डा. राधेश्याम द्विवेदी
प्रारम्भिक इतिहास :-हिंद इस्लामिक वास्तुकला का प्रारंभ 12वीं शताब्दी के अंत में भारत पर विदेशी कब्ज़े से हुआ। मुसलमानों को सासानी और बिज़ेन्टाइन साम्राज्यों से विभिन्न योजनाओं का खज़ाना विरासत में मिला । सुरूचिपूर्ण इमारतों होने के कारण उन्होंने जिस भी देश पर कब्ज़ा किया, वहां की स्थानीय वास्तुकला को अपने अनुकूल ढालने में सदा सफल रहे। आरंभ में मुसलमान हमलावर केवल हथियारबंद घुड़सवार थे जो कि देश में केवल लूटमार के उद्देश्य से आए थे और उन्होंने नगरों शहरों अथवा साम्राज्यों की स्थापना के बारे में नहीं सोचा । इसलिए वे अपने साथ वास्तुकार या राजमिस्त्री नहीं लेकर आए । दूसरी इमारतों को नष्ट कर उनसे प्राप्त निर्माणाधीन सामग्री को कई कामचलाऊ इमारतों जैसे दिल्ली की कुवत-उल-इस्लाम मस्जि़द और अजमेर का अढ़ाई दिन का झोंपड़ा में प्रयुक्त किया गया । अत: भारत में मुसलमानों के आगमन ने भारतीय वास्तुकला पर तुरंत ही कोई प्रभाव नहीं डाला । मुसलमानों का भारत पर हमला हज़ार वर्ष से भी अधिक समय तक चला और सन् 1526 में सम्राट बाबर के भारत पर हमले के बाद ही मुसलमानों ने देश में बसने का सोचा और समय बीतने के साथ वे इस बात से संतुष्ट हो गए कि अब वे इस देश के थे और देश उनका । सातवीं से 16वीं तक भारत में इस्लामी स्थापत्य, हमलावरों की अनिर्णीत स्थिति की ओर संकेत करता है । उन्हें लगता था कि वे अधीनस्थ लोगों के बीच रह रहे हैं जिनमें से अनेक उनके प्रति शत्रुतापूर्ण भावना रखते थे । इसलिए प्रारंभिक मुस्लिम नगर और शहर मकबरे का निर्माण भी किले की भांति करते थे ताकि वे शत्रु सेना से आसानी से उसकी रक्षा कर सकें । मस्जिदों और मंदिरों के दोनों प्रकार की वास्तु्कलायें देखी जाती हैं। इसमें सबसे महत्व्था पूर्ण तत्त्व् दोनों शैलियों में अलंकरण का अत्यंत महत्त्वर रहा और कई बार स्तंभावलियों से घिरा खुला प्रांगण भी मिलता है। मस्जिदों और मंदिरों के दोनों प्रकार की वास्तु्कलायें देखी जाती हैं। इसमें सबसे महत्व्की पूर्ण तत्त्वत दोनों शैलियों में अलंकरण का अत्यंत महत्त्वर रहा और कई बार स्तंभावलियों से घिरा खुला प्रांगण भी मिलता है।
दोनों के बीच का अंतर:- दोनों के बीच का अंतर भी उतना ही स्पष्ट था। मस्जिद का इबादत कक्ष विस्तृत था, जबकि मंदिर का पूजा स्थल अपेक्षाकृत छोटा था । मस्जिद प्रकाशमय और खुली थी, जबकि मंदिर अंधकारपूर्ण और बंद था । मंदिर और मस्जिद की रूपरेखा में अंतर पूजा-अर्चना में हिंदू और मुस्लिम तरीके के बीच अंतर के माध्यम से समझाया जा सकता है। एक साधारण हिंदू मंदिर के लिए देवता की प्रतिमा को स्थापित करने का कक्ष, गर्भ गृह और उपासकों के लिए अक्सर सामने की ओर विशाल कक्ष मिलता है । इस्लांम में इबादत के तरीके में एक साथ नमाज़ के लिए एक विशाल कक्ष मिलता है, जिसका पश्चिमी छोर मक्का की ओर मुँह करता हो, यानि की पश्चिमी भारत की ओर मुँह हो । नमाज़ कक्ष के पीछे की दीवार के मध्य में एक आला होता है जिसे मिहराब कहते हैं, जो नमाज़ करने की दिशा (किबला) बताता है । इसके दाहिने ओर का मंच (मिंबर) नमाजियों की अगुवाई करने वाले इमाम का होता है । शुरू में मुअज्जिन एक मीनार से अज़ान देते थे, जो कि बाद में स्थापत्य का केवल एक हिस्सा बन कर रह गई । नमाज़ कक्ष के एक गलियारे या हिस्से को उन महिलाओं के लिए अलग कर दिया जाता है जो परदा करती थीं । मस्जि़द का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में होता है और इसके चारों ओर चलने के लिए ढके हुए स्थान (लिवान) बने होते हैं। मस्जि़द के प्रांगण में प्रक्षालन के लिए अक्सर एक हौज़ का प्रावधान होता है । वास्तुकला की इस शैली में न केवल नई पद्धतियां और सिद्धांत अपनाए गए बल्कि ये मुसलमानों की धार्मिक और सामाजिक आवश्यकताओं को भी प्रतिबिंबित करती हैं । इस्लामी वास्तुकला मेहराब, मेहराबी छत और गुंबद, स्तंभ और पिरामिडी मीनार या पतली मीनार, जिन्हें क्षैतिज कहा जाता है, पर आधारित थीं। मज्जिदों में मक्का की दिशा में नमाज पड़ने के लिए एक बड़ी आयताकार जगह होती है जिसे मिहराब कहा जाता है। मिहराब के कोने में मीनारे होती है जो स्तंभ नुमा होती है। मस्जिदें खुली हुई होती हैं, उनका केंद्र सुदूर मक्का की दिशा में होता है। मंदिर रहस्य का घर होता है, जिसका केंद्र अनेक दीवारों एवं गलियारों से घिरा हुआ बीच का देवस्थान या गर्भगृह होता है। मजिस्द की दीवारें प्राय: सादी या पवित्र आयतों से उत्कीर्ण होती हैं, उनमें मानव आकृतियों का चित्रण निषिद्ध होता है। मंदिरों की दीवारों में मूर्तिकला और मानवकृति चित्रण उच्चतम शिखर पर पहुँचा होता है, पर लिखाई का नाम नहीं होता है । पत्थरों के सहज रंगों में ही इस चित्रण द्वारा मंदिरों की सजीवता आई। मस्जिदों में रंगबिरंगे पत्थरों, संगमर्मर और चित्र विचित्र पलस्तर के द्वारा दीवारें मुखर की गई।
हिंदू वास्तुकला शैली:-हिंदू वास्तुकला शैली में स्थान आर-पार फैले टोडा थे जिन्हें मार्ग बनाकर जोड़ा गया था। प्रत्येक अपने नीचे वाले से बहुत दूर होता है , ताकि फैलाव को एक पटिया या ईंट से पाटे जा सकने वाले आकार तक सीमित किया जा सके। भारत में मेहराब पहले से विद्यमान होने के कुछ प्रमाण हैं, लेकिन माना जाता है कि मुसलमान मेहराब के निर्माण का सिद्धांत लेकर आए, ताकि छत या दीवार या इमारत के ऊपरी हिस्से को यथावत रखा जा सके । ईंटों और पत्थरों को इस तरह से लगाया जाता था, ताकि वे वक्र रेखा बना सकें और इमारत के ऊपरी हिस्से में ये संधान प्रस्तर से जुड़े होते थे । कई मामलों में प्राचीन समय में स्थानीय वास्तुकारों