एक नया ‘बुखारी’ पैदा कर रहा है ‘प्रवक्ता’

-पंकज झा

किसी व्यक्ति की तारीफ़ या निंदा में किये गए लेखन सामान्यतः निकृष्ट श्रेणी का लेखन माना जाता है. लेकिन 2 दिन में ही अगर यह लेखक दुबारा ऐसा निकृष्ट काम करने को मजबूर हुआ है तो इसके निहितार्थ हैं. खैर. पहले चतुर्वेदी जी को पढ़-पढ़ कर बोर हुए पाठकों के लिए एक चुटकुला. मेरे एक वामपंथी मित्र हैं. बात सच है या झूठ ये वो वामपंथी ही बेहतर जानते होंगे. लेकिन ‘मामला’ रोचक है. बकौल वे मित्र, उनका समाजशास्त्र का पेपर चल रहा था. मित्र ने तैयारी कुछ खास नही की थी. पेपर देख कर एकबारगी काँप गए लेकिन तुरत उन्होंने एक तरकीब निकाली. उन्होंने ‘साइकिल’ के हर पार्ट का स्मरण किया और लगे पेलने. महान समाजशास्त्री मिस्टर ‘स्पोक’ ने यह कहा तो मिस्टर ‘ब्रेक’ का ऐसा मानना था. रॉबर्ट ‘चेन’ ने ऐसा कहा तो भयंकर समाजशास्त्री ‘हेंडल’ महाशय की स्थापना इससे उलट थी वे मोटे तौर पर ‘पैडल’वादी थे आदि-आदि. और बकौल वो मित्र इन्ही ‘उपकरण’ की बदौलत वो प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए.

महान व्याख्याता पंडित चतुर्वेदी जी के बारे में अपन यह तो नहीं कह सकते. निश्चय ही उनका ‘लुकास’ या पेचकस का अस्तित्व रहा होगा इतना भरोसा तो किया ही जा सकता है. लेकिन यह ज़रूर है कि जब भी इन लोगों को अपना कुतर्क थोपना होता है तो ये तत्व भी इन्ही उद्धरणों की मदद लेकर मुद्दे की ‘साइकिल’ को बड़े ही कुशलता से पगडंडी से उतार दिया करते हैं. गरीब के भूखे पेट को अपना उत्पाद बना कर बेचने वाले इन दुकानदारों को ‘अपचय, उपचय और उपापचय’ पर बात करने के बदले सीधे ‘थेसिस, एंटीथेसिस और सिंथेसिस’ तक पहुचते हुए देखा जा सकता है. क्रूर मजाक की पराकाष्ठा यह कि ‘भूखे पेट’ को मार्क्स के उद्धरण बेच कर इनके एयर कंडीशनर का इंतज़ाम होता है. इन लोगों ने कोला और पेप्सी की तरह ही अपना उत्पाद बेचने का एक बिलकुल नया तरीका निकाला हुआ है. जिन-जिन कुकर्मों से खुद भरे हों, विपक्षी पर वही आरोप लगा उसे रक्षात्मक मुद्रा में ला दो. ताकि उसकी तमाम ऊर्जा आरोपों का जबाब देने में ही लग जाय. आक्रामक होकर वे इनकी गन्दगी को बाहर लाने का समय ही न सकें.

इस बारे में केवल दो उदहारण पर गौर कीजिये. राष्ट्रवादी-राष्ट्र भक्त समूहों के लिए दो विशेषण हमेशा इनके जुबान पर ही होता है. पहला साम्प्रदायिक और दूसरा फासीवादी होना. थोड़ी गंभीरता से सोचने पर ही ताज्जुब हो सकता है कि न तो कम्म्युनिष्टों से ज्यादा साम्प्रदायिक आज तक कोई पैदा हुआ है और फासीवाद-तानाशाह व्यवस्था का समर्थन तो इनके मूल में है. इनकी तो जात ही ऐसी है कि हर उस लोकतांत्रिक व्यवस्था को नष्ट-भ्रष्ट करो जो मानव को मानवीय गुणों से विभूषित करता हो. अभी अरुंधती पर लिखे इनके एक लेख में इनके शब्द हैं….लेखक के विचारों को आप कानून की तराजू में रखकर तौलेंगे तो बांटे कम पड़ जाएंगे…..!

अब आप सोचें….. फासीवाद का इससे भी बड़ा नमूना कोई हो सकता है? यह उसी तरह की धमकी है जब कोई आतंकवादी समूह कहता है कि मुझे गिरफ्तार करोगे तो जेल के कमरे कम पड जायेंगे. क्या कोई भी लेखक समूह अपने लिए ऐसी स्वतंत्रता चाहेगा जो हर तरह के क़ानून से मुक्त हो? इस बात से कौन इनकार करेगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बेहतर नमूना हमारा यह प्यारा ‘लोकतंत्र’ प्रस्तुत करता है. इन कठमुल्लों के स्वर्ग माने जाने वाले किसी भी देश में आप ऐसी आज़ादी नहीं पायेंगे. लेकिन बावजूद इसके अपने यहाँ भी क़ानून द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देते हुए भी कुछ युक्ति-युक्त निबंधन भी लगाया गया है. इस विषय पर प्रवक्ता पर भी अतिवादी लाल, दलाल और वाम मीडिया से पिसता अवाम काफी विमर्श हो चुका है. तो इस पर ज्यादा विमर्श न करते हुए भी इतना ज़रूर कहूँगा कि संविधान ने जिन अभिव्यक्तियों को दंड की श्रेणी में रखा है उनमें राज्य के विरुद्ध, उनको नुकसान पहुचाने वाले कृत्यों को सबसे प्रमुखता दी है.

तो अगर पंडित जी की बात मान ली जाय तो देश रसातल में पहुचेगा ही साथ ही कुत्सित मानसिकता का परिवार से लेकर राष्ट्र तक में कोई आस्था नहीं रखने वाला हर वामपंथी, स्वयम्भू लेखक ‘मस्तराम’ की तरह बन बाप-बेटी, भाई-बहन तक में सम्‍बन्ध स्थापित करने वाला लेख लिख वैचारिक हस्तमैथुन कर मस्त रहेगा.

इसी तरह एक दूसरा इनका उत्पाद है साम्प्रदायिकता का झांसा देना. आप अगर इनके घिनौने चेहरे पर नज़र डालेंगे तो पता चलेगा कि इन जैसा साम्प्रदायिक आज तक पैदा नहीं हुआ. आखिर आपने कभी भी ‘हिंदू’ के साथ ‘सम्प्रदाय’ विशेषण नहीं सुना होगा. वास्तव में हिंदू कोई सम्प्रदाय हो ही नही सकता है. सम्प्रदाय का आशय होता है ‘सम्यक प्रकारेण प्रदीयते इति सम्प्रदायः’ भावार्थ यह कि एक़ गुरु के द्वारा समूह को सम्यक प्रकार से प्रदान की गयी व्यवस्था ‘सम्प्रदाय’ कहलाता है. इस अर्थ में रामानंदी, निम्बार्की, शैब, शाक्त, वैष्णव, उदासी आदि या फ़िर मुस्लिम, सिक्ख, इसाई पारसी आदि तो सम्प्रदाय हो सकते हैं क्युकी यह सभी एक गुरु द्वारा दुसरे तक प्रदान की गयी व्यवस्था है. लेकिन हिंदुत्व तो सभी सम्प्रदाय रूपी नदियों को स्वयं में समेत लेने वाला समुद्र ही है. हिंदू कैसे सम्प्रदाय हो सकता है जिसका न कोई इकलौता गुरु या पैगम्बर है और न ही एक पूजा पद्धति.

हां यह ज़रूर है कि अगर सम्प्रदाय के शाब्दिक अर्थों में सोचा जाय तो दुनिया के घिनौने सम्प्रदाय में से एक है माओवादी सम्प्रदाय. इससे ज्यादा सांप्रदायिक आज-तक इसलिए कोई पैदा नहीं हुआ क्योंकि दुनिया ने भले ही इक्कीसवीं सदी में छलांग लगा दी हो, ये अपने पिता मार्क्स और माओ की स्थापना से रत्ती भर भी आगे जाने को तैयार नहीं हैं. न केवल इस मामले में अरियल हैं अपितु अपने (कु)पंथ के निमित्त खून की किसी भी दरिया को किसी जेहादी की तरह फांद लेने को तत्पर भी हैं. तो ऊपर के तथ्यों के बावजूद जब चतुर्वेदी जैसे लोग विषवमन कर अपना ज़हर राष्ट्र के खिलाफ उडेलते हैं, राष्ट्रवाद को सारी बुराइयों की जड बताते हैं तब स्वाभाविक रूप से खून खौलने लगता है….खैर.

अब सवाल यह पैदा होता है कि जैसा शुरुआत में कहा गया है कि इन जैसे तत्वों पर लिखने का निकृष्ट काम आखिर किया क्यूँ जाय? इनकी क्यूँ न जम कर उपेक्षा की जाय. इन तत्वों की समाप्ति का सबसे बड़ा उपाय तो यही है न कि इन्हें नज़रअंदाज़ किया जाय. लेकिन अफ़सोस यही होता है कि प्रवक्ता जैसा ईमानदार माना जाने वाला साईट भी शायद सस्ती लोकप्रियता के मोह से बच नहीं पा रहा है. अन्यथा पंडित जी द्वारा उड़ेली जा रही इतनी गंदगी का प्रवक्ता पर स्थान पाना कहां संभव होता. आप गौर करें….किसी एक ही लेखक का बाबा रामदेव पर सप्ताह में भर में सात लेख प्रकाशित करते आपने किसी साईट को देखा है? वो भी तब, जबकि कोई विशेष नहीं हुआ है रामदेव जी के साथ अभी. इसी तरह किसी भी साईट पर आपने अयोध्या मुद्दे पर एक ही लेखक के दर्ज़न भर आलेख देखे? वामपंथ पर इस तरह का सीरीज लेखन और राष्ट्रवाद को गरियाने की सुपारी अगर प्रवक्ता जैसे खुद को राष्ट्रवाद का सिपाही मानने वाले साईट ने जगदीश्वर जी को दे रखी हो तो आखिर किया क्या जाय?

अभी हाल में विभिन्न साइटों पर बुखारी से संबंधित लेख में एक लेखक ने अच्छा तथ्य उजागर किया है. उसके अनुसार एक सामान्य से मुल्ला, बुखारी को ‘बुखारी’ बनाने का श्रेय संघ परिवार को है. आपातकाल के बाद नसबंदी के कारण मुस्लिम, कांग्रेस से काफी नाराज थे. तब लेखक के अनुसार संघ समर्थित राजनीतिक दलों ने यह नारा लगाना शुरू किया था. ‘अब्दुल्ला बुखारी करे पुकार, बदलो कांग्रेस की सरकार.’ यह सन्दर्भ देते हुए लेखक का कहना था कि मुस्लिम तो कांग्रेस से तब नाराज़ थे ही अगर बुखारी का नारा नहीं लगवाया जाता तब भी चुनाव परिणाम वही होने थे. लेकिन बुखारी की मदद लेकर संघ ने बिना मतलब उसको मुसलमानों का रहनुमा बना दिया. यही निष्कर्ष प्रवक्ता के बारे में भी निकालते हुए संपादक से यह कहना चाहूँगा कि अगर वे निष्पक्ष दिखने के चक्कर में देश को इतनी गाली नहीं भी दिलवाएंगे तो भी उनकी पठनीयता क़म नही होगी. ज़ाहिर सी बात है कि जब आज वामपंथी अप्रासंगिक होते जा रहे हैं. संसद से लेकर सड़क तक, केरल के पंचायत से लेकर बंगाल के निगम से जब ये गधे की सिंग की तरह गायब होते जा रहे हैं तो किसी एक भड़ासी की क्या बिसात. तो किसी एक अनजाने से चतुर्वेदी जी को इतना भाव दे कर जाने-अनजाने प्रवक्ता एक नये बुखारी को ही जन्म दे रहा है. ये नए अब्दुल्ला भी ताकतवर हो कर सबसे पहले पत्रकारिता के मुंह पर ही तमाचा मारेंगे. भष्मासुर के कलियुगी संस्करणों ने खुद को असली राक्षस से ज्यादा ही खतरनाक साबित किया है. संपादक बेहतर जानते होंगे कि नया मुल्ला प्याज ज्यादे खाता है.

24 thoughts on “एक नया ‘बुखारी’ पैदा कर रहा है ‘प्रवक्ता’

  1. बहुत अच्छा विश्लेषण किया है श्री पंकज जी ने. सटीक लेखन और सटीक शीर्षक

  2. यदि दो टी.वी. एक दूसरे के सामने अलग-अलग चैनल पर सैट कर रख दिये जायें और फुल वाल्यूम पर चालु कर दिये जायें तो क्या होगा? दोनों टी.वी. कुछ कह रहे हैं पर दूसरा क्या कह रहा है, यह सुन पाने में असमर्थ हैं। वह दोनों टी.वी. एक दूसरे से जो कह रहे हैं, उसे अंग्रेज़ी में duologue कहते हैं dialogue नहीं ।

    श्री चतुर्वेदी जैसे कम्यूनिज़्म के प्रचारकों से यह आशा नहीं की जानी चाहिये कि वह किसी से शास्त्रार्थ करेंगे । वह अपने दोनों कानों में उंगली डाल कर सिर्फ और सिर्फ बोलते रहने के अभ्यस्त हैं। कल यदि देश में कम्यूनिस्ट शासन आ जाये तो शास्त्रार्थ और लोकतंत्र की कल्पना ही जड़ से समाप्त हो जायेगी। समाजवाद में विरोधी विचारधारा के व्यक्ति को जेल मिलती है किन्तु कम्यूनिस्ट शासन में गोली से भून दिया जाता है और इसे बड़े गर्व से सर्वहारा वर्ग की तानाशाही कहा जाता है।

    समस्या यह है कि कम्यूनिस्ट लोकतंत्र में रहते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लाभ उठाते हुए जो जी चाहे, कहते हैं और हम भी बहुत बड़े लोकतांत्रिक कहलाने के लोभ में इनको अपना वैचारिक मंच प्रदान करते हैं। पर कल यदि कम्यूनिस्ट सत्ता में हों तो ऐसे सभी वैचारिक मंचों को जड़ से उखाड़ फैंकना उनकी पहली प्राथमिकता होगी । विश्वास न हो तो पूछ लीजिये श्री चतुर्वेदी से । यदि ईमानदार कम्यूनिस्ट होंगे तो स्वीकार कर लेंगे कि हां, मार्क्सवाद का यही सिद्धान्त है।

  3. पंकज जी आप तो कांच लेकर वामपंथियों को दिखाने लगे , बद्सुरतों के लिए कांच सबसे बड़ा दुश्मन होता है . सत्य गर्भीत लेख के लिए हार्दिक बधाई .

  4. आदरणीय झा जी
    थिसिस,एण्टीथिसिस और सिँथेसिस का सारा अधिकार मार्क्स और माओ के चेलोँ के पास है।हीगल को इनलोगोँ ने पेटेँट किया हुआ है।बुद्धिवादी तो इनसे बढ़कर कोई हो सकता।नाहक ही आप अपने हाँथोँ को तकलीफ दे रहे है।इन शर्मनिरपेक्षोँ को कोई फर्क नहीँ पड़ने वाला।एक अच्छा आलेख,जितनी प्रशंसा की जाए कम है। http://www.atharvavedamanoj.jagranjunction.com

  5. झा साहब आप भी तो वही कर रहे हैं जो आपके विपक्षी करते है — तर्कों के स्थान पर खाली कुतर्क. हाँ आपका साइकिल वाला उदहारण अच्छा लगा. इससे हमारी शिक्षा व्यवस्था पर करारा व्यंग भी होता है. जब शिक्षक ही अज्ञानी होंगे तो छात्रों का भगवन ही मालिक है. और यह विश्व विद्यालय चतुर्वेदी जी और पंकज जी जैसे छात्र ही पैदा कर सकते हैं अनावश्यक मुद्दों को भारतीय विश्वविद्यालयों की एम. ए की कापी के उत्तरों की भांति खींचते है जहाँ उत्तर की गुणवत्ता इस पर निर्भर रहती है की kitna kikha gaya है na की kya. तो चतुर्वेदी जी baba ramdev पर 7 likhte हैं तो आप चतुर्वेदी जी पर 8 se kam mat likhiyega.

