ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव


“वास्ते इति वास्तु” अर्थात जिस स्थान पर निवास किया जाए वह वास्तु है। वैदिक काल से लेकर वर्तमान काल तक में गृह स्थान को वास्तुशास्त्र कहा गया है जिस स्थान पर सुरक्षित एवं व्यवस्थित रुप से निवास किया जाए वह वास्तु है। इसलिए गृह निर्माण से लेकर आजीवन गृह निवास तक वास्तुपुरुष की पूजा-अर्जना का विशेष फल प्राप्त होता है। इसके फलस्वरुप संपूर्ण जीवन सुख, सम्पन्नता, रोगनाशकता तथा सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहता है। इसके अतिरिक्त जब गृह स्वामी अपनी राशि द्वारा सही दिशा में भूमि का चयन कर, गृहनिर्मा्ण कराकर निवास करता है तो वह सुखी-समॄद्ध जीवन व्यतीत करता हैं और उसका निवास मंगलदायक सिद्ध होता है। वास्तुशास्त्र का वास्तविक रुप प्रकृति के तत्वों को ध्यान में रखते हुए गृह निर्माण करना ही वास्तु का मूल सिद्धांत है, गृह निर्माण के समय वास्तुदेव के पोजन से गृहशुद्धि तथा समृद्धि प्राप्त होती है तथा जितनी भी अनिष्टकारी अशुभ शक्तियां भूमि पर आस कर रही होती हैं वह सभी अपना स्थान छोड़ कर अन्यत्र चली जाती हैं। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में किसी भी प्रकार की सुख-शांति, धन-अभाव, मानसिक-शांति, परिवारिक-कलह, बीमारी अथवा क्लेश उत्पन्न हो रहा हो तो अविलम्ब वास्तुदेव का पूजन शुभ दिन, शुभ योग, शुभ नक्षत्र में करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है तथा सुख एवं समृद्धि का वास होता है। वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन न करने से पारिवारिक सदस्यों को किस तरह से नाना प्रकार के रोगों का सामना करना पड सकता है। ऐसे ही कुछ उपायों की जानकारी हम आपको दे रहें हैं जिनका प्रयोग आपको स्वस्थ रखने में सहयोग करेगा और रोग निवारण में उपयोगी सिद्ध होगा-

दमा रोगियों के लिए उपाय

दमा रोगी के कमरे की पश्चिम दिवार पर पेंडुलम वाली सफेद या सुनहरी-पीले रंग क़ी दिवार घडी लगाना और शरीर की सुरक्षा हेतु तीन मुखी रुद्राक्ष धारण कराना, रोग में कमी और सेहत में सुधार करता हैं। 

मिर्गी,  हिस्टीरिया या दिमागी कमजोरी के लिए उपाय

परिवार में यदि कोई इस प्रकार की बीमारी से पीड़ित हों तो रोगी को उतर-पश्चिम, दखिन- पश्चिम, पश्चिम या दक्षिण दिशा के शयनकक्ष में शयन करना चाहिए, रोगी का शयन कक्ष भवन के उत्तर-पूर्व दिशा में कतई नही होना चाहिए, इससे अशांति बनती है।  पाँचमुखी रुद्राक्ष या एकमुखी रुद्राक्ष धारण कराना चाहिए एवं रोगी का शिव उपासना करना शुभदायक रहता है।

उच्च रक्तचाप एवं मधुमेह के उपाय

इस स्थिति में यह ध्यान रखना हैं कि अपने भूखंड और भवन के बीच के स्थान में कोई स्टोर, लोहे का जाल या बेकार का सामान नही होना चाहिए तथा अपने घर क़ी उत्तर-पूर्व दिशा में नीले फूल वाला पौधा लगाना चाहिए। इससे रोग नियंत्रण में सहजता से आता हैं और उपचार का लाभ रोगी को शीघ्र मिलने लगता है। 

