आचार-व्यवहार की कोरोना-संहिता का पालन न किया तो फिर रोना पड़ेगा

 -डॉ. वीरेन्द्र सिंह चौहान-

कोरोना रुपी दैत्य की विषैली जकड़न में कम से कम 60,000 अमेरिकियों की मौत तय मानते हुए (रविवार की पत्रकार वार्ता में डोनाल्ड ट्रम्प ने स्वीकार किया) भी अमेरिका चरणबद्ध ढंग से अपनी अर्थव्यवस्था की लोक-डाउन जैसी बेड़ियों को खोलने चला है। इधर अपने यहाँ संक्रमित और मरने वालों की संख्या पर अपेक्षाकृत प्रभावी अंकुश लगने के बाद सोमवार से भारतीय अर्थ तंत्र के कपाट भी सीमित मात्रा में खुल जाएंगे।

लॉक डाउन 3 मई तक जारी रहना है।मगर संक्रमण के हॉटस्पॉट क्षेत्रों को छोड़कर तुलनात्मक ढंग से सुरक्षित समझे जा रहे भारत के एक बड़े क्षेत्र में आंशिक रूप से ही सही, कारोबार का चक्का घूमना शुरू कर देगा।ऐसा करना व्यापक लोकहित में माना जा रहा है। समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए यह बड़ी राहत की खबर है क्योंकि अपरिहार्य, अनिवार्य और अनपेक्षित लॉक डाउन सबसे अधिक उन्हीं के लिए दमघोटू साबित हो रहा है। केंद्र सरकार का लाखों करोड़ों रुपए का राहत पैकेज इस श्रेणी में आने वाले करोड़ों भारतीयों के लिए बहुत बड़ा संबल बना। मगर यह भी कटु सत्य है कि उसके सहारे बहुत लंबे समय तक चलते रहना न संभव है और न व्यवहारिक। हांफती अर्थव्यवस्था का और अधिक ठहराव कोरोनासुर रुपी विषाणु के समान्तर असह्य आर्थिक-मानसिक रुग्णता का सबब न बने,इसके लिए भी ऐसा करना आवश्यक हो चला है।

इसी लिहाज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोक डाउन संबंधी संबोधन में की गई घोषणा के अनुरूप पूरे देश में जमीनी स्थिति की केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित कड़े मानदंडों पर समीक्षा हुई है। उसी के आधार पर आर्थिक व अन्य प्रशासनिक गतिविधियों को खोलने संबंधी निर्णय लिए जा रहे हैं। मसलन, हरियाणा ने सोमवार से अपने सभी सरकारी कार्यालयों में कामकाज की बहाली के संबंध में आदेश जारी कर दिए हैं। आवश्यक सावधानियां बरतते हुए ‘ए’ और ‘बी’  श्रेणी के सभी अधिकारियों को शत प्रतिशत काम पर लौटने के लिए कहा जा रहा है। इसके विपरीत ‘सी’ व ‘डी’ श्रेणी के कर्मचारी बारी-बारी कार्यालय आकर ड्यूटी दे सकेंगे। प्रदेश में घर से निकलने पर मास्क पहनना या घर में निर्मित फेस कवर से मुंह ढकना अनिवार्य बनाया गया है। ऐसा न किए जाने पर दंडात्मक कार्यवाही का सामना करना पड़ेगा। इसी प्रकार अन्य गतिविधियों के संचालन के संबंध में विस्तृत दिशानिर्देश सार्वजनिक कर दिए गए हैं। पंजाब ने भी कर्फ़्यू में इसी शैली में रियायत देने की घोषणा की है। कमोबेश यही स्थिति देश के अन्य हिस्सों में भी रहेगी। एक अनुमान के अनुसार कुल मिलाकर लॉक डाउन का आर्थिक कुप्रभाव लगभग एक चौथाई कम हो जाएगा।

