आखिर कब तक चलेगा यह सब?

-दिवस दिनेश गौड़

मित्रों शीर्षक आपको बाद में समझाऊंगा किन्तु लेख से पहले आपको एक सच्ची कहानी सुनाना चाहता हूँ।

हमारे देश में एक महान वैज्ञानिक हुए हैं प्रो. श्री जगदीश चन्द्र बोस। भारत को और हम भारत वासियों को उन पर बहुत गर्व है। इन्होने सबसे पहले अपने शोध से यह निष्कर्ष निकाला कि मानव की तरह पेड़ पौधों में भी भावनाएं होती हैं। वे भी हमारी तरह हँसते खिलखिलाते और रोते हैं। उन्हें भी सुख दुःख का अनुभव होता है। और श्री बोस के इस अनुसंधान की तरह इसकी कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।

श्री बोस ने शोध के लिये कुछ गमले खरीदे और उनमे कुछ पौधे लगाए। अब इन्होने गमलों को दो भागों में बांटकर आधे घर के एक कोने में तथा शेष को किसी अन्य कोने में रख दिया। दोनों को नियमित रूप से पानी दिया, खाद डाली। किन्तु एक भाग को श्री बोस रोज़ गालियाँ देते कि तुम बेकार हो, निकम्मे हो, बदसूरत हो, किसी काम के नहीं हो, तुम धरती पर बोझ हो, तुम्हे तो मर जाना चाहिए आदि आदि। और दूसरे भाग को रोज़ प्यार से पुचकारते, उनकी तारीफ़ करते, उनके सम्मान में गाना गाते। मित्रों देखने से यह घटना साधारण सी लगती है। किन्तु इसका प्रभाव यह हुआ कि जिन पौधों को श्री बोस ने गालियाँ दी वे मुरझा गए और जिनकी तारीफ़ की वे खिले खिले रहे, पुष्प भी अच्छे दिए।

तो मित्रों इस साधारण सी घटना से बोस ने यह सिद्ध कर दिया कि किस प्रकार से गालियाँ खाने के बाद पेड़ पौधे नष्ट हो गए। अर्थात उनमे भी भावनाएं हैं।

मित्रों जब निर्जीव से दिखने वाले सजीव पेड़ पौधों पर अपमान का इतना दुष्प्रभाव पड़ता है तो मनुष्य सजीव सदेह का क्या होता होगा?

