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    Homeसाहित्‍यