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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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रतन मणि लाल

दुनिया भर में ऊर्जा के मोर्चे पर आज अनिश्चय बरकरार है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में दुनिया भर में तेल का उत्पादन नई ऊंचाई पर पहुंचेगा, स्थिर होगा और आखिरकार निचले स्तर को छुएगा। ऐसी स्थिति में तेल की कीमतें 500 डॉलर प्रति बैरल को भी पार कर जाएंगी और इसी हिसाब से कोयले और प्राकृतिक गैस की कीमतें 3 गुना हो जाएंगी। बिजली बनाने के लिए फिर इनका इस्तेमाल इतना सस्ता नही रह जाएगा। एक ओर विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से नाभिकीय ऊर्जा का विकल्प अनिवार्य है पर दूसरी ओर आलोचक मानते हैं कि नाभिकीय ऊर्जा भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का कुछ हिस्सा ही मुहैया कर सकेगी।

भारत के भविष्य के लिए आखिर नाभिकीय ऊर्जा कितनी महत्वपूर्ण है? किसी के पास इसका निश्चित जवाब नही है। इसके बावजूद ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से नाभिकीय ऊर्जा का विकल्प अनिवार्य है। लेकिन उत्तरी जापान में फुकुशिमा-दाइची कॉम्प्लेक्स में नाभिकीय दुर्घटना से लोगों की चिंता समझी जा सकती है। ये दुनिया के विशालतम रिएक्टरों में शामिल हैं जिनका निर्माण कठोर सुरक्षा मानकों के आधार पर किया गया है। भीषण भूकंप अैर भयंकर सुनामी के अभूतपूर्व संयोग से घटी यह त्रासदपूर्ण घटना स्मरण कराती है कि कोई भी तंत्र अचूक नही है और इसमें कुछ दुर्घटनाओं की आशंका बनी रह सकती है।

लेकिन कहा जाता है कि जिस तरह टाइटैनिक जैसे जहाज के डूबने पर भी सामुद्रिक गतिविधियां नहीं रुकी थीं, उसी तरह इस दुर्घटना के बाद भी नाभिकीय ऊर्जा के भविष्य पर किसी तरह का सवालिया निशान नहीं लगेगा। इसके परिणामस्वरूप नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों के लिए मानक जरूर और कड़े किए जाएंगे। जापान के पास प्राकृतिक ऊर्जा के स्त्रोत बहुत सीमित हैं और ऐसे में वह नाभिकीय ऊर्जा के विकल्प को नकार नहीं सकता। भारत के पास कोयला और जल विद्युत के स्त्रोत हैं लेकिन आने वाले वर्षों में विकास की गति बरकरार रखने के लिए उसे भी नाभिकीय ऊर्जा की आवश्यकता पड़ेगी। ऐसे में जापान पर आई आपदा से भारतीय नाभिकीय ऊर्जा उद्योग को अवश्य ही कोई सबक सीखना चाहिए। आज वैश्विक स्तर पर और भारत में भी एक नाभिकीय पुनर्जागरण चल रहा है। साथ ही जापान की नाभिकीय दुर्घटना के बाद भारत में नाभिकीय ऊर्जा के विरोध में स्वर भी मुखर हो रहे हैं। वैसे भी नयूक्लियर संशयवाद भारत में कोई नया नहीं है।

भारत के रिएक्टर भूकंप के लिहाज से कम गतिविधि वाले क्षेत्र (लो सीस्मिकजोन) के 2 से 3 के दायरे में स्थित हैं और भूकंप प्रतिरोध को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। नरोरा रिएक्टर 4 के दायरे में आने के बावजूद पैमाने पर 6.4 की तीव्रता वाला भूकंप झेल चुका है, इसी तरह भुज में आए 6.9 की तीव्रता वाले भूकंप के बावजूद गुजरात का काकरापार संयंत्र सामान्य ढंग से काम कर रहा है।

दुनिया में नाभिकीय ऊर्जा की आर्थिक व्यवहार्यता को साबित करने की जरूरत नहीं है। भले ही नाभिकीय ऊर्जा प्लांट लगाने की लागत काफी ज्यादा हो, इसके परिचालन की लागत कम रहेगी। नाभिकीय ऊर्जा से अपनी एक तिहाई ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने वाले फ्रांस ने साबित कर दिया है कि एक बार यदि उत्पादन को मानक स्तर पर ला दिया जाए और संयंत्रों को समयबद्घ तरीके से बनाया जाए, तो नाभिकीय ऊर्जा प्रतिस्पर्धी हो सकती है।