वही होता है जो आज हमारे भारत देश का हो रहा है।

५००-७०० वर्षों से हमें यही सिखाया पढाया जा रहा है कि तुम बेकार हो, खराब हो, तुम जंगली हो, तुम तो हमेशा लड़ते रहते हो, तुम्हारे अन्दर सभ्यता नहीं है, तुम्हारी कोई संस्कृती नहीं है, तुम्हारा कोई दर्शन नहीं है, तुम्हारे पास कोई गौरवशाली इतिहास नहीं है, तुम्हारे पास कोई ज्ञान विज्ञान नहीं है आदि आदि। मित्रों अंग्रेजों के एक एक अधिकारी भारत आते गए और भारत व भारत वासियों को कोसते गए। अंग्र जों से पहले ये गालियाँ हमें फ्रांसीसी देते थे, और फ्रांसीसियों से पहले ये गालियाँ हमें पुर्तगालियों ने दीं। इसी क्रम में लॉर्ड मैकॉले का भी भारत में आगमन हुआ। किन्तु मैकॉले की नीति कुछ अलग थी। उसका विचार था कि एक एक अंग्रेज़ अधिकारी भारत वासियों को कब तक कोसता रहेगा? कुछ ऐसी परमानेंट व्यवस्था करनी होगी कि हमेशा भारत वासी खुद को नीचा ही देखें और हीन भावना से ग्रसित रहें। इसलिए उसने जो व्यवस्था दी उसका नाम रखा Education System. सारा सिस्टम उसने ऐसा रचा कि भारत वासियों को केवल वह सब कुछ पढ़ाया जाए जिससे वे हमेशा गुलाम ही रहें। और उन्हें अपने धर्म संस्कृती से घृणा हो जाए। इस शिक्षा में हमें यहाँ तक पढ़ाया कि भारत वासी सदियों से गौमांस का भक्षण कर रहे हैं। अब आप ही सोचे यदि भारत वासी सदियों से गाय का मांस खाते थे तो आज के हिन्दू ऐसा क्यों नहीं करते? और इनके द्वारा दी गयी सबसे गंदी गाली यह है कि हम भारत वासी आर्य बाहर से आये थे। आर्यों ने भारत के मूल द्रविड़ों पर आक्रमण करके उन्हें दक्षिण तक खदेड़ दिया और सम्पूर्ण भारत पर अपना कब्ज़ा ज़मा लिया। और हमारे देश के वामपंथी चिन्तक आज भी इसे सच साबित करने के प्रयास में लगे हैं। इतिहास में हमें यही पढ़ाया गया कि कैसे एक राजा ने दूसरे राजा पर आक्रमण किया। इतिहास में केवल राजा ही राजा हैं प्रजा नदारद है, हमारे ऋषि मुनि नारद हैं। और राजाओं की भी बुराइयां ही हैं अच्छाइयां गायब हैं। आप जरा सोचे कि अगर इतिहास में केवल युद्ध ही हुए तो भारत तो हज़ार साल पहले ही ख़त्म हो गया होता। और राजा भी कौन कौन से गजनी, तुगलक, ऐबक, लोदी, तैमूर, बाबर, अकबर, सिकंदर जो कि भारतीय थे ही नहीं। राजा विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान गायब हैं। इनका ज़िक्र तो इनके आक्रान्ता के सम्बन्ध में आता है। जैसे सिकंदर की कहानी में चन्द्रगुप्त का नाम है। चन्द्रगुप्त का कोई इतिहास नहीं पढ़ाया गया। और यह सब आज तक हमारे पाठ्यक्रमों में है।

इसी प्रकार अर्थशास्त्र का विषय है। आज भी अर्थशास्त्र में पीएचडी करने वाले बड़े बड़े विद्वान् विदेशी अर्थशास्त्रियों को ही पढ़ते हैं। भारत का सबसे बड़ा अर्थशास्त्री चाणक्य तो कही है ही नहीं। उनका एक भी सूत्र किसी स्कूल में भी बच्चों को नहीं पढ़ाया जाता। जबकि उनसे बड़ा अर्थशास्त्री तो पूरी दुनिया में कोई नहीं हुआ।

दर्शन शास्त्र में भी हमें भुला दिया गया। आज भी बड़े बड़े दर्शन शास्त्री अरस्तु, सुकरात, देकार्ते को ही पढ़ रहे हैं जिनका दर्शन भारत के अनुसार जीरो है। अरस्तु और सुकरात का तो ये कहना था कि स्त्री के शरीर में आत्मा नहीं होती वह किसी वस्तु के समान ही है, जिसे जब चाहा बदला जा सकता है। आपको पता होगा १९५० तक अमरीका और यूरोप के देशों में स्त्री को वोट देने का अधिकार नहीं था। आज से २०-२२ साल पहले तक अमरीका और यूरोप में स्त्री को बैंक अकाउंट खोलने का अधिकार नहीं था। साथ ही साथ अदालत में तीन स्त्रियों की गवाही एक पुरुष के बराबर मानी जाती थी। इसी कारण वहां सैकड़ों वर्षों तक नारी मुक्ति आन्दोलन चला तब कहीं जाकर आज वहां स्त्रियों को कुछ अधिकार मिले हैं। जबकि भारत में नारी को सम्मान का दर्जा दिया गया। हमारे भारत में किसी विवाहित स्त्री को श्रीमति कहते हैं। कितना सुन्दर शब्द हैं श्रीमती जिसमे दो देवियों का निवास है। श्री होती है लक्ष्मी और मति यानी बुद्धि अर्थात सरस्वती। हम औरत में लक्ष्मी और सरस्वती का निवास मानते हैं। किन्तु फिर भी हमारे प्राचीन आचार्य दर्शन शास्त्र से गायब हैं। हमारा दर्शन तो यह कहता है कि पुरुष को सभी शक्तियां अपनी माँ के गर्भ से मिलती हैं और हम शिक्षा ले रहे हैं उस आदमी की जो यह मानता है कि नारी में आत्मा ही नहीं है।

