भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन कैसे पुष्ट हुआ

केवल कृष्ण पनगोत्रा

(जानते हैं उन आंदोलनकारी विद्रोहों को भी जिनसे राष्ट्रवाद की भावना जागृत हुई। इन विद्रोहों को कमतर करके नहीं आंका जा सकता)

1857 में मंगल पांडेय ने स्वतंत्रता के लिए जिस संग्राम का शंखनाद किया, उसकी पृष्ठभूमि वस्तुतः बहुत पहले तैयार होना शुरू हो गई थी। स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रवादी इतिहास में उसका उल्लेख नाम मात्र ही किया जाता है।
भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध दो प्रकार के आंदोलन चले- अहिंसक और क्रांतिकारी। भारत की आजादी के लिए 1757 से 1942 के बीच जितने भी आंदोलन, विद्रोह हुए वे सभी पूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बने।
इतिहास के सूक्ष्म अध्ययन से ही उस कालखंड पर दृष्टिपात होता है। इससे पहले कि हम उन तत्वों और घटनाओं का शाब्दिक चित्रण करें, भारत में राष्ट्रवाद की प्रमुख घटनाओं की महत्ता को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
देखा जाए तो एक प्रकार से 1941 से 1918 तक चलने वाले प्रथम विश्व युद्ध के बाद महात्मा गांधी जी ने राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया। असहयोग आंदोलन, नागरिक अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन उनके नेतृत्व में चलने वाली प्रमुख घटनाएं थीं। राष्ट्रीय आंदोलन में 13 अप्रैल, 1919 के दिन पंजाब के अमृतसर में जलियांवाला बाग की दु:खद घटना ने राष्ट्रवादी भावना को उद्वेलित करने में विशेष भूमिका निभाई। 1919 में अंग्रेजों के विरुद्ध चलने वाले राष्ट्रीय आंदोलन में अली बन्धुओं ने तब मोर्चा खोल दिया जब प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की से हुए अन्याय का विरोध किया। इस विरोध को ही खिलाफ़त आंदोलन कहा जाता है। 1927 में ब्रिटिश सरकार ने जॉन साइमन के नेतृत्व में एक आयोग नियुक्त किया जिसका कार्य 1919 के विधेयक का पुनर्रावलोकन करना था। यह आयोग तीन फरवरी, 1928 को भारत पहुंचा, जिसका भारतीयों ने इसलिए विरोध किया क्योंकि इसमें एक भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया था।
चूंकि भारतीयों ने प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार की सहायता की थी, अत: आशा यह थी कि अंग्रेजी शासन भारतीयों को विशेषाधिकार देकर प्रसन्न करेगी। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। गांधी जी के नेतृत्व में लोगों ने इसका जम कर विरोध किया और समूचे देश में असंतोष फैल गया। अंग्रेज़ भयभीत हो गए और उन्होंने 1919 में दमनकारी रौलट्ट एक्ट पारित कर दिया। पहली बार भारतीयों ने धार्मिक पहचान को दरकिनार करते हुए बतौर भारतवासी ब्रिटिश सरकार के इस काले कानून का विरोध किया। इसके पश्चात 1921 में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन चलाया लेकिन उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा गांव में हई हिंसक घटना के कारण गांधी जी ने इसे वापिस ले लिया और सत्याग्रह शुरू कर दिया।
1929 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का सत्र लाहौर में हुआ, जिसमें संपूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया गया। उधर ब्रिटिश सरकार ने नवम्बर 1930 को पहली गोल मेज़ कान्फ्रेंस बुलाई ताकि साइमन कमीशन द्वारा प्रस्तावित सुधारों को कोई शक्ल दी जा सके। कांग्रेस का इस कान्फ्रेंस का बहिष्कार किया। 1932 में लार्ड इरविन गांधी जी को अवज्ञा आंदोलन को समाप्त करने और दूसरी गोल मेज़ कान्फ्रेंस में भाग लेने के लिए राजी कर लिया। गांधी इसमें शामिल हुए मगर कुछ भी प्राप्त नहीं कर सके। साइमन कमीशन का सिफारिशों के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने 1935 में एक एक्ट पास किया जिसमें प्रांतीय स्तर पर निर्वाचित सरकारें गठिया करने का प्रावधान था। इसके अंतर्गत 1937 में देश के ग्यारह प्रांतों में चुनाव हुए। कांग्रेस ने सात प्रांतों में बहुमत प्राप्त किया। इस बीच 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया और ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस से मशविरा किए बिना भारत को युद्ध में भागीदार घोषित कर दिया। विरोध स्वरूप कांग्रेस के समस्त मंत्रियों ने नवम्बर 1939 में त्यागपत्र दे दिया।
तो हम ने देखा कि भारतीयों का दमन करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने पहले और दूसरे विश्व युद्ध के बीच कई कानून बनाये। अन्ततः 15 अगस्त, 1947 को भारत ने अंग्रेजी राज से स्वतंत्रता पाई।

राष्ट्रवाद को प्रेरित करने वाले अनदेखी घटनाएं:

*सन्यासी विद्रोह-
बंगाल में सबसे ज्यादा अत्याचार हिंदुओं पर होता था। अंग्रेजों ने हिंदुओं को उनके तीर्थ स्थानों पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। परिणामत: शांत रहने वाले संन्यासियों में असंतोष फैल गया।
बंगाल में अंग्रेजों की नीति के चलते जमींदार, कृषक, शिल्पकार सभी की स्थिति बदतर हो गई थी।
बंगाल में जब 1770 ईस्वी में भयानक अकाल आया तो अंग्रेज सरकार ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया और जनता को उनके हाल पर ही छोड़ दिया।
बंगाल में हिंदुओं का धर्मांतरण चरम पर था। गरीब जनता की कोई सुनने वाला नहीं था।

*नील विद्रोह(1859-60)

नील विद्रोह (Indigo-rebellion) 1859 में बंगाल किसानों द्वारा किया गया था। यह विद्रोह 1857 की क्रांति के बाद किया गया सबसे पहला संगठित विद्रोह था। दरअसल किसान अपनी उपजाऊ जमीन पर चावल की खेती करना चाहते थे मगर अंग्रेज नील की खेती करवाना चाहते थे। इस विद्रोह के आरम्भ में नदिया जिले के किसानों ने 1859 के फरवरी-मार्च में नील का एक भी बीज बोने से मना कर दिया। यह आन्दोलन पूरी तरह से अहिंसक था।  इस आंदोलन की विशेष महत्ता या थी वो इसमें भारत के हिन्दू और मुसलमान दोनो ने बराबर का हिस्सा लिया। किसानों को दमन का सामना करना पङता था।

*रामोसी विद्रोह(1822)

पश्चिमी घाट में रहने वाले ‘रामोसी जाति’ के लोगों ने 1822 ई. में अपने नेता सरदार ‘चित्तर सिंह’ के नेतृत्व में यह विद्रोह किया। रामोसी विद्रोह अकाल और भूख की समस्या के चलते प्रारम्भ हुआ था। 1825-26 में भारी अकाल के चलते रामोसियों ने उमाजी के नेतृत्व में फिर से विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह 1839 तक निरंतर चला।

* अल्लूरी सीता राम विद्रोह(1922-24)

(Alluri Sitarama Raju) अपने अनुयायी आदिवासियों की सहायता से अंग्रेजो के विरुद्ध सशस्त्र विदोह करके स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने के प्रयत्न आरम्भ कर दिए। आरम्भ में उनका मुख्य उद्देश्य पुलिस थानों पर आक्रमण करके वहा से शस्त्रास्त्र छीनना था जिससे सशस्त्र विद्रोह को आगे बढाया जा सके। 22 अगस्त 1922 से मई 1924 तक राजू के दल ने दसियों पुलिस थानों पर कब्जा करके हथियार लुट लिए।  स्थिति आ गयी कि सरकार ने थानों में हथियार रखना ही बंद कर दिया। मलावार से पुलिस बुलाई गयी पर वह भी राजू के दलों के सामने नही टिक सकी। अंत में सेना बुलानी पड़ी। उसने पहले राजू के प्रमुख सहयोगियों को पकड़ा और अंत में 7 मई 1924 को अल्लूरी राजू भी उसकी पकड़ में आ गये। उन्होंने सेना की पकड़ से भी निकल भागने का प्रयत्न किया तो इसी में गोली मार दी गयी। इस प्रकार लगभग दो वर्षो तक ब्रिटिश सत्ता की नींद हराम करने वाला यह वीर शहीद हो गया।
इन विद्रोहों के अतिरिक्त ऐसे कई छोटे विद्रोह हुए हैं। भारत में राष्ट्रवाद की अलख जगाने में इन विद्रोहों की महत्ता को न तो दरकिनार किया जा सकता है और न ही कमतर करके आंका जा सकता है। खास बात यह थी कि ये समस्त आंदोलन धर्म और जाति आधारित मानसिकता से प्रेरित नहीं थे बल्कि विदेशी शासकों के विरुद्ध नैसर्गिक अधिकारों को प्राप्त करने हेतु उत्पन्न हुए थे। इन्हीं आंदोलनों के कारण भारत ‘अनेकता में एकता’ की भावना का पूरे विश्व में डंका आज तक बजा रहा है।•
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