लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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-बीनू भटनागर-   india

दिल्ली में एक युवक को ज़रा सी बात पर पीट-पीटकर मार दिया गया, इससे दर्दनाक और दुखद बात क्या हो सकती है! पोलिस ने भी दोबारा उस युवक को उसी स्थान पर लाकर छोड़ा, जहां उसकी पिटाई हुई थी, उसे  उसके घर पर जहां वह ठहरा हुआ था, छोड़कर आना चाहिये था। यह लड़का पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश से था, इसलिये इसे नस्लभेद का नाम दिया जा रहा है, पर दिल्ली में आये दिन छोटी-छोटी बातों को लेकर हुए झगड़े हिंसात्मक हो जाते हैं जिनमे लोगों की मौत हो जाती है। लोगों को क्रोध पर नियंत्रण ही नहीं रह गया है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए थोड़ी सहनशीलता और संवेदनशीलता का विकास करना ऐसे झगड़ों को मिटा सकता है। ज़रा-ज़रा सी बात को आत्म-सम्मान का प्रश्न बना लेना, अपने अहम से जोड़कर देखना सही नहीं है।

विश्व में कई नस्ल हैं। जैसे श्वेत/ काकेशस, मंगोलाइड एशियन, नीग्रोआइड / ब्लैक और औसस्ट्रेलोइड।इन सबकी शारीरिक विलक्षणतायें हैं।कुछ मिश्रित नस्लें भी हैं। नस्लों मे इंसानों को कुदरत ने बांटा हुआ है, पर हमे हर नस्ल के व्यक्ति का सम्मान करना चाहिये। हमारे देश मे भी कई नस्लों और मिली-जुली नस्लों के लोग रहते हैं। पहले जब उत्तर भारत के लोगों को दक्षिण के बारे में अधिक पता नहीं था तो वो हर दक्षिण भारतीय को मद्रासी कहते थे, ये उनका अज्ञान था, पर इस पर दक्षिण के लोग क्रोधित हो जाते थे। उनका खानपान रहन-सहन अलग लगता था, इसलिये उनका मज़ाक बनाया जाता था। संचार के माध्यम और अधिक आने जाने से ये दूरियां कम हो गईं हैं और अब उत्तर के लोग इडली-ढोसा शौक से खाते हैं और दक्षिण के लोग छोले-भटूरे का मज़ा लेते हैं।

दुर्भाग्यवश पूर्वोत्तर राज्यों के बारे मे जनमानस मे अभी जानकारी बहुत कम है। वो मंगोलौइड रेस से हैं, इसलिये उनकी आंखें बाल और शारीरिक बनावट उत्तर भारतीयों से बहुत अलग है। नेपाली, दक्षिणी पूर्वी एशिया, चीन और जापान के लोगों का संबध भी मंगोलौइड नस्ल से है, इसलिये उत्तर भारत के लोग इन्हें विदेशी समझने की ग़लती कर बैठते हैं। अलग दिखने वाले लोगों के पति जिज्ञासा होना स्वाभाविक है, परन्तु दुर्व्यवहार करना या मारपीट करना सहन नहीं किया जा सकता। पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को जो देश के अन्य भागों मे रह रहे हैं इस बात को स्वीकार करना चाहये कि जो तथाकथित अभद्र टिप्पणियां उनको सुनने को मिलती हैं, वो अधिकतर यहां के लोगों का अज्ञान ही होती हैं। पूर्वोत्तर राज्यों के बारे मे जानकारी न होने की वजह से और मंगोलौइड नस्ल से संबंध होने कारण उन्हें अगर कोई विदेशी समझले तो  क्रोधित न होकर अपने राज्य के बार में विनम्रता से बताना चाहिये। चिंकी भी कोई अपशब्द नहीं है, प्यार से बहुत से बच्चों का नाम रख दिया जाता है, जिनकी शक्ल में मंगोलौइड  नाक-नक्श होते हैं, उन्हें चिंकी कह दिया जाता है। इसलिये इससे चिढ़ने की ज़रूरत नहीं है।चिढ़ने वालों को ही चिढ़ाया जाता है। कुछ बातों को नज़रअंदाज़ करना ही उचित है। पूर्वोत्तर राज्यों की सरकारों को अपने प्रदेश की संस्कृति, भाषा, पहनावे और खान-पान की जानकारी का प्रचार भी करना चाहिये। पूरे भारत के लोगों को अपने से अलग दिखने वाले लोगों का सम्मान करना चाहिये।

One Response to “अपने ही देश में…”

  1. अशोक आंद्रे

    आज हर प्रबुद्ध व्यक्ति के मन में कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं कि हमारे समाज को क्या हो गया है जरा-जरा सी बात पर नसलियां टिपण्णी से ऊपर उठने की बजाय सामने वाले की जिंदगी को ही समाप्त करने पर उतारू हो जाते हैं.इसका हल हम
    सभी को ढूंढना होगा.आपका यह आलेख बहुत कुछ कह गया है. सुन्दर.
    अशोक आंद्रे

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