हिंदूराष्ट्र स्वप्नद्रष्टा : बंदा वीर बैरागी


अध्याय —– 5

बंदा वीर बैरागी के जन्म काल की परिस्थितियां

आदि शंकराचार्य नित्य प्रति की भांति स्नान के लिए गंगा की ओर उस दिन भी जा रहे थे। रास्ते में एक चांडाल अपने चार कुत्तों के साथ उनका मार्ग घेरे हुए खड़ा था । उस चांडाल को देखते ही शंकराचार्य ने दूर से ही ऊंचे स्वर में उसे हटने का संकेत करते हुए कहा – – ” दूर हटो , दूर हटो । “
शंकराचार्य की इस बात को सुनकर भी चांडाल अपने स्थान से तनिक भी इधर-उधर नहीं हुआ । वह शंकराचार्य से उल्टा यह कहने लगा कि हे महात्मा ! आप वेदांत के सैकड़ों वाक्यों के द्वारा ब्रह्म और जीव की एकता के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं । एक ओर तो आप ऐसा कहते हैं कि एक ही ब्रह्म है , जो सबमें व्याप्त है । आकाश की तरह वह व्यापक और शांत है। दूसरी ओर आप उस अद्वीतीय ब्रह्म में भेद की कल्पना करते हैं । यह आश्चर्य की बात है। मैं पवित्र और अपवित्र हूँ। अतः दूर रहो । यह आपका मिथ्या आग्रह कैसा ? आप समस्त शरीरों में स्थित ब्रह्म की अवहेलना कर रहे हैं । क्या आप जैसे अद्वैत ज्ञानी के लिए इस प्रकार का आचरण करना या भेदभाव करना शोभनीय है ? – ऐसा कहकर वह चांडाल मौन हो गया ।
उसकी बातों ने आचार्य शंकर को अंदर तक झकझोर दिया था । शंकराचार्य कुछ देर के लिए अपलक उसे निहारते रहे । उन्हें अपनी गलती का आभास हो गया था । तब उन्होंने अपनी गलती को सुधारते हुए उस चांडाल से कहना आरंभ किया – ” आप वास्तव में आत्म ज्ञानी हैं । आपका कथन पूर्णतया सत्य है। “
इसके पश्चात आचार्य शंकर ने जिन श्लोकों से चांडाल की स्तुति की वे मनीष पंचक के नाम से प्रसिद्ध हैं । उसका भावार्थ इस प्रकार दिया गया है कि मैं ब्रह्म हूँ और समस्त जगत भी ब्रह्म रूप है , ऐसी जिसकी दृढ़ मान्यता है , वह चांडाल हो या कोई और वह मेरा गुरु है। कथा के अनुसार चांडाल के भेष में भगवान शंकर ही उपस्थित थे और वह आचार्य शंकर के ब्रह्म ज्ञान की परीक्षा ले रहे थे ।
भारत की महानता का राज ही यह है कि यहां पर प्रत्येक महान से महान व्यक्तित्व को भी समय आने पर परीक्षाओं के दौर से निकलना पड़ा है , और जो परीक्षाओं में सफल हो गया , उत्तीर्ण हो गया , वही मुकद्दर का सिकंदर कहलाया है । इसका अभिप्राय यह है कि हमारे यहां पर ज्ञान की परीक्षा होती है , क्योंकि ज्ञान को ओढ लेना एक अलग चीज है , परन्तु ज्ञान को अंगीकृत कर लेना , हृदयंगम कर लेना और अपने आचरण में उतार लेना सर्वथा विपरीत बात है । ज्ञानी वह नहीं है जिसने ज्ञान को ओढ़ रखा है , अपितु ज्ञानी वह है ,जिसने ज्ञान को अपने आचरण में उतार लिया है । मनसा , वाचा ,कर्मणा सारे भेद मिटा दिये और इन तीनों में समन्वय स्थापित कर उनके समरूप हो गया है।

