लेखक परिचय

आर.एल. फ्रांसिस

आर.एल. फ्रांसिस

(लेखक पुअर क्रिश्वियन लिबरेशन मूवमेंट के अध्‍यक्ष हैं)

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 आर.एल.फ्रांसिस

इसी 24 अगस्त को कंधमाल के सांप्रदायिक दंगों को चार वर्ष पूरे हो जाएंगे, पर लगता है कि इन चार वर्षो में हमने कुछ भी नहीं सीखा। हालही में बरेली, आगरा या उतर पूर्व की घटनाएं यही बताती है। सांप्रदायिकता चाहे कैसी भी हो वह अंतत: राष्ट्रविरोधी ही होती हैं। वह एक धर्म के अनुयायियों को दूसरे धर्म के अनुयायियों के विरुद्व खड़ा करने और राष्ट्र की एकता की जड़ों को खोदने का काम करती है। धार्मिक कटटरवाद पर अधारित हिंसा को बढ़ाने के लिए यह सांप्रदायिक सोच ही जिम्मेदार है। भारतीय समाज और राजनीति में सांप्रदायिकता की जड़े पिछले डेड दो सौ सालो से बहूत मजबूत हुर्इ है और इसी के चलते 1947 में देश विभाजन इसकी सबसे बड़ी त्रासदी थी।

 

सांप्रदायिकता ने आधुनिक भारत के धार्मिक इतिहास को आकार देने में एक महत्वपूर्ण रोल अदा किया है। बि्रटिश राज की ‘फूट डालो और राज करो नीति के कारण ही देश धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों में विभाजित कर दिया गया – मुस्लिम बाहुल्य वाला पाकिस्तान (जिसमें वर्तमान का इस्लामिक पाकिस्तान एवं बंगलादेश शामिल हैं) विभाजन के समय इतने बड़े पैमाने पर आबादी की अदला-बदली (1 करोड़ 20 लाख ) हुर्इ जिससे भीषण और व्यापक जनसंहार हुआ। शायद दुनिया के किसी देश में विभाजन के समय इतना व्यापक जनसंहार नही हुआ होगा। हालांकि भारत का गणतंत्र धर्मनिरपेक्ष है और इसकी सरकार किसी धर्म को आधिकारिक रुप से मान्यता प्रदान नहीं करती है

 

इसके बावजूद भारत विभाजन ने पंजाब, बंगाल, दिल्ली तथा देश के कर्इ अन्य हिस्सों में हिन्दूओं, मुस्लमानों तथा सिखों के बीच हुए दंगों और मारकाट के कारण सांप्रदायिता का ऐसा बीज बो दिया जिसे पनपने से रोकने के लिए राजनीतिक नेतृत्व ने कोर्इ ठोस प्रयास ही नही किये। आजाद भारत में एक दशक बाद ही साल 1961 में मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर को सांप्रदायिक दंगों ने जकड़ लिया था इसके बाद से अब तक न जाने कितने ही सांप्रदायिक दंगे हो चुके है। 1969 में गुजरात के दंगे हो या 1984 में सिख विरोधी हिंसा, 1987 में मरेठ शहर में दंगा जो दो महीने तक चलता रहा जिसमें कर्इ निर्दोष लोग को अपनी जान गंवानी पड़ी। 1989 में भगलपुर का दंगा या 1992 -93 में हुए दंगे कितनी ही जान-माल की क्षाति उठानी पड़ी। 2002 के गुजरात दंगे और 2008 में कंधमाल की हिंसा या अभी पिछले एक महीने से सुलग रहा बरेली हो या फिर असम जिसमें लाखो लोग बेघर हो गए है।

 

