अच्छे दिन के निहितार्थ

-वीरेन्द्र सिंह परिहार-

Onion prise hike in india

विरोधी दलों का तो काम ही है, विरोध करना। पर आजकल स्थिति यह है कि जहां देखो, वही आम नागरिक भी मोदी सरकार को लेकर तंज कस रहे है- ‘लो अच्छे दिन आ गए।’ निश्चित रूप से ऐसी बातें देश में बढ़ती महंगाई को लेकर है। लोगों को इस बात की शिकायत है, कि नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान यह वायदा किया था कि सत्ता में आने पर वह महंगाई को नियंत्रित करेंगे। इसके लिए विशेष-कोष बनाने का वायदा भी किया गया था। लेकिन सत्ता में आते ही रेलवे का यात्री किराया और माल-भाड़ा बढ़ा दिया गया। माल-भाड़ा बढ़ने का नतीजा यह हुआ कि तकरीबन सभी वस्तुओं पर महंगाई बढ़ गई, क्योंकि वस्तुओं की ढु़लाई महंगी हो गई। इसके पश्चात् पेट्रोल एवं डीजल के दाम बढ़ा दिए गए। इसका भी दूसरी वस्तुओं की महंगाई पर असर पड़ा। इसके अलावा भी महंगाई का आलम यह है कि टमाटर जो अभी कुछ दिनों पूर्व तक अमूमन 20 रूपये किलो तक मिल रहा था, वह 80 रूपये से 100 रूपये किलो तक मिल रहा है। प्याज के रेट बढ़तें-बढ़ते 40 रू. तक पहुंच गए हैं। आलू के रेट भी अप्रत्याशित ढंग से बढ़ गये है। कुल मिलाकर सर्वत्र एक शिकायत का भाव मोदी सरकार के प्रति देखने को मिल रहा है।

अब जहां रेलवे का किराया और माल-भाड़ा बढ़ाने का सवाल है, तो यह सभी को पता है कि यह पूर्ववर्ती यूपीए सरकार का फैसला था, जो लोकसभा चुनावों के चलते लागू नहीं हो सका था। कहने वाले कह सकते है कि फिर भी मोदी सरकार इस बढ़ें किराए को वापस ले सकती थी। पर ऐसे लोगों को शायद यह नहीं पता कि यदि यथास्थिति का दौर ही रेल्वे में चलता रहा तो रेलों का आधुनिककरण कैसे होगा? बेहतर रेलवे स्टेशन कैसे बनाएं जाएंगे? रेल यात्रियों की बेहतर सुरक्षा और रेलों की गुणवत्ता पूर्ण साफ-सफाई कैसी की जा सकती है? नई रेल-पटरियों को बिछाने और नई रेल-लाइनों के सर्वे के लिए संसाधन कहां से आएंगेे? रेलों की रफ्तार कैसे बढ़ेगी? बुलेट ट्रेनों का सपना कैसे साकार होगा? रेल बजट में मोदी सरकार के रेलमंत्री ने दिल्ली से अहमदाबाद के बीच ही सही बुलेट ट्रेन चलाने और कई तेज गति की रेल गाडिया प्रमुख मार्गों में चलाने की घोषणा की है, और उम्मीद है कि जो शीघ्र ही पूरी होगी। इसी तरह से और भी रेलवे की गुणवत्ता बढ़ाने की दृष्टि से प्रतिबद्धता जताई गई है। इतना ही नहीं, लोगों को उम्मीद है कि आने वाले समय में रेलवे के क्षेत्र में देश में एक नया परिदृश्य देखने को मिलेगा।
जहां तक पेट्रोल और डीजल में मूल्य वृद्धि का सवाल है तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर पूर्ववर्ती सरकार बहुत पहले ही बाजार के हवाले कर चुकी है। यानी की पेट्रोल और डीजल के मूल्यों का निर्धारण अंतरराष्ट्रीय मूल्यों के आधार पर किया जाएगा। वैसे पिछले दिनों हुई पेट्रोल और डीजल में मूल्य वृद्धि के लिए ईराक संकट या वहां का गृह-युद्ध जिम्मेदार है। अलबत्ता ऐसी खबरें जरूर है कि पेट्रोल और डीजल कंपनियां अपना घाटा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती है। जिस पर समुचित नियंत्रण की आवश्यकता है।अब रहा सवाल टमाटर, प्याज, आलू एवं दूसरी जरूर की वस्तुओं के मूल्य वृद्धि का तो मोदी सरकार इनकी कीमते बढ़ने से रोकने के लिए हर संभव उपाय कर रही है। प्याज के निर्यात-मूल्य पर जहां काफी बढोत्तरी कर दी गई है। वहीं जमाखोरी रोकने के लिए राज्य सरकारों को छापे डालने के लिए कहा गया हैं। पर अर्थशास्त्र के इस सिद्धांत का सभी को पता होगा कि जब किसी वस्तु की मांग, आपूर्ति की तुलना में ज्यादा होती है, तो उसकी कीमतें बढ़ जाती हैं और कोई भी सरकार इस दिशा में कुछ खास नहीं कर सकती। अलबत्ता इन स्थितियों के लिए देश में मानसून का देरी से आना और कम बारिश भी एक हद तक जिम्मेदार है।