चिकत्सा के क्षेत्र में महर्षि चरक, शुषुक, धन्वन्तरी, शारंगधर, पातंजलि सब गायब हैं और पता नहीं कौन कौन से विदेशी डॉक्टर के नाम हमें रटाये जाते हैं। आयुर्वेद जो न केवल चिकित्सा शास्त्र है अपितु जीवन शास्त्र है वह आज पता नहीं चिकित्सा क्षेत्र में कौनसे पायदान पर आता है?

बच्चों को स्कूल में गणित में घटाना सिखाते समय जो प्रश्न दिया जाता है वह कुछ इस प्रकार होता है-

पापा ने तुम्हे दस रुपये दिए, जिसमे से पांच रुपये की तुमने चॉकलेट खा ली तो बताओ तुम्हारे पास कितने रुपये बचे?

यानी बच्चों को घटाना सिखाते समय चॉकलेट कम्पनी का उपभोगता बनाया जा रहा है। हमारी अपनी शिक्षा पद्धति में यदि घटाना सिखाया जाता तो प्रश्न कुछ इस प्रकार का होता-

पिताजी ने तुम्हे दस रुपये दिए जिसमे से पांच रुपये तुमने किसी गरीब लाचार को दान कर दिए तो बताओ तुम्हारे पास कितने रुपये बचे?

जब बच्चा बार बार इस प्रकार के सवालों के हल ढूंढेगा तो उसके दिमाग में कभी न कभी यह प्रश्न जरूर आएगा कि दान क्या होता है, दान क्यों करना चाहिए, दान किसे करना चाहिए आदि आदि? इस प्रकार बच्चे को दान का महत्त्व पता चलेगा। किन्तु चॉकलेट खरीदते समय बच्चा यही सोचेगा कि चॉकलेट कौनसी खरीदूं कैडबरी या नेस्ले?

अर्थ साफ़ है यह शिक्षा पद्धति हमें नागरिक नहीं बना रही बल्कि किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी का उपभोगता बना रही है। और उच्च शिक्षा के द्वारा हमें किसी विदेशी यूनिवर्सिटी का उपभोगता बनाया जा रहा है या किसी वेदेशी कम्पनी का नौकर।

मैंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई में कभी यह नहीं सीखा कि कैसे मै अपने तकनीकी ज्ञान से भारत के कुछ काम आ सकूँ, बल्कि यह सीखा कि कैसे मै किसी Multi National Company में नौकरी पा सकूँ, या किसी विदेशी यूनिवर्सिटी में दाखिला ले सकूँ।

तो मित्रों सदियों से हमें वही सब पढ़ाया गया कि हम कितने अज्ञानी हैं, हमें तो कुछ आता जाता ही नहीं था, ये तो भला हो अंग्रेजों का कि इन्होने हमें ज्ञान दिया, हमें आगे बढ़ना सिखाया आदि आदि। यही विचार ले कर लॉर्ड मैकॉले भारत आया जिसे तो यह विश्वास था कि स्त्री में आत्मा नहीं होती और वह हमें शिक्षा देने चल पड़ा। हम भारत वासी जो यह मानते हैं कि नारी में देवी का वास है उसे मैकॉले की शिक्षा की कà ��या आवश्यकता है? हमारे प्राचीन ऋषियों ने तो यह कहा था कि दुनिया में सबसे अवित्र नारी है और पुरुष में पवित्रता इसलिए आती है क्यों कि उसने नारी के गर्भ से जन्म लिया है। जो शिक्षा मुझे मेरी माँ से जोडती है उस शिक्षा को छोड़कर मुझे एक ऐसी शिक्षा अपनानी पड़ी जिसे मेरी माँ समझती भी नहीं। हम तो हमारे देश को भी भारत माता कहते हैं। किन्तु हमें उस व्यक्ति की शिक्षा को अपनाना पड़ा जो यह मानता है कि मेरी माँ में आत्मा ही नहीं है। और एक ऐसी शिक्षा पद्धति जो हमें नारी को पब, डिस्को और बीयर बार में ले जाना सिखा रही है, क्यों?

आज़ादी से पहले यदि यह सब चलता तो हम मानते भी कि ये अंग्रेजों की नीति है, किन्तु आज क्यों हम इस शिक्षा को ढो रहे हैं जो हमें हमारे भारत वासी होने पर ही हीन भावना से ग्रसित कर रही है? आखिर कब तक चलेगा यह सब?

प्रवक्ता.कॉम के एक विद्वान्(?) लेखक के द्वारा पिछले कुछ दिनों से स्वामी रामदेव जी पर अपने पूरे दम के साथ कुठारागात किया जा रहा है, उन्हें बताना चाहूँगा कि इस लेख का सारा डाटा मुझे भारत स्वाभिमान के उनके एक व्याख्यान से ही मिला है। और आप ध्यान से देखें हमारी भारत माता के चित्र को जो लेख में सबसे ऊपर है। कितनी सुन्दर है हमारी भारत माँ!!!

18 thoughts on “आखिर कब तक चलेगा यह सब?

  1. आपका लेख काफी अच्छा है और भारतीय संस्कृति के अनुरूप है! हमें अपने ही देश में हर काम में अंगेजी बोलना ज़रूरी है यहाँ तक की सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट तक में अंग्रेजी में बहस होती है! सबसे पहले हमें हिंदी का प्रचार और प्रसार करना होगा और अंग्रेजी के प्रभाव कम करना होगा!

  2. आपकी टिप्पणी से कुछ अनुमान करके ढूंढा, शायद इसी का उल्लेख आपने किया था। देर भले ही हो, पर मुझे आपके विचार और लेखन बहुत भाया। लिखते रहें। डटे रहें। कभी और समय मिलने पर, आपको इ मेल करूंगा। विलंब से अभिनंदन। अनवरत लिखते रहें।

  3. एक श्रेष्ठ लेख को अपने एक कुष्ठ मानसिकता से ग्रस्त ‘विद्वान् लेखक’ को कुछ समझाने में लगा दिया.
    चाणक्य – सांप को दूध पिलाना उसके विष को बढ़ाने के समान ही है !
    भारतीय संस्कृति के यथार्थ चित्रण और राष्ट्र गौरव की सात्विक विवेचना के लिए धन्यवाद !!!!!!

  4. दिवस दिनेश गौड़ जी लेखक बनने के लिए बधाई. आपका पहला लेख बहुत ही सुन्दर है. आप ने बहुत ही सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है. किसी विद्वान लेखक को प्रवक्ता में बार बार जगह देना गलत है. खासकर एक ही विषय पर.
    आपमें एक बहुत ही उम्दा लेखक की प्रतिभा छुपी है. आप इस क्षेत्र में जरूर सफल होंगे. ऐसी मेरी आशा है. आपने जिस समस्या की और ध्यान आकृष्ट किया है, वह इस देश की दुखती रग है. मैकाले को देश से बाहर करने के लिए क्रांति की जरुरत है. देश में आजादी के बाद, कुछ वर्षों को छोड़ दिया जाये तो वामपंथी समर्थक ही सत्तासीन रहे हैं, उनसे राष्ट्रवादी शिक्षा की उम्मीद करना ही बेकार है. आशा करता हूँ की आप जैसे विद्वान् लेखक ही मैकाले द्वारा स्थापित शिक्षा पद्धति की नीव में निर्णायक प्रहार कर पाएंगे. असत्य की नीव में खड़ा यह शिक्षा पद्धति सत्य के सामने बेबस हो जायेगी.
    मै शुरू से ही भारतीय भाषाओं में शिक्षा का प्रबल समर्थक रहा हूँ लेकिन मैकाले की व्यवस्था आड़े आती है. देश से अंग्रेजी शिक्षा को निर्णायक तिलांजलि का वक्त आ चूका है. देश में शिक्षा को मातृभाषा में अनिवार्य किया जाना चाहिए. माध्यम हमेशा मातृभाषा होना चाहिए.
    मैकाले की शिक्षा पद्धति ने मातृभाषा को मृतप्राय बना दिया है. इसको फिर से जीवित करने की आवश्यकता है.अन्यथा देशी भाषाएँ सिर्फ मयूसियम में नजर आएँगी. मैं प्रवक्ता के विद्वान लेखकों से आग्रह करूँगा की वो भारतीय भाषाओं के उत्थान के लिए लेख लिखें.