सांप्रदायिक दंगों के कारण मानवता को इतना गहरा अघात लगता है कि उससे उबरने के लिए कर्इ कर्इ दशक लग जाते है। दंगों की चपेट में आए परिवारों का सब कुछ तहस नहस हो जाता है। रोज-रोटी की समास्या अलग से खड़ी हो जाती है। कंधमाल में चार साल पहले हुए दंगो के चलते हजारों घर जला दिये गए। यह सांप्रदायिक दंगे र्इसाइयों और गैर र्इसार्इ अदिवासियों के बीच हुए थे। दोनो ही वर्गो को जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा। विदेशी लेखक माइकल पारकर ने अपनी पुस्तक ”हारविस्ट आफ हेट -कंधमाल इन क्रासफायर में इन दंगों के बाद लोगो के सामने खड़ी कठनाइयों और दंगा भड़कने के कारणों का जिक्र किया है।

सांप्रदायिक हिंसा के पीडि़तों के लिए न्याय पाना और जीवन को दोबारा पटरी पर लाना बेहद कठिन होता है। सरकार एवं सरकारी मशीनरी मारे गए लोगों और हुए नुकसान की भरपार्इ के लिए मामूली मुआवजा देकर मामले से पीछा छुड़ा लेते है इसके बाद पीडि़तों का शोक-गीत सुनने वाला कोर्इ नही होता। कंधमाल के र्इसार्इ इस ममाले में थोड़े खुशनसीब निकले कि चर्च ने उनका जीवन दोबारा पटरी पर लाने के लिए राहत और पुर्नवास पर करोड़ों रुपये खर्च किये है। सरकार द्वारा दी जाने वाली बीस से पचास हजार की मदद के इलावा चर्च ने अपनी तरफ से तीस हजार रुपये प्रत्येक र्इसार्इ परिवार को मुहैया करवाए है। कंधमाल हिंसा में पीडि़त र्इसार्इ परिवारों के नाम पर चर्च संगठनों ने विश्व के कर्इ देशों से अनुदान प्राप्त किये। कैथोलिक ले-मैन ने मांग की है कि प्रत्येक चर्च-कैथोलिक,प्रोंस्टेंट,इवैंजेंलिक और पेंटीकास्ट को कंधमाल में 2007 से अब तक किये गए खर्च का ब्योरा तैयार करने की जरुरत है। जाहिर है कि आर्थिक मदद करने वाली एजेंसियां और देश और दुनिया भर के लोग यह जानना चाहेंगे कि उनके दान किए धन से पीडि़तों को कितना लाभ हुआ। उल्लेखनीय है कि इन चर्चो ने दुनिया भर के र्इसार्इ देशों से कंधमाल पीडि़तों के नाम पर इक्कठा किये गए धन का आज तक कोर्इ लेखा-जोखा देश के सामने नही रखा है।

सांप्रदायिक हिंसा के दौरान और बाद में विभिन्न धर्मो-वर्गो की संस्थाए एवं राजनीतिक तंत्र अपने वर्ग के प्रभावित लोगों की सहायता के लिए सक्रिय हो जाता है वह अपने-अपने समुदाय के लोगों को लेकर राहत कैंप और उनके पुर्नवास की व्यवस्था करने के लिए धन संग्रह करने में जुट जाते है। सरकारे पीडि़तो से अपना पल्ला छुड़ाने के लिए इस तरह के धुव्रीकरण को शाह देती है जिससे हिंसा प्रभावित लोगो में आपसी भार्इचारा पनपने की जगह और अलगाव बढ़ने लगता है। 2002 की गुजरात हिंसा और 2008 की कंधमाल हिंसा इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है।

क्या कारण है कि एक धर्मनिरपेक्ष देश में साप्रदायिकता की आग ठंडी होने के स्थान पर लगातार सुलगती ही जा रही है वह भी ऐसे देश में जिसका अपना कोर्इ आधिकारिक धर्म नहीं है। 42वें संविधान संशोधन द्वारा इसे और मजबूती दी गर्इ है। इसके बावजूद कुछ राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता पाने के लालच में कुछ धर्मो एवं सांप्रदायों को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे है। कांग्रेस पार्टी ने अपने 84वें अधिवेशन में सांप्रदायिकता के विरुद्व प्रस्ताव पास कर हल्ला बोलने की घोषणा की थी लेकिन वह धरातल पर ऐसा करती कहीं दिखार्इ नही देती। पिछले साल बरेली में हुर्इ सांप्रदायिक हिंसा पर कर्इ मुसलमान बुद्विजीवियों ने कांग्रेस की तरफ अुंगली उठार्इ थी। उनका मानना था कि सांप्रदायिक हिंसा में धर्म से ज्यादा राजनीति का रोल है।

हालही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने असम का जिक्र करते हुए कहा है कि सांप्रदायिक हिंसा देश की मिली जुली संस्कृति पर हमला है और इससे कड़ार्इ से निपटने की जरुरत है। आज जरुरत इस बात की भी है कि सरकार ऐसे सांप्रदायिक दंगो से निपटने के लिए एक विशेष ढांचा देश के नगरिकों की सहयता से खड़ा करे। यह दुखद है कि पिछले छ:ह दशकों से हम ऐसे किसी प्रयास की और नही बड़े है। हमने केवल राजनेताओं और कुछ गिने चुने मुठठी भर (सवा करोड़ की आबादी में से डेड सौ) लोगो को लेकर राष्ट्रीय एकता परिषद खड़ी कर ली है। जिसकी बैठक बुलाने में महीनों ही नही साल लग जाते है। सरकारी छत्रछाया में चलने वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में भी ऐसे लोग भर दिये जिनकी कार्यशैली पर देश का बहुसंख्यक अंगुली उठा रहा है।

सांप्रदायिक हिंसा एवं दंगों से निपटने और विभिन्न सांप्रदायों, वर्गो, धर्मो एवं समूहों के बीच आपसी सौहार्द बनाए रखने के लिए जिला,ब्लाक,शहर,गांव स्तर तक की समितियां बनार्इ जानी चाहिए। ऐसी समितियों में शामिल किये जाने वाले व्यकितयों को सरकारी तौर पर मानदेय उपलब्ध करवाया जाना चाहिए और उनकी प्राथमिकता अपने क्षेत्र में आपसी सौहार्द को बनाये रखना होना चाहिए। किसी भी देश के विकास के लिए परस्पर सांप्रदायिक सौहार्द का होना बेहद जरुरी है अगर हम अपने बजट का कुछ मामूली हिस्सा खर्च करके कोर्इ ऐसा तंत्र विकसत करने में सफल होते है तो यह देश और समाज दोनो के हित्त में होगा।

 

One Response to “सांप्रदायिकता से कैसे निपटे -भारत”

  1. Anil Gupta

    विद्वान् लेखक ने साम्प्रदायिकता से निबटने के लिए जो चिंता व्यक्त की है वह उचित ही है.लेकिन दंगे कैसे रुकें और कैसे सौहार्द का वातावरण बने ये महत्वपूर्ण है. मेरे विचार में इस देश के सभी लोग एक ही नस्ल के हैं. ये तथ्य हेदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेलुलर एंड मोलेकुलर बायोलोजी ने एक विस्तृत जांच में लगभग पांच लाख लोगों का डी एन ए टेस्ट किया और ये प्रमाणित किया की इस देश के सभी लोग वो चाहे किसी भी क्षेत्र के या किसी भी पंथ के हों वो सभी एक ही ही डी एन ए के हैं अर्थात सभी एक ही नस्ल के हैं.अलग अलग लोगों ने अलग अलग पूजा पद्धति अपनाई हैं लेकिन इससे रक्त सम्बन्ध नहीं बदल जाते हैं. साथ ही बहुत से लोगों ने कुछ ऐतिहासिक परिस्थितियों में apni मूल aastha बदल di. लेकिन yadi sab ये sweekar karen की sabke purkhe एक ही the और unhe apne purkhon par abhiman है to samasya kaafi had tak sulajh sakti है.

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