हिन्दू मुस्लिम संबंध-2

hindu-muslimअनिल गुप्ता 

गुरुदेव रविंद्रनाथ टेगोर ने १९२४ में अपने लेखों में मुस्लिम मानसिकता के विषय में स्पष्ट लिखा कि,”उन्होंने कई मुसलमानों से पूछा कि यदि भारत पर कोई मुस्लिम ताकत हमला करती है तो क्या वो अपने पडोसी हिन्दू के साथ मिलकर अपने देश कि रक्षा करेंगे?उन्हें उत्तर मिला किसी भी परिस्थिति में कोई भी मुस्लिम किसी भी देश में रहता हो,इस्लाम धर्मावलम्बी के विरुद्ध उसका खड़ा होना असंभव है”हालाँकि हम सबने देखा है कि किस प्रकार इस्लामी देश ईरान और इराक आपस में लड़े.पश्चिम एशिया के अधिकांश देशों में आपस में टकराव हैं जबकि सभी देश मुस्लिम देश हैं.लेकिन भारत में मुस्लिम नेतृत्व अजीब प्रकार से हिन्दू विरोधी मानसिकता से ग्रस्त होकर प्रतिक्रियात्मक ढंग से व्यव्हार करता है.कहीं इसका कारण ये तो नहीं कि इस देश के ९९% मुस्लमान हिन्दुओं से मतांतरित हैं और स्वयं को हिन्दुओं से अलग दिखाने के उत्साह में उग्र हिन्दू विरोधी भावनाएं प्रगट करते हैं?उनके द्वारा लगातार हिन्दुओं को मुस्लमान बनाने के पर्यत्न आज भी जारी हैं.मोहम्मद अली कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और गांधीजी के परम प्रिय थे.लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से सात करोड़ हिन्दू दलितों को मुअलमान बनने का आह्वान किया था.
खिलाफत आन्दोलन के कारन मुसलमानों में धर्मान्धता का उत्साह बढ़ गया था और उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद कि हत्या करदी.पूरे देश ने इसकी निंदा की.लेकिन गांधीजी ने लिखा,”मैं भाई अब्दुल रशीद नामक मुस्लमान जिसने श्रद्धानंद की हत्या की है, का पक्ष लेकर कहना चाहता हूँ की इस हत्या का दोष हमारा है.अब्दुल रशीद जिस धर्मोन्माद से पीड़ित था,उसका उत्तरदायित्व हम लोगों पर है.
कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में १९२३ में परम्परानुसार वन्देमातरम प्रारंभ हुआ.राष्ट्रभक्त संगीतग्य श्री विष्णु दिगंबर पुलस्कर गा रहे थे.लेकिन अध्यक्ष के पद पर विराजमान मोहम्मद अली ने खड़े होकर विरोध करना शुरू कर दिया.लेकिन पुलस्कर जी गाते रहे.लेकिन बाद में कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित करके केवल शुरू के दो पदों को ही गाने का निर्णय ले डाला क्योंकि आगे के पदों के विषय में मुसलमानों द्वारा विरोध किया जा रहा था.कांग्रेस की ये घुटनेटेक नीति ही मुस्लिम साम्प्रदायिकता की आग में घी डालने का काम कर रही थी.
१९३३ में केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढने वाले एक मुस्लिम चौधरी रहमत अली ने मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान का प्रस्ताव रखा.
१९४७ तक हिंदुस्तान के टुकड़े करके मुसलमानों का अलग देश बनाने के लिए भारी उथल पुथल चलती रही.ऐसे में भी कांग्रेस के समाजवादी धड़े के चिन्तक अशोक मेहता और अच्युत पटवर्धन ये मान कर चल रहे थे की अंग्रेज के जाने के बाद सब ठीक हो जायेगा.और हिन्दुओं और मुसलमानों का आपसी विरोध समाप्त हो जायेगा.१९४२ में उनके द्वारा एक पुस्तक लिखी गयी ”द कम्युनल ट्राईएंगल इन इण्डिया”.जिसमे त्रिभुज की एक भुजा हिन्दू थी, दूसरी मुस्लिम और तीसरी ब्रिटिश.उनका कहना था की एक बार ब्रिटिश यहाँ से चला जायेगा तो शेष दो भुजाएं आपस में मिल जाएँगी और एक बन जाएँगी.इस बीच दुसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों को भारत की मदद की आवश्यकता थी.इसलिए उन्होंने खुलकर पाकिस्तान का मुद्दा नहीं छेड़ा.लेकिन विश्व युद्ध समाप्त होते ही उनका खेल चालू हो गया.भारत में अपनी योजना को पूरा करने के लिए नेहरु जी के मित्र और अन्तरंग माऊंटबेटन को भारत भेज दिया गया.
