लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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जुलाई 2004 की उनींदी सुबह। पत्रकारिता की डिग्री प्राप्त एक युवक प्रदेश के एक राजनीतिक मीडिया में काम करने का नियुक्ति पत्र लिये रायपुर स्टेशन पर उतरा। साथ में एक झोला लिए, एक ऐसा झोला जिसमें निम्न मध्य वर्गीय परिवार के सपने बंद थे और थे दो जोड़ी कपड़े तथा अपने लिखे और प्रकाशित कुछ आलेख। अपने इसी बैसाखी की दौलत वो दिल्ली से आकर एक नये राज्य की नयी राजधानी और नये लोगों के बीच पांव जमाने की फिराक में था। कुछ इस तरह की “करने चला था पार समंदर को आज वो, लेकिन वो हाथ में लिए कागज की नाव था…” ! उस समय का रायपुर एक कस्बेनुमा उंघता-अनमना, अलसाया सा शहर था, एक ऐसा शहर जिसपर जल्द से जल्द राजधानी जैसा बन जाने का भूत सवार था। कुछ उसी तरह जैसे उस युवक को भी पत्रकार बन जाने का। आज जब इस अंजाने से युवक की आंखों से रायपुर को देखा जाय तो अद्भुत, अलौकिक, चमत्कारिक परिवर्तनों का शहर जान पड़ता है यह तो। तब से खारून में भले ही काफी पानी न बहा हो लेकिन रायपुर तो मैट्रो जनित रफ्तार से चल पड़ा। साथ ही प्रदेश का मीडिया भी उसी रफ्तार से कदमताल करने लगा, तेजी से विकसित होते इस अवसरों के राज्य के साथ। कहते हैं हर क्रिया के समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है। निश्चय ही शहर के इस विकास के समानुपाती रूप में ही अच्छी और बुरी चीजें भी मीडिया में साफ-साफ दिखने लगी।
किसी ने सच कहा है कि अगर कोई अहंकारी हो तो “ज्ञान” उसके घमंड का शमन कर सकता है. लेकिन उसका क्या इलाज़ है जिसको “ज्ञान” का ही घमंड हो. ऐसे ही मेधा के घमंड में चूर दिल्ली के कुछ दुकानदार आदिवासियों को पीट-पाटकर उनकी हत्या और बलात्कार को प्रोत्साहन देने वाले राक्षसों को मंच प्रदान कर अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास करते रहते हैं. बहती हुई नर्मदा में हाथ धो पाने में असफल कुछ पेशेवर अब मजलूम आदिवासियों के जान और माल के पीछे हाथ धो कर पड़े हैं. उनका नया निशाना है प्रदेश का मीडिया जिसको पानी पी-पी कर कोसने और उनको बदनाम करने में ये गिरोह कोई कसर बाकी नहीं रख रहा है. जबकि माधव राव सप्रे की गौरव परंपरा वाले प्रादेशिक समाचार माध्यमों ने -कुछ अपवादों को छोड़कर- सदा ही अपने सरोकारों में राष्ट्रीय कहे जाने वाले, वामपंथियों  के हाथ में खेलने  वाले मीडिया को आइना दिखाया है. हाल ही में राजधानी के प्रेस क्लब ने ऐसे गिरोहों को मंच देने से वंचित रखने का प्रस्ताव पारित किया है. इन्ही सब आलोक में लेखक ने प्रदेश के मीडिया के अपने अनुभवों को सूत्रबद्ध किया है.
 यदि अच्छी चीजों की बात करें तो प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या नक्सलवाद के विरोध में -कुछेक अपवादों को छोड़कर- जिस तरह का रूख यहॉं के अखबारों ने दिखाया उसकी जितनी तारीफ की जाय वह कम है। कम से कम कुछ संवेदनशील मुद्दे पर तो इसने राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया को भी आईना दिखाया है। आपको याद होगा जब देश के सारे इलेक्ट्रानिक चैनल आरूषि को न्याय दिलाने में व्यस्त थे। जिस समय सारे समाचार माध्यम उस पीडि़त परिवार के हर रात लेखा जोखा मांगने की “पुनीत” जिम्मेदारी निभा रहा था। रायपुर अपने 26 लाख बस्तरिया भाई-बहनों को नक्सली ब्लैक आउट से मुक्त करने के प्रयास में सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था। यह भी याद रखने योग्य है कि जब कथित मराठी, राज ठाकरे मुबंई को अपनी बपौती साबित करने की जद्दोजहद में लगा था और बार-बार फटकारे जाने के बाद भी हिंदी मीडिया स्थानीय टीवी चैनलों से फुटेज ले-ले कर उसे प्रसारित करने में व्यस्त था वहॉं रायपुर का एक अखबार धमतरी निवासी एक दूसरे ठाकरे, राजू ठाकरे की खबर मुख्यता से प्रकाशित कर रहा था। इस “ठाकरे” ने रंभा इंगोले नाम की एक वृद्धा की मृत्यु हो जाने पर उन्हें अपनी मॉं बनाकर उनका अंतिम संस्कार एवं श्राद्ध कर्म अपने हाथों से किया था। तो ये जो राज ठाकरे और राजू ठाकरे में फर्क है, आदमीयत और भलमनसाहत का, कमोवेश रायपुर के समाचार माध्यम ने, कथित राष्ट्रीय मीडिया के बरक्स वही फर्क कायम रखा है।
 यहॉं के मीडिया की एक और सबसे बड़ी सफलता जो कही जायगी वो है छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का सम्मान दिलवाना। कोई लाख कुछ कह ले लेकिन वह कथित आंदोलन केवल और केवल अखबारों के माध्यम से ही चलाया गया। बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के मुठ्ठीभर बुद्धिजीवियों द्वारा शुरू किये गये उस दोस्ताना संघर्ष को, मुखर लेकिन मूक जनभावनाओं की नब्ज जिस तरह से अखबारों ने पकड़ी और जितनी जल्दी सरकार का ध्यान आकृष्ट करने में सफल रही, वैसी सफलता तो टीआरपीवादी मीडिया सपने में भी नहीं सोच सकती। इसके अलावे जब-जब किसी समूह विशेष या कुछ मीडिया द्वारा प्रदेश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने का प्रयास किया गया, छत्तीसगढ़ ने उसे मुंहतोड़ जवाब देने में पल भर की देरी नहीं की। याद कीजिए… एक कुंठित लेखक ने दिल्ली से प्रकाशित एक साहत्यिक पत्रिका में बस्तर-बालाओं का अपमान किया था, प्रदेश के सभी अखबारों ने एक स्वर में “हंस” की चाल चलने  वाले कौए, उस असभ्य पत्रिका की बखिया उधेड़ कर रख दी थी। या एक खूबसुरत, लोकप्रिय नेत्री को अपने प्रायोजित  रिपोर्ट  के माध्यम से बेइज्जत करने का प्रयास एक राष्ट्रीय चैनल के स्थानीय संवाददाता द्वारा किया गया तो उसे भी दुत्कारने में स्तंभ लेखकों ने कोई कसर बाकी नहीं रखी। एक अखबार ने उसके कैमरे की तुलना बंदर के हाथ में उस्तरा तक से कर दी थी।
ऐतिहासिक आदिवासी आंदोलन सलवा जुडूम की चर्चा किये बिना यहाँ का  मीडिया विमर्श संभव ही नहीं है। इस महान आंदोलन का दुष्प्रचार जिस तरह जाने या अनजाने में गैर छत्तीसगढ़ी मीडिया ने किया है, नक्शा में देखकर भी मुश्किल से एर्राबोर और रानीबोदली को पहचान सकने की अक्षमता के बावजूद दिल्ली में रहने वाले “भाई” लोगों ने सुनी-सुनायी बात या दुष्प्रचार के आधार पर जितनी भड़ास निकाली, जिस तरह से बिना मतलब प्रदेश को बदनाम किया गया, सैकड़ों आदिवासियों के मारे जाने, लाखों गरीबों के अंधकार में झोंक देने पर ऊफ तक न करने वाले, नोटिस तक नहीं लेने वाले दिल्ली के मीडियाखोरों,भाई लोगों ने, किसी नक्सली की सामान्य गिरफ्तारी पर भी हायतौबा मचायी, उसके लिए इतिहास उन लोगों को कभी माफ नहीं करेगा। कई बार तो इस मामले में ऐसी हास्यास्पद स्थिति आयी कि एक ही अखबार में एक ही दिन में जिस घटना की स्थानीय संपादक द्वारा तारीफ की गई उसी अखबार के दूसरे पन्ने पर दिल्ली के सम्पादक द्वारा उसी समाचार की भर्त्सना भी की गई।
 लब्बोलुबाब यह कि छत्तीसगढ़ के समाचार माध्यमों ने अपने सामाजिक सरोकारों का परिचय देकर अपनी जिम्मेदार रिपोर्टिंग द्वारा निश्चय ही सप्रे जी की परंपरा को आगे ही बढ़ाया है। उनकी पुनीत आत्मा को गौरवान्वित होने का अवसर दिया है। साथ ही रायपुर द्वारा दिल्ली को आईना दिखाने का काम भी किया गया है। हालकि इतनी अच्छी बातों के बावजूद  कुछ विसंगतियों से इनकार नहीं किया जा सकता । खासकर विज्ञापन और समाचार में फासला निरंतर कम होते जाना, या समाचारों का संबंध डायरेक्टली विज्ञापनों से जोड़ देना, ऑंख मूंद कर विरोध या समर्थन, विचारधारा के प्रति अति आग्रह, संगठनों के प्रेस विज्ञप्ति पर अधिक निर्भरता, कस्बायी संस्करणों की बाढ़ के बावजूद गॉंव-मड़ई की खबरों का कम होते जाना आदि कुछ राष्टीय मीडिया की बीमारी से यदा-कदा छत्तीसगढ़ भी संक्रमित नज़र आ जाता है। यह  ऐसी चीजे हैं जिसपर निश्चय ही ध्यान देने की ज़रूरत है। लेकिन लाख दवावों एवं दुष्प्रचारों के बावजूद डट कर उपरोक्त अमानवाधिकारियों का मुकाबला किया है वह स्वर्णिम इतिहास बन गया है. 
    खैर, जब उपरोक्त वर्णित वह युवक अपनी झोला उठाये किसी अन्य पड़ाव तक जाने को उद्यत होगा तो उस थैले में ये ढेर सारी अच्छी यादें होंगी और होगा ढेर सारी उम्मीद की छत्तीसगढ़ के भी ढेर सारे नये और प्रतिभाशील लोग मीडिया में आ कर अपने देश और प्रदेश की तकदीर गढ़ने में योगदान देंगे, तमाम विघ्न-बाधाओं, वामपंथियों के वाबजूद। विभिन्न तरह के सद्भावों के इस सेतु बंधन में गिलहरी के समान ही सही, स्वयं के भागीदार होने का आत्मसंतोष यहाँ का मीडिया उपलब्ध कराते रहेगा।
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3 Responses to “मैं सच कहूं अगर तो तरफदार मत कहो – पंकज झा”