ज्ञान जिसके पास हो बुद्धि करें उपयोग ।
राष्ट्रचेता होता वह नमन करें सब लोग ।।

भारत ने बड़ा उसी को माना है जिसने अपने ज्ञान को अपने आचरण में उतार लिया हो । जिसने ज्ञान को केवल बाहर से ओढा है उसे हृदयंगम नहीं किया , उसे अपनी आत्मस्वीकृति प्रदान नहीं की और आचरण में उतार कर उसके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त नहीं की , वह चाहे कोई भी हो , उसे भारत ने महान नहीं माना । ढोंग , पाखंड , अज्ञान , मिथ्याचरण आदि को भारत ने सिरे से नकारा है। वास्तव में ओढा हुआ ज्ञान हमारे पतन का कारण बनता है , हमारे विनाश का कारण बनता है , जबकि आचरण में उतारा हुआ ज्ञान हमारे उत्थान और विकास का कारण बनता है।
महापुरुष ज्ञान को ओढ़ते नहीं है ,अपितु वह ज्ञान को अपने आचरण में उतारते हैं । ‘ सदा सत्य बोलो ‘- ये शब्द गुरु द्रोणाचार्य के सभी शिष्यों ने पढ़े थे और अगले दिन ही जाकर गुरु जी को सुना दिया था कि पहले दिन का पाठ उन्हें याद हो गया है । केवल एक युधिष्ठिर ऐसे थे जो न केवल अगले दिन अपितु और भी कई अगले दिनों तक यही कहते रहे कि मुझे अभी पाठ याद नहीं हुआ । गुरुजी ने चिल्लाकर कहा – युधिष्ठिर ! तुम मूर्ख हो । सभी बच्चे पहले दिन ही पाठ याद कर आए । क्या कारण है कि तुम्हें यह पाठ याद नहीं हो रहा ? तब निष्कपट युधिष्ठिर ने बड़े निश्छल भाव से कहा – गुरुजी ! मैं बीते हुए दिनों में प्रयास करने के उपरांत भी सदा सत्य नहीं बोल पाया । इसलिए मैं कैसे कह दूं कि मैंने पाठ याद कर लिया है ।
गुरुजी को आभास हो गया कि तेरे सारे शिष्यों में से सबसे योग्य कोई शिष्य है तो वह युधिष्ठिर ही है , जो ज्ञान को ओढ़ता नहीं है , अपितु उसे हृदयंगम करता है , अपने आचरण में उतारता है । तब से युधिष्ठिर गुरुजी के विशेष कृपा के पात्र हो गए।

कष्टों की भट्टी पड़ै, सह ले ताप – संताप ।
महापुरुष होता वही हट जाते सब पाप ।।

सोने को आभूषण बनने के लिए पहले तपना पड़ता है , और तपना ही नहीं पड़ता अपितु उसे भट्टी में से बाहर निकल कर स्वर्णकार के हाथों से अनेकों चोटें भी झेलनी पड़ती हैं । इसी प्रकार मंदिर में जाकर पूजा के लिए रखी जाने वाली मूर्ति को भी मूर्तिकार की छैनी की हजारों चोटों का सामना करना पड़ता है । हीरे को मूल्यवान बनने के लिए किसी खान में हजारों लाखों वर्ष दबे रहना पड़ता है । यह सारे उदाहरण बताते हैं कि पहले साधना की भट्टी में पड़े रहकर और फिर साधना की भट्टी के बाहर आकर भी अपने शिल्पकार की अनेकों चोटों को खाकर ही कोई बड़ा बनता है , कोई महान बनता है , महापुरुष बनता है , इतिहास पुरुष बनता है ,इतिहास नायक बनता है।
हमारे चरितनायक बंदा वीर बैरागी का जीवन ऐसी ही अनेकों परीक्षाओं से बना जीवन है । उन्होंने भट्टी में पड़े रहना भी स्वीकार किया और भट्टी के बाहर आकर अनेकों चोटे खाना भी स्वीकार किया । उन्होंने हीरा बनने के लिए धरती में दबे रहना भी स्वीकार किया , और मां भारती के पावन मंदिर की मूर्ति बनने के लिए शिल्पकार की अनेकों चोटे खाना भी सहर्ष स्वीकार किया। वह गुरु गोविंदसिंह के सामने खड़े हुए तो श्रद्धा से नतमस्तक होकर गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करने से तनिक भी नहीं चूके । उस श्रद्धा भक्ति में उन्होंने यह स्पष्ट आभास कराया कि मैं कुछ भी नहीं हूं । इसी प्रकार जब वह अपने अनुयायियों , भक्तों या मानने वालों के बीच खड़े हुए तो उनके बीच में रहकर भी उन्होंने कभी यह एहसास नहीं कराया कि मैं तुमसे अलग हूँ या तुमसे बड़ा हूं । उनके बीच रहकर भी उन्होंने समानता का प्रदर्शन किया और ऐसा अहंकार शून्य व्यक्तित्व प्रस्तुत करने में वह सफल रहे कि वह और जनसाधारण सब समान हैं और मां भारती के लिए काम करने वाले एक जैसे योद्धा हैं ।
मां भारती के इस पुजारी का जन्म सन 1670 में पुंछ की पहाड़ी रियासत के राजोर गांव में एक राजपूत परिवार में हुआ था । उस समय दिल्ली का शासक मुगल बादशाह औरंगजेब था । जिसके अत्याचारों और धर्मांधता की नीतियों से पूरा हिंदुस्तान आतंकित था । उस क्रूर बादशाह के शासनकाल में हिंदुओं का रहना दूभर हो गया था । पंजाब के गुरुओं पर उसके द्वारा जिस प्रकार के अत्याचार किए गए उनके रक्तिम दागों से इतिहास के पन्ने आज तक रचे – रंगे पड़े हैं । इस रक्तपिपासु बादशाह के शासनकाल में अनेकों हिंदू मंदिरों का विध्वंस कर दिया गया था । साथ ही नित्य प्रति कितने ही निरपराध हिंदुओं के चोटी व जनेऊ उतारकर उन्हें बलात मुस्लिम बनाए जाने की प्रक्रिया चल रही थी ।
औरंगजेब के इस प्रकार के अत्याचारों से गुरु गोविंद सिंह और उनके पिता गुरु तेगबहादुर व उनके अन्य अनेक क्रांतिकारी साथी जूझ रहे थे । लोग सहर्ष अपना बलिदान दे रहे थे । कुल मिलाकर हिंदू पर हो रहे अत्याचारों के उस काल में सर्वत्र एक चुनौती व्याप्त थी , जो किसी अन्य महापुरुष के आगमन का आवाहन कर रही थी । सर्वत्र क्रांति की एक पुकार थी और सर्वत्र एक ललकार व्याप्त थी। गुरु तेग बहादुरजी अपना बलिदान दे चुके थे । इसी प्रकार गुरु गोविंदसिंह जी भी अपने दो बेटों का बलिदान दे चुके थे। जिससे परिस्थितियां और भी अधिक चुनौतीपूर्ण हो चुकी थीं ।

