लेखक परिचय

अखिलेश आर्येन्दु

अखिलेश आर्येन्दु

वरिष्‍ठ पत्रकार, टिप्पणीकार, समाजकर्मी, धर्माचार्य, अनुसंधानक। 11 सौ रचनाएं 200 पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। 25 वर्षों से साहित्य की विविध विधाओं में लेखन, अद्यनत-प्रवक्ता-हिंदी।

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अखिलेश आर्येन्दु

पिछले दिनों कर्इ प्रदेशो में बच्चों और शिक्षकों से ताल्लुक रखने वाली तमाम चौकाने वाली खबरों से मीडिया जगत में एक हलचल जैसी स्थिति देखने को मिली। कहीं शिक्षक या शिक्षिका ने बच्चों को इतना पीटा की बच्चें बिकलांग या उनकी मौत हो गर्इ। कुछ मामलों में बच्चों ने अपने शिक्षक या शिक्षिका पर हमलाकर के उन्हें मौत के घाट उतार दिया। बुद्धिजीवियों और शिक्षा शास्त्रियों के जरिए, इन पर तमाम चर्चाएं और परिचर्चाएं चलीं। इसी बीच न्यायालय का आदेश आया कि बच्चों को शारीरिक दंड या क्रूरता के साथ डाटा-फटकारा न जाए। इस पर जहां बच्चों को राहत मिली वहीं पर तमाम अभिभावक और बड़े-बुजुर्गों ने इसे बच्चों को ढीट बनाने वाला आदेश बताया।

जैसी घटनाएं स्कूलों और कालेजों में घट रही हैं उससे न्यायालय को ऐसा आदेश देने के अलावा कोर्इ और रास्ता दिखार्इ नहीं पड़ा, जिससे उन्हें ऐसा आदेश देना पड़ा। आज से बीस-पच्चीस साल पहले आज की अपेक्षा बच्चों की दिल दहला देने वाली पिटार्इ स्कूलों और कालेजों में की जाती थी। लेकिन तब ऐसा हो-हल्ला नहीं मचता था। उसका सकारात्मक असर भी पड़ता था, लेकिन कर्इ बार ऐसी क्रूरता से पिटार्इ होती थी कि छात्र का कोर्इ न कोर्इ अंग-भंग हो जाता था। लेकिन मीडिया का विस्तार न होने और मानवाधिकार जैसे संघटन तब नहीं हुआ करते थे। इस लिए ऐसी वारदातों पर कोर्इ बवेला नहीं मचता था। लेकिन पिछले 20-25 सालों से देश-दुनिया में कर्इ तरह के बदलाव आए हैं। पिछले कर्इ सालों से 113 देशो में स्कूलों और कालेजों में बच्चों को किसी भी तरह का शारीरिक दंड पर रोक लगा दी गर्इ है। 29 देशो में परिवार या नजदीकी रिश्तेदार बच्चों को थप्पड़ नहीं मार सकते। ऐसा करना वहां अपराध के दायरे में माना गया है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी बच्चों को थप्पड़ या दंडे से मारना सुधारने का सबसे घटिया तरीका माना है। ऐसा ही देश के सर्वोच्च न्यायालय का भी मानना है। यानी बच्चों को सुधारने या उनकी लापरवाही की सजा थप्पड़ या दंडा से मारना बहुत ही गैरइंसानी तरीका है।

तमाम समाज शास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों और शिक्षा शास्त्रियों का मानना है कि बच्चों की आदतों को सुधारने या दिए हुए कार्य को पूरा न करने की स्थिति में बच्चों को बहुत ही दोस्ताना तरीके से समझाना चाहिए न कि झल्लाकर थप्पड़ जड़ना चाहिए। लेकिन इस बात का पालन भारत सहित दुनिया के तमाम देश के स्कूलों में नहीं किया जाता है। अमरीका, फांस, जापान और जर्मना सहित सभी देशो में बच्चों को शारीरिक दंड देने पर मनाही है लेकिन इसका पालन बहुत ही कम किया जाता है। सर्वेक्षणों और शोध से भी पता चला है कि बच्चों को शारीरिक दंड देने से जहां वे ढीट बनते हैं वहीं पर वे बागी भी बन जाते हैं। षोध से पता चलता है कि जो बच्चें ज्यादा शारीरिक दंड पाए होते हैं वे बड़े होकर ज्यादा हिंसक प्रवृति के होते हैं। ऐसे बच्चे बड़े होने पर बात-बात पर दूसरों पर बहुत जल्दी हाथ उठा देते हैं।

बच्चों को शारीरिक दंड पर स्कूलों पर तो प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन मदरसों और गुरुकुलों पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सका है। मदरसों और गुरुकुलों में बच्चों को जानवरों से भी बदत्तर तरीके से पीटा जाता है। आए दिन कर्इ तरह की घटनाएं इसका प्रमाण हैं, ऐसे बच्चें अपंग होकर बहुत ही दयनीय दशा में अपनी जिंदगी गुजारते हैं। इस लिए सरकार और न्यायालय को इन पर भी प्रताड़ना का कानून सक्ती से लागू करना चाहिए।

शिक्षक बच्चों को दंड देते वक्त हमेशा भूल जाते हैं कि इसका परिणाम बहुत भंयकर भी हो सकता है। बच्चे की जिंदगी हमेशा के लिए तबाह हो सकती है और उसकी बुरी आदत छूटने के बजाए और भी बदतर हो सकती है। दूसरी बात, शारीरिक दंड अक्सर बच्चों के शिक्षक या माता-पिता के रिश्तों को बनाने के बजाए बिगाड़ते ही हैं। यह बात शिक्षक और अभिभावकों को समझनी चाहिए कि जो बात प्यार के साथ मनवार्इ जा सकती है, वह थप्पड़ या दंडे से मारकर कभी भी नहीं। गुस्सा और दंड कभी सकारात्मक परिणाम नहीं देते हैं। इस बात को उन लोगों को जरूर समझनी चाहिए जो शारीरिक दंड ही बच्चों को सुधारने का सबसे बेहतर तरीका मानते हैं। एक आदर्श व्यकित के निर्माण के लिए प्यार से समझाना ही एक बेहतर तरीका ही दंड का होना चाहिए। प्यार, उपवास, समझाना-बुझाना और प्रेरक गीत या कहानी के जरिए भी बच्चों को एक आदर्ष नागरिक बानाया जा सकता है ऐसा दुनिया के तमाम शिक्षाविदों का मानना है।

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