के इससे अवगत होने के बावजू़द भी मुसलमानों ने इसे पुन: प्रवर्तित किया। इसके परिणामस्वरूप चपटे सरदल या टोडेदार भीतरी छत का स्थाकन मेहराब और मेहराबी छतों ने ले लिया और पिरामिडी छत या मीनार का स्था़न गुंबद ने ले लिया । चौकोर ढांचे के ऊपर गोल गुंबद बनाने की आवश्यकता को देखते हुए बगली डाट के माध्यम से कोणों को प्रवर्तित किया गया, ताकि अनेक किनारे, अक्सर 16 भुजावाले आधार को गुंबद के ऊपर गोलाकार ढोल आकार में रखा जा सके । छज्जे को प्रवर्तित कर दीवारों से प्रक्षेपण पर बिठाए गए प्रास आलों पर बारजा बना । हिंदुओं की अंत्येष्टि से भिन्न मृतकों को दफ़नाने में कक्ष, पश्चिमी दीवार में एक मेहराब और ज़मीन के नीचे एक कक्ष में असली कब्र शामिल होते थे । आकार में विशाल और जटिल मकबरों में एक मस्जि़द और सुनियोजित बगीचा भी होता था । इस्लामी इमारतों की पद्धति, विषय-वस्तु या अंलकरण भी पूर्व प्रचलित पद्धतियों से भिन्न था । हिंदू शैली या अलंकरण मुखयत: प्रकृतिवादी है जिसमें समृद्ध वनस्पति जीवन के साथ मानव और पशु आकृतियां दर्शाई गई हैं । मुसलमानों में जीवित वस्तुओं का सजावट या अंकरण द्वारा निरूपण निषिद्ध था। इसलिए उन्होंने ज्यामितीय और अरबस्क नमूने, अलंकृत लिखावट और वनस्पति जगत का निरूपण किया ।
हिंद-इस्लामी वास्तुकला का योगदान:- संक्षेप में मुसलमानों का हिंद-इस्लामी वास्तुकला में गहरा और दिलचस्प योगदान था । उनके द्वारा लाई गईं स्थापत्य विशेषताओं में मेहराब, गुंबद, मीनार, लंबित, बगली डाट, मेहराब, अर्द्ध गुंबद वाले दोहरे प्रवेशद्वार, छतरियां प्रमुख हैं। निर्माण में कंकरीट का प्रयोग शामिल है । उन्होंने विभिन्न रंगों और रूपरेखाओं में मुलम्मेत और चित्रकारी की भी शुरूआत की । इस्लामी अंकरण तत्व अक्सर कशीदाकारी लगते थे । भारत में काफी पहले से ही चूने के बारे में जानकारी थी और निर्माण कार्य में काफी हद तक इसे प्रयुक्त किया जाता था। ईंट के काम में अक्सर मिट्टी का प्रयोग होता था। पत्थर के बड़े-बड़े टुकडुों को एक दूसरे के ऊपर रखकर उन्हें लोहे की कीलों से जोड़ा जाता था । रोमवासियों की तरह मुसलमानों ने भी कंकरीट और चूने-गारे का निर्माण कार्यों में विस्तृत प्रयोग किया । संयोग से उन्होंने चूने का प्रयोग पलस्तर और अंलकरण के आधार के रूप में किया, जो उसी में उत्कीर्ण होता था और टाइलों पर मीनाकारी को बनाए रखता था । इस प्रकार हम देखते हैं कि दोनो स्थापत्यों में असमानता होते हुए भी दोनों एक दूसरे से प्रभावित और जुड़ी हुई भी हैं। एक के प्रभाव को दूसरे पर देखा जा सकता हैं। कलाकार प्रायः दोनो प्रकार की संरचायें बनाते रहे हैं। इसलिए कहीं कहीं वे अपनी इच्छानुसार अपने मूल कला को भी दर्शा गये हैं

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