प्राकृतिक आपदाओं को रोका जाना कैसे संभव?

अरब सागर से उठे तोक्ते तूफान के बाद बंगाल की खाड़ी में आए यास नामक चक्रवात ने देश को बड़ी आर्थिक क्षति पहुंचाई है, जिसकी भरपाई कर पाने में शायद कई वर्ष लग जाएंगे। यह जग जाहिर है कि बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों का आना कोई नई बात नहीं है, क्योंकि इससे पहले 1970 में आए भोला तूफान को आज बुजुर्ग याद करते हैं। भोला चक्रवात के चलते 5 लाख से भी अधिक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। वहीं, 1991 में आए गोर्की चक्रवात का कहर भी लोगों के मन और मस्तिष्क में बसा है। जिसके चलते लगभग डेढ़ लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। ऐसे और भी बहुत सारे चक्रवातों के उदाहरण मिल जाएंगे, जिन्होंने अपना कहर बरपाकर कई लोगों को काल के गाल में समा जाने को मजबूर कर दिया।

देश में हर साल एक नई प्राकृतिक या अन्य तरह की विपदा किसी-न-किसी रूप में मुँह बाए खड़ी मिलती हैं | यह विपदा बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प, चक्रवात या फिर सुनामी के रूप में आन दस्तक देती है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान इन आपदाओं के द्वारा दिए जख्म हम आज तक भूले नहीं हैं। चाहे यह जख्म अगस्त 2015 मणिकरण में हुए भूस्खलन का हो, 2013 में उत्तराखंड में आई त्रासदी का, पिछले वर्ष आए अम्फान का या फिर पूर्वी तट पर टकराते चक्रवातों का जो हुदहुद और फैलिन नाम से दहशत मचा कर चले गए।

इन आपदाओं के चलते देश को भारी जान-माल की क्षति भी हुई। जबकि अब समूची आधुनिक मनोवैज्ञानिक सभ्यता पर कोराना अपना कहर जमकर बरपा रहा है। यह समूचे विश्व के लिए बहुत बड़ा नासूर बन चुका है। वहीं, भारत में रही-सही कसर बंगाल की खाड़ी में आए यास चक्रवात और अरब सागर से उठे तोक्ते तूफान ने पूरी कर दी। ऐसे में यह सवाल मौजूं है कि आखिर ऐसी विपदाओं के आने की पीछे की वजह क्या है? आखिर क्यों उठते हैं यास और तौक्ते जैसे खतरनाक तूफान? जैसा कि वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला हैं कि तूफानों के उठने के पीछे का मुख्य कारण समुद्री जल का गरम होना है। ज्यों ही समुद्री जल गरम होता जाएगा, त्योंही समुद्र से उठने वाले तूफानों की भयावहता बढ़ती जाएगी। हम सब यह बखूबी जानते हैं कि समुद्र का तापमान क्यों बढ़ रहा है? इसके पीछे की वजह साफ है पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैंसों का बढ़ना। ऐसे में, अब दरकार इस बात की है कि हमें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियमित रूप से कम करना होगा। लेकिन, जब भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने का सवाल उठता है तो इस मसले पर होने वाले वैश्विक सम्मेलनों में इसका ठीकरा विकासशील देशों पर फोड़ दिया जाता है और सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जित करने वाले अमीर और विकसित देश अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं | सवाल उठता है कि कार्बन उत्सर्जन के मुद्दे पर विकसित और अमीर देशों के मौजूदा रूख के बने रहते क्या हम इससे पैदा होने वाली स्थिति में किसी सुधार की उम्मीद कर सकते हैं? इसके बावजूद इस मसले पर वैश्विक स्तर पर चिंता जताने और हालात में सुधार होने की उम्मीद में कमी नहीं होती है। अगर हम ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को स्थायी रूप से कम करते जाने की पुख्ता व्यवस्था कर लेते हैं तो यह बहुत हद तक संभव है कि हम भविष्य में ऐसी आने वाली विपदाओं से बच सकते हैं।

यह वैज्ञानिक उपलब्धियों का शुक्र है कि इस बार अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में आए चक्रवात की पूर्व चेतावनी ने लोगों को सुरक्षित इलाकों में जाने का अवसर दे दिया। इससे जनक्षति कम से कम हुई है। वहीं, कुछ साल पहले ऐसे चक्रवातों के आने की पूर्व सूचना के अभाव में लाखों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता था। हालांकि, इस बार तोक्ते और यास ने कोई कम तांडव नहीं मचाया है, भले ही इस चक्रवात से कम जनक्षति हुई हो, पर तांडव की भयावहता बिलकुल भी कम नहीं थी। इसकी भयावहता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि आम लोगों के तबाह होते आशियानों, धड़ाम से गिरते पेडों या टूटते बिजली के खंभों, हवाई रूप लेते छप्परों और बैनरों से तबाही का भयावह मंजर साफ देखा गया। यह कहा जा सकता है कि तोक्ते और यास नामक चक्रवातों ने जनक्षति को छोड़कर हूदहूद, भोला, गोर्की जैसे चक्रवातों की तरह ही तबाही मचाई है।

