अमित शाह की परछाई से कैसे निकल पाएंगे नड्डा!

लिमटी खरे

तकरीबन सात माह से जेपी नड्डा भाजपा की राष्ट्रीय इकाई में कार्यकारी अध्यक्ष की हैसियत से काम कर रहे थे, अब वे भाजपा के पूर्ण कालिक अध्यक्ष बन चुके हैं। उनका कार्यकाल 2023 तक रहेगा। पिछले सात माहों के कार्यकाल पर अगर गौर फरमाया जाए तो जेपी नड्डा के खाते में कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। वे अब तक निर्वतमान अध्यक्ष अमित शाह की परछाई के रूप में ही काम करते दिखे। नरेंद्र मोदी की दूसरी पारी में जब अमित शाह के द्वारा केंद्रीय गृह मंत्री का पदभार संभाला गया, उसके बाद जे.पी. नड्डा को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। उनके द्वारा लिए गए कमोबेश हर फैसले में कहीं न कहीं अमित शाह का हस्ताक्षेप और उनकी छाप भी दिखाई दी। अब उनके लिए यह जरूरी है कि वे अमित शाह और नरेंद्र मोदी की छतरी से बाहर निकलें और दमदारी के साथ कुछ निर्णय लेकर पार्टी को मजबूत करने की कवायद करें तो ही वे सफल और कद्दावर अध्यक्ष की फेहस्ति में अपना नाम दर्ज करा सकते हैं, अन्यथा उन्हें भी रिमोट कंट्रोल से चलने वाले अध्यक्षों की सूची में शुमार कर दिया जाएगा।

भारतीय जनता पार्टी को इस मुकाम तक लाने में अटल बिहारी बाजपेयी, लाल कृष्ण आड़वाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह आदि नेताओं के योगदान को शायद ही कभी भुलाया जा सके। इसके बाद अमित शाह ने जबसे भाजपा की ममान संभाली उसके बाद से पार्टी में मुखर फैसले लिए जाने लगे। अमित शाह के कार्यकाल में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आदि राज्यों की सत्ता भाजपा के हाथ से फिसली तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भाजपा का परचम लहराया गया। उत्तर प्रदेश में जातिगत समीकरणों के हिसाब से भाजपा की जीत की उम्मीदें बहुत ही कम थीं। इसके अलावा आम चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन जिस तरह का रहा, वह भी अमित शाह के खाते की एक बहुत बड़ी उपलब्धि ही मानी जाती है। अमित शाह को एक कुशल प्रशासक के रूप में देखा जाता है। अमित शाह की छवि सख्त मिज़ाज नेता के रूप में स्थापित हुई है। वैसे भी किसी दल में अनुशासन बनाए रखने के लिए शीर्ष नेता का कुछ हद तक सख्त होना भी बहुत जरूरी होता है।

अब अमित शाह के बाद जब जे.पी. नड्डा को भाजपा की कमान सौंपी गई है तब के परिदृश्य में स्थितियां जे.पी. नड्डा के अनुकूल ही दिख रही हैं। वर्तमान में पार्टी बहुत ही सशक्त रूप में उभर चुकी है। केंद्र में पूरी बहुमत की सरकार है। यह अलहदा बात है कि 2017 के मुकाबले अनेक राज्य अब भाजपा के हाथों से फिसल चुके हैं। अमित शाह कड़क मिज़ाज तो जे.पी. नड्डा बहुत ही कोमल हृदय वाली छवि के इंसान माने जाते हैं। भाजपा के अंदर भी अन्य दलों की तरह ही अंदर ही अंदर एक दूसरे की जड़ें काटने वाले नेताओं की कमी नहीं है। राज्य स्तर पर गुटबाजी भी भाजपा में आम है। इस तरह की बातों से निपटने के लिए जे.पी. नड्डा को बेहतर रणनीति बनाना होगा।

अब अमित शाह और जे.पी. नड्डा के कार्यकाल की कदम कदम पर समीक्षा के साथ ही साथ तुलना भी की जाएगी। अभी तक तो जे.पी. नड्डा कार्यकारी अध्यक्ष थे, इसलिए उनके उस कार्यकाल में कार्यकर्ताओं को उनसे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं थी, पर अब जब वे पूर्णकालिक अध्यक्ष बन चुके हैं तब सबकी निगाहें उन पर जा टिकी हैं। कार्यकारी अध्यक्ष रहते हुए जे.पी. नड्डा ने किसी तरह की छाप नहीं छोड़ी है। उनके कार्यकारी अध्यक्ष रहते हुए अनेक राज्यों में हुए विधान सभा चुनावों में भाजपा ने मुंह की खाई है। कार्यकारी अध्यक्ष रहने के बाद भी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में कमोबेश हर फैसले पर अमित शाह और नरेंद्र मोदी की छाप दिखाई देती थी। इस दौरान जे.पी. नड्डा अपनी सशक्त मौजूदगी दर्ज नहीं करवा पाए।

महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर हुए नाटकीय घटनाक्रम में भी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की फजीहत हुई। यह असफलता भी जे.पी. नड्डा के खाते में ही आई। महाराष्ट्र में भाजपा को अपने दशकों पुराने साथी शिवसेना से दूर रहना पड़ा। शिवसेना के साथ रिश्ते बिगड़ना भी एक बड़ा फेक्टर बनकर उभरा। इधर, झारखण्ड में भाजपा के सहयोगी आल झारखण्ड स्टूडेंट यूनियन (आजसू) से रिश्ते संभाल नहीं पाई और दोनों ने अलग अलग चुनाव लड़े। यहां भी भाजपा को सत्ता से दूर होना पड़ा। हरियाणा की अगर बात की जाए तो हरियाणा में भाजपा को सीटें कम आने पर जननायक जनता पार्टी के साथ समझौता कर सरकार बनाने पर मजबूर होना पड़ा।

भाजपा के खाते में उपलब्धियां तो हैं। मामला चाहे धारा 370 एवं 35ए हटाने का हो या जम्मू काश्मीर को तोड़कर नए राज्यों के निर्माण का या राम मंदिर पर सरकार का कदम हो, हर मामले में सारा का सारा श्रेय अमित शाह के खाते में ही जाता दिखा। भाजपा के अध्यक्ष होने के नाते पार्टी के खाते में श्रेय आया तो वह भी अमित शाह के रास्ते ही आता दिखा।

जे.पी. नड्डा ने जब अध्यक्ष की कमान संभाली है तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौति दिल्ली विधान सभा के चुनाव के रूप में ही सामने खड़ी दिख रही है। दिल्ली में पार्टी सालों से सत्ता से बाहर है। पिछली मर्तबा 70 सीटों वाली दिल्ली विधन सभा में भाजपा के हाथ महज तीन सीट ही लगीं थीं। अब दिल्ली में सातों लोकसभा सीट पर भाजपा का कब्जा है। इस लिहाज से भाजपा से कार्यकर्ता यही उम्मीद करेंगे कि 1998 के बाद राजनैतिक वनवास काट रही भाजपा को इस बार सत्ता के शिखर तक पहुंचाया जाए। देश की राजनैतिक राजधानी के विधान सभा चुनावों में जे.पी. नड्डा की अग्नि परीक्षा ही होना माना जा सकता है।

इसके साथ ही साथ बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव भी जे.पी. नड्डा के लिए चुनौति से कम नही होंगे। इतना ही नही सीएए, एनआरसी, एनपीआर भी केंद्र में भाजपानीत सरकार की प्राथमिकताएं हैं। इन मामलों में देश भर में हो रहा विरोध किसी से छिपा नहीं है। इस विरोध के शमन के लिए भाजपा की केंद्रीय सरकार तो प्रयास कर रही है किन्तु संगठन स्तर पर इसके लिए प्रयास करना भी जे.पी. नड्डा के लिए कम मुश्किल नहीं होगा।

देश भर के सूबाई संगठनों में नेताओं के बीच आपसी खींचातान भी जमकर मची हुई है। आपसी रार अब तक गाहे बेगाह ही सामने आती थी, क्योंकि अमित शाह का अनुशासन का डंडा नेताओं को बैकफुट पर रहने के लिए मजबूर कर देता था। अब अपेक्षाकृत लिबरल छवि वाले जे.पी. नड्डा के लिए सूबाई नेताओं को समन्वय बनाकर चलने की नसीहत देना भी चुनौति से कम नहीं होगा।

केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्रियों की पत्रकार वार्ताओं को कम ही देखा गया है। मीडिया के सामने सबसे ज्यादा आने वालों की फेहरिस्त में केंद्र के अनेक मंत्रियों का तो अब तक नंबर ही नहीं लग पाया है। सरकार की नीतियों के बखान में भी भाजपा का जमीनी संगठन कसरत करता नहीं दिखता। देश के नागरिकों को सीएए का मतलब समझाने निकले भाजपा के सांसदों को पसीना आ गया था।कुल मिलाकर 2014 में अमित शाह जबसे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, उसके बाद से लगातार ही उनके द्वारा जिस तरह से फैसले लिए गए, वे सदा ही चर्चाओं में बने रहे। उनके कार्यकाल में भाजपा ने ऊॅचाईंयां को स्पर्श किया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। अभी जे.पी. नड्डा को उनकी परछाईं के अंदर ही देखा जाता रहा है। अब जे.पी. नड्डा को उनकी परछाईं से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र अस्त्तित्व बनाने की जरूरत है, ताकि वे अमित शाह के बाद भाजपा को और अधिक बुलंदियों तक ले जा सकें।

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