वास्तु में ज्योतिष का महत्व

वास्तु शास्त्र एवं ज्योतिष शास्त्र दोनों एक दूसरे से संबंधित है. दोनों को एक दूसरे का पूरक भी कहा जा सकता है. वास्तु विद्या ज्योतिष विद्या का एक भाग है. ज्योतिष विद्या के द्वारा व्यक्ति विशेष के जीवन की घटनाओं का अध्ययन किया जाता है तो वास्तु शास्त्र भवन से संबंधित शास्त्र है. भवन के रख रखाव, साज-सज्जा, संरचना और व्यवस्था से जुड़ा शास्त्र है. ज्योतिष विद्या और वास्तु विद्या दोनों का ही उद्देश्य मानव जीवन को सुखमय बनाना है. वास्तु शास्त्र के द्वारा वातावरण में उपस्थित ऊर्जा को संतुलित रुप में प्राप्त कर, जीवन में उन्नति, सफलता और अधिक से अधिक सकारात्मक ऊर्जा शक्ति प्राप्त करना है. यह किस प्रकार संभव है आईये जानें-

वास्तु में ज्योतिष का महत्व

वास्तु शास्त्र ज्योतिष की ही एक शाखा है। बिना ज्योतिष ज्ञान के वास्तु शास्त्र अधूरा है। एक अच्छे वास्तु शास्त्री को कदम-कदम पर ज्योतिष की जरूरत महसूस होती है। वास्तु शास्त्र में प्रत्येक दिशा को एक ग्रह से जोड़ा गया है। प्रत्येक ग्रह के गुण, धर्म व स्वभाव का ज्ञान जरूरी हो जाता है। वास्तु प्राप्ति के लिए अनुष्ठान, भूमि पूजन, नींव खनन, कुआँ खनन, शिलान्यास, द्वार स्थापन व गृह प्रवेश आदि के मुहूर्त व शुभाशुभ ज्ञान के लिए ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान जरूरी हो जाता है। एक जैसे दो मकानों में रहने वाले दो परिवारों में अलग-अलग समस्याएँ व परस्पर विरोधी फल मिलने के कारणों का विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि उनके गृह प्रवेश मुहूर्त व जन्मपत्रियों में भिन्नता है।

जन्मपत्री द्वारा निर्धारित प्रारब्ध और संचित कर्मों के फल को हमें भुगतना ही होगा। अनुकूल वास्तु के द्वारा हम अपनी कठिनाइयों को कम अवश्य कर सकते हैं समाप्त नहीं कर सकते। वास्तु और ज्योतिष एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं। जीवन के घटनाक्रम में आने वाले संकटों के निवारण के लिए यदि वास्तु के साथ-साथ ज्योतिषीय पहलू पर भी विचार कर लिया जाए तो हल ढूंढ़ना आसान हो जाता है। व्यक्ति को किस प्रकार के वास्तु की प्राप्ति होगी? घर बना बनाया लेगा या भूमि लेकर स्वयं बनाएगा? पैतृक घर मिलेगा या मिले हुए को भी बेच देगा आदि प्रश्नों के उत्तर के लिए भी ज्योतिष के सामान्य ज्ञान से सम्बन्धित कुछ बातें यहां दे रहे हैं।

ग्रहों के गुण, धर्म, स्वभाव व दोष

सूर्य

यह ग्रह पुरूष जाति, रक्त वर्ण, पित्त प्रकृति तथा पूर्व दिशा का स्वामी है। यह आत्मा, आरोग्य, स्वभाव, राज्य, देवालय का सूचक एवं पितृ कारक है। पूर्व दिशा में दोष होने पर या जन्मपत्री में सूर्य पीड़ित होने पर पिता से सम्बन्ध ठीक नहीं होते। सरकार से परेशानी, सरकारी नौकरी से परेशानी, सिरदर्द, नेत्र रोग, हृदय रोग, चर्म रोग, अस्थि रोग, पीलिया, ज्वर, क्षय रोग व मस्तिष्क की दुर्बलता आदि हो सकते हैं।