ऐसे चक्रवात के बाद लोगों के प्रति संवेदनाओं का उमड़ना एक अलग बात है। लेकिन, ऐसी स्थिति में उनका स्थायी समाधान ढूंढा जाना एक अलग चीज है। पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि पूर्वी तट पर हर दो-तीन वर्ष में एक बड़े तूफान के टकराने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि गरीबों और जरूरतमंदों को पक्के आवास में निवास करवाया जाये। चूंकि, हरेक चक्रवात के चलते उन्हें छप्पर, झोपड़-पट्टी जैसे अस्थाई आवास के कारण से विस्थापन का दंश झेलना पड़ता हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि केन्द्र व राज्य सरकार उनके लिए स्थायी एवं पक्के आवास बनाये जाने की पहल करे। ताकि, वे आगे से आने वाली किसी भी अप्रत्याशित संकट से विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर न होने पाए। सरकार चाहे तो समुद्र तट से 100 से 200 किलोमीटर के बीच किसी भी प्रकार का कच्चा घर व भवन खड़ा न होने दे। इससे यह होगा कि चक्रवात के चलते कच्चे मकानों में दबकर मरने वालों की संख्या में जरूर कमी आएगी और बड़ी आबादी को विस्थापित भी नहीं करना पड़ेगा। भविष्य में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं को झेलने की तैयारियां पहले से ही पुख्ता होनी चाहिए।

भारत में आपदा जोखिम की बात करें, तो यहां अलग-अलग तीव्रता वाली एक नहीं बल्कि अनेक प्राकृतिक और मानव जन्य आपदाएं आती रहती हैं। भारत में लगभग 58.6 फीसदी भू-भाग सामान्य से लेकर बहुत अधिक तीव्रता वाला भूकम्प संभावित क्षेत्र है। 40 मिलियन हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र यानी कुल भूमि का 12 फीसदी बाढ़ और नदी अपरदन संभावित है। इसके अलावा 68 फीसदी कृषि योग्य क्षेत्र सूखा संभावित है। वहीं, भारत में सदा पहाड़ी क्षेत्रों में भू-स्खलन और हिम-स्खलन का जोखिम बना रहता है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में 1980 से 2010 के बीच में समुचित आपदाओं में सूखा 7 बार, भूकम्प 16 बार, महामारी 56 बार, अत्यधिक गर्मी 38 बार, बाढ़ 184 बार, कीट संक्रमण 1 बार, बड़े पैमाने पर सूखा 34 बार, तूफान 92 बार, ज्वालामुखी 2 बार आ चुके हैं। इन सब के चलते प्रगति की दौड़ में किए गए कार्य धराशाई हो जाते हैं। आमजन प्रभावित होने के साथ-साथ बहुत बड़े स्तर पर आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसके चलते मानव जीवन को तहस-नहस करके रख दिया जाता है।

ऐसे में प्राकृतिक आपदाओं को रोकने के कारगर उपाय क्या हो? बता दें, प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह से रोका जाना संभव नहीं हैं। हां, प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुक़सान को कम जरूर किया जा सकता है।‌ इसके लिए
यह महत्त्वपूर्ण है कि बांध, सड़कों, पुलों, फ्लाईओवरों, रेल की लाइनों, बिजली घरों, जल भण्डारण, टावरों, सिंचाई नहरों, डेल्टा जल वितरक तंत्र, नदी तथा तटीय तटबंधों, पत्तनों तथा अन्य नागरिक जनोपयोगी सेवाओं जैसी महत्त्वपूर्ण अवसंरचनाओं को विश्वव्यापी सुरक्षा निर्देश के अनुरूप निर्मित और मॉनिटर करने की जरूरत हैं। पर्यावरणिक रूप से सतत विकास में सततता को सुनिश्चित करने के लिए पर्यावरण संबंधी संरक्षण और विकास संबंधी प्रयास दोनों साथ-साथ चलाए जाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने के लिए अधिकाधिक भूमि पर पौधारोपण करने की निहायत जरूरत समझते हुए कदम उठाया जाए। पारिस्थितिकी संतुलन और स्थाई विकास को बनाए रखने के लिए वनों दीप समूहों, तटवर्ती क्षेत्रों, नदियों, कृषि, शहरी पर्यावरण और औद्योगिक पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी प्रणालियों पर भी गौर करना होगा। आज जलवायु में परिवर्तन होने के कारण चक्रवात, बाढ़ तथा सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएं आने की प्रबलता बढ़ी हैं। ऐसे में, एक सतत् एवं प्रभावी तरीके से इन चुनौतियों से निपटने के लिए जलवायु परिवर्तन के अनुकूल क्रियाओं को प्रोत्साहित और संवर्धित करने की जरूरत है। किसी आपदा से निपटने में विद्यमान एवं नए संस्थागत प्रबंधों को एकीकृत, सहयोगी एवं क्रियाशील दृष्टिकोण अपनाने की सख्त दरकार है। इसके साथ-साथ हमें प्रकृति की ताकत से भली-भांति परिचित होने और उसके महत्त्व को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना होगा। अगर हम समय रहते नहीं चेते, तो ऐसे में निकट भविष्य में बहुत बड़े संकट से दो-चार होना पड़ेगा।

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