हमारा उपास्य ईश्वर कैसा है?

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-मनमोहन कुमार आर्य

उपासना क्या है? उपासना किसी के पास बैठने को कहते हैं। सर्वोत्तम उपासना सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के पास बैठना है। ईश्वर के पास किस प्रकार बैठ सकते हैं, इसके लिए हमें यह करना है कि शुद्ध व पवित्र होकर ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव का ध्यान करना है और ऐसा करते हुए ईश्वर की स्तुति व उससे प्रार्थना करना है। ऋषि दयानन्द ने वेदों के आधार पर ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना के मंत्रों सहित उसके गुण, कर्म व स्वभाव पर अपने प्रायः सभी ग्रन्थों में प्रकाश डाला है। ईश्वर का ज्ञान मनुष्य कृत ग्रन्थों को पढ़कर उतना नहीं मिलता जितना की वेद व वेदर्षियों के ग्रन्थों को पढ़कर मिलता है। इन ग्रन्थों में उपनिषद प्रमुख हैं और 6 दर्शनों में योग व सांख्य दर्शन का विशेष महत्व हैं। इन सभी ग्रन्थों के अनेक आर्य विद्वानों के भाष्य व टीकायें उपलब्ध हैं जिनका अध्ययन कर हम ईश्वर के यथार्थ स्वरूप से परिचित हो सकते हैं। ऋषि दयानन्द ने विश्व के मनुष्यों पर एक उपकार यह भी किया है कि उन्होंने चारों वेद और समस्त वैदिक वांग्मय से सभी मनुष्यों के लिए उपयोगी विषयों का ज्ञान अपने अनेक ग्रन्थों में उपलब्ध कराया है। इन ग्रन्थों में सत्यार्थप्रकाश मुख्य ग्रन्थ है। इसके साथ ही ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय व व्यवहारभानु सहित  वेदभाष्य आदि का अध्ययन मनुष्य को आध्यात्मिक व सांसारिक ज्ञान प्राप्त कराने का मुख्य साधन है। इनका अध्ययन कर मनुष्य ईश्वर व आत्मा विषयक ज्ञान को प्राप्त कर लेता है और साधना द्वारा ईश्वर का साक्षात व प्रत्यक्ष ज्ञान भी जान लेता है। साधना करते हुए जब ईश्वर व आत्मा का ध्यान परिपक्व होकर सफल होता है तो वह जीवन के प्रमुख लक्ष्य ईश्वर साक्षात्कार को प्राप्त कर लेता है। सभी मनुष्यों को अन्य कार्यों को करते हुए मुख्य कार्य ईश्वर व आत्मा आदि विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के साथ योग साधना द्वारा समाधि अवस्था को प्राप्त होकर ईश्वर साक्षात्कार करना ही है।

 

हमारा ईश्वर कैसा है? इसका उत्तर हमारा ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्त्ता है और वही हमारा उपास्य है। हम सदैव उसी की उपासना करें। इसके साथ यदि हम हम ऋषि दयानन्द कृत वेदों के भाष्य, सत्यार्थप्रकाश एवं आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों का अध्ययन करेंगे तो हमें ईश्वर के अनेक गुण, कर्म, स्वभावों का परिचय प्राप्त होगा। यद्यपि ईश्वर के अनन्त गुण, कर्म व स्वभाव हैं, परन्तु यदि हम ईश्वर के इन उल्लिखित प्रमुख गुण, कर्म, स्वभाव का भी विचार, चिन्तन एवं ध्यान करें तो हमें इससे भी बहुत लाभ हो सकता है। उपासना में योगदर्शन वर्णित योग के आठ अंगों का विशेष महत्व हैं। यह हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि। योग के इन अष्टांगों में आसन व प्राणायाम को भी तीसरे व चौथे स्थान पर रखा गया है। ऋषि दयानन्द जी ने भी आसन व प्राणायाम का सन्ध्योपासना विधि में उल्लेख किया। सन्ध्या व ईश्वरोपासना अर्थात् ध्यान सुखासन आदि किसी आसन में बैठकर की जानी चाहिये। इसके लिए आसन की स्थिरता का अभ्यास करना आवश्यक है। प्राणायाम से भी शरीर के दोष, अशुद्धियां व रोग दूर होते हैं। प्राणायाम की क्रिया से मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है। एकाग्र मन ही ध्यान में सहायक होता है। अतः इन क्रियाओं का ज्ञान व अभ्यास आवश्यक है। योग साधना में यम व नियमों का भी विशेष महत्व है। स्वाध्याय भी नियम के अन्तर्गत आता है। इससे भी साधना में लाभ होता है। हमारा अनुमान है कि बिना स्वाध्याय के मनुष्य योग साधना में सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता जितना शीघ्र व उत्तम स्थिति वेद एवं वैदिक साहित्य के स्वाध्याय करने को प्राप्त होती है।

 