चन्द्रमा

यह ग्रह स्त्री जाति, श्वेत वर्ण, जलीय तथा वायव्य दिशा का स्वामी है। यह मन, चित्तवृŸिा, शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, सम्पत्ति व माता का कारक है। वायव्य दिशा में दोष होने पर या जन्मपत्री में चन्द्रमा दूषित होने पर माता से सम्बन्ध ठीक न होना, मानसिक परेशानियाँ, अनिद्रा, दमा, श्वांस रोग, कफ, सर्दी, जुकाम, मूत्र रोग, मासिक धर्म सम्बन्धी रोग, पित्ताशय की पथरी व निमोनिया आदि हो सकते हंै।

मंगल

यह ग्रह पुरूष जाति, रक्त वर्ण, दक्षिण दिशा का स्वामी, अग्नि तŸव वाला तथा पित्त प्रकृति का है। यह धैर्य और पराक्रम का स्वामी, भाई का कारक तथा रक्त एवं शक्ति का नियामक कारक है। दक्षिण दिशा में दोष होने पर या जन्मपत्री में मंगल पीड़ित होने पर भाइयांे से सम्बन्ध ठीक न होना, क्रोध अधिक आना, दुर्घटनाएँ होना, रक्त विकार, कुष्ठ रोग, फोड़ा-फंुसी, उच्च रक्त चाप, बवासीर, चेचक, प्लेग आदि हो सकते हैं।

बुध

यह ग्रह नपुंसक जाति, श्यामवर्ण, उत्तर दिशा का स्वामी, त्रिदोष प्रकृति तथा पृथ्वी तŸव वाला है। यह ज्योतिष, चिकित्सा, शिल्प, कानून, व्यवसाय का स्वामी है। उत्तर दिशा में दोष होने पर या जन्मपत्री में बुध पीड़ित होने पर विद्या बुद्धि सम्बन्धी परेशानियाँ, वाणीदोष, मामा से सम्बन्ध ठीक न होना, स्मृति लोप, मिर्गी, गले के रोग, नाक के रोग, उन्माद, मतिभ्रम, व्यवसाय में हानि, शंकालु व अस्थिर विचार आदि दोष हो सकते हैं।

गुरु

यह ग्रह पुरूष जाति, पीत वर्ण, ईशान दिशा का स्वामी तथा आकाश तŸव वाला है। इसके द्वारा पारलौकिक एवं आध्यात्मिक सुखों का विशेष विचार किया जाता है। ईशान कोण में दोष होने पर या जन्मपत्री में गुरु पीड़ित होने पर पूजा में मन न लगना, देवताओं, गुरुओं और ब्राह्मणों पर आस्था न रहना, आय में कमी, संचित धन में कमी, विवाह में देरी, संतान में देरी, मूर्छा, उदर विकार, कान का रोग, गठिया, कब्ज, अनिद्रा आदि कष्ट हो सकते हैं।

शुक्र

यह ग्रह स्त्री जाति, श्याम, गौर वर्ण, आग्नेय दिशा का स्वामी, कार्य कुशल तथा जलीय तŸव वाला है। यह काव्य, संगीत, वस्त्राभूषण, वाहन, स्त्री, कामेच्छा व सांसारिक सुखों का कारक है। आग्नेय दिशा में दोष होने पर या जन्मपत्री में शुक्र पीड़ित होने पर पत्नी सुख में बाधा, प्रेम में असफलता, वाहन से कष्ट, शृंगार के प्रति अरूचि, नपुंसकता, हर्निया, मधुमेह, धातु एवं मूत्र सम्बन्धित रोग व गर्भाशय सम्बन्धित रोग हो सकते हैं।

शनि

यह ग्रह नपुंसक जाति, कृष्ण वर्ण, पश्चिम दिशा का स्वामी व वायुतŸव का है। इसके द्वारा आयु, बल, दृढ़ता, विपत्ति, यश व नौकर-चाकरों का विचार किया जाता है। यह व्यक्ति को दुर्भाग्य तथा संकटों के चक्कर में डालकर अन्त में शुद्ध और सात्विक बना देता है। पश्चिम दिशा में दोष होने पर या जन्मपत्री में शनि पीड़ित होने पर नौकरों से क्लेश, नौकरी में परेशानी, वायु विकार, लकवा, रीढ़ की हड्डी में तकलीफ, भूत प्रेत का भय, चेचक, कैंसर, कुष्ठ रोग, मिर्गी, नपुंसकता व पैरों में तकलीफ हो सकती है।

