आपात्काल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और स्मृतियां – भाग-२

आपातकाल की ३७वीं बरसी पर विशेष

विपिन किशोर सिन्हा

आपात्काल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और स्मृतियां – भाग-१

मैंने उसी दिन से रात में हास्टल में रहना छोड़ दिया। क्लास खत्म होने के बाद अलग-अलग रास्ते से विश्वविद्यालय से बाहर निकलता और दूर के रिश्ते के अपने मामाजी के यहां रात गुजारता। पढ़ाई बुरी तरह बाधित हो रही थी। इस लुकाछिपी से तो जेल जाना ही अच्छा लग रहा था। संगठन में मुझसे वरिष्ठ कोई छात्र रह नहीं गया था। आन्दोलन को गतिमान रखने के लिए संघ द्वारा मुझे गिरफ़्तारी से बचने की सलाह दी जा रही थी। वैसे मैं तो कब का गिरफ़्तार हो गया होता यदि दिन में कालेज से गिरफ़्तारी होती। उपकुलपति कालू लाल लाल श्रीमाली दिन के उजाले से बहुत डरता था। इमर्जेन्सी के प्रारंभिक दिनों में वह दिन में कोई कार्यवाही नहीं करता था।

हमने छात्रों का मनोबल बनाए रखने के लिए सक्रिय छात्रों की एक नई टीम बनाई। डा. प्रदीप सिंह, होमेश्वर वशिष्ठ, विष्णु गुप्ता, इन्द्रजीत सिंह, शरद सक्सेना, अरुण प्रताप सिंह और मैं, कोर ग्रूप के सदस्य थे। इन छः क्रान्तिकारियों का परिचय दिए बिना यह लेख अधूरा रहेगा।

१. डा. प्रदीप सिंह – बिहार के सासाराम जिले का रहने वाला यह क्रान्तिकारी अत्यन्त जोशीला था। कठिन से कठिन कार्य करने के लिए सदैव प्रस्तुत रहता था। रज्जू भैया से उसने सशस्त्र क्रान्ति की अनुमति मांगी। बहुत समझाने-बुझाने के बाद वह अहिंसक आन्दोलन के लिए सहमत हुआ था। मेडिकल कालेज में वह तृतीय वर्ष का छात्र था, रुइया छात्रावास में रहता था। इस समय अपने गृह नगर में कार्यरत है।

२. होमेश्वर वशिष्ठ – धौलपुर, राजस्थान का रहने वाला यह क्रान्तिकारी मूल रूप से कवि था। बड़ी सारगर्भित कविताओं की रचना करता था लेकिन सिद्दान्तों और आदर्शों के लिए मर-मिटने के लिए प्रतिबद्ध था। माइनिंग इन्जीनियरिंग का अन्तिम वर्ष का छात्र होमेश्वर सी.वी. रमन हास्टल में रहता था। इस समय धौलपुर में एरिया मैनेजर।

३. इन्द्रजीत सिंह – बलिया का निवासी मेटलरजिकल इन्जीनियरिंग के तृतीय वर्ष का छात्र था, मौर्वी हास्टल में रहता था। लंबाई साढ़े छः फीट की थी। भीड़ में भी अपनी लंबाई के कारण दूर से पहचाना जाता था। अत्यन्त मृदुभाषी लेकिन कुशाग्र बुद्धि का यह स्वयंसेवक किसी भी परिस्थिति में झुकता नहीं था। डिग्री हासिल करने के बाद इसने स्वयं का उद्योग लगाया। इसकी कंपनी राजपूत इन्जीनियरिंग में निर्मित थर्मोकपुल भारत मे सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

४. अरुण प्रताप सिंह – ला अन्तिम वर्ष के छात्र, भगवान दास हास्टल में रहते थे। उम्र में हमलोगों से काफी बड़े थे। स्वाभाविक नेतृत्व क्षमता के धनी अरुण जी इमर्जेन्सी में हमलोगों के अभिभावक थे। मन-मस्तिष्क और शरीर से बलिष्ठ यह क्रान्तिकारी सोनभद्र का रहने वाला था। इस समय राबर्ट्सगंज के बड़े वकीलों में उनकी गणना होती है।