महर्षि दयानन्द जी ने स्तुति, प्रार्थना व उपासना के आठ वेदमंत्रों का चयन कर उन्हें हिन्दी भावार्थ सहित प्रस्तुत किया है। यह मन्त्र ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना में विशेष महत्व रखते हैं। प्रत्येक उपासक को इन मंत्रों व इनके अर्थों को स्मरण कर लेना चाहिये। हम अनुभव करते हैं कि ऋषि ने इन मंत्रों के जो अर्थ किये हैं वह पूर्ण सत्य व यथार्थ हैं। इन मंत्रों का अर्थ सहित उच्चारण करने से ईश्वर के स्वरूप व सत्ता का भली प्रकार से ज्ञान उपासक को हो जाता है। हम यहां इन आठ मंत्रों में प्रथम, तृतीय, षष्ठ व अष्टम् मंत्र का ऋषि दयानन्द जी का दिया हुआ तात्पर्य प्रस्तुत कर रहे हैं जो कि इस प्रकार है। हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्ययुक्त, शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर! आप कृपा करके हमारे समस्त दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों को दूर कर दीजिए और जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ हैं, वह सब हमको प्राप्त कीजिए। ईश्वर आत्मज्ञान का दाता, शरीर, आत्मा और समाज के बल का देनेहारा है। सब विद्वान् लोग ईश्वर की उपासना करते हैं और उसके प्रत्यक्ष सत्यस्वरूप शासन, न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं। ईश्वर का आश्रम ही मोक्ष-सुखदायक है। उस ईश्वर को न मानना, अर्थात् उसकी भक्ति न करना ही मृत्यु आदि दुःख का हेतु है। हम लोग उस सुखस्वरूप सकल ज्ञान के देनेहारे परमात्मा की प्राप्ति के लिए आत्मा ओर अन्तःकरण से भक्ति अर्थात् उसी की आज्ञापालन करने में तत्पर रहें। ईश्वर सब प्रजा का स्वामी है। ईश्वर सर्वोपरि है। वह कभी हमारा तिरस्कार नहीं करता है। हम लोग जिस जिस की कामना वाले होकर ईश्वर की भक्ति करते हैं, उसका आश्रय लेते हैं तथा इच्छा व कामना करते हैं वह वह हमारी कामना सिद्धि की प्राप्त होती है अर्थात् ईश्वर उनको सफल करता है। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना उपासना से हम लोग धन व ऐश्वर्य के स्वामी होते हैं। ईश्वर स्वप्रकाश, ज्ञानस्वरूप, सब जगत् का प्रकाश करने वाला है। वह सकल सुखदाता है। ईश्वर सम्पूर्ण विद्या से युक्त है। हमारा ईश्वर हम पर कृपा कर हम लोगों को विज्ञान वा राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए अच्छे, धर्मयुक्त, आप्त लोगों के मार्ग से सम्पूर्ण प्रज्ञान और उत्तम कर्म प्राप्त कराये और हमसे कुटिलतायुक्त पापरूप कर्म को दूर करे। इस कारण हम लोग ईश्वर की बहुत प्रकार की स्तुतिरूप नम्रतापूर्वक प्रशंसा सदा किया करें और सर्वदा आनन्द में रहें। यह ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना का संक्षिप्त नमूना है।

 

इस प्रकार से ईश्वर की स्तुति आदि एवं सन्ध्या के मन्त्रों से विधिपूर्वक ध्यान करने से उपासक के मन के एकाग्र होकर ईश्वर में स्थित होने से ईश्वर की निकटता में वृद्धि होती है जिससे मनुष्य ईश्वर साक्षात्कार की ओर प्रवृत्त होता है। जब भी ईश्वर की कृपा होती है तो उपासक को ईश्वर के स्वरूप का साक्षात ज्ञान व उसका प्रत्यक्ष हो जाता है। यही मनुष्य जीवन का उद्देश्य भी है। यह भी जान लेना चाहिये कि ईश्वर ज्ञानस्वरूप, प्रकाशस्वरूप् एवं आनन्दस्वरूप है। अतः सन्ध्या व ध्यान में एकाग्रता व स्थिरता होने पर जीवात्मा के दुःख दूर होकर सुख व आनन्द की अनुभूति होती है। जब ध्यान में स्थिरता आ जाती है तो उपासक स्वतः ध्यान में प्रवृत्त होकर आनन्द का लाभ प्राप्त करता रहता है। योग साधक बताते हैं कि उपासना में स्थित साधक को यह संसार व इसके व्यवहार अच्छे नहीं लगते। वह अधिक से अधिक समय ईश्वर की संगति में ही रह कर आनन्द का लाभ प्राप्त करना चाहता है। अतः सभी मनुष्यों को ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर उपासना में प्रवृत्त होना चाहिये। ऐसा करना ही मनुष्य को कृतघ्नता के पाप से बचाता है। इसका कारण है कि जीवात्मा पर ईश्वर के कोटिशः व इससे भी अधिक उपकार है। ईश्वर के सभी उपकारों को हम उसकी उपासना के द्वारा ही किंचित रूप से पूरा कर सकते हैं। इससे हमें अनेकानेक लाभ भी होते हैं। अपने उपास्य ईश्वर के स्वरूप का कुछ कुछ वर्णन हम उपर्युक्त पंक्तियों में कर चुके हैं। पाठकों को ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों सहित वेद और वैदिक साहित्य का स्वाध्याय करना चाहिये। इससे वह ईश्वर के विषय में विस्तार से जान पायेंगे। हमारा उपास्य ईश्वर है और वह सच्चिदानन्द आदि गुणों वाला है। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

 

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