जोड़ो के दर्द, गठिया, पीठ दर्द हेतु के लिए वास्तु उपाय

घर में किसी को इस प्रकार के रोग कष्ट दे रहें हों तो आप ध्यान दें कि आपके घर के कमरों क़ी दीवारों पर दरारे नही होनी चाहिए, उन पर कवर/प्लास्टर करवा देना चाहिए या दरारों पर किसी झरने या पहाड़ी का पोस्टर लगा देना चाहिए। रोग में कमी करने के लिए सात मुखी रुद्राक्ष धारण करना भी ठीक रहता है। 

ह्रदय रोग निवारण हेतु वास्तु उपाय

सुबह उठने के बाद अपने सोने वाले पलंग क़ी साइड पर ३-4 बार दाए हाथ से हल्का सा थपथपाय इसे नो (09 ) दिनों तक करे, सोने वाले कमरे क़ी उत्तर दिवार पर क्रिस्टल गेंद टांग दे और गेंदों के नीचे चारों दिशाओं में एक-एक क्रिस्टल पिरामिड रख दे, घर टूटी खिडकिया शीशे, आईने नही होने चाहिए, अगर ऐसा हो तो उन्हें भी बदल दीजिये, टूटे शीशे और खिडकियों को कभी भी अखवार, कागज या कपड़े से नहीं ढकें।

चिकित्सा शास्त्र में बहुत से लक्षण सुनने और देखने में मिलते है लेकिन वास्तु शास्त्र में बिलकुल स्पष्ट है कि घर/भवन का दक्षिण-पश्चिम भाग अर्थात नैऋत्य कोण ही परिवार में मधुम्ह रोग का जनक होता है। इस दिशा में वास्तु दोष होना निम्न प्रकार से मधुमेह रोग का कारण बन सकता है। 

  • दक्षिण-पश्चिम कोण में कुआँ,जल बोरिंग या भूमिगत पानी का स्थान मधुमेह बढाता है।
  • दक्षिण-पश्चिम कोण में हरियाली बगीचा या छोटे छोटे पोधे भी शुगर का कारण है।
  • घर/भवन का दक्षिण-पश्चिम कोना बड़ा हुआ है तब भी शुगर आक्रमण करेगी।
  • यदि दक्षिण-पश्चिम का कोना घर में सबसे छोटा या सिकुड भी हुआ है तो मधुमेह होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
  • दक्षिण-पश्चिम भाग घर या वन की ऊँचाई से सबसे नीचा है मधुमेह बढेगी। इसलिए यह भाग सबसे ऊँचा रखे।
  • दक्षिण-पश्चिम भाग में सीवर का गड्ढा होना भी शुगर को निमंत्रण देना है।
  • ब्रह्म स्थान अर्थात घर का मध्य भाग भारी हो तथा घर के मध्य में अधिक लोहे का प्रयोग हो या ब्रह्म भाग से जीना सीडीयां ऊपर कि और जा रही हो तो समझ ले कि मधुमेह का घर में आगमन होने जा रहा हें अर्थात दक्षिण-पश्चिम भाग यदि आपने सुधार लिया तो काफी हद तक आप असाध्य रोगों से मुक्त हो सकते हैं।

रोगमुक्त रहने के लिए निम्न सावाधानियां रखनी चाहिए

  • अपने बेडरूम में कभी भी भूल कर भी खाना ना खाए।
  • अपने बेडरूम में जूते चप्पल नए या पुराने बिलकुल भी ना रखे।
  • मिटटी के घड़े का पानी का इस्तेमाल करे तथा घडे में प्रतिदिन सात तुलसी के पत्ते डाल कर उसे प्रयोग करे।
  • दिन में एक बार अपनी माता के हाथ का बना हुआ खाना अवश्य खाए।
  • अपने पिता को तथा जो घर का मुखिया हो उसे पूर्ण सम्मान दे।
  • प्रत्येक मंगलवार को अपने मित्रों को मिष्ठान जरूर दे।
  • रविवार भगवान सूर्य को जल दे कर यदि बन्दरों को गुड खिलाये तो आप स्वयं अनुभव करेंगे की मधुमेह शुगर कितनी जल्दी जा रही है।
  • ईशानकोण से लोहे की सारी वस्तुए हटा ले।

