लेखक परिचय

वीरभान सिंह

वीरभान सिंह

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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वीरभान सिंह

तेल का खेल और सरकारी आंकडे़बाजी

वीरभान सिंह तेल के खेल में सरकारी आंकडों की बाजागरी में फंसी जनता मंहगाई की मार से बेमौत मर रही है। इधर बढती मंहगाई के दंश से जनमानस कराह रहा है और उधर सरकार के वजीर वाहन और सत्ता सुख भोग रहे हैं। आम आदमी के न तो रसोई के बजट का ठिकाना है और न ही घर के। सुरसा की तरह दिनों-दिन बढ रही मंहगाई की मार से जहां जनता की कमर टूटती जा रही है, वहीं मंत्रियों और नेताओं के काफिलों में चलने वाली सरकारी और गैर सरकारी गाडियों में पेट्रोल के रूप में जनता के धन की खुली बर्बादी की जा रही है।

केन्द्र की कुर्सी पर काबिज कांग्रेस सरकार के शासनकाल और मंहगाई का बड़ा पुराना रिश्ता है। कांग्रेस की सरकार जब-जब केन्द्र में आई है तब-तब मंहगाई ने अपने ही बनाए रिकार्ड तोडे हैं। खद्य सामग्रियों पर बढे दामों से अभी आम आदमी उबर भी नहीं पाया था कि पेट्रोल की कीमतों में 7.50 रू. की भारी बढोत्तरी करके जनता के जले पर सरकार ने नमक छिडकने जैसा काम किया। पेट्रोल की कीमतों में किए गए इजाफे के विरोध में देश भर में प्रदर्शन हुए। कहीं प्रधानमंत्री की अर्थी निकाली गई तो कहीं पेट्रोलियम मंत्री का पुतला फूंका गया। विपक्ष को भी बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल गया लेकिन केन्द सरकार अपनी ही बात पर अडी रही कि तेल कंपनियों को हो रहे घाटे की वजह से यह कठोर कदम उठाया गया है। माना सरकार स्वयं भी बढती मंहगाई को लेकर चिंतित है, मगर उसकी यह चिंता सिर्फ मीडिया के कैमरों के सामने तक ही सीमित क्यों रहती है, धरातल पर मंहगाई को कम करने के कोई उपाय क्यों नहीं किए जाते ?

केन्द्र सरकार द्वारा पेट्रोल की कीमतों में प्रत्येक तिमाही और छमाही बढोत्तरी करके अपना दुखडा रो देती है। सच तो यह है कि इन सबके पीछे सरकारी मशीनरी ही जिम्मेदार है। केन्द्र से लेकर प्रदेश सरकार सभी अपनी सुविधाओं में कटौती करना नहीं चाहते हैं। यदि सरकारी नुमाइंदे अपनी सुविधाओं में थोडी भी कटौती कर दें तो बढती मंहगाई पर थोडा अंकुश लग सकता है। आए दिन यह देखने में आता है कि यदि सरकार का कोई भी मंत्री निरीक्षण या फिर समीक्षा बैठक में भाग लेने जाता है, या फिर वह अपने घर से मंत्रालय के लिए ही निकलता है तो उसकी एक नीली या लाल बत्ती वाली गाडी के पीछे दर्जनों वाहनों का काफिला चलता है। अब जरा सोचिए, क्या इस काफिले का कोई औचित्य है? सरकार का एक-एक मंत्री, नेता, विधायक या फिर बडा अधिकारी जनता के पैसे की खुलेआम बर्बादी करता है लेकिन उस पर न तो कभी सरकारी टिप्पणी की जाती है और न ही हमारे देश के लोग विरोध करते हैं। आप शायद नहीं जानते कि इस प्रकार से गाडियों के पीछे चलने वाले वाहनों के काफिलों में एक दिन में ही सैकडों लीटर डीजल जलकर बर्बाद हो जाता है। यदि सरकरी मशीनरी अपनी दिखावे भरी लाइफ को छोडकर वास्तव में जनहितैशी के रूप में काम करें तो निश्चित ही हर समस्या का हल निकल आएगा। मगर, यह सोचने का वक्त न तो देश के प्रधानमंत्री के पास है, न वित मंत्री के और न ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों के पास। यही वजह है कि मंहगाई दिनों-दिन बढ रही है और मंहगाई के लिए जिम्मेदार भौतिक सुख-सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं।