राहु

यह कृष्णवर्ण, नैर्ऋत्य दिशा का स्वामी तथा क्रूर ग्रह है। इसके द्वारा गुप्त युक्ति बल, कष्ट और त्रुटियों का विचार किया जाता है। नैर्ऋत्य कोण में दोष होने पर या जन्मपत्री में राहु पीड़ित होने पर दादा से परेशानी, अहंकार हो जाना, त्वचा रोग, कुष्ठ रोग, मस्तिष्क रोग व भूत प्रेत का भय आदि हो जाता है।

केतु

यह कृष्ण वर्ण तथा क्रूर ग्रह है। इसके द्वारा नाना से परेशानी, जादू टोने से परेशानी, छूत की बीमारी, रक्त विकार, दर्द, चेचक, हैजा व चर्म रोग का विचार किया जाता है। यह मोक्ष का कारक है।

भवन प्राप्ति योग

जब कोई भी व्यक्ति घर बनाना चाहता है तो सबसे पहले उसे भूमि की आवश्यकता होती है। भूमि का कारक ग्रह मंगल और चतुर्थ भाव बलवान होने पर व्यक्ति भूमि क्रय कर सकता है। चतुर्थ भाव या मंगल पीड़ित होने पर व्यक्ति किराये के मकान में ही रहता है और यदि भाग्यवश अपना मकान बन भी जाए तो उसमें वास्तु दोष जरूर होता है। बने बनाए मकान को देखने के लिए जन्मपत्री में चैथे भाव के साथ शनि की स्थिति पर भी विचार किया जाता है। जन्मपत्री में कौन-कौन से योग बनने पर व्यक्ति भूमि या भवन प्राप्त कर सकता है, अब उन पर विचार करते हैं:

1. यदि चतुर्थेश केन्द्र या त्रिकोण में हो।

2. यदि चतुर्थेश स्वगृही, वर्गोत्तम, स्व नवांश या उच्च का हो तो भूमि, वाहन व घर का सुख मिलता है।

3. यदि लग्नेश चतुर्थ में हो या लग्नेश और चतुर्थेश का स्थान परिवर्तन हो तो घर, कोठी, आवास आदि का पूर्ण सुख मिलता है।

4. यदि चतुर्थेश व दशमेश की युति केन्द्र या त्रिकोण में हो तो जातक का घर सुन्दर, बड़ा व महलनुमा होता है।

5. यदि चतुर्थेश बलवान हो और लग्नेश से उस का सम्बन्ध हो।

6. यदि मंगल त्रिकोण में हो।

7. यदि चतुर्थ भाव पर दो शुभ ग्रहों की दृष्टि हो।

8. यदि चतुर्थेश व पंचमेश में परिवर्तन योग हो।

9. यदि चतुर्थेश व नवमेश में परिवर्तन योग हो।

10. यदि चतुर्थेश व एकादशेश में परिवर्तन योग हो।

11. लग्नेश, चतुर्थेश व द्वितीयेश जितने शुभ ग्रहों से दृष्ट हों, उतने मकान मिलते हैं।

12. केन्द्र व त्रिकोण में बैठे ग्रहों मेें जितने ग्रह बलवान हों, व्यक्ति के पास उतने ही मकान हांेगे।

13. चैथे भाव में शनि बैठा हो तो व्यक्ति को बड़ी उम्र में मकान बनवाना पड़ता है।

14. शनि, मंगल और राहु की युति हो तो व्यक्ति काले धंधे की कमाई से सम्पदा बनाता है।

15. सप्तमेश उच्च का हो या सप्तम भाव में शुक्र हो तो व्यक्ति को पत्नी पक्ष से मकान का लाभ मिलता है।

भवन प्राप्ति हेतु ग्रहों की दशाएं

जब व्यक्ति को पता चलता है कि उसकी कुण्डली में भूमि या भवन का सुख है तो उसका अगला प्रश्न होता है कि यह सुख कब मिलेगा? इसके लिए व्यक्ति की दशा अन्तर्दशा का विचार किया जाता है। निम्नलिखित दशा अन्तर्दशा में व्यक्ति को यह सुख मिल सकता है:

1. जिन ग्रहों के कारण यह योग बन रहा है उनकी दशा या अंतर्दशा में व्यक्ति भवन या भूमि को प्राप्त करता है।