दिशानुसार वास्तुदोष और रोग

पूर्व दिशा में वास्तु दोष होने पर

  • यदि भवन में पूर्व दिशा का स्थान ऊँचा हो, तो व्यक्ति का सारा जीवन आर्थिक अभावों, परेशानियों में ही व्यतीत होता रहेगा और उसकी सन्तान अस्वस्थ, कमजोर स्मरणशक्ति वाली, पढाई-लिखाई में जी चुराने तथा पेट और यकृत के रोगों से पीडित रहेगी।
  • यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान न हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर हो, तो परिवार के मुखिया को आँखों की बीमारी, स्नायु अथवा ह्रदय रोग की स्मस्या का सामना करना पडता है।
  • घर के पूर्वी भाग में कूडा-कर्कट, गन्दगी एवं पत्थर, मिट्टी इत्यादि के ढेर हों, तो गृहस्वामिनी में गर्भहानि का सामना करना पडता है।
  • यदि पूर्व की दिवार पश्चिम दिशा की दिवार से अधिक ऊँची हो, तो संतान हानि का सामना करना पडता है।
  • अगर पूर्व दिशा में शौचालय का निर्माण किया जाए, तो घर की बहू-बेटियाँ अवश्य अस्वस्थ रहेंगीं।
  • भवन के पश्चिम में नीचा या रिक्त स्थान हो, तो गृहस्वामी यकृत, गले, गाल ब्लैडर इत्यादि किसी बीमारी से परिवार को मंझधार में ही छोडकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

बचाव के उपाय

  • पूर्व दिशा में पानी, पानी की टंकी, नल, हैंडापम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा।
  • पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है, जो कि कालपुरूष के मुख का प्रतीक है। इसके लिए पूर्वी दिवार पर ‘सूर्य यन्त्र’ स्थापित करें और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज(झंडा) लगायें।
  • पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें। धन और वंश की वृद्धि होगी तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढेगी।
  • पश्चिम दिशा में वास्तु दोष होने पर
  • पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह शनि है। यह स्थान कालपुरूष का पेट, गुप्ताँग एवं प्रजनन अंग है।
  • यदि पश्चिम भाग के चबूतरे नीचे हों, तो परिवार में फेफडे, मुख, छाती और चमडी इत्यादि के रोगों का सामना करना पडता है।
  • यदि भवन का पश्चिमी भाग नीचा होगा, तो पुरूष संतान की रोग बीमारी पर व्यर्थ धन का व्यय होता रहेगा।
  • यदि घर के पश्चिम भाग का जल या वर्षा का जल पश्चिम से बहकर, बाहर जाए तो परिवार के पुरूष सदस्यों को लम्बी बीमारियों का शिकार होना पडेगा।
  • यदि भवन का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर हो, तो अकारण व्यर्थ में धन का अपव्यय होता रहेगा।
  • यदि पश्चिम दिशा की दिवार में दरारें आ जायें, तो गृहस्वामी के गुप्ताँग में अवश्य कोई बीमारी होगी।
  • यदि पश्चिम दिशा में रसोईघर अथवा अन्य किसी प्रकार से अग्नि का स्थान हो, तो पारिवारिक सदस्यों को गर्मी, पित्त और फोडे-फिन्सी, मस्से इत्यादि की शिकायत रहेगी।