  5. gaud jee aap kee baat mein dam hai. aashaa karata hun ki is baat ko bhaartiy samajhege.
    koi shak naheen ki hamare dushman ham mein heen bhawanaa jagaane ke liye puree taakat se kaam kar rahe hain. bhaarat ke nindak asl mein hamare dushman hain. unakee pahachaan karne ke liye aapne badee saral bhaashaa mein apanee baat samjhaa dee hai. is badhiyaa lekh ke liye meree badhaai sweekar karen.

  6. एक विचारधारा यह भी है :

    क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
    सबका लिया सहारा
    पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
    कहो कहाँ कब हारा ?

    क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
    तुम हुये विनीत जितना ही
    दुष्ट कौरवों ने तुमको
    कायर समझा उतना ही ।

    अत्याचार सहन करने का
    कुफल यही होता है
    पौरुष का आतंक मनुज
    कोमल होकर खोता है ।

    क्षमा शोभती उस भुजंग को
    जिसके पास गरल हो
    उसका क्या जो दंतहीन
    विषरहित विनीत सरल हो ।

    तीन दिवस तक पंथ मांगते
    रघुपति सिंधु किनारे
    बैठे पढते रहे छंद
    अनुनय के प्यारे प्यारे |

    उत्तर में जब एक नाद भी
    उठा नही सागर से
    उठी अधीर धधक पौरुष की
    आग राम के शर से ।

    सिंधु देह धर त्राहि-त्राहि
    करता आ गिरा शरण में
    चरण पूज दासता गृहण की
    बंधा मूढ़ बन्धन में

    सच पूछो, तो शर में ही
    बसती है दीप्ति विनय की
    संधिवचन सम्पूज्य उसीका
    जिसमे शक्ति विजय की ।

    सहनशीलता, क्षमा, दया को
    तभी पूजता जग है
    बल का दर्प चमकता उसके
    पीछे जब जगमग है

    —रामधारी सिंह “दिनकर”

  7. दिवस जी को एक नई शुरुआत के लिए बधाई अपने एक शानदार लेख लिखा है

  8. आदरणीय कपूर साहब बहुत बहुत धन्यवाद…आप जैसे ज्ञानी और राष्ट्रवादी अग्रजों की कृपा इसी प्रकार बनी रहे तो देश की युवा शक्ति (जो अभी सोई हुई है) भी जागकर राष्ट्र आराधन करती भारत के प्राचीन गौरव को प्राप्त करेगी| प्रवक्ता.कॉम पर मेरा यह दूसरा लेख है| आशा है मेरे आने वाले लेखों से भी आपको इसी प्रकार हर्ष होगा|
    आदरणीय सुरेश जी बहुत बहुत आभार…मुझे तो लिखने की प्रेरणा आप से ही मिली है| कुछ माह पहले तक तो मै खुद को एक बुरा लेखक समझता रहा| एक दिन किसी दोस्त ने फेसबुक पर आपके ब्लौग के एक लेख का लिंक दे दिया जिसे पढ़ कर मै इतना प्रभावित हुआ की कुछ ही दिनों में मैंने आपका पूरा ब्लौग पढ़ डाला और फिर लिखने का सोचा| इस प्रकार लेखन में तो मेरे गुरु आप ही हैं|
    आदरणीय अज्ञानी जी आपको भी बहुत बहुत धन्यवाद…क्षमा करें मुझे आपका नाम नहीं पता इसलिए अज्ञानी कहा| आपकी जैसे राष्ट्रवादियों की कृपा मिलती रहे तो और भी लिखूंगा|
    आदरणीय अनिल सहगल जी मैंने जो कुछ भी लिखा है अपने अनुभव से ही लिखने का प्रयास किया है| शिक्षा पद्धति की खामियां मैंने महसूस की इस लिए इसे बदलने की इच्छा जाहिर की| मैंने अपनी इंजीनियरिंग में सच में केवल नौकरी पाने की ही शिक्षा ली है| अत: चाहता हूँ कि ऐसा न हो और आने वाली पीढ़ी को यह शिक्षा न मिले इस लिए प्रयास किया|