आवाहन सब ओर था फैली थी ललकार।
नई भोर की खोज में उत्सुक थे नर नार ।।

तभी प्रकृति ने सर्वत्र व्याप्त इस चुनौती का उत्तर देते हुए 1670 में हमारे इस चरितनायक को हमारे मध्य भेजा । मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल में गुरु गोविंदसिंह औरंगजेब से अपने आप को स्वतंत्र करने की घोषणा कर चुके थे । यह घटना1655 ई0 की है । फलस्वरूप औरंगजेब उनसे और भी अधिक क्रोधित रहने लगा था। सन् 1658 में जब औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को जेल में डाल कर स्वयं गद्दी प्राप्त की तो उसके बाद उसका गुरु गोविंदसिंह के प्रति दृष्टिकोण और भी अधिक कठोर हो गया।
बालक लक्ष्मण देव बचपन से ही विशेष प्रतिभा का धनी था । उसने अपने बचपन में सेनापतित्व करना सीख लिया था । साथ ही तीरंदाजी में भी उसने बहुत कौशल प्राप्त कर लिया । वह पूरा घुड़सवार बन चुका था , जबकि तीरंदाजी में उसका कोई सामना करने वाला नहीं था । उसका निशाना कभी चूकता नहीं था। बालक लक्ष्मण देव के भीतर दीखने वाली यह प्रतिभा बचपन में ही उसका भविष्य बता रही थी । उसे देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि यह बच्चा बड़ा होकर निश्चय ही देश , समाज और राष्ट्र के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगा । क्योंकि मुगल बादशाहत के समय में ऐसा तीरंदाज और ऐसा घुड़सवार मिलना बड़ा कठिन था । निश्चय ही मां भारती की नियति उसे अपने लिए तैयार कर रही थी।
अपने भारत देश में समय आने पर देश व धर्म के लिए बलिदान होने की परंपरा का कारण यदि हम खोजें तो हमारे वैदिक वांग्मय में ऐसे अनेकों प्रसंग मिल जाएंगे जो देश व धर्म पर बलिदान होने के लिए हमें उत्साहित करने वाले होंगे । महाभारत में भी ( अ0145 पृष्ठ 6007 पर ) श्री महेश्वर उमा से कहते हैं कि अब समर्थ शरीर वाले पुरुष के साथ बलिदान की तात्विक विधि बताता हूं । सुनो ! क्षत्रिय के लिए दीन- दुखियों की रक्षा और प्रजापालन के निमित्त प्राण – त्याग अभीष्ट बताया गया है । योद्धा अपने स्वामी के अन्न का बदला चुकाने के लिए , ब्रह्मचारी गुरु के हित के लिए तथा सब लोग गौवों और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए अपने प्राणों को निछावर करता है , यह शास्त्र का विधान है।”
उसी पृष्ठ पर महाभारत में ही यह भी स्पष्ट लिखा है कि – ” स्वराज्य की रक्षा के लिए अथवा दुष्ट शासकों द्वारा पीड़ित हुई प्रजा को कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए नियम पूर्वक युद्ध के मार्ग पर चलकर प्राणों का परित्याग करें । “
इसका अभिप्राय है कि स्वराज्य की रक्षा के लिए और दुष्ट शासकों द्वारा पीड़ित हुई प्रजा को उसके कष्टों से मुक्ति दिलाना हमारे धर्म का एक अनिवार्य अंग है । अतः जब गुरु तेग बहादुर या गुरु गोविंदसिंह जी मुगल बादशाहों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर रहे थे या उनके अत्याचारों का सामना करने के लिए स्वयं को प्रस्तुत कर रहे थे तो समझना चाहिए कि वह धर्म का ही पालन कर रहे थे । दुष्ट शासक से प्रजा की रक्षा करना हमारे धर्म का एक अनिवार्य अंग है । यही हमारा राष्ट्र धर्म है और यही हमारा राजधर्म है।
इसी राजधर्म पर प्रकाश डालते हुए महाभारतकार आगे लिखता है :— ” आगे कहा गया है कि जो भृत्य स्वामी के अन्न का बदला देने के लिए उनका कार्य उपस्थित होने पर अपने प्राणों का मोह छोड़कर उनकी सहायता करता है और स्वामी के लिए प्राण त्याग देता है वह पुण्य लोकों में जाता है । “
जैसे किसी शराबी के घर का परिवेश उसके बच्चों को और उसके घर आने जाने वालों तक को प्रभावित करता है , वैसे ही किसी समाज व राष्ट्र का परिवेश भी वहां आने – जाने वालों को प्रभावित करता है , उसमें जन्म लेने वाले बच्चों को प्रभावित करता है।
हमारा राष्ट्रीय संस्कार यदि धर्म व जाति के लिए बलिदान हो जाना है या स्वराज्य की रक्षा करते – करते अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देना है तो यह स्वाभाविक है कि यहां जन्म लेने वाला हर बच्चा देशभक्ति से ओतप्रोत होगा । लक्ष्मण देव इस सिद्धांत के अपवाद नहीं हो सकते थे । जब वह घुड़सवारी और तीरंदाजी सीख रहे थे तो उसका अभिप्राय देश व धर्म की रक्षा करना भी था। यह बहुत संभव है कि उस बच्चे को उस समय यह ज्ञात न हो कि तुझे एक दिन मुगलों से युद्ध करना है , परंतु इतना तो निश्चित है कि जब वह घुड़सवारी और तीरंदाजी सीख रहा था तो यह केवल शौक के लिए नहीं सीख रहा था , अपील उसे यह भी ज्ञात था कि भविष्य में पता नहीं कौन सा बड़ा दायित्व लेना पड़ जाए या किस प्रकार कोई ऐसा दायित्व निर्वाह करना पड़ जाए जिससे देश व धर्म का भला हो सकता है ? संसार भर के जितने भी महापुरुष हुए हैं , उनके बचपन में कुछ ऐसे ही विशिष्ट लक्षण दिखाई दे जाते हैं कि उन्हें जो काम बहुत बाद में जाकर करना चाहिए थे , उन्हें वह बचपन में सीख लेते हैं और फिर बचपन में सीखा गया उनका वह कर्म – कौशल उन्हें भविष्य में बड़ा लाभप्रद होता है।

