महर्षि व युग-ऋषि के कथन का क्रियान्वयन

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                                       मनोज ज्वाला
     इन दिनों सम्पूर्ण देश-दुनिया में कॉरोना-वायरस की महामारी से
उत्त्पन्न हालातों के कारण भय व संशय का वातावरण बनता जा रहा है । कितु
वास्तव में यह तो नवसृजन से पहले की अपरिहार्यताओं का क्रियान्वयन मात्र
है । महान स्वतंत्रता सेनानी महर्षि अरविन्द व युग-ऋषि श्रीराम शर्मा
आचार्य ने अपनी-अपनी आध्यात्मिक तपश्चर्या की शक्ति व दिव्य-दृष्टि से
देश-दुनिया की भावी होतव्यताओं के सम्बन्ध में जो-जो कहा है सो सब सन
२०११ से ही अक्षरशः चरितार्थ होता जा रहा है । देश में ‘कांग्रेसी राज’
का अवसान और दुनिया भर में भारतीय सनातन संस्कृति की स्वीकृति के प्रति
बढता रुझान कभी असम्भव सा प्रतीत हो रहा था ; किन्तु ऐसे वैचारिक वातावरण
का निर्माण होता गया कि अब यह सब प्रत्यक्ष दिख रहा है । इन दोनों ऋषियों
ने अपनी दिव्य-दृष्टि के द्वारा भविष्य से भी आगे का अवलोकन कर ‘काल के
चौथे आयाम’ (भविष्यातीत) को उदघाटित करते हुए  विश्वव्यापी  युगान्तरकारी
समग्र परिवर्तन की भविष्यवाणी अभिव्यक्त कर रखी है । उन भविष्योक्तियों
का सार यह है कि “दुष्प्रवृतियों के उन्मूलन व सत्प्रवृतियों के
संवर्द्धन तथा सभ्यता समाज व शासन की अवांछित रीति-नीति में संशोधन और
विकास की प्रकृति-पर्यावरण-विरोधी केन्द्रीकृत पद्धति के विकेन्द्रीकरण
से युक्त युग-परिवर्तन और भारत राष्ट्र का सशक्तिकरण व भारतीय सनातन
संस्कृति का वैश्विक उन्नयन महकाल का अटल निश्चय है . क्योंकि सृष्टि का
विनाश रोकने के लिए यह आवश्यक है” । ‘ऋषिद्वय’ की यह भविष्योक्ति उनके
द्वारा पूर्वघोषित समय के साथ-साथ चरितार्थ होता हुआ अब एकदम साफ दिख रहा
है ।
        ज्ञात हो कि स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय रहने के पश्चात एक
अलौकिक मार्गदर्शक सत्ता के निर्देशानुसार आध्यात्मिक तप के ताप से भारत
की राष्ट्रीय चेतना को जगाने-तपाने-झकझोरने का सूक्ष्म सरंजाम खडा करने
में प्रवृत हुए  इन दोनों ऋषियों ने कहा है कि “ वैचारिक अवांछनीयताएं जब
अनर्थ की सीमा लाँघ जाएंगी, तो आत्मबल-सम्पन्न व्यक्तियों के बीच
‘सुपरचेतन सत्ता’  का प्रादुर्भाव होगा, जो उल्टे को उलट कर सीधा कर
देगा” । भारत की भवितव्यता के परिप्रेक्ष्य में इसका समय भी रेखांकित
करते हुए ऋषिद्वय ने कह रखा है- “ रामकृष्ण परमहंस के जन्म से लेकर १७५
साल तक की अवधि संधिकाल है, जिसके दौरान भारत को कई अवांछनीयतायें झेलनी
पड सकती हैं ; किन्तु इस अवधि के बीतते ही भारत के भाग्य का सूर्योदय
सुनिश्चित है, जिसके साथ ही इसकी सोयी हुई राष्ट्रीयता जाग जाएगी और
बीतते समय के साथ  सनातन धर्म  सारी दुनिया पर छा जाएगा ” । भारत को
विभाजन की पीडादायी त्रासदी के साथ मिली तथाकथित स्वतंत्रता पर
प्रतिक्रिया जताते हुए १५ अगस्त १९४७ को राष्ट्र के नाम प्रसारित संदेश
में महर्षि अरविन्द ने कहा था-“ भारत का विभाजन एक न एक दिन अवश्य मिट
जाएगा और यह राष्ट्र फिर से अपने अखण्ड स्वरुप को धारण कर लेगा” ।
युग-परिवर्तन के निमित्त अध्यात्मिक-वैचारिक आन्दोलन का सूत्रपात करने के
कारण युगऋषि कहे गए श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपनी अनेक पुस्तकों में लिखा
हुआ है-          “अवांछनीयताओं का उन्मूलन हो कर रहेगा , यह महाकाल की
योजना है , इसे कोई टाल नहीं सकता । असत्य-अनीति-अन्याय-झूठ-पाखण्ड पर
आधारित समस्त स्थापनायें-व्यवस्थायें भरभरा कर गिर जाएंगीं,
दुर्जन-शक्तियों को मुंह की खानी पडेगी और सज्जन शक्तियों के संगठन से
सत्य-नीति-न्याय-विवेक-सम्पन्न व्यवस्थायें खडी होंगीं । २१वीं सदी का
पहला दशक बीतते ही युग-परिवर्तन की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी और अगले
दशक से परिवर्तन स्पष्ट दिखाई पडने लगेगा । भारत  इस  विश्वव्यापी
परिवर्तनकारी योजना के क्रियान्वयन का ध्रूव-केन्द्र होगा ” ।
        पिछले दस वर्षों से हमारे देश में बदलाव की बह रही हवा के
परिप्रेक्ष्य में यह कहना समीचीन होगा कि उपरोक्त ऋषिद्वय  के अनुसार
भारत को चूंकि भावी विश्व का नेतृत्व करना है तथा सनातन धर्म के वश्विक
विस्तार से ही विश्व-वसुधा का कल्याण सम्भव है, इसलिए परिवर्तन की शुरुआत
सनातनधर्मी भारत से ही हुई है और राजनीति चूंकि यहां की समस्त समस्याओं
की जड है, इस कारण पहला प्रहार राजनीति पर ही  हुआ है । यह शुरुआत ठीक
उसी समय से हुई है जब रामकृष्ण परमहंस के जन्म-काल सन १८३६ से ले कर १७५
साल का संधिकाल २०११ में समाप्त हुआ ।
       सन २०११ से देश भर में अचानक आई राष्ट्रीय जागृति के परिणामस्वरुप
सन २०१४ में प्रचण्ड बहुमत से एक अप्रत्याशित व्यक्तित्व नरेन्द्र मोदी
का सत्तासीन होना एवं राजनीतिक अनीति-अनाचारपूर्ण धर्मनिरपेक्षता की
झण्डाबरदार कांग्रेस का धराशायी होना तथा उसके बाद से एक पर एक  असम्भव
सी प्रतीत होने वाली घटनाओं का घटित होना ; यथा- भारत की योग-विद्या को
वैश्विक मान्यता मिलना,  विश्व राजनीति में भारत की पैठ बढना, पाकिस्तान
में बलुचिस्तान का आन्दोलन भडकना,  इस्लामी अरबिया देशों में सनातनधर्मी
मन्दिरों का निर्माण होना व अपने देश में सैकडों वर्षों से विवादित
राम-जन्मभूमि पर अब मन्दिर-निर्माण शुरु हो जाना और फिर दुबारा प्रचण्ड
बहुमत से हिन्दुत्ववादी भाजपा-मोदी की सत्ता कायम होना एवं राजनीतिक
प्रदूषण फैलाते रहने वाले तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों का सफाया होते जाना
तथा भारतीय सनातन परम्पराओं के विरोधी वामपंथी दलों का अस्तित्व मिटते
जाना और संविधान की धारा ३७० का निरस्तीकरण व जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन
होना ; ये ऐसे तथ्य हैं जो इस सत्य की ओर संकेत  करते हैं कि  नियति का
परिवर्तन-चक्र सचमुच ही नियत समय से शुरू हो चुका है ।
          भारत का मणि-मुकुट कहे जाने वाले  जम्मू-कश्मीर की सत्ता को
अपनी बपौती जागिर मान आसुरी कहर बरपाते हुए सनातनधर्मी जनता को
प्रताडित-विस्थापित कर वहां के ‘नन्दन वन’ से सुशोभित उस दिव्य धरा पर
