मकर सक्रान्ति पर्व का महत्व और उसको जानने से लाभ

मनमोहन कुमार आर्य

                मनुष्य सभी आवश्यक विषयों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। जो ज्ञान उसे अधिक महत्वपूर्ण लगता है उसे स्मरण रखते हुए उससे लाभ प्राप्त करने में उसी प्रवृत्ति बनती है। हमारे अनेक पर्व हमें उनके महत्व से परिचित कराते हैं जिन्हें मनाकर हम उससे यथोचित लाभ लेने का प्रयास करते हैं। मकर सक्रान्ति का पर्व भी ऐसा ही एक पर्व है जिसके यथार्थस्वरूप से परिचित होकर हमें ज्ञात होता है कि इस पर्व से ‘‘उत्तरायण 6 माह के काल का आरम्भ होता है। इससे हमारे दिन के समय में वृद्धि और रात्रि के अन्धकार की अवधि में निरन्तर कमी आती जाती है। महाभारत के दिनों में उत्तरायण में ही हमारे क्षत्रिय व अन्य लोग अपने प्राण त्यागने को महत्वपूर्ण मानते थे। अजेय योद्धा भीष्म पितामह के जीवन का उदाहरण है कि जब उनका समस्त शरीर अर्जुन के बाणों से बिंध गया था और उनकी मृत्यु निकट ही थी, तब उन्होंने अपने ब्रह्मचर्य व तप के बल से अपने प्राणों व आत्मा की उर्ध्व गति के लिए उत्तरायण के आगमन तक रोक रखा था। इसका कारण यही था कि उत्तरायण में प्राण त्यागने पर मनुष्य की उत्तम गति व मोक्ष प्राप्ति की सम्भावना होती है। उत्तरायण के प्रथम दिन मकर सक्रान्ति के दिन ही यह पर्व अज्ञात दीर्घ अवधि से मनया जा रहा है। इससे हमें आकाश में होने वाली ज्योतिषीय घटना का ज्ञान भी होता है। यदि यह पर्व न मनाया जाता होता तो जन सामान्य मकर सक्रान्ति की घटना से शायद परिचित न होता। अतः मकर सक्रान्ति मनाते हुए हमें मकर राशि और सूर्य के उसमें प्रविष्ट होने सहित इस पर्व से दिन के समय में वृद्धि व रात्रि के समय में कमी होने की वास्तविकता को समझना चाहिये। इसका हमारे जीवन में महत्व होता है। यदि मकर सक्रान्ति के दिन व इसके बाद भी रात्रि के समय में वृद्धि व दिन के समय में कमी का क्रम पूर्ववत् जारी रहता तो इससे मनुष्य जीवन के अस्तित्व में बाधायें व समस्यायें आतीं। अतः इस लाभकारी परिवर्तन के दिन को हमें प्रसन्नतापूर्वक ज्ञान से पूर्ण परम्परा को अपनी भावनाओं में स्थिर कर मनाना चाहिये। इस लेख में हम मकर सक्रान्ति विषयक जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं।

                हमारी पृथिवी सूर्य के चारों ओर भ्रमण करते हुए परिक्रमा करती है। इसी से रात्रि, दिन, सप्ताह, महीने व वर्ष होते हैं। पृथिवी को सूर्य की एक परिक्रमा व चक्र पूरा करने में एक वर्ष का समय लगता है। इसे सौर वर्ष कहा जाता है। हमारी पृथिवी सूर्य की परिक्रमा एक वर्तुलाकार परिधि में करती है। इससे जो वृत्त बनता है उसे क्रान्तिवृत्त कहते हैं। हमारे ज्योतिष के विद्वानों ने इस क्रान्तिवृत्त पर 12 भाग कल्पित किये हुए हैं। इन 12 भागों के नाम उन्होंने आकाशीय नक्षत्र पुंजों की कुछ पशुओं से मिलती जुलती आकृतियों के अनुरूप, जिन्हें राशियां कहते हैं, दिये हैं। यह आकृतियां हैं 1- मेष, 2- वृष, 3- मिथुन, 4- कर्क, 5- सिंह, 6- कन्या, 7- तुला, 8- वृश्चिक, 9- धनु, 10- मकर, 11-कुम्भ तथा 12 मीन। इन आकृतियों के समान नक्षत्र पुंजों की आकृतियां होने के कारण ही इन राशियों को यह नाम दिये गये हैं। सूर्य का भ्रमण व परिक्रमा करते हुए जब पृथिवी एक राशि से दूसरी राशि में प्रविष्ट होती है तो उसे ‘संक्रान्ति’ नाम से सम्बोधित किया जाता है। संसार में पृथिवी के एक राशि से दूसरी राशि में संचरण व प्रविष्ट होने को सूर्य का संक्रमण कहने लगे हैं। 6 माह तक सूर्य क्रान्तिवृत्त के उत्तर में उदय होता है और 6 माह तक क्रान्तिवृत्त के दक्षिण भाग में। इस प्रत्येक 6 मास की अवधि का नाम अयन कहलाता है। सूर्य के उत्तर की ओर उदय की अवधि को ‘उत्तरायण’ और दक्षिण दिशा की ओर उदय की अवधि को ‘दक्षिणायन’ कहते हैं। उत्तरायण काल में सूर्य उत्तर की ओर से निकलता हुआ दीखता है। उत्तरायण की अवधि में दिन का समय निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होता जाता है और रात्रि का समय दिन प्रति दिन कम होता जाता है।