कांग्रेस का मुस्लिम साम्प्रदायिकता के आगे घुटने टेकने का क्रम जारी रहा.१९४६ में संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश)में कांग्रेस की सर्कार थी जिसके मुख्य मंत्री पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त जी थे.और गृह मंत्री रफ़ी अहमद किदवई थे.उनकी सर्कार के झूंसी के प्रशाशन ने दशहरे के जलूस को यह कहकर रोक दिया की मार्ग में कुछ मुसलमानों के घर पड़ते हैं जलूस से उनकी भावनाओं को आघात पहुंचेगा.यहाँ तक की विरोध करने पर संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी को भी गिरफ्तार कर लिया गया.२५ दिन तक भगवन राम की सवारी रुकी रही.बाद में पंडित मदन मोहन मालवीय जी द्वारा पन्त जी को पत्र लिखे जाने परउनकी रिहाई संभव हो पाई.१६ अगस्त १९४६ को मुस्लिम लीग ने सीढ़ी कार्यवाही की घोषणा कर डाली और पाकिस्तान बनाने की मांग को लेकर दस हज़ार से भी अधिक हिन्दुओं की हत्या कर दी गयी.हजारों महिलाओं के पतियों की हत्या करके उनके हत्यारों से ही जबरन उनका निकाह कर दिया गया.गांधीजी और कांग्रेसी नेताओं को कोई कष्ट नहीं हुआ लेकिन जैसे ही इसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने कुछ मुसलमानों को मार दिया तो गांधीजी भागे भागे वहां पहुंचे और जवाहरलाल नेहरु सहित सभी प्रमुख कांग्रेसी नेता वहां पहुँच कर हिन्दुओं की भर्त्सना करने में लग गए.इस बीच कलकत्ता,नोआखाली,लाहोर,मुल्तान तथा अन्य क्षेत्रों में हिन्दुओं के व्यापक नरसंहार के समाचार लगातार आते रहे लेकिन कांग्रेस के ये सेकुलर मुस्लिम परस्त नेता वहां जाने का साहस नहीं कर पाए और हिन्दुओं को अपने हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया गया.बिहार की कांग्रेसी सर्कार ने तो हिन्दुओं को दबाने के लिए उन पर विमानों से बम तक गिरवाये.
बहरहाल पाकिस्तान बनने के समय कांग्रेसी नेताओं की मुर्खता के कारण लाखों हिन्दू मारे गए.पहले तो गाँधी जी ने कहा की पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा.लेकिन जब जवाहरलाल नेहरु ने २ जून १९४७ को तीन घंटे लेडी माऊंटबेटन के साथ बिताकर पाकिस्तान बनाना स्वीकार कर लिया तो उन्हें सांप सूंघ गया और कह दिया की अब मुझमे जवाहर के विरुद्ध लड़ने की ताकत नहीं बची है.इस वक्त भी लोगों को गुमराह करने के लिए कह दिया की पाकिस्तान बनने का मतलब ये नहीं है की हिन्दू यहाँ आ जायेंगे और मुसलमान वहां चले जायेंगे.भोले भाले हिन्दू उन पर विश्वास करते थे अतः मान गए की कहीं नहीं जाना है.लेकिन मुस्लिम लीग के गुंडों द्वारा हिन्दुओं का सफाया करने, उनकी हत्याएं करने उनकी संपत्ति लूटने और उनकी बहु बेटियों को जबरन अपनी पाशविकता का शिकार बनाने के बाद हिन्दुओं का वहां रहना असम्भव हो गया.और उन्हें जान बचाकर अपने ही घरों से बेघर होकर भारत आना पड़ा.रस्ते में लाखों हिन्दू मारे गए.एक अनुमान के अनुसार लगभग तीस लाख हिन्दू मरे गए जबकि जस्टिस खोसला ने इस बारे में अपना अनुमान दस लाख का दिया था.दुनिया के इतिहास में इतना बड़ा नरसंहार नहीं हुआ था.ये किसी भी दशा में हिटलर के नाजियों द्वारा यहूदियों की हत्या से काम नहीं था.लेकिन कांग्रेसी सेकुलरिस्टों की मेहरबानी से इस बारे में विश्व जनमत अनभिग्य ही बना रहा.लगभग तीन करोड़ लोगों द्वारा विस्थापन झेलना पड़ा.
लेकिन इतना सब होने के बाद भी अंत नहीं हुआ.स्वतंत्रता के बाद जो कांग्रेस सर्कार बनी उसने मुस्लिम समाज को कभी देश की संस्कृति के साथ एकाकार नहीं होने दिया और उनमे अलगाव की भावना को बढ़ाने का हर सम्भव प्रयास किया.क्योंकि अंग्रेजों की डीवाईड एंड रूल की नीति के सच्चे अनुयायी नेहरूजी बने.
१८८३ में ब्रिटिश इतिहासकार सर जे.आर.सीली ने व्याख्यान माला में इस विषय को प्रस्तुत किया था की किस प्रकार अंग्रेजों ने भारत को जीता और किस प्रकार उससमय तक(१८८३ तक) वो भारत पर शाशन कर सके थे.उसने बताया की किस प्रकार मुट्ठी भर अंग्रेज भारतियों को एक दुसरे के विरुद्ध लड़ाकर उनपर अपना राज्य कायम कर पाए.नेहरु जी ने उसकी इस बात को पूरी तरह आत्मसात कर लिया और विभाजन की विभीषिका झेलने के बाद भी भारतीयों को एक नहीं होने दिया गया.मुसलमानों को हिन्दुओं का डर दिखा कर और हिन्दुओं की कुछ जातियों को दूसरी जातियों के विरुद्ध खड़ा करके अपनी सरकारें चलाते रहे.