2. चन्द्रमा की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा होने पर भूमि व भवन का लाभ होता है।

3. मंगल की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा होने पर भूमि व भवन का लाभ होता है।

4. गुरु की महादशा में गुरु, शनि, शुक्र या मंगल की अंतर्दशा में व्यक्ति भूमि व भवन का सुख प्राप्त करता है।

5. गुरु की महादशा में शनि की अंतर्दशा में व्यक्ति को पुराना मकान मिलता है या उसका जीर्णोद्धार होता है।

6. चतुर्थेश, मंगल या शनि की महादशा या अंतर्दशा में व्यक्ति मकान का सुख प्राप्त करता है।

राशियों द्वारा वास्तु ज्ञान

आपका मकान कैसा होगा? मुख्य मार्ग की दिशा क्या होगी? आसपास का वातावरण कैसा होगा? आदि प्रश्नों का उत्तर आपकी जन्म राशि व चन्द्रमा की डिग्री के अनुसार दिया जा सकता है। यहाँ प्रत्येक राशि को चार भागों में बाँटकर संक्षिप्त फलादेश किया जा रहा है:

जन्मराशि अनुसार गृह स्थिति  जन्मराशि अंश     घर की स्थिति

मेष

प्रथम ( 0 – 7  – मकान गली में होगा। गली दक्षिण से उत्तर दिशा वाली होगी। मकान का खुला भाग पश्चिम दिशा की ओर होगा। मकान के आसपास कुआँ या जल संग्रह का स्थान होगा।

द्वितीय (8  – 15 ) – मकान की गली पश्चिम से पूर्व की ओर होती हुई उत्तर दिशा को जाएगी। उत्तर दिशा की ओर बड़ा जल संग्रह होगा।

तृतीय (16 – 22) – मकान की गली उत्तर से दक्षिण की ओर जा रही होगी। मकान का खुला भाग पश्चिम दिशा की ओर होगा। मकान के पास शिव मन्दिर होगा।

चतुर्थ (23 – 30) – मकान की गली पूर्व से पश्चिम की ओर होगी। मकान दक्षिणमुखी होगा। मकान के दक्षिण में तालाब होगा।

जन्म राशि वृष –  अंश – घर की स्थिति

प्रथम –  ( 0 – 7 ) –           मकान पूर्व मुखी होगा। मकान की गली दक्षिण से उत्तर की ओर होगी। मकान में पानी टपकता होगा। मकान के आग्नेय में जल संग्रह होगा।

द्वितीय-  (8  – 15 ) – मकान दक्षिण मुखी होगा। मकान के सामने पश्चिम से पूर्व की ओर मार्ग होगा। मकान के पश्चिम भाग में गणेश जी का मन्दिर होगा।

तृतीय (16 – 22) – मकान पश्चिम मुखी होगा। मकान के सामने दक्षिण से उत्तर की तरफ मार्ग होगा। मकान के रास्ते में गणेश जी का मन्दिर होगा।

चतुर्थ – (23 – 30) –             मकान उत्तर मुखी होगा। मकान के सामने का मार्ग पश्चिम से पूर्व की ओर होगा। दो परिवारों का निवास होगा। उत्तर दिशा में मन्दिर होगा।

जन्मराशि अंश   मिथुन

प्रथम – ( 0 – 7 ) –  मकान के सामने का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर होगा। मकान के पूर्व में खाली स्थान होगा। मकान में पुरूष प्रधान देवता का पूजन होगा।

द्वितीय – (8  – 15 ) – मकान के सामने का मार्ग पूर्व से पश्चिम की ओर होगा। दक्षिण में कोई फव्वारा या झरना होगा। ईशान में माँ दुर्गा का मन्दिर होगा।

तृतीय –  (16  – 22 ) –  मकान के सामने दक्षिण से उत्तर की ओर मार्ग होगा। खुली जगह पश्चिम में और पूर्वजों द्वारा बनवाया गया होगा। दक्षिण में कोई फव्वारा होगा।

चतुर्थ – (23 – 30) –मकान के सामने का मार्ग पूर्व से पश्चिम की ओर होगा। मकान पूर्वजों का होगा इसमें अनेक देवताओं का पूजन होगा।