यह तो तस्वीर का एक पहलू है। तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जो ज्यादा सच है कि सचमुच में अच्छे दिन आ रहे हैं। यूपीए सरकार के दस वर्षों बाद पहली बार इस सरकार के इतने अल्प कार्यकाल में मुद्रास्फीति की दर दो अंकों से घटकर 5.6 पर आ गई है। इसका तात्पर्य यह है कि कुछ क्षेत्रों में जहां महंगाई बढ़ी है, वहां बहुत से क्षेत्रों में महंगाई घटी भी है। मोदी सरकार ने आवश्यक सैकड़ों दवाइयों के रेट कम कर दिए हैं। आयकर की न्यूनतम सीमा दो लाख से ढाई लाख किए जाने, सब्सिडी का सरलीकरण किए जाने से भी लोगों को कही-न-कहीं महंगाई से राहत मिलेगी।

लोगों को यह पता होना चाहिए कि अच्छे या बुरे दिन बहुत कुुछ शासकों की कार्य-पद्धति से जुड़ा होता है। इस दिशा में बड़ा काम यह हुआ कि देश एक तरह से वंशवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद और भ्रष्टाचार से मुक्त होने की दिशा में बढ़ चला है। मदन मोहन मालवीय शिक्षक प्रशिक्षण योजना के तहत देश में बेहतरीन शिक्षक तैयार किए जाएंगे, जो कि भावी पीढ़ी को संस्कारवान, राष्ट्रीय चरित्र से भरपूर और रोजगार-दक्ष बना सकेंगे। वस्तुतः अच्छे दिनों से आशय है- सुशासन, राजपाट चलाने वाले को जवाबदेह बनाना, प्रशासन में पारदर्शिता। खासकर खास और आम का अंतर समाप्त हो, शोषण-’उत्पीड़न रूके। कानून का राज्य हो, उसकी दृष्टि में सब समान हो। शासन और प्रशासन की नीतियां परिणाम-मूलक हो। शासक एवं जन प्रतिनिधि अपने आपको जनता का स्वामी न समझकर सेवक समझे। सुधारों का दौर ऊपर से सुविधाओं का दौर नीचे से शुरू हों, जैसा कि द्वितीय सरसंघचालक गुरूजी का मानना था। इस दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए नरेन्द्र मोदी ने विधि मंत्रालय को निर्देशित कर दिया है कि जिन सांसदों के विरूद्ध आपराधिक प्रकरण हैें, उनके प्रकरणों का निराकरण एक वर्ष में कराने के लिए आवश्यक कदम उठाये जाएं। ताकि राजनीति का साफ सुथरा और राजनीति में अपराधीकरण रोका जा सके। दागी सांसदों को चाहे वह किसी दल के हो, जेल भेज भेजा जा सके और उनकी खाली हुई सीट पर स्वच्छ छवि के लोग चुनकर आ सके। निश्चित रूप से मोदी सरकार का यह कदम हमारे लोकतंत्र की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। और जो लोग इस व्यवस्था से निराश और हताश हो चुक थे, उनके भविष्य के प्रति आशा का संचार हुआ हेै। मोदी सरकार ने सुशासन की दिशा में कदम उठाते हुए करोड़ों-करोड़ लोगों को प्रमाणीकरण की समस्या से मुक्त कर दिया हेै। अब लोग अपने प्रमाण-पत्रों का स्वतः सत्यापन कर सकेंगे। जबकि अभी तक लोग खास तौर पर युवा एवं छात्र प्रमाणीकरण के लिए अधिकारियों के चक्कर काटते और दुत्कारे जाते देखे जाते थे।