  9. ओह………इस लेख पर तो नज़र ही नहीं पडी थी अपनी. क्या सुन्दर लिखा है दिनेश जी ने. कई बार अपने को ऐसा लगता है कि प्रवक्ता के टिप्पणीकार गण अकारण ही हम जैसे लेखकों को फुलाते रहते हैं. यह ‘प्रपंच’ डाक्टर राजेश कपूर साहब भी काफी करते हैं. अगाध विद्वता और सरोकार के धनी प्रवक्ता के पाठक-टिप्पणीकार गण ही प्रवक्ता के असली थाती हैं. ये सब महानुभाव अगर नियमित लेखन करने लगें तो हम जैसे पाठकों का काफी ज्ञानवर्द्धन होगा. यही प्रवक्ता का भी साफल्य होगा.साधुवाद दिनेश जी….बधाई भी.

  10. सुन्दर सुन्दर भाई-उत्तम उत्तम भाई…………………….अतीव सुन्दर एवं बहुत अच्छा लिखा है जी………………..
    .अभी जयपुर में संघ से जुडे हुवे इंजिनीयरों का एक कार्यक्रम हुवा था उसमे ये आग्रह किया गया था कि अभियन्ता अपनी प्रतिभा का उपयोग प्राचिन भार्तिये ग्यान को युग धर्म के अनुसार पुर्न जीवित करने में सहयोग करें या व्यक्तिगत रुप से भी अनुसंअधान कर स्वयं जानकर दुसरो को बतायें.
    पुजनिय सुर्दशन जी ने “प्राईड ओफ़ इन्डिया” पढने का सुझाव दिया था एवं सप्रे जी एवं बंजरग जी ने क्रमश: भारतीय प्राचीन प्रभाव विश्व पर एवं भारतिय अर्थ चिन्तन पर बहुत प्रेरणास्पद बौदिक दिया,मजेदार बात ये है कि जब मेने अपने सीनियर को बंजरग जी की पुस्तक दी तो अगले दिन आते ही उन्होने मुझे कहा मुझे तो किसी ने पहले इसे बताया ही नही था,और य्ह विचार उनके माध्यम से उनके भी सीनियर तक पहुच गया है………………………फ़िर वैदिक गणित के कुछ छोटे छोटे प्रयोगों को देख कर मेरे साथ वालो की रुची जगी है…………..आशा है हम सब भी केवल मात्र भावनात्म ना होकर और ज्यादा अनुसंधान करेंगे………………

  11. आखिर कब तक चलेगा यह सब? – by – दिवस दिनेश गौड़

    श्री दिवस दिनेश गौड़ जी के अनुसार शिक्षा में यह चल रहा है / पढाया जा रहा है : –

    (१) भारत की कोई संस्कृती नहीं, कोई दर्शन नहीं, कोई गौरवशाली इतिहास नहीं, कोई ज्ञान विज्ञान नहीं
    (२) भारत के बड़े अर्थशास्त्री चाणक्य को किसी स्कूल में नहीं पढ़ाया जाता.
    (३) दर्शन शास्त्र में भारत जीरो है –
    स्त्री का आदर नहीं है जबकि हमरे शब्द ” श्रीमती ” मे दो देवियों है – श्री = लक्ष्मी और मति = बुद्धि अर्थात सरस्वती.
    भारत में हम औरत में लक्ष्मी और सरस्वती का निवास मानते हैं, किन्तु फिर भी कहा जाता है कि हम महिलाओं के आदर में जीरो हैं.
    (४) चिकित्सा,
    (५) गणित,
    (६) इंजीनियरिंग,
    की पढ़ाई बेतुकी है

    श्री दिवस दिनेश गौड़ जी के अनुसार उपर वाले बिंदु हीन भावना उत्पन्न कर रहे है.

    आखिर कब तक चलेगा यह सब ?

    मेरा उत्तर / विचार :

    हम स्वतंत्र देश हैं. प्रजातंत्र है. शिक्षा में भारत के शिक्षा मंत्री निरंतर सुधार लाने का विचार देते रहते हैं.

    हमें जो पसंद नहीं और सरकार मानती नहीं, तो अगली देश-प्रदेश की सरकारें बदल दें. कुछ बेबसी तो नहीं है.

    अब तो विदेशी भी शिक्षा में हमारे देश के साथ मिल रहें हैं.

    जो प्रस्ताव हों, उनको विचार के लिए शिक्षा मंत्री के पास भिजवा दें, विश्वास है कि वह उनका स्वागत करेंगे.

    – अनिल सहगल –

  12. तो आखिरकार एक अछे टिपण्णीकार से एक अछे लेखक की दिनेश गौर जी की सफल यात्रा चल पडी है; बहुत सुन्दर ! desh ko बहुत zaruurat है aise jujhaaru lekhkon की jo maikaale aur maarks ke maanas putr n hon, bhaarat से ghrinaa karane waale naheen, pyaar karane waale hon.
    – kaash ham sab bhaarteey is tathy ko samajh saken jo ki uparokt lekh mein gaud जी ne darshaayaa है.

  13. आदरनीय दिवस गौड़ जी,
    आपने जो भी उद्घृत किया है जहाँ से भी किया है उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है! हम जैसे अज्ञानी लोगों को थोडा थोडा ज्ञान देते रहें!
    धन्यवाद

  14. आर्यन जी उत्साह वर्धन के लिए धन्यवाद| आप जैसे राष्ट्रवादियों के रक्त में उबाला आता रहेगा तो निश्चय ही हम शीघ्र ही भारत को उसके उसी प्राचीन गौरव पूर्ण स्थान पर ले जाएंगे जहाँ हमारे ऋषि मुनियों, आचार्यों और वीरों ने पहुंचाया था|

  15. divas ji sabse pahle is lekh ke liye aapko साधुवाद देना chahunga… aapne mere man ki पीड़ा और आज ki अवस्था को प्रदर्शित किया हे और उन वामपंथी logon को lalkara हे जो hamare desh को nichodne me lage huye hen… भारतीय संस्कृति के पुरोधा उन्हें दिखाई नहीं देते यहाँ का विज्ञानं यहाँ केगौर्रव दिखाई नहीं देते वो तो उन videshi logon के पुजारी हें जो जहाँ भी रहे उस देश की शाशन और संस्कृति को ukhad fenkne और विध्वंश करने में लगे रहे इन मेकाले के pujariyon को जुटे मार मार के यहाँ से बहार कर देने में देश और hamari bhalai हे… आपने चतुर्वेदी को भी यहाँ निशाना बनाया हे तो wo तो बेशर्म किस्म का इंसान हे उसको तो दो चार गली मेरी तरफ से भी लिखनी चाहिए थी… अपनी संस्कृति और शिक्षा पद्धति का विनाश करने वाले मेकाले और उनके पुजारियों को आज की युवा पीढ़ी कभी स्वीकार नहीं करती आपकी लेकनि के प्रहार सदा isi prkar इन दुष्टों पर होते रहेंगे मेरी यही कामना हे
    धन्यवाद्

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