                दक्षिणायन काल में सूर्य दक्षिण की ओर से उदय होता हुआ दिखाई देता है। इसमें रात्रि का समय बढ़ता और दिन का समय घटता जाता है। दक्षिणायण काल में सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है तो इसे उत्तरायन और जब कर्क राशि में संक्रान्ति करता है तो उसे दक्षिणायन के नाम से जाना जाता है। उत्तरायण में सूर्य का प्रकाश हमारी पृथिवी पर अधिक मात्रा में प्राप्त होने से इससे अनेक प्रकार से लाभ होते हैं जिससे इसका महत्व दक्षिणायन से अधिक है। उत्तरायण का आरम्भ मकर संक्रान्ति के दिन से होने से इस दिन को महत्वपूर्ण मानकर पर्व मानने की परम्परा प्राचीन काल से चल रही है। मकर सक्रान्ति के दिन से ही इसके बाद के दिन बड़े होने आरम्भ होते थे परन्तु आजकल इस दिन से लगभग 22 दिन पहले ही दिन बड़े होने लगते हैं। अब से 83 वर्ष पूर्व विक्रमी सम्वत् 1994 में पाया गया था कि मकर संक्रान्ति से 22 दिन पूर्व धनु राशि के 7 अंश 24 कला पर ‘उत्तरायण’ होता है। इस परिवर्तन को 1350 वर्ष लगे हैं। ऐसा होने पर भी मकर सक्रान्ति के दिन ही उत्तरायण को आरम्भ मान लिया जाता है। इसका कारण प्राचीन काल से मनायी जाने वाली इस उत्तरायण पर्व प्रथा को सुरक्षित रखना प्रतीत होता है। इससे हमें यह ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में हमारे पूर्वज मकर संक्रानित के दिन उत्तरायण का पर्व मनाते थे और उत्तरायण उसी दिन होता भी था। यह कारण व महत्व इस उत्तरायण पर्व अथवा मकर संक्रान्ति पर्व को मनाने का है।

                मकर संक्रान्ति का पर्व मध्य जनवरी मास में मनाया जाता है। इस अवसर पर शीत अपने यौवन पर होता है। इस समय जंगल, वन, पर्वत सहित नगरों व ग्रामों आदि सभी स्थानों में शीत का आतंक छाया हुआ होता है। ऐसे समय में मनुष्य के हाथ पैर भी सिकुड़ जाते हैं। मकर संक्रान्ति से पूर्व दिनों की यह स्थिति होती है कि सूर्य के उदय होते ही वह अस्तांचल के गमन की तैयारियां आरम्भ कर देते हैं। ऐसा लगता था कि दिन रात्रि में समा रहा है। रात्रि इतनी लम्बी हो जाती है कि कठिनाई से बीतती थी। मकर संक्रान्ति के आने पर रात्रि के वृद्धि अभियान पर विराम लगता है और इसके बाद से वह छोटी होती जाती है व दिन बड़े होने लगते हैं। दिन के समय में वृद्धि होने से मकर सक्रान्ति के दिवस से आरम्भ उत्तरायण काल को देवयान कहा गया है। इसी काल में महाभारत काल व उसके बाद के ज्ञानी लोग स्वशरीर त्याग की इच्छा करते थे। वह ऐसा मानते थे कि इस समय देह त्यागने से उन की आत्मा सूर्य लोक में होकर प्रकाश मार्ग से प्रयाण करेगी। आजीवन ब्रह्मचारी भीष्म पितामह ने इसी उत्तरायण के आगमन तक शर-शयया पर शयन करते हुए प्राणोत्क्रमण की प्रतीक्षा की थी। ऐसे प्रशस्त समय पर कोई पर्व बनने से कैसे वंचित रह सकता था। इसी कारण से आर्य जाति के प्राचीन आचार्यों ने मकर संक्रान्ति, सूर्य की उत्तरायण संक्रमण की तिथि, को उत्तरायण या मकर संक्रान्ति पर्व निर्धारित किया था।