मोदी सरकार से तात्कालीन तौर पर कुछ नाराजगी होने पर भी लोग निराश नहीं हैं व अच्छे दिनों को लेकर आशान्वित हैं। एक बात तो यह है कि मोदी सरकार वोट खरीदने का जरिया बनी लोक-लुभावन योजनाओं के पक्ष में नहीं है। क्योंकि भ्रष्टाचार के अलावा यही दूसरा बड़ा कारण है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चली है। इसका मतलब यह नहीं है कि मोदी सरकार सब कुछ बाजार के हवाले कर देगी। वस्तुतः मोदी सरकार जनकल्याणकारी योजनाओं और विकास को गति देने के बीच एक संतुलन बनाने की पक्षधर है। सच्चाई यही है कि कुल मिलाकर नियोजित विकास ही देश में व्याप्त गरीबी, बेकारी, महंगाई दूर करने का एकमेव उपाय है। कुल मिलाकर विकास ही ‘अच्छे दिनों की गारण्टी है।’ मतदाताओं ने पांच वर्ष के लिए इस सरकार को जनादेश दिया है, इसलिए कम-से-कम छह माह का धैर्य इसके परीक्षण के लिए रखना कतई उचित होगा।

2 thoughts on “अच्छे दिन के निहितार्थ

  1. मैंने स्वामी विवेकानन्द जी के वक्तव्य, “हर कार्य को इन चरणों से गुजरना होता है, उपहास, विरोध, ओर फिर स्वीकृति| जो समय से आगे की सोचते हैं उन्हें गलत समझा जाना निश्चित है|” को प्रवक्ता.कॉम के इन पन्नों पर कई बार दोहराया है| यह कथन सामान्य स्थिति में उपयुक्त है लेकिन तथाकथित स्वतंत्रता के पिछले सरसठ वर्षों में समाज के हर वर्ग में मध्यमता और अयोग्यता के कारण फैली अराजकता में आज उपहास और विरोध स्वाभाविक नहीं बल्कि भारत-विरोधी शक्तियों द्वारा आयोजित किये जा रहे हैं| भारतीयों को समझना होगा कि देश में पहली बार राष्ट्रीय शासन की स्थापना हो पाई है और सभी को मिल भारत के पुनर्निर्माण में अपना योगदान देना होगा| कुशल शासन व व्यवस्था के अंतर्गत हुए विकास व प्रगति द्वारा साधारण नागरिकों के जीवन में अच्छे दिन अवश्य आयेंगे| अच्छे दिन के निहितार्थ को कुशलतापूर्वक समझाते उनके आलेख के लिए वीरेंद्र परिहार जी को मेरा साधुवाद|

  2. बहुत सही विश्लेषण , लोगों ने केवल शब्दों को पकड़ लिया है , सही हालत क्या हैं व उस सन्दर्भ में आज इनका क्या हल हो सकता है यह जानने की जरुरत कोई नहीं चाहता हर आदमी अपनी समस्या का हल अपने तरीके से चाहता है तब उसके लिए अच्छे दिन है अन्यथा बुरे दिन

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