  6. चतुर्वेदी जी का लेखन एक हाईस्कूल विद्यार्थी की भांति होता है जिसे मास्टर मार मार कर सिखाता है की तेरा तो कोई विचार होता ही नहीं है तुझे तो उन महान विचारकों के विचार अपने दिमाग में भर कर कापी पर उड़ेलने हैं बस. हर लाइन से पहले एक भरी नाम लिखना जरूरी है. रही बात इनके वामपंथी होने की तो वामपंथ और दक्षिण पंथ दोनों लड़ते ही रहे हैं और उधर पूजी पंथ अपना लौह चक्र चला रहा है जिसके बीच “आवामपंथ” गायब हो गया है. अरुंधती राय के सन्दर्भ में मुझे बोरिस पस्त्रनक की बात याद अति है. बोरिस ने नोबेल पुरस्कार ठुकरा दिया था और कहा था की डॉक्टर जीवागो में मैंने अपने देश की जो आलोचना की है वह नोबेल पाने के लिए नहीं अपितु अपने देश से प्यार के कारण की है. काश अरुंधती भी ऐसा ही कह पातीं पर अब तो वे लोकप्रियता के लिए ही कह रहीं हैं और छप रही हैं.

  7. बहुत सुंदर और सटीक लेख ।
    पढ़कर बहुत कुछ जानने समझने को मिला ।
    पुनःश्च बधाई ।

  8. पंकज जी, अपने महान लेखक महा-विद्वान श्री जगदीश चतुर्वेदी महोदय के विचारों से ( या यूं कहें की गालियों से ) आप या डा० राजेश कपूर , अनिल सहगल आदि अन्य पाठक व्यर्थ ही आहत हो रहे हो …… साधारण हिन्दी भाषी वाम को बायां या उलटा ( पंजाबी में खब्बा ) कहते है .. एक रिकशा चलाने वाले अनपढ़ व्यक्ति को भी कहा जाता है की उलटी ओर मुड़ो तो वह बाएँ ओर चल पड़ता है … अब यदि कोई वामपंथी उलटी भाषा बोलता है तो “ यथा नाम तथा गुण “ को ही तो चरितार्थ कर रहा है…

    जैसे बालू मथ कर तेल पाने की आशा नहीं की जा सकती वैसे ही किसी उलट्पंथी से आप सीधी बात की अपेक्षा नहीं कर सकते … देशभक्तों को देश-द्रोही कहना उलटे पंथ की मजबूरी है यही उनका धर्म भी है …

    ये कहते हैं की लेखक का कोई धर्म नहीं होता … यदि धर्म नहीं होता तो क्या लेखक को अधर्मी कहा जाए ? इनके महाज्ञान को स्वीकारें तो आदिकवि बाल्मीकी तो लेखक थे ही नहीं …. इनका फरमान है की लेखक का कोई देश नहीं होता … यदि ऐसा मान लें तो बाल गंगाधर तिलक जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी जिनके लेखों की आग ने स्वतंत्रता की जंग में प्राण फूंक दिये थे , वे लेखक थे ही नहीं ……

    . लगता है कि इनका मानना है कि लेखक का धर्म नहीं होता पर पंथ जरूर होता है .. शायद इसी लिए यह अपने परिचय में अपने को वामपंथी चिन्तक कहते हैं …

    वैसे भी जो अपने आप को किसी देश का न माने उसका वोट देने का अधिकार तो समाप्त ही कर देना चाहिए क्योंकि उसके लिए देश का नागरिक होना जरूरी है …. अपने महान उलट्पंथी विद्वानों को स्वयं ही यह अधिकार सरंडर कर देना चाहिए …

    मैं तो सोचता हूँ कि अंधे के आगे रोइए, अपने नैन खोइए वाली कहावत को मानते हुए इन बेचारों को कुछ न कहा जाए …… उलट पंथियों से उल्टियों की ही आशा करनी चाहिए जो वे कर रहें हैं ……. गोपाल कृष्ण अरोडा