५. विष्णु गुप्ता – मौन तपस्वी, मेधावी, अल्पभाषी, दृढ़प्रतिज्ञ और विचारों पर अडिग। संघ के समर्पित निष्ठावान कार्यकर्त्ता। मेकेनिकल इन्जीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का यह छात्र मेरा प्रिय मित्र और सहपाठी रहा है। हमदोनों धनराजगिरि छात्रावास में रहते थे। विष्णु बदायूं का रहनेवाला है। इस समय हिन्दुस्तान एरोनटिक्स लिमिटेड, लखनऊ मे महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत है।

६ शरद सक्सेना – अत्यन्त मृदुभाषी यह क्रान्तिकारी लखनऊ का रहने वाला था। मेरा सहपाठी और अभिन्न मित्र शरद मेकेनिकल इन्जीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र था और विश्वकर्मा हास्टल में रहता था। उसे हम अजातशत्रु कहते थे। उसके विचारों और कार्यों में गज़ब की दृढ़ता थी। जो सोच लेता था, करके ही दम लेता था। अपने दोस्तों की हरसंभव सहायता करने के लिए हमेशा तत्पर रहा करता था। इस समय नौ सेना के मझगांव डाक, मुंबई में महाप्रबंधक।

एक दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) ने सिद्धगिरि बाग के एक गुप्त स्थान पर स्वय़ंसेवकों की बैठक ली। उस बैठक तक पहुंचना भी किसी जासूसी फिल्म के दृश्य से कम रोमांचक नहीं था।

मुझे यह सूचना मिली कि मुझे अपने पांच विश्वस्त सहयोगियों के साथ लंका स्थित पुषालकर जी के दवाखाने (ऊषा फ़ार्मेसी) में दिन के ठीक बारह बजे पहुंचना है – बिना किसी सवारी के पैदल। वहां छः सायकिल सवार पहले से उपस्थित थे। उन्होंने हमें अपनी-अपनी सायकिलों पर बैठाया और कमच्छा में एक स्वयंसेवक दिवाकर के घर के सामने छोड़ दिया। वहां दो आदमी पहले से तैनात थे। हममें से तीन को एक के पीछे जाना था और शेष तीन को दूसरे के पीछे। हम दो ग्रूपों में विभक्त हो चुके थे। दोनों ग्रूपों ने अलग-अलग गलियों में प्रवेश किया। पता नहीं किस रास्ते हम रमापुरा पहुंचे। रिले रेस की तरह हमलोग अलग-अलग स्वयंसेवकों के मार्गदर्शन में गोदौलिया, लक्सा, गुरुबाग होते हुए सिद्धगिरि बाग पहुंचे। वहां पहले से ही लगभाग ५० स्वयंसेवक एक हाल में उपस्थित थे। सर्वत्र शान्ति थी; कोई किसी से न परिचय पूछ रहा था, न बात कर रहा था। दिन के ठीक तीन बजे रज्जू भैया कक्ष में प्रकट हुए। मैंने पूर्व में उन्हें कई बार देखा था, लेकिन उस दिन उन्हें पहचान नहीं पाया। उनके चेहरे से उनकी मूंछे गायब थीं। सदा धोती-कुर्ते में रहनेवाले उस दिन पैंट-शर्ट पहने थे। उन्होंने हंसते हुए स्वयं अपना परिचय दिया –

“मेरे नए हुलिए को देख आप शंकित न हों। मैं आपका रज्जू भैया ही हूं।”

उनकी आवाज़ सुन मैं आश्वस्त हुआ कि वे रज्जू भैया ही थे। फिर भी मैं अपनी जिज्ञासा रोक नहीं पाया, पूछ ही लिया –

“रज्जू भैया, आपने यह वेश क्यों धारण कर रखा है? आपकी मूंछे कहां चली गईं?”

रज्जू भैया किसी भी गंभीर विषय को क्षण भर में ही सहज बना देते थे। हंसते हुए बोले –

“मूंछें तो अपनी खेती हैं, जब चाहा उगा लिया, जब चाहा काट लिया। रही बात वेश-भूसा की, तो मैंने सोचा कि क्यों नहीं कालेज के दिनों को याद कर लिया जाय। इन्दिरा गांधी की खुफ़िया पुलिस मुझे इस रूप में देखने की आदी नहीं है।”

हाल में एक ठहाका लगा और सभी तनावरहित हो गए।

रज्जू भैया ने बताया – आर.एस.एस, जनसंघ, विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय मज़दूर संघ, विद्यार्थी परिषद, सेवा समर्पण संस्थान, विद्या भारती आदि आनुषांगिक संगठन, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी, लोकदल, समाजवादी पार्टी इत्यादि सभी गैर कांग्रेसी पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व जेल में है। पूज्य सरसंघचालक बाला साहब देवरस को भी गिरफ़्तार किया जा चुका है। सिर्फ़ वे और नानाजी देशमुख ही बाहर हैं। पूरे देश में लाखों स्वयंसेवको की गिरफ़्तारी हो चुकी है। देश के सभी जेलों में क्षमता से अधिक राजनैतिक बन्दी हैं। इसलिए अब और गिरफ़्तारी देने की आवश्यकता नहीं है। प्रचार तंत्रों पर सरकार ने पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया है। आकाशवाणी को इन्दिरा वाणी की उपाधि मिल चुकी है। पूरा देश सही समाचारों के लिए बी.बी.सी. पर आश्रित है। लेकिन सभी लोग बी.बी.सी. नहीं सुन पाते हैं। हमें अपने ढंग से अपने नेटवर्क के माध्यम से जनता तक सही बात पहुंचानी है। हमें लोकसंपर्क के माध्यम से अलख जगाने का काम करना है। इसके लिए अबतक गिरफ़्तारी से बचे कार्यकर्त्ताओं को गिरफ़्तारी से बचते हुए भूमिगत होकर कार्य करना है। समय-समय पर आपलोगों को आवश्यक निर्देश, पत्रक और साहित्य स्वयमेव उपलब्ध हो जाएगा। उसके सुरक्षित वितरण की जिम्मेदारी आपलोगों पर है। हमारा यह नेटवर्क पूरे देश में कार्य कर रहा है। शीघ्र ही इमर्जेन्सी कि यह काली रात समाप्त हो जाएगी। विजय ही विजय है।

मात्र एक घंटे में बैठक समाप्त हो गई। कार्यकर्त्ता अपूर्व उत्साह से भर उठे। हम जैसे गए थे, वैसे ही वापस भी आए। मैं किन रास्तों से बैठक स्थल पर गया था, मुझे आज भी याद नहीं है। वैसे भी बनारस की गलियां किसी भूल-भुलैया से कम नहीं हैं।

डा. प्रदीप ने पता नहीं कहां से एक हिन्दी टाइप राइटर और एक साइक्लोस्टाइल मशीन पा ली। केन्द्र से छपी सामग्री मिलने के पूर्व वह चार पृष्ठ का एक स्थानीय पत्र निकालना चाह रहा था। मुझे संपादन का दायित्व दिया। टाइप करने और छापने का काम उसने स्वयं लिया, वितरण के लिए नेटवर्क तो था ही। ‘रणभेरी’ नाम दिया गया उस पाक्षिक का। अभी चार ही अंक छपे थे कि एक रात पुलिस का छापा पड़ा और सारी सामग्री पुलिस उठा ले गई। उस रात प्रदीप हास्टल में नहीं था। किसी ने मुखबिरी की थी, लेकिन वह बच गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसके इस अपराध को बेहद संगीन माना। उसे हास्टल और विश्वविद्यालय से निकाल दिया। पुलिस ने उसपर मीसा तामील की लेकिन अपने लाख प्रयासों के बावज़ूद भी उसे गिरफ़्तार करने में सफल नहीं हो सकी। उसके घर कुर्की-ज़ब्ती की नोटिस भेजी गई। परिवार वालों को आसन्न संकट से बचाने के लिए कोर कमिटी ने प्रदर्शन के साथ प्रदीप को गिरफ़्तारी देने की सलाह दी। होमेश्वर वशिष्ठ, विष्णु और अरुण जी उसे अकेले भेजने के पक्ष में नहीं थे। एक दिन कृषि विद्यालय की प्रत्येक कक्षा में प्रदीप, अरुण जी और होमेश्वर ने घुसकर लंबा भाषण दिया। हमलोग पर्चे बांट रहे थे। यह कार्यक्रम लंच के पहले किया गया, लेकिन पुलिस नहीं आई। गिरफ़्तारी नहीं हो पाई। वहीं पर यह घोषणा की गई कि अपराह्न में यही क्रान्तिकारी आर्ट्स कालेज और साइंस कालेज के बीच खाली मैदान में भाषण देंगे।

