मियाँ कबीर, तुम क्यों रोने लगे?

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

मेरे एक दोस्त हैं सीताराम सिंह वे हमारे साथ जेएनयू में पढ़ते थे,वे रूसी भाषा में थे और मैं हिन्दी में था। वे स्वभाव से बागी और बेहद क्रिएटिव हैं। अभी फेसबुक पर मिले और बोले कि पुरूषोत्तम अग्रवाल की किताब पढ़ रहा हूँ कबीर पर। मुझे उनकी बात पढ़कर एक बात याद आयी कि लोग जिस बात को मानते नहीं है उसकी हिमायत में लिखते क्यूँ हैं ? इस प्रसंग में मुझे सआदत हसन मंटो याद आए और उनका कबीर पर लिखा एक वाकया याद आ रहा है। वाकया यूं है-

‘‘छपी हुई किताब के फ़रमे थे,जिनके छोटे-बड़े लिफ़ाफ़े बनाए जा रहे थे।

कबीर का उधर से गुजर हुआ- उसने दो-तीन लिफ़ाफे उठाए और उन पर छपी हुई तहरीर पढ़कर उसकी आंखों में आंसू आ गए।

लिफ़ाफ़े बनानेवाले ने हैरत से पूछाः ‘‘ मियाँ कबीर,तुम क्यों रोने लगे? ’’

कबीर ने जबाब दियाः ‘‘ इन कागजों पर भगत सूरदास की कविता छपी हुई है… लिफ़ाफ़े बनाकर इसकी बेइज़्ज़ती न करो।’’

लिफ़ाफ़े बनानेवाले ने हैरत से कहाः ‘‘जिसका नाम सूरदास है,वह भगत कभी नहीं हो सकता।’’

कबीर ने ज़ारो-क़तार(फूट-फूटकर) रोना शुरू कर दिया।’’

मैं सोचता हूँ कि पुरूषोत्तम अग्रवाल की कबीर पर किताब और उनकी लोकसेवा को देखकर कबीर फूट-फूटकर रो रहे होंगे। जीवन और कर्म में इतनी बड़ी फांक कबीर झेल नहीं सकते।

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