  9. पत्रकारिता तो पहले से ही अपने मुँह पर तामचा मार चुकी है, जिस पत्रकारिता को गणेश शंकर विद्यार्थी और दीन दयाल उपाध्‍याय जैसे महान पत्रकारो ने नये आयाम दिया उसी पत्रकारिता को आज के दो कौड़ी के पत्रकारों ने दो टके की रोटी के लिये अपनी कलम की लाज ही बेच दी है। पत्रकरों की यही नीति रही तो वो तमाचे ही जूते भी खायेगे।

    मानता हूँ बुखारी का पत्रकार को तमाचा मारना गलत था किन्‍तु जिस प्रकार की आज मीडिया का कृत्‍य है वो जूता खाने वाला है। रही संघ की बात तो कभी कोई सर्वश्रेष्‍ठ नही होता है, कोई भी खिलाडी हर दिन बेस्‍ट नही देता और हर नेता हर बार चुनाव जीत जाये कम ही होता है। उसी प्रकार कभी संघ कमजोर होता है तो कभी मजबूत भी होगा।

  10. पुनर्विचार के पश्चात् एक विनम्र सुझाव – चतुर्वेदी जी के विचार का विरोध करें लेखन का नहीं …. आपकी वैचारिक विजय तभी संभव है यदि आप दोनों लिखते रहें और प्रवक्ता उन विचारों को यथासंभव स्थान देता रहे .

  11. मै बहुत दिनो से सोच रहा हू कि ऎसी आम धारणा क्यो बन गई है कि हरेक मुसलमान आतंकी और हरेक वामपंथी देशद्रोही क्यो लगता है ! लेकिन पिछ्ले दिनो की कुछ घटनाए और कुछ आलेखो के कारण उस धारणा का कारण समझ मे आ गया. हो सकता है सभी मुसलमान और सभी कम्युनिस्ट आतंकी और देशद्रोही न हो लेकिन ऎसी धारणा अरुधतियो, गिलानियो, चतुर्वेदियो के कारण ही बनती है.
    एक चोर की कहानी सुनी है. एक बार एक चोर चोरी कर रहा था. इसी दरम्यान घर के लोग और आस-पास के लोग जग गये. चोर पकडा ना जाये इसलिये सुनियोजित रणनीति के तहत चोर-चोर…चोर की आवाज लगाते हुए भागने लगा. कुछ लोग भी चोर का शोर सुन उसके पीछे भागे. चोर ही चोर को ढूढने वालो का नेता बन बैठा.
    सबसे बडे फंडामेंट्लिस्ट, साम्प्रदायिक, फासीवादी, हिंसक, धर्मान्ध गिरोह का नाम है कम्युनिस्ट. यह गिरोह बहुरुपिया भी है- कभी मार्क्सवादी, कभी वामपंथी, तो कभी सर्वहारा और नक्सली-माओवादी के नाम से जाना जाता है. यह गिरोह न तो किसी को शांति से जीने देता है, न खुद शांति से जीता है. बस एक ही नारा- मरो और मारो !
    पंकज जी ने इस गिरोह का पर्दाफाश किया है. वे हम सबकी शुभकामना और बधाई के पात्र है. बस उस वामपंथी मित्र का नाम भी बता देते जिसने “सायकिल पार्ट्स की वैचारिक थ्योरी विकसित की तो बडी कृपा होगी.

  12. पंकज जी आपका लेख सौ सुनार की तो एक लुहार की, वाला है । सम्प्रदाय की परिभाषा कापी कर रहा हूं । कई नई चीजें जानने को मिली । आपका आभारी हूं ।

  13. “वास्तव में हिंदू कोई सम्प्रदाय हो ही नही सकता है. सम्प्रदाय का आशय होता है ‘सम्यक प्रकारेण प्रदीयते इति सम्प्रदायः’ भावार्थ यह कि एक़ गुरु के द्वारा समूह को सम्यक प्रकार से प्रदान की गयी व्यवस्था ‘सम्प्रदाय’ कहलाता है. इस अर्थ में रामानंदी, निम्बार्की, शैब, शाक्त, वैष्णव, उदासी आदि या फ़िर मुस्लिम, सिक्ख, इसाई पारसी आदि तो सम्प्रदाय हो सकते हैं क्युकी यह सभी एक गुरु द्वारा दुसरे तक प्रदान की गयी व्यवस्था है. लेकिन हिंदुत्व तो सभी सम्प्रदाय रूपी नदियों को स्वयं में समेत लेने वाला समुद्र ही है. हिंदू कैसे सम्प्रदाय हो सकता है जिसका न कोई इकलौता गुरु या पैगम्बर है और न ही एक पूजा पद्धति.”