                इस पर्व को मनाते हुए तिल के अनेक प्रकार के पकवान बनाकर उनका सेवन किया जाता है। वैद्यों के अनुसार शीत का निवारण करने में खाद्य पदार्थों में तिल का विशेष स्थान है। मकर संक्रान्ति के दिन भारत के सब प्रान्तों में तिल और गुड़ या खांड के लड्डू बनाकर दान किये जाते हैं। इन लड्डुओं को इष्ट मित्रों में भी बांटा जाता है। महाराष्ट्र में इस दिन तिलों का तीलगूल नामक हलुवा बांटने की प्रथा है। सौभाग्यवती स्त्रियां तथा कन्याएं अपनी सखी-सहेलियों से मिलकर उन को हल्दी, रोली, तिल और गुड़ भेंट करती हैं। प्राचीन ग्रीक लोग भी वधू-वर को सन्तान वृद्धि के निमित्त तिलों का पक्वान्न बांटते थे। इस से ज्ञात होता है कि तिलों का प्रयोग प्राचीनकाल में विशेष गुणकारक माना जाता रहा है। प्राचीन रोमन लोगों में मकर संक्रान्ति के दिन अंजीर, खजूर ओर शहद अपने इष्ट मित्रों को भेंट देने की रीति थी। यह भी मकर संक्रान्ति पर्व की वैश्विकता एवं प्राचीनता का परिचायक है।                 हमने मकर संक्रान्ति पर्व से जुड़ी घटना एवं इसके उपलब्ध स्वरूप पर प्रकाश डाला है। हमने इस लेख की सामग्री श्री पं. भवानी प्रसाद लिखित आर्य पर्व पद्धति पुस्तक से ली है। मकर संक्रान्ति वैदिक व आर्य पर्व है। इससे हमारी प्राचीन संस्कृति में पर्वों को प्राकृतिक, ज्योतिषीय व ऋतु परिवर्तन आदि धटनाओं से जोड़कर मानने की परम्परा का ज्ञान होता है। आज भी मकर संक्रान्ति का मनाना प्रासंगिक है। हमें ज्ञात होता है कि अब रात्रि छोटी व दिन बड़े होने आरम्भ हो जायेंगे। शीत का जो आतंक होता है वह भी मकर संक्रान्ति पर्व से निरन्तर घटता जाता है और फाल्गुन के महीने में शीण व समाप्त सा हो जाता है। चैत्र का महीनों तो अत्यन्त सुहावना होता है। इस महीने में होली का पर्व मनाया जाता है। हमें मकर संक्रान्ति पर्व पर अपने घरों में वृहद यज्ञ करने चाहिये और उसमें हवन सामग्री में तिल मिलाकर उससे आहुतियां देनी चाहियें। तिल के सभी प्रकार के पकवान बनाकर उसका कुछ दिनों तक सेवन करना चाहिये। वेद प्रचार प्रसार से जुड़ी गुरुकुल आदि संस्थाओं को दान देना चाहिये। आर्यसमाजों व सार्वजनिक स्थानों पर पर्व मनाने के लिये सामूहिक कार्यक्रम भी आयोजित किये जा सकते हैं। ऐसा करके हम मकर संक्रान्ति पर्व की परम्परा को जारी रखने में सफल होंगे। यह प्रथा चलती रहे, लोग इसके विभिन्न पहुलुओं से परिचित होते रहें तथा तिल आदि के पकवानों का सेवन कर रोग शीतकाल में शीत से उत्पन्न रोगों से बचे रहें, यही इस पर्व को मनाने की उपयोगिता प्रतीत होती है।

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