देश धर्म सबसे बड़ा कहते वेद और शास्त्र ।
एक हाथ में शस्त्र हो रक्षित हो तब शास्त्र ।।

इसीलिए बचपन को शेष जीवन की नींव कहा जाता है । नींव जितनी सुदृढ़ रखी जाती है , भवन उतना ही स्थिर और सुंदर बन पाता है । यदि नींव कमजोर है तो भवन की मजबूती सदा संशय उत्पन्न करने वाली रहती है , संदेह के घेरे में रहती है । महापुरुष वही बनता है जो अपने बचपन की नींव को मजबूत कर लेता है या कहिए कि जिनकी बचपन की नींव मजबूत होती है , वही आगे चलकर अपने जीवन में महान कार्य कर पाते हैं। बालक लक्ष्मण देव को परिस्थितियां निर्मित करती जा रही थीं या वह स्वयं परिस्थितियों को निर्मित करता जा रहा था ? यदि इस प्रश्न पर चिंतन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि बालक लक्ष्मण देव अपने लिए स्वयं परिस्थितियां निर्मित करता जा रहा था । यदि वह घुड़सवारी और तीरंदाजी न सीखता और उसकी घुड़सवारी और तीरंदाजी की चर्चा उस समय गुरु गोविंद सिंह जी तक न पहुंच पाती तो गुरु गोविंद सिंह उसे कभी भी देश व धर्म का काम करने के लिए उसकी तपस्या भंग करा कर लाने की सोचते तक भी नहीं।
बालक लक्ष्मण देव ने अपने कर्म कौशल को उसकी पराकाष्ठा तक पहुंचाया । जिससे उसका यश फैला। परिणामस्वरूप उसी यश की चर्चा गुरुजी तक पहुंची और गुरुजी को जब उपयुक्त समय अनुभव हुआ तो इस शेर पुत्र को वह देश व धर्म की रक्षा के लिए एक उचित पात्र समझकर उसकी तपस्या के बीच से उठा लाए।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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