देश में १९२५ में विदर्भ के एक प्रमुख कांग्रेसी डॉ.केशव राव बलिराम हेडगेवार ने भारतीयों को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया और हिन्दुओं को जाती बिरादरी से ऊपर उठकर एक सूत्र में संगठित होकर अपने समाज की कमजोरियों को दूर करने के लिए राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कीलेकिन नेहरूजी ने महात्मा गाँधी की हत्या की आड़ में संघ को प्रतिबंधित कर दिया और लाखों स्वयंसेवकों को जेलों में डाल दिया.लेकिन महीनों तक छान बीन करने के बाद भी कोई आरोप प्रमाणित न हो पाने पर संघ पर से प्रतिबन्ध हटाना पड़ा.
विभाजन के समय संघ के हजारों स्वयंसेवकों ने अपनी जान की परवाह न करके विस्थापित हिन्दुओं की सुरक्षा की और लाखों हिन्दुओं की जान बचायी.
विभाजन के बाद भी सेकुलर सरकारों ने मुस्लिम समाज को देश के साथ समरस होने नहीं दिया और केवल उनके वोट बेंक की खातिर अलगाव को बनाये रखा गया.आज़ादी के बाद देश में अब तक हजारों की संख्या में हिन्दू मुस्लिम और कभी कभी हिन्दू ईसाई झगडे हो चुके हैं.हालाँकि कल आजम खान ने कहा था की कांग्रेस के राज में अब तक पचास हजार दंगे हो चुके हैं.लेकिन छोटे-२ झगड़ों को छोड़ दें तो भी बड़े दंगों की संख्या हजारों में है.
आज स्थिति ये है की पिछले डेढ़ वर्ष के अखिलेश यादव के शाशन में उत्तर प्रदेश में ही सौ से अधिक दंगे हो चुके हैं.
एक बात तो सबको समझने होगी.हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को ही इस देश में रहना है.जीना यहाँ मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ?मुसलमानों को ये समझना और स्वीकार करना होगा की वो भी हिन्दू पूर्वजों की ही संतान है.अनेकों प्रमुख मुस्लिम नेताओं और बुद्धिजीवियों ने ये स्वीकार किया है की उनके पुरखे हिन्दू थे.पत्रकार एम् जे अकबर के दादा हिन्दू थे.संगीतकार ऐ आर रहमान तो बचपन में दलीप ही था.ऐसे अनगिनत उदहारण गिनाये जा सकते हैं.अगर सबकी रगों में एक ही खून है तो झगडा कैसा?
मुस्लमान अपने मजहबी मामलों को माने लेकिन दुनियावी मामलों में उन्हें हिन्दुओं के साथ एक जैसे कानूनों को मानने की मानसिकता बनानी होगी.अब इस्लामी पुनरुत्थान के ख्वाब देखना बंद करदें.भारत में भारतीय बनकर ही रहा जा सकता है.भारत की सभ्यता और संस्कृति का सम्मान करना सब का कर्तव्य है.जिन बातों से हिन्दुओं का दिल दुखे ऐसे कामों को करने से परहेज करना चाहिए.
एक प्रसंग का उल्लेख करके बात समाप्त करूँगा.१९८२ में मेरठ में शाह्घासा नमक स्थान पर एक मंदिर को लेकर हुए दंगे के दौरान पूर्व केन्द्रीय मंत्री जनरल शाहनवाज खान ने प्रधान मंत्री इंदिराजी को पत्र लिखा.इंदिरा जी ने जवाब दिया की आपस में शांति और सद्भाव कायम रखना दोनों की जिम्मेदारी है.और ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे दुसरे की भावनाओं को ठेस पहुंचे.उन्होंने लिखा की जब वो छोटी थीं उनके घर आनंद भवन में डॉ.महमूद आया करते थे और वो बताते थे की जब वो अरब में जाते हैं तो वहां उन्हें हिन्दू ही कहा जाता है.ऐसा ही प्रसंग दिल्ली के पूर्व शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी ने भी बताया था की उन्हें भी अरब में हिन्दू ही कहा गया.
केवल वोट के लालची छद्म सेकुलर दलों के जाल में न फंस कर जमाते-उलेमाए-हिन्द के राष्ट्रिय अध्यक्ष मौलाना सुएब कासमी साहब द्वारा कही गयी उपरोक्त बातों पर गंभीरता से विचार करें.अगर हिन्दू और मुस्लमान आपस में मिलकर रहेंगे तो दोनों का ही विकास होगा.और देश भी उन्नति करेगा.