जन्मराशि अंश   कर्क

प्रथम  – ( 0 – 7 ) –  मकान के सामने का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर होगा। मकान का खुला स्थान पश्चिम की ओर होगा। मकान के पास सुन्दर बगीचा होगा। पुल तथा हरियाली होगी। मकान के मार्ग में गणपति का मन्दिर होगा।

द्वितीय  – (8  – 15 ) –      मकान की गली पूर्व से पश्चिम की ओर होगी। मकान का खुला भाग दक्षिण दिशा में होगा। मकान के सामने कोई अन्य मकान नहीं होगा। मकान में दो परिवार रहते होंगे।

तृतीय –  (16  – 22 ) –  मकान की गली दक्षिण से उत्तर की ओर होगी। मकान का खुला भाग पूर्व दिशा में होगा।

चतुर्थ  – (23 – 30) – मकान की गली पूर्व से पश्चिम की ओर होगी। खुला भाग उत्तर दिशा में होगा। पूर्व में शिव का मन्दिर और उत्तर में दुर्गा का मन्दिर या तालाब होगा।

जन्मराशि अंश   सिंह

प्रथम  – ( 0 – 7 ) –  मकान की गली पूर्व से पश्चिम की ओर होगी। खुला भाग दक्षिण की ओर होगा। मकान में दो से अधिक परिवारों का वास होगा। व्यक्ति सुखी सम्पन्न और कीर्तिवान होगा।

द्वितीय  – (8  – 15 ) –      मकान का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर होगा। पूर्व दिशा में खुला आँगन होगा।

तृतीय    –  (16  – 22 ) –                मकान की गली पूर्व से पश्चिम की ओर होगी। उत्तर दिशा में खुला स्थान होगा। मकान में देवी का मंदिर होगा।

चतुर्थ   – (23 – 30) – मकान की गली दक्षिण से उत्तर की ओर होगी। खुला भाग पश्चिम की ओर होगा। गृहस्वामी शिव भक्त होगा।

जन्मराशि अंश   कन्या

प्रथम  – ( 0 – 7 ) –  मकान का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर होगा, खुली जगह पश्चिम में होगी। पूर्व दिशा की ओर झरना या तालाब होगा।

द्वितीय  – (8  – 15 ) –      मकान का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर होगा। खुली जगह पूर्व की ओर होगी।

तृतीय  –  (16  – 22 ) –  मकान का मार्ग पूर्व से पश्चिम की ओर होगा। उत्तर दिशा में खुला स्थान होगा। घर में पुरूष प्रधान देवता की पूजा होगी।

चतुर्थ  – (23 – 30) -मकान का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर होगा। खुली जगह पूर्व में होगी। घर में शक्ति प्रधान देवी की पूजा होगी।

जन्मराशि – अंश – तुला राशि

प्रथम – ( 0 – 7 ) –  मकान की गली पूर्व से पश्चिम की ओर होगी। खुला स्थान उत्तर में होगा। पश्चिम की ओर गहरा तालाब होगा। उत्तर दिशा की ओर शिवजी का मंदिर होगा।

द्वितीय – (8  – 15 ) – मकान का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर होगा। खुला भाग पूर्व की ओर होगा। मकान के दोनों ओर सुन्दर मकान हांगे। मकान के पश्चिम की ओर तालाब होगा। मकान में पुरूष प्रधान देवता का पूजन होगा।

तृतीय –  (16  – 22 ) – 

मकान की गली पूर्व से पश्चिम की ओर होगी। खुली जगह दक्षिण में होगी। गृह स्वामी माँ काली का उपासक होगा।

चतुर्थ – (23 – 30) –

मकान का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर होगा। खुला स्थान पश्चिम में होगा। मकान के पूर्वी भाग में बगीचा या कुआँ होगा। घर में पुरूष प्रधान देवता का पूजन होगा।

जन्मराशि अंश वृश्चिक

प्रथम – ( 0 – 7 ) – 

मकान का मार्ग पूर्व से पश्चिम की ओर होगा। खुली जगह दक्षिण में होगी। मकान के पूर्वी भाग में झरना या फव्वारा होगा।

द्वितीय – (8  – 15 ) –

मकान का मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर होगा। खुली जगह पश्चिम में होगी।