जिहादी-बारुदी खुनी खेल खेलते रहने वाले और स्वयं को ‘अजेय’ समझने वाले
अब्दुल्लाओं-सईदों-सुल्तानों को अब जेलों के भीतर अपने जुल्मों की खतायें
गिननी पड रही हैं , तो इसे आप क्या कहेंगे ? यह नियति की उस नीयत के
क्रियान्वयन का एक चरण है , जिसके तहत भारत का पुनरुत्थान होना  और इसे
अपना अखण्ड स्वरुप धारण करना सुनिश्चित है । अब आप यह भी देख ही रहे हैं
कि ‘पाक-अधिकृत कश्मीर’ को भी अंगीकृत कर लेने के लिए भारतीय सेना मचल
रही है. जिससे युद्ध अवश्यम्भावी प्रतीत हो रहा है तो समझिए कि उसका
परिणाम महर्षि अरविन्द के शब्दों में ‘अखण्ड भारत का पुनर्निर्माण” ही
होगा । ऐसी सम्भावना से इंकार नहीं किया सकता है । भारत के शासन का शौर्य
जब  भडक उठेगा. तब इस बार  कोई नियंत्रण-रेखा नहीं होगी और न ही
यथास्थितिवाद की पुनरावृति होगी । क्योंकि, ‘ऋषिद्वय’ के अनुसार भारत
राष्ट्र अब करवट ले रहा है, अपना वास्तविक आकार ग्रहण करने को मचल रहा है
। अतएव, भारत को टुकडे-टुकडे करने का नारा लगाने वाले गिरोहों एवं
राष्ट्र-द्रोह कानून को समाप्त कर देने की वकालत करने वाली कांग्रेस,
कांफ्रेन्स आदि सेक्युलर-कम्युनिष्ट दलों को सावधान हो जाना चाहिए ,
क्योंकि भारत-पुनरुत्थान के मार्ग में जो भी तत्व बाधक बनेंगे, वे  मिट
जाएंगे , राजनीति के परिदृश्य से ही लुप्त हो जाएंगे । भारत का
पुनरुत्थान और एक नये युग का निर्माण अब हो कर रहेगा । यह ऋषियों की
योजना-घोषणा है, और जैसी कि सनातन परम्परा है- ऋषियों के वचन कभी खाली
नहीं जाते, उसे भगवान पूरा करते हैं ।
       इधर कुछ महीनों से कॉरोना वायरस के संक्रमण से उत्पन्न जिस
माहामारी की त्रासदी पूरी दुनिया झेल रही है उसकी चेतावनी भी युग-ऋषि की
भविष्यवाणियों में वर्षों पूर्व ही दी जा चुकी है । आचार्यश्री की
सुस्पष्ट घोषणा है- “दुनिया को ऐसी-ऐसी बीमारी-महामारी व प्राकृतिक
आपदाओं-विपदाओं का सामना करना पडेगा. जिसका निदान-समाधान खोज पाने में
आधुनिक विज्ञान भी असमर्थ होगा । विज्ञान की यह असमर्थता भी हम देख रहे
हैं और साथ ही यह भी देख रहे हैं कि इस महामारी से उबरने के लिए ही सही
सारी दुनिया में सभ्यतागत विकास की रीति-नीति अब नये सिरे से गढी जाने
लगी है … सारी दुनिया सनातन भारतीय संस्कृति से निःसृत जीवन-शैली को
अपनाने की दिशा में तेजी से बढ रही है । विश्व-स्वास्थ्य संगठन ने अब
साफ-साफ यह कह दिया है कि कॉरोना से बचने का सबसे कारगर उपाय
हिन्दू-जीवन-पद्धति का अनुसरण ही है । इतना ही नहीं हॉर्वर्ड युनिवर्सिटी
और नासा जैसे विश्व-विख्यात आधुनिक बौद्धिक संस्थानों के वैज्ञानिकों
द्वारा भी अब गायत्री मंत्र व महामृत्युंजय मंत्र की महिमा का बखान किया
जाने लगा है और अमेरिका-ब्रिटेन-फ्रांस-इटली-जर्मनी जैसे घोर मजहबी देशों
में वैदिक मंत्र-जाप शुरु हो चुका है; तो जाहिर है कि सनातन धर्म वैश्विक
व्याप्ति की ओर बढ रहा है; ‘ऋषिद्वय’ जो कह गये हैं सो सब चरितार्थ होते
दिख रहे हैं ।
•       मनोज ज्वाला; 

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