जाहिर तौर पर कोयला ऊर्जा का सबसे सस्ता साधन है, लेकिन कोयले से निकलने वाली ऊर्जा बड़े पैमाने पर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती है जिस वजह से आने वाले दशकों में इसमें कटौती करनी ही होगी। कोयला आधारित और जल विद्युत परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय कीमत अदा करनी ही पड़ती है। कोयला जहां कार्बन उत्सर्जन में वृद्घि करता है वहीं जल विद्युत परियोजनाएं रहवासियों को विस्थापित करने पर विवश करती हैं। विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कोयले के भंडार अगले चार दशकों से ज्यादा नही टिकने वाले।

ऊर्जा पर 2006 में बनाई गई एक विशेषज्ञ समिति ने अनुमान लगाया था कि 2031-32 में आज के 1,44,000 मेगावाट की तुलना में भारत की ऊर्जा आवश्यकता 9,60,000 मेगावाट होगी। इसमें जीडीपी की वृद्घि दर को 9 फीसदी मान कर चला गया था यदि भारत वास्तव में इतनी तेजी से विकास करता है, तो 2030 में भारत की कोयला, पनबिजली और अपारंपरिक ऊर्जा स्त्रोतों से सिर्फ अधिकतम 75 फीसदी आवश्यकताओं की ही पूर्ति हो सकेगी।

भारत में परमाणु ऊर्जा विभाग तीन चरणों में नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम चला रहा है। पहले चरण में दाबित गुरुजल रिएक्टरों (पीएचडब्ल्यूआर) और उनसे जुड़े ईंधन चक्र के लिए विधा को स्थापित किया जाना है। ऐसे रिएक्टरों में प्राकृतिक यूरेनियम को ईंधन के रुप में, गुरुजल को मॉडरेटर एवं कूलेंट के रुप में प्रयोग किया जाता है। दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर बनाने का प्रावधान है, जिनके साथ पुन: प्रसंस्करण संयंत्र और प्लूटोनियम-आधारित ईंधन संविचरण संयंत्र भी होगें। प्लूटोनियम को यूरेनियम 238 के विखंडन से प्राप्त किया जाता है। तीसरा चरण थोरियम 233 चक्र पर आधारित है। यूरेनियम-233 को थोरियम के विकिरण से हासिल किया जाता है।

One Response to “कितनी महत्वपूर्ण है नाभिकीय ऊर्जा”

  1. sunil patel

    नाभिकीय उर्जा का दौर चला गया है. ठीक है की आज इस उर्जा के बहुत जरुरत है, किन्तु विज्ञानं की नित नै खोज के साथ उर्जा के ने स्त्रोत आते रहेंगे. हम नाभिकीय उर्जा प्लांट लगा कर उरेनियम के लिया विदेशो के सामने भीक magenge.

    २० साल पहले तक बल्ब जलते थे. आज CFL है. कल कोई ने प्रयोग आयेंगे जो न सिर्फ सस्ते होंगे बल्कि विनाश रहित होंगे.

    सौर उर्जा, पवन उर्जा, जल उर्जा – अनगिनत स्त्रोत है. क्यों उनका समुचित दोहन नहीं करते है. स्कूल की प्रदर्शिनियो में कई बार ग्रामीण इलाको से भी छात्र इतने अछे project बनाते है. जरुरत है मौका देने की.

    एक कोयला बिजली प्लांट या बाँध पर जितना खर्च किया जाता है उतना सरकार अगर सौर उर्जा उद्योग पर खर्च कर दे तो घर घर में सौर panel बन्ने लगेंगे. सौर उर्जा घरुलू उद्योग की शक्ल ले लेगी. जब मांग बढ़ेगी तो ज्यादा लोग उत्पादन करेंगे, झ्यादा उत्पादन होगा तो कीमत घटेगी. पेनिस्सिलिने का उद्धरण लिया जा जकता है तो इतनी कीमती और महेंगी thi की मरीज के मूत्र से वापस निकल ली जाती thi, किन्तु आज हर मेडिकल स्टोर पर मिलती है.

    विज्ञानं का दौर है, हो सकता है कल ने प्रयोगों से बिजली मोबाइल की सिम पर उनित में १०, २०, ५०, १००, १००० के recharge में मिलने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाइये.

    हम नाभिकीय उर्जा का विरोध नहीं कर रहे है. विरोध उस कीमत का है तो अमेरिका को खुश करने के लिया किया जा रहा है. जैसे पुल्सर मोटर साइकिल की कीमत पर लेम्ब्रेटा स्कूटर खरीदना. अगर ऐसा ही है तो अमेरिका क्यों नवादा prant में दुनिया का सबसे बड़ा सौर संयंत्र अलगाता. क्यों २००७ से खाद्य की कमी आइ. क्योंकि अमेरिका सहित विकसित देश खाद्यान का उपयोग एथनोल के dwara उर्जा उत्पादन के लिए किया.

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