तृतीय –  (16  – 22 ) – 

मकान का मार्ग पूर्व से पश्चिम की ओर होगा। खुला स्थान घर के उत्तर में होगा।

चतुर्थ – (23 – 30) -मकान का मार्ग उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर होगा। खुला स्थान पूर्व की ओर होगा। मकान में दो परिवार रहते होंगे। मकान में पुरूष प्रधान देवता का पूजन होगा।

जन्मराशि अंश धनु

प्रथम – ( 0 – 7 ) –  मकान का मार्ग उत्तर से दक्षिण की ओर होगा। खुला स्थान पश्चिम दिशा में होगा।

द्वितीय – (8  – 15 ) -मकान का मार्ग उत्तर से दक्षिण की ओर होगा। पूर्व दिशा की ओर शिव मन्दिर होगा। गृह स्वामी शिव एवं शक्ति का उपासक होगा।

तृतीय –  (16  – 22 ) –  मकान का मार्ग पश्चिम से पूर्व की ओर होगा। मकान का खुला भाग उत्तर दिशा में होगा। घर के दोनों ओर मार्ग होगा।

चतुर्थ – (23 – 30) –

मकान की गली उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर होगी। मकान पूर्व मुखी होगा। मकान के सामने वाला मकान सुनसान रहेगा। घर में पुरूष देवता की उपासना होगी।

जन्मराशि अंश   मकर

प्रथम  – ( 0 – 7 ) –  मकान की गली पूर्व से पश्चिम की ओर होगी। मकान दक्षिण मुखी होगा। मकान के सामने जल स्थान या मन्दिर होगा।

द्वितीय  – (8  – 15 ) –      मकान की गली दक्षिण से उत्तर की ओर होगी। मकान पूर्व मुखी होगा। मकान में पुरूष प्रधान देवता की पूजा होगी।

तृतीय  –  (16  – 22 ) –     मकान के सामने की गली पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर होगी। मकान उत्तर मुखी होगा।

चतुर्थ    – (23 – 30)- मकान के सामने की गली उत्तर से दक्षिण की ओर होगी। मकान के आग्नेय या ईशान में शिव मंदिर या जल संग्रह स्थल होगा। पैतृक मकान होगा। स्वामी पुरूष प्रधान देवता की आराधना करता होगा।

जन्मराशि अंश   कुम्भ

प्रथम  – ( 0 – 7 ) –  मकान के सामने की गली पूर्व से पश्चिम की ओर होगी। मकान उत्तर मुखी होगा। पश्चिम में गणपति की मूर्ति होगी। दक्षिण दिशा में विष्णु मन्दिर होगा।

द्वितीय  – (8  – 15 ) –      मकान की गली दक्षिण से उत्तर की ओर होगी। खुली जगह पश्चिम में होगी। उत्तर दिशा की ओर झील, नदी या नाला होगा। पश्चिम में मन्दिर होगा।

तृतीय   –  (16  – 22 ) –  मकान दक्षिण मुखी होगा। दक्षिण दिशा की ओर मंदिर होगा।

चतुर्थ  – (23 – 30)-           मकान के सामने की गली दक्षिण से उत्तर की ओर गतिशील होगी। मकान पूर्व मुखी होगा। पश्चिम की ओर झरना या फव्वारा होगा। वायव्य दिशा में एक मंदिर होगा।

जन्मराशि – अंश –      मीन

प्रथम   – ( 0 – 7 ) –         मकान के सामने की गली पश्चिम से पूर्व की ओर होगी। मकान के पास तालाब या नाला होगा। मकान उत्तर मुखी होगा। मकान के पश्चिम और पूर्व की ओर सुन्दर मकान हांेगे। उत्तर की ओर झाड़ी, बगीचा एवं मंदिर होगा।

द्वितीय  – (8  – 15 ) –      मकान के नैर्ऋत्य में मंदिर होगा। मकान में शिव की उपासना होगी। मकान का निर्माण विचित्र रूप का होगा।

तृतीय   –  (16  – 22 ) –  मकान की गली पश्चिम से पूर्व की ओर होगी। मकान दक्षिण मुखी होगा। गृह स्वामी पुरूष देवता का उपासक होगा।

चतुर्थ   – (23 – 30 )- मकान की गली दक्षिण से उत्तर की ओर होगी। मकान पश्चिम मुखी होगा।

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