हिन्दू मामलों में माननीय सुप्रीम कोर्ट की रुचि अपेक्षाकृत ज्यादा

डा. राधेश्याम द्विवेदी
वैसे तो न्यायपालिका लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ है। इसे पूरे देश की अखण्डता तथा समग्र देशवासी की भावना को देखते हुए ही कार्य करना चाहिए, परन्तु व्यवहार में अनेक अवसर आये हैं कि हिन्दू मामलों में जन भावना की अनदेखी की गई है। भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट एक स्वतंत्र संस्था है जिसे किसी भी धर्म समुदाय को सबूतों के आधार पर फैसला देना चाहिए, लेकिन कुछ मामलों में माननीय सुप्रीम कोर्ट अपनी यह गरिमा नहीं बना पाता है और उसकी राय में संदेह की गुंजायश झलकने लगती है।आज के पोस्ट में एसे ही कुछ पहलुओं को रेखांकित करने का प्रयास किया जाएगा।
बंटवारा धर्म के आधार पर :- भारत और पाकिस्तान का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था जिसके बाद पाकिस्तान मुसलमानों का देश बना और भारत हिंदुओं का देश होना चाहिए था लेकिन महात्मा गांधी व पंडित नेहरू ने भारत को धर्मनिरपेक्ष देश बनवा दिया। धर्मनिरपेक्ष का मतलब कि देश का कोई मजहब नहीं है। इसमें सभी धर्म को एक जैसा सम्मान होना चाहिए था , लेकिन आज भी भारत धर्मनिरपेक्ष होने के बाद धर्म बदलते ही राय अलग अलग हो जाती है।
हिन्दू मामलों में तुरंत एक्सन :- माननीय सुप्रीम कोर्ट को राममन्दिर, तीन तलाक के फैसलों में समय क्यों लग रहा है? वह राममन्दिर और तीन तलाक जैसे गम्भीर मुद्दों पर मुस्लिम पर्सनल लॉ की राय क्यों मांग रहा है जबकि हिन्दू मामलो में माननीय न्यायालय किसी की भावना या राय की कोई जरुरत नहीं समझता हैं। 11 मई 2017 से तीन तलाक के मुद्दे की सुनवाई के पहले ही दिन कोर्ट नें कहा था कि अगर तीन तलाक का मामला इस्लाम धर्म का हुआ तो उसमें हम दखल नही देंगे। आप मुसलमानों की धमकियों से डरते हैं अगर आप कुरान में लिखे होनें से तीन तलाक को मानते हैं तो पुराण में लिखे राम के अयोध्या में पैदा होनें को क्यों नही मानते?
हिन्दू भावनाओं तथा देवी देवताओं पर ज्यादा कटाक्ष :- ना केवल माननीय सुप्रिम कोर्ट ही अपितु देश के अन्यानेक सार्वजनिक तथा सार्वभौमिक संस्थायें भी अपनी धर्म निरपेक्ष छवि को बनाये रखने में विफल देखे गये हैं। फिल्म उद्योग में तो हिन्दू भावनाओं तथा देवी देवताओं से सम्बन्धित फिल्मों की बाढ़ सी आ जाती है। कोई भी निर्माता किसी हिन्दूतर भावनाओं पर हाथ लगाना ही नहीं चाहता है, जब कि समाज में असमानता तथा गैर बराबरी के नियमों का उलंघन उनमें अपेक्षाकृत ज्यादा होता है। इस प्रकार हमें ना जाने क्यों इन संस्थाओं के दोहरे चरित्र नजर आने लगते हैं ।
दही हांडी पर कार्यवाही :-माननीय सुप्रीम कोर्ट को दही हांडी की ऊंचाई से लोगों को होने वाले नुकसान साफ नजर आ जाता है, और उस पर तुरन्त एक्सन लिया जाता है,लेकिन मोहर्रम के जुलूस में छोटे बच्चों का कटार से अपनी पीठ पर वार करके घायल करना नजर नहीं आता। उस पर कोई एडवाइजरी तक नहीं जारी होती देखी गयी है। सोसल मीडिया और समाचार चैनल तक मौन दिखते हैं।
गौ हत्यारों पर कार्यवाही :– माननीय सुप्रीम कोर्ट को गोरक्षकों द्वारा गौ हत्यारों पर की गई कार्रवाई तो नजर आ जाती है और इस पर भी तुरन्त माननीय न्यायालय एक्सन भी लेते देखा गया है,लेकिन प्रतिदिन कट रही लाखों गायों की हत्या उसे शायद नजर नहीं आती है। केंद्र के पशु बाजारों में गाय की खरीद.फरोख्त पर प्रतिबंध लगाने के बाद फैसले के खिलाफ विरोध जताने के लिए केरल के कई हिस्सों में वीफ फेस्ट का आयोजन किया गया। केरल में सत्तारुढ़ माकपा की अगुवाई वाली एलडीएफए विपक्षी कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और उनके युवा प्रकोष्ठों ने मार्च निकाले और राज्यभर में उत्सव का आयोजन किया। कोच्चि में तो राज्य के पर्यटन मंत्री केण् सुरेंद्रन ने भी इस फेस्ट में हिस्सा लिया। केरल उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय को शायद यह कृत्य दिखाई ना पड़ा हो। स्वतः संज्ञान लेने के अधिकार का प्रयोग करना भी शायद उन्हें अच्छा ना लग रहा है। समझदार हिन्दू यदि सड़क पर ना उतरें तो उनकी भावना का ख्याल करना भी माननीय न्यायालय के समझ में नहीं आ रहा है। इस उत्तेजनात्मक कार्य से कानून व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। इसे नजर अन्दाज करना देश हित में कदापि नहीं होगा।
जलीकट्टू :-माननीय सुप्रीम कोर्ट को जलीकट्टू में साड़ों की चोट तो नजर आ जाती है, इसमें जानवरों पर अत्याचार होता दिखाई देता है और माननीय न्यायालय उस पर बेन लगा देता है, लेकिन ईद पर कटने वाले लाखों जीवों की हत्या नजर नहीं आती। बकरीद की कुर्बानी इस्लाम की शान है।
महिलाओं को प्रवेश:- शनि शिंगनापुर मंदिर में महिलाओं को प्रवेश ना देना महिलाओं पर अत्याचार है जबकि हाजी अली दरगाह में महिलाओं को प्रवेश देना या ना देना उनके धर्म का आंतरिक मामला है।
इसी प्रकार कई अन्य मामले भी दर्शनीय हैं- पर्दा बुर्का प्रथा – पर्दा प्रथा एक सामाजिक बुराई है लेकिन बुर्का उनके धर्म का हिस्सा है। शिवजी पर दूध चढाना दूध की बर्बादी है लेकिन मजारों पर चादर चढाने से मन्नतें पूरी होती है। भारत तेरे टुकङे होगें ये कहना अभिव्यक्ति की आजादी है और इस बात से देश को कोई खतरा नही है और वंदे मातरम कहने से इस्लाम खतरे में आ जाता है। सैनिकों पर पत्थर फैंकने वाले भटके हुऐ नौजवान है और अपने बचाव में एक्शन लेने वाले सैनिक मानवाधिकारों के दुश्मन हैं।

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