आखिर क्यों नहीं उठी विरोध की आवाज-

आज तक मेरी समझ में यह नहीं आया कि क्या जरूरत है कि एक मंत्री की गाडी के पीछे दर्जनों लग्जरी गाडियों का काफिला लगाया जाए। यह महज सत्ता की सनक का ही परिचायक है, वरना एक मंत्री जो जनता का सेवक है, वह सिर्फ एक सुरक्षा वाहन और एक अन्य वाहन के साथ भी अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। मगर, यह सब सोचने के लिए वक्त किसके पास है। एक पूरी की पूरी आईएएस लाॅबी बढती मंहगाई पर अंकुश लगाने के लिए प्लान तैयार करने को रखी गई है। ये लोग 70 से 01 लाख रूपए तक की मासिक सेलरी लेते हैं लेकिन कभी भी ऐसा समाधान नहीं निकालते जिससे जनता का भला हो। हां, कभी-कभार कोई सलाह दे भी दे तो उसे विपक्षी पार्टी का दलाल कहकर बदनाम कर देते हैं। सरकारी बाजागरी पर चढ रही आम आदमी की बलि रोकने के लिए अब देश के न्यायधीशो को ही मनन करना होगा और आदेश पारित करना होगा कि नियम यदि आम आदमी के लिए हैं तो उसकी जद में जनता के वे हाईटेक सेवक भी शामिल हैं जो सत्ता सुख में जनता सुख भूल चुके हैं।

One Response to “जनता अधीर, वाहन सुख में हैं वजीर !”

  1. mahendra gupta

    यदि वे वास्तव में जन नेता है तो उन्हें खतरा किस बात का है?क्यों वे इतना बड़ा लवाजमा साथ लेकर चलतें है.? आखिर कल तक इन सड़कों पर छपल पटकते,घर घर घूमते नेताओं पर मिनिस्टर बनते ही ऐसा जान को क्या खतरा हो जाता है कि उन्हें इतनी सुरक्षा कि जरूरत होने लगती है.कारण एक ही है पद का महत्व दिखाना.जब ये जनता से कट कर अलग रह कर अपनी शान दिखाते हैं,जनता का कम न कर अपना और अपने चापलूसों के कम करते हैं तो उन्हें खतरा लगने लगता है कि हमें जनता मारेगी,यदि वे निष्पक्ष रह कर सब के कम करें तो ऐसा कुछ भी न हो और न ही इस लवाजमें कि जरूरत रहे .सच तो यह है कि यह लोग जनता क्र सेवक नहीं उस पर बोझ हैं.और हम कब से, इन कितने ही लोगों का बोझ अपने सर पर ढो रहें हैं.
    यह हालत हर राजनितिक दल के साथ है.इनसे हमारा पिंड छुटने वाला नहीं है.पद से हटकर भी यह इस लालच को नहीं छोड़ पाते हैं.लालू,मायावती और न जाने कितने ही अलग अलग दलों के नेता हैं जिन्हें जेड जेड प्लस कि सुराषा चहिये,ऐसा ही लवाजमा चाहिए ,कोई पूछे कि इन कि जान को क्या खतरा है?कौन मारकर जेल में जाना चाहेगा.और मर कर क्या लेलेगा?
    सर्कार को खर्च बचाना है तो सब के वेतन बंद कर देने चाहिए,कोई पेंसिओं नहीं,कोई सुरक्षा नहीं,आखिर वे जनता कि सेवा का लिए आयें हैं तो पैसा किस बात का?फिर इनमें और सरकारी कर्मचारी में क्या अंतर है?
    यह एक विचारनीय बिंदु है,और इस पर बहस होनी चाहिए,

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