Home साहित्‍य कविता आशा है नव साल की, सुखद बने पहचान ।।

आशा है नव साल की, सुखद बने पहचान ।।

खिली-खिली हो जिंदगी, महक उठे अरमान ।

आशा है नव साल की, सुखद बने पहचान ।।

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दर्द दुखों का अंत हो, विपदाएं हो दूर ।

कोई भी न हो कहीं, रोने को मजबूर ।।

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छेड़ रही है प्यार की, मीठी-मीठी तान ।

नए साल के पँख पर, खुशबू भरे उड़ान ।।

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बीत गया ये साल तो, देकर सुख-दुःख मीत ।

क्या पता? क्या है बुना ? नई भोर ने गीत ।।

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माफ़ करे सब गलतियां, होकर मन के मीत ।

मिटे सभी की वेदना, जुड़े प्यार की रीत ।।

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जो खोया वो सोचकर, होना नहीं उदास ।

जब तक साँसे हैं मिली, रख खुशियों की आस ।।

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पिंजड़े के पंछी उड़े, करते हम बस शोक ।

जाने वाला जायेगा, कौन सके है रोक ।।

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पथ के शूलों से डरे, यदि राही के पाँव ।

कैसे पहुंचेगा भला, वह प्रियतम के गाँव ।।

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रुको नहीं चलते रहो, जीवन है संघर्ष ।

नीलकंठ होकर जियो, विष तुम पियो सहर्ष ।।

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दुःख से मत भयभीत हो, रोने की क्या बात ।

सदा रात के बाद ही, हँसता नया प्रभात ।।

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चमकेगा सूरज अभी, भागेगा अँधियार ।

चलने से कटता सफ़र, चलना जीवन सार ।।

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काँटें बदले फूल में, महकेंगें घर-द्वार ।

तपकर दुःख की आग में, हमको मिले निखार ।।

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