    . . . विचारणीय है … इस विषय पर एक विस्तृत लेख की अपेक्षा है .

  14. कौन कहता है की हिन्दू आतंकवादी नहीं होता जगदीश्वर जी को पढ़कर ये गलतफहमी दूर हो गयी अब संघ को भी आतंकवादियों की परिभाषा बदलनी होगी

  15. pankaj ji
    pravakta sabhi ke liye hai aur sabhi ko yahan likhne ka adhikar hai. marx aur unke supporters ko gali dene se pahle apne gireban mein jhank kar dekhiye. aap ko comunist aur jagdishwar ji ka artile accha nahi lagta but jab aap bjp aur rss ke talve chate ho to dusron ko apka article kaisa lagta hoga. aap jagdishwar ji aur unke jaise writers ke virodh karte ho but muslim aur communalism ki baaten karne walon ka virodh kyon nahin karte. aap jaise kunthit writers se kya ummed karen.
    Mazharuddeen Khan Editor Rajasthan Gaurav Newspaper Bhiwadi.

  16. पंकज झा का लेखन ”पीड़ा से उपजे गान” की तरह पसंद आया. जो लोग आती कर देते हैं उनके विरुद्ध बार-बार खडा होना ही पड़ता है. लगे रहो.

  17. पंकज जी का विश्लेषण सही है. एक सीमा तक हिन्दू विरोध की अभिव्यक्ती होते रहने से पता चलता है कि कौनसी शक्तियां, किस सीमा तक राष्ट्र विरोधी हैं और क्या कर रही हैं. किन्तु भारतीयता विरोधयों को जरूरत से अधिक महत्व व स्थान देना सचमुच अनुचित लगता है.
    – चतुर्वेदी जी और डा. मीना जी के भारतीयता विरोधी लेखन से कुछ विशेष लाभ भी हुए है—
    १. क्रिप्टो क्रिश्च्नों तथा वामपंथियों की भारत विरोधी नीयत का अनेक उन लोगों को भी पता चला जो इनकी असलियत नहीं जानते थे.
    २. वामपंथियों व ईसाई संगठनों द्वारा मिलकर किये जा रहे भारत को दुर्बल बनाने, तोड़ने के षड्यंत्रों का भी कुछ खुलासा हुआ है.
    ३. राष्ट्र विरोधयों के विरुद्ध सशक्त ढंग से लिखने वाले अनेक दूर दृष्टी वाले नए-नए टिप्पणीकार निर्मित हो गए हैं. यह कोई छोटी उपलब्धी नहीं.
    – कुछ लेखकों व इन टिप्पणीकारों को पढ़ने के बाद इतनी संतुष्टी हो जाती है कि लिखने की इच्छा ही नहीं होती. जो मुझे कहना होता है वह सब तो इन सज्जनों द्वारा पहले ही मुझ से भी अधिक अछे ढंग से कहा जा चुका होता है.
    – चुनौती हमें सम्पूर्ण ऊर्जा से कार्य करने के लियी प्रेरित करती है. चतुर्वेदी जी व डा. पुरुषोत्तम मीना जी जैसों ने भारतीयता के विरुद्ध इतना विष वामन न किया होता तो आप सब लोग भी शायद इतने सक्रीय व जुझारू न बने होते.
    – फिर भी ऐसे भारत-भारतीयता विरोधियों को एक सीमा से अधिक स्थान देना उचित नहीं जो कि स्वामी रांदेव जी के विषय में हुआ है. विश्वास है कि सम्पादक महोदय इसका भविष्य में ध्यान रखेंगे.
    – पंकज झा जी को इस विश्लेषात्मक, सार्थक लेखन हेतु साधुवाद !

