञान ।।

    भाषा के बिन देश का, होता कब उत्थान ।
    बात पते की जो कही, समझे वही सुजान ।।

    जिनकी भाषा है नहीं, उनका रुके विकास ।
    परभाषा से होत है, हाथों-हाथ विनाश ।।

    प्रियंका सौरभ
    प्रियंका सौरभ
    रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

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