1 thought on “हिन्दू मुस्लिम संबंध-2

  1. सिर्फ कुछ लोगो के अति महान बनने के प्रयास के परिणाम-स्वरूप जो लाखो लोगो के साथ हुए अति अमानवीय कृत्य को किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहाराया जा सकता . ये सभी तथा – कथित सेकुलर राजनितिज्ञ एवम समस्त सेकुलर राजनितिज्ञ दलो ने क्या कभी पाकिस्तान और बंगलादेश में हो रहे हिन्दुओ पर हो रहे अत्याचारों का विरोध अथवा खेद तक प्रकट करने का कष्ट किया है ?

    कदापि नहीं इनके लिए धर्मनिरपेक्ष होने का मतलब है , हर बात चाहे वो सही या गलत हो , उसमे मुस्लिम समुदाय का खुलकर अनुसरण करना . और स्थिति कितनी घातक है इसका जीता जागता प्रमाण है उत्तर-प्रदेश . माननीय अखिलेश यादव जी को ये लगता है , की एक समुदाय विशेष को खुश करके वो अपनी सरकार चला लेंगे और ठीक भी है क्योंकि मात्र एक खास समुदाय को अपनी बातो से बहला फुसला कर वो सिर्फ कुछ समय ही स्थापित हुई सरकार को तानाशाही अंदाज़ में चला भी रहे है वह भी इतने अल्पकाल में इतने भीषण एवं अनेको दंगे होने या करवाने के पश्चात् .

    और विकास की बात तो इस क्षेत्र में करना बेमानी हे बस दंगे करवाओ और उसमे एक समुदाय विशेष पर अति कृपया करो तो विकास की बात भी कुए में गयी और आपको धर्मनिरपेक्ष का तमगा मिला वो अलग .

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