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    Homeसाहित्‍यकवितामानव सभ्यताएं

    मानव सभ्यताएं

    उसकी आँखे खुली थी या बंद
    ये कह पाना मुश्किल सा ही था
    क्योकि उसकी आँखो के बाहर
    बड़ी बड़ी तख्तियां लटक रही थी
    जिस पर लिखा था मानव सभ्यताएं
    उसकी नाक के नथुने इतने बड़े थे
    की पूरी पृथ्वी समां जाये
    उसका मुँह ऐसा था
    जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सभ्यताओं
    को यही से निगला गया हो
    आप उसकी गर्दन को लम्बा कहेंगे
    तो आपको नर्क भेजा जायेगा
    और छोटा कहेंगे तो भी
    आप उसके कंधे देख चढ़
    कर कुलांचे भरना चाहेंगे
    पर वो जगह
    मानव सभ्यता के अनुकूल नहीं
    आप उसकी छाती देखकर
    खेत बनाना चाहेंगे
    पर वहाँ पर्वतों के अलावा कुछ नहीं,

    आप उसके पेट पर बनी
    नाभि को देखकर नाभि को
    ब्रह्माण्ड का केंद्र मान लेंगे
    आप उसकी कमर देखकर
    उसके चारो ओर
    पक्की सड़क बनाना चाहेंगे
    उसकी जाँघे आपको
    सभी नदियों का
    उदगम स्थल लगेगी
    उसकी पिंडलिया आपको
    हवा से बाते करती झरनों सी लगेगी
    उसके पैर आपको गाँधी की
    अहिंसा से भी ज्यादा
    मुलायम महसूस होंगे
    जिसके नीचे दफ़न है
    न जाने कितनी सारी
    मरी और सड़ी मानव सभ्यताएं!

    मंजुल सिंह
    मंजुल सिंह
    शिक्षा- सिविल इंजीनियरिंग, एम.ए. (हिंदी), यू.जी.सी (नेट/जे.आर.एफ-हिंदी), वर्तमान में अध्यनरत

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