हमलोग वापस चले आए। दोपहर के बाद भोजनोपरान्त हमलोग साइंस कालेज पहुंचे। वहां पुलिस तैनात थी। छात्रों के क्लास में जाने के पूर्व प्रदीप, होमेश्वर, इन्द्रजीत और अरुण जी ने चारों दिशाओं में खड़े होकर छात्रों को संबोधित करना आरंभ कर दिया। आर्ट्स और साइंस कालेज के अधिकांश छात्र शीघ्र ही उपस्थित हो गए। १००-५० की भीड़ अचानक जनसमूह में परिवर्तित हो गई। पुलिस अग्रिम कार्यवाही के लिए जबतक उच्चाधिकारियों और वी.सी. से निर्देश लेती, तबतक सभी पत्रक बंट चुके थे, क्रान्तिकारी भाषण जारी थे, जनसमूह के “इन्दिरा गांधी- मुर्दाबाद” के नारे से आकाश गूंज रहा था। नारेबाजी और तालियों की गड़गड़ाहट की आवाज़ संस्कृत संकाय और मिन-मेट तक पहुंच रही थी। आधे घंटे के बाद पुलिस ने कार्यवाही की, खूब लाठियां भांजी। भीड़ तितर-बितर हो गई, सैकड़ों घायल हुए। मुझे भी इमर्जेन्सी का प्रसाद मिला। दो-तीन लाठियां मेरे शरीर पर भी पड़ीं। लेकिन प्रदीप, होमेश्वर, इन्द्रजीत और अरुण जी डटे रहे। इन्द्रजीत कुछ ज्यादा ही जोश में था। योजनानुसार उसे गिरफ़्तारी नहीं देनी थी। उसे सिर्फ़ पत्रक बांटने थे। लेकिन वह भी भाषण में शामिल हो गया और अन्त तक डटा रहा। छात्रों के सामने पुलिस ने उनपर कोई प्रहार नहीं किया, सिर्फ़ गिरफ़्तार किया। चारो वीर योद्धा नारे लगाते रहे। चारों को भेलूपुर थाने में ले जाया गया। वहां पुलिस ने अपना गुस्सा उतारा। मेज़ पर उनकी हथेलियां ज़बर्दस्ती रखकर बेंतों की वर्षा की गई। लात-घूंसों और थप्पड़ों से जमकर पिटाई की गई। मां-बहन की गालियां दी गईं अलग से।

क्रमशः

3 COMMENTS

  1. आप्लोगोंने जिस तरह से काम किया वह प्रेरनादायी है. अच्छा हुआ की अपने उसे लिपिबद्ध किया
    जिन्होंने काम किया वो आज क्या सोचते होंगे?
    सत्ता भी जनता ने दी पर …
    दरभंगा में हमारी बैठकें गोविन्दच्र्या व प्रान्त प्रचारक देवजी के साथ होय्थी थीं – साहित्य भी हम बाता करते थे- पर उस शहर में उस समय मैं नया था -बहुत पहचाना नहीं जा सका..चापरा में अभी प्रक्टिस में डॉ CN गुप्ता हैं उनके घर गोविन्दजी की बैठक हुई थी – उनकी पत्नी मुझे बहुत मानतीं थी -एक दिन कहा- ये सन कौन लोग आते रहते हैं , अच्छा नहीं लगता.. मैंने कहा-;भाभी क्या मैं नहीं औं?..प्रेम से बोली-‘ नहीं आप या गोविन्दजी के बारे में मैं ऐसा नहीं सोचती..
    न जाने कितने परिवारों ने यातनाएं झेलीं,,,हमारा उन सबों को आदर्पुर्वार्क स्मरण..

  2. मैं खाली इमरजेंसी शब्द ही सुनता था, लेकिन आज पहली बार आँखों देखी या यूं कहें भुक्तभोगी की दास्ताँ सुन रहा हूँ (ऐसा लग रहा है जैसे मैं आपसे कमेंटरी सुन रहा हूँ ). आजादी के क्रांतिकारियों के किस्से सुनता था, और आज इमरजेंसी के क्रांतिकारियों के किस्से सुन रहा हूँ. आपका बहुत बहुत शुक्रिया.

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