बचाव के उपाय

  • ऎसी स्थिति में पश्चिमी दिवार पर ‘वरूण यन्त्र’ स्थापित करें।
  • परिवार का मुखिया न्यूनतम 11 शनिवार लगातार उपवास रखें और गरीबों में काले चने वितरित करे।
  • पश्चिम की दिवार को थोडा ऊँचा रखें और इस दिशा में ढाल न रखें।
  • पश्चिम दिशा में अशोक का एक वृक्ष लगायें।
  • उत्तर दिशा में वास्तु दोष होने पर-
  • उत्तर दिशा का प्रतिनिधि ग्रह बुध है और भारतीय वास्तुशास्त्र में इस दिशा को कालपुरूष का ह्रदय स्थल माना जाता है। जन्मकुंडली का चतुर्थ सुख भाव इसका कारक स्थान है।
  • यदि उत्तर दिशा ऊँची हो और उसमें चबूतरे बने हों, तो घर में गुर्दे का रोग, कान का रोग, रक्त संबंधी बीमारियाँ, थकावट, आलस, घुटने इत्यादि की बीमारियाँ बनी रहेंगीं।
  • यदि उत्तर दिशा अधिक उन्नत हो, तो परिवार की स्त्रियों को रूग्णता का शिकार होना पडता है।

बचाव के उपाय

  • यदि उत्तर दिशा की ओर बरामदे की ढाल रखी जाये, तो पारिवारिक सदस्यों विशेषतय: स्त्रियों का स्वास्थय उत्तम रहेगा। रोग-बीमारी पर अनावश्यक व्यय से बचे रहेंगें और उस परिवार में किसी को भी अकाल मृत्यु का सामना नहीं करना पडेगा।
  • इस दिशा में दोष होने पर घर के पूजास्थल में ‘बुध यन्त्र’ स्थापित करें।
  • परिवार का मुखिया 21 बुधवार लगातार उपवास रखे।
  • भवन के प्रवेशद्वार पर संगीतमय घंटियाँ लगायें।
  • उत्तर दिशा की दिवार पर हल्का हरा रंग करवायें।

दक्षिण दिशा में वास्तु दोष होने पर

  • दक्षिण दिशा का प्रतिनिधि ग्रह मंगल है, जो कि कालपुरूष के बायें सीने, फेफडे और गुर्दे का प्रतिनिधित्व करता है। जन्मकुंडली का दशम भाव इस दिशा का कारक स्थान होता है।
  • यदि घर की दक्षिण दिशा में कुआँ, दरार, कचरा, कूडादान, कोई पुराना सामान इत्यादि हो, तो गृहस्वामी को ह्रदय रोग, जोडों का दर्द, खून की कमी, पीलिया, आँखों की बीमारी, कोलेस्ट्राल बढ जाना अथवा हाजमे की खराबीजन्य विभिन्न प्रकार के रोगों का सामना करना पडता है।
  • दक्षिण दिशा में उत्तरी दिशा से कम ऊँचा चबूतरा बनाया गया हो, तो परिवार की स्त्रियों को घबराहट, बेचैनी, ब्लडप्रैशर, मूर्च्छाजन्य रोगों से पीडा का कष्ट भोगना पडता है।
  • यदि दक्षिणी भाग नीचा हो, ओर उत्तर से अधिक रिक्त स्थान हो, तो परिवार के वृद्धजन सदैव अस्वस्थ रहेंगें। उन्हे उच्चरक्तचाप, पाचनक्रिया की गडबडी, खून की कमी, अचानक मृत्यु अथवा दुर्घटना का शिकार होना पडेगा। दक्षिण पिशाच का निवास है, इसलिए इस तरफ थोडी जगह खाली छोडकर ही भवन का निर्माण करवाना चाहिए।
  • यदि किसी का घर दक्षिणमुखी हो ओर प्रवेश द्वार नैऋत्याभिमुख बनवा लिया जाए, तो ऎसा भवन दीर्घ व्याधियाँ एवं किसी पारिवारिक सदस्य को अकाल मृत्यु देने वाला होता है।

बचाव के उपाय

  • यदि दक्षिणी भाग ऊँचा हो, तो घर-परिवार के सभी सदस्य पूर्णत: स्वस्थ एवं संपन्नता प्राप्त करेंगें। इस दिशा में किसी प्रकार का वास्तुजन्य दोष होने की स्थिति में छत पर लाल रक्तिम रंग का एक ध्वज अवश्य लगायें।
  • घर के पूजनस्थल में ‘श्री हनुमंतयन्त्र’ स्थापित करें।
  • दक्षिणमुखी द्वार पर एक ताम्र धातु का ‘मंगलयन्त्र’ लगायें।
  • प्रवेशद्वार के अन्दर-बाहर दोनों तरफ दक्षिणावर्ती सूँड वाले गणपति जी की लघु प्रतिमा लगायें।

 आग्नेय में वास्तु दोष होने पर

  • इस दिशा के दोषपूर्ण रहने से व्यक्ति को क्रोधित स्वभाव वाला व चिडचिड़ा बना देगा।
  • यदि भवन का यह कोण बढ़ा हुआ है तो यह संतान को कष्टप्रद होकर राजमय आदि देता है। इस दिशा का स्वामी ‘गणेश’ है और प्रतिनिधि ग्रह ‘शुक्र’ है।
  • यदि आग्नेय ब्लॉक की पूर्वी दिशा मे सड़क सीधे उत्तर की ओर न बढ़कर घर के पास ही समाप्त हो जाए तो वह घर पराधीन हो जाएगा।

नैऋत्य में वास्तु दोष होने पर

  • दक्षिण व पश्चिम के मध्य कोण को नेऋत्य कोण कहते है। यह कोण व्यक्ति के चरित्र का परिचय देता है।
  • यदि भवन का यह कोण दूषित होगा तो उस भवन के सदस्यों का चरित्र प्रायः कुलषित होगा और शत्रु भय बना रहेगा।
  • विद्वानों के अनुसार इस कोण के दूषित होने से अकस्मिक दुर्द्घटना होने के साथ ही अल्प आयु होने का भी योग होता है।
  • यदि द्घर में इस कोण में खाली जगह है गड्डा है, भूत है या कांटेदार वृक्ष है तो गृह स्वामी बीमार, शत्रुओं से पीडित एंव सम्पन्नता से दूर रहेगा।
  • नेऋत्य का हर कोण पूरे घर मे हर जगह संतुलित होना चाहिए, अन्यथा दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। इस दिशा का स्वामी ‘राक्षस’ है और प्रतिनिधि ग्रह ‘राहु’ है।

वायव्य में वास्तु दोष होने पर

  • पश्चिम दिशा व उत्तर दिशा को मिलाने वाली विदिशा को वायव्य विदिशा या कोण कहते है जैसा कि नाम से ही विदित होता है कि यह कोण वायु का प्रतिनिधित्व करता है। यह वायु का ही स्थान माना जाता है। यह मानव को शांति, स्वस्थ दीर्घायु आदि प्रदान करता है। वस्तुतः यह परिवर्तन प्रदान करता है।
  • भवन मे यदि इस कोण मे दोष हो, तो यह शत्रुता चपट हो तो, जातक भाग्यशाली होते हुए भी आनन्द नही भोग सकता है।
  • यदि वायव्य द्घर मे सबसे बड़ा या ज्यादा गोलाकार है तो गृहस्वामी को गुप्त रोग सताएंगें। इस कोण का स्वामी ‘बटुक’ है और प्रतिनिधि ग्रह ‘चन्द्रमा’ माना गया है।

ईशान में वास्तु दोष होने पर

यह दिशा विवेक, धैर्य, ज्ञान, बुद्धि आदि प्रदान करती है भवन मे इस दिशा को पूरी तरह शुद्ध व पवित्र रखा जाना चाहिए।