  18. एक नया ‘बुखारी’ पैदा कर रहा है ‘प्रवक्ता’ – by – पंकज झा

    (१) प्रवक्ता.कॉम संपादक महोदय के अपने मापदंड होंगे जिस कारण श्री जगदीश्वर चतुर्वेदी जी को इतना स्थान दिया है.

    (२) मेरी राय में चतुर्वेदी जी अपना बोरी-बिस्तर बंद करने की सोच ही रहे होंगे. बेशर्मी ही हद होती है और वह इसे पार करने ही वाले हैं. वह quit march करने ही वाले ही होंगे. Amen

    फिर प्रवक्ता.कॉम पाठकों को उनकी याद आया करेगी की वह भी कोई अनोखी चीज़ थे.

    प्रवक्ता.कॉम को उनकी farewell की भी सोचनी बनती है. जूते मार कर तो विदा नहीं किया जाता है न.

    (३) मेरी पूछो तो मैंने चतुर्वेदी जी से बहुत कुछ सीखा है, पाया है. मैं उनका बहुत आभारी हूँ. जरूरत पढने पर साइकिल चलाना तो सिखा ही दिया है.

    (४) सर्कस में जोकर का रोल बहुत जरुरी होता है. चतुर्वेदी जी अच्छा रोल कर रहे हैं.

    (५) Every cloud has a silver lining अब हम विचारें कि क्या चतुर्वेदी जी का कचरा पढ़ कर प्रवक्ता.कॉम पाठकों को कुछ भी सोचने को विवश नहीं किया चतुर्वेदी जी ने.

    (६) चतुर्वेदी जी का लेख लिखने का record होगा. लेखों का honorarium भी नहीं और इतनी सारी बातों का ठीकरा अलग.

    हे राम – बुरा न मानें.

    – अनिल सहगल –

  19. जी पंकज जी,
    मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ! मैंने इसी आशय के साथ एक टिप्पणी भी की थी जिसे सम्पादक जी ने कारणवश नहीं छापा हालांकि उसमे ऐसा कुछ नहीं था की प्रकाशित न किया जा सके. मुझे अभी भी संदेह है की संपादक जी मेरी टिप्पणी को प्रकाशित करते हैं या नहीं! अगर नहीं तो मैं शायद ही प्रवक्ता पर वापिस आने का सोचूं या किसी और को पढने के लिए प्रेरित करूँ! आपकी प्रवक्ता पर कुछ समय से अनुपस्थिति को मैं समझ सकता हूँ …………. चलिए देखते हैं !

  20. आदरणीय पंकज भाई निश्चित तौर पर आपका लेख सटीक है| मैंने भी अब इन चतुर्वेदी जैसों को पढना व टिपण्णी करना छोड़ दिया है| इन जैसों को पढने और टिपण्णी देने का अर्थ है इनकी टीआरपी बढ़ाना| बचपन में हमें स्कूल में सिखाया जाता था कि जो बच्चा अधिक बदमाशी करता है उस पर ध्यान ही मत दो, क्यों कि वह आपका ध्यान आकर्षित करने के लिए ही शैतानी करता है|
    चतुर्वेदी जैसों को अमृत पिलाओ तो वह इन्हें विष का स्वाद देता है, ज्ञान दो तो इन्हें अज्ञान प्रतीत होता है| हमारे गाँव में कहावत है की गधे की आँख में घी डालो तो वह चिल्लाता है कि मेरी आँख फोड़ दी| शायद चतुर्वेदी भी उसी श्रेणी में आ गया है|
    बहरहाल आपके इस सुन्दर लेख के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद|

  21. ” क्रूर मजाक की पराकाष्ठा यह कि ‘भूखे पेट’ को मार्क्स के उद्धरण बेच कर इनके एयर कंडीशनर का इंतज़ाम होता है”.
    “कुत्सित मानसिकता का परिवार से लेकर राष्ट्र तक में कोई आस्था नहीं रखने वाला हर वामपंथी, स्वयम्भू लेखक ‘मस्तराम’ की तरह बन बाप-बेटी, भाई-बहन तक में सम्‍बन्ध स्थापित करने वाला लेख लिख वैचारिक हस्तमैथुन कर मस्त रहेगा” .

    इतना सब कुछ लिखने के बाद भी “इन्हें”शायद ही शर्म आये | बहुत सही लिखा है आपने |

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