देश का इस दिशा में बढ़ना प्रथम दृष्टया सुकूनदायक प्रतीत होता है। मगर इस दिशा में पहलकदमी करते हुए प्रत्येक भारतवासी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेतावनी को ध्यान में रखना होगा। लॉक डाउन में मिलने वाली आंशिक छूट को कोरोना-युद्ध में भारत की जीत का ऐलान मानने की भूल बिल्कुल न की जाए। जिन्हें जिन कार्यों के लिए घर से निकलने के लिए छूट दी जा रही है, उन्हें कोरोना के पूर्ण पराभव तक उस छूट की सारी मर्यादाओं का पालन करना होगा। जिसे हम छूट का नाम दे रहे हैं कायदे से देखा जाए तो वह अधिक आचरणगत कड़ाई के साथ लागू होनी चाहिए।

फिलहाल, घर से निकलने का अर्थ स्वच्छंद होकर घुलना-मिलना कदाचित नहीं है। मुंह ढक कर निकलना, बारंबार हाथों को धोना या सैनिटाइज करना, न खुद किसी जमावडे में शामिल होना और न किसी को जमावड़े करने देना, यह कोरोना-काल में  शिष्टाचार आधार बिंदु हैं। इसे कोरोना काल की नूतन आचार संहिता या कोरोना कोड ऑफ कंडक्ट भी कह सकते हैं। इसका कड़ाई से अनुपालन नहीं हुआ तो अब तक हमारे परिवेश में खुला घूम रहा अदृश्य कोरोनासुर सबको एक बार फिर से घर के दरवाजे वाली लक्ष्मण रेखा के पीछे धकेल देगा। अभिप्राय यह कि हम भारतीयों को आचार-व्यवहार की इस नूतन कोड को अपने दैनंदिन स्वभाव का अंग बनाना पड़ेगा।

30 करोड से अधिक आबादी वाले भारतवर्ष ने कोरोना के खिलाफ जंग में ‘तबलीगी महा-चूक’ को छोड़कर अब तक गजब का आत्मानुशासन प्रदर्शित किया है। इसके पीछे देश के वर्तमान नेतृत्व की अभूतपूर्व विश्वसनीयता की अहम भूमिका रही है, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। समय पर लॉक डाउन, उसके बाद की परिस्थितियों का अद्भुत और अनूठा प्रबंधन व भारत की कोरोना संबंधी रणनीति के आंकड़ों में झलकते नतीजे, नि:संदेह देश के सामूहिक आत्मविश्वास को बढ़ाने में कामयाब रहे हैं। कोरोना की लड़ाई क्योंकि सारा विश्व अपने-अपने मोर्चे पर मगर एक साथ लड़ रहा है, इसलिए भारत के कार्य की वैश्विक समीक्षा और अन्य देशों के साथ तुलना भी साथ साथ चल रही है। निर्विवाद रूप से वैश्विक मंचों पर हमारी रणनीति और हमारे नेतृत्व की कुशलता को लगातार सराहा जा रहा है।

मगर राष्ट्रीय-उत्साह इजाफा करने वाली इन तमाम बातों से संतुष्ट होकर किसी भी मोर्चे पर लापरवाही बरतना आत्मघाती साबित होगा। इन दिनों कोरोना सम्बन्धी आधिकारिक अपडेट देने के लिए हर शाम पीआईबी के मीडिया सेंटर पर प्रकट होने वाले स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ. लव अग्रवाल के शब्दों में कहना हो तो कोरोना महामारी के साथ  हमारी लड़ाई हर पल और हर दिन की लड़ाई है। किसी एक दिन और कुछ एक मोर्चों पर जीत के कारण कुछ व्यक्तियों या किसी समूह की कोताही अब तक की सारी तपस्या और संघर्ष पर पानी फेर सकती है।इसका प्रमाण तबलीग का मरकज है। हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फारसी क्या ? निजामुद्दीन का तबलीगी मरकज अब तक संक्रमित पाए गए भारतीयों में से 30 फ़ीसदी से अधिक को कोरोनरी भेंट चढ़ाने के लिए अकेला उत्तरदायी है। कोरोना के विरुद्ध मौजूदा युद्ध एक मायने में सांप-सीढ़ी के खेल जैसा भी लगता है। मंजिल से एक कदम पहले भी सांप ने डस लिया तो खिलाड़ी लुढ़कते हुए धडाम शून्य वाले सोपान या पायदान पर जा गिरेगा। निश्चित जीत के तरफ बढ़ रहा भारत यह जोखिम उठाने की स्थिति में बिलकुल नहीं है।

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