  • यदि यह दिशा दूषित होगी तो भवन मे प्रायः कलह व विभिन्न कष्टों को प्रदान करने के साथ व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट होती है और प्रायः कन्या संतान प्राप्त होती है। 
  • लगातार शारीरिक कष्ट बने रहने कि स्थिति को दूर करने के विषय में बताया कि अपने मकान के सामने अशोक के पेड़ लगायें।
  • घर के सामने लैंप पोस्ट कुछ इस तरह से लगायें की उसका प्रकाश घर के ऊपर आये। 
  • यदि आपका प्रवेश द्वार दक्षिण अथवा दक्षिण-पश्चिम में हो तो लाल रंग अथवा केवल पश्चिम में होने पर सफेद अथवा सुनहरे रंग से रंगे।
  • सर दर्द अथवा माइग्रेन जैसे रोग को दूर करने के लिये बेड के उत्तर पश्चिम कोने में सफेद माल जिसका किनारा भूरे रंग का हो, दबा कर रखने से समस्या का हल हो जाता है।
  • इसके अलावे बेड कवर सफेद अथवा हल्के रंग का प्रयोग में लायें। मधुमेह की बढ़ती समस्या को नियंत्रित करने लिये अपने शयन कक्ष के उत्तर-पश्चिम दिशा में नीले रंग के फूलों का गुलदस्ता रखें।
  • इसके अतिरिक्त सफेद मूंगा के धारण करने से भी इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
  • एकाग्रता लाने के विषय में बताया कि विद्यार्थियों के कमरे की पूर्व दीवार पीला अथवा गुलाबी रंग की होनी चाहिये।
  • साथ ही जोड़ों के दर्द के समाधान के लिये यह ध्यान अवश्य रखें कि जिस कमरे में आप सोते हैं उसकी दीवार में दरार न हो। साथ ही दक्षिण-पश्चिम भाग को भारी रखें। साथ ही भगवान विष्णु की तसवीर कमरे की पूर्व दीवार में लगाना सही माना जाता है।

रोग वास्तु के बारे में निम्न बिंदुओं से भवन में शारीरिक रोग पर विचार किया जाता है

  •  भवन के उत्तर-पूर्व में भारी निर्माण तथा शौचालय बनाने से अनिद्रा, मानसिक रोग, तनाव, चिड़चिड़ापन, एवं शरीर निरंतर रोगी रहने लगता है क्योंकि यहां पर प्राकृतिक ऊर्जा बाधित होती है।
  • दक्षिण-पूर्व का विस्तार या सोने से या द्वार होने से मानसिक तनाव, अशांत चित्त, उच्च रक्तचाप, आदि रोग होते हैं। इस दिशा में भूमिगत जलस्रोत होने से निर्जलीकरण, हैजा, संतान पीड़ा, किसी किडनी में तकलीफ, मानसिक अशांति इत्यादि रोग होते हैं।
  • वायव्य कोण अर्थात उत्तर-पश्चिम में निरंतर सोने या बैठने से व्याकुलता एïवं मन उच्चाटन प्रवृत्ति का होना, वायु विकार आदि रोग होते हैं। इस कोण में भूमिगत जल, मानसिक पीड़ा, अनिद्रा, बच्चे कम उम्र में प्रौढ़ होने तथा इस दिशा में द्वार होने से दुर्घटनाएं होती हैं।
  • उत्तर में भारी तथा दक्षिण में हल्का या पूर्व में भारी तथा पश्चिम में हल्का रखने से स्वास्थ्यवर्धक ऊर्जा एवं हवा बाधित होती है जिससे अनिद्रा, मानसिक तनाव, शारीरिक दुर्बलता तथा दीर्घकालीन रोग होते हैं।
  • ब्रह्म स्थान अर्थात घर के मध्य भाग में निर्माण, भूमिगत जल स्रोत एïवं अग्नि की स्थापना से विनाशकारी रोग, भ्रमिता का शिकार, पेट में पीड़ा, अनिद्रा, मानसिक रोग होते हैं।
  • नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) का विस्तार एवं भूमितगत जलस्रोत, पुत्र को रोग, मानसिक पीड़ा, भय, अनिद्रा, दुर्घटनाजनित रोग एवं गुर्दे में रोग देता है।
  • पश्चिम दिशा में भूमिगत जल, मंदाग्नि, स्त्रीजनित रोग, दौरे पडऩा एवं अस्थिरता पैदा करता है।
  • दक्षिण दिशा में भूमिगत जलस्रोत, स्त्री रोग, मानसिक तनाव एवं अशांतच्ति करता है।
  • भवन के दरवाजे आवाज करते हैं तो अनिद्रा, मानसिक अशांति एवं भय इत्यादि पीड़ा आती है।

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