  1. Ranjana

    शब्दशः सहमत हूँ आपसे…

    इलेक्ट्रानिक मिडिया से तो अब कोई आशा ही न बची है,परन्तु प्रिंट मिडिया यदि अपने कर्तब्यों का पालन करे तो कोई शंशय नहीं की यह लोकतंत्र का मजबूत चौथे खम्भे के रूप में पुनर्प्रतिष्ठित न हो जाए…

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  2. Jeet Bhargava

    बहुत ही सटीक लिखा है आपने. तथ्यों के साथ पूरी पोल-पट्टी खोलकर रख दी. आखिर मानवाधिकार के नाम पर हम कब तक नक्सलवाद और जेहादी आंतकवाद की त्रासदी झेलते रहेंगे? इनका शिकार नहीं हुए लोग ही ऐसी खोखली बाते करके हिंसा के हमदर्द बन सकते हैं. यह मानवाधिकारवादी उन लोगो के बारे में कब सोचेंगे जिन्होंने इस हिंसा में अपना जान-माल खोया है? छत्तीसगढ़िया पत्रकारों को नमन. आप ने न केवल उस राज्य के दुख-दर्द को जाना और महसूस किया बल्कि उसीके होकर उसके उत्थान में समर्पित भी किया. यह बेहद ही खुशी की बात है. छत्तीसगढ़ का मीडिया इस बात का सबूत है कि सकारात्मक और राष्ट्रवादी पत्रकारिता में वाकई दम होता है. चाहे कितने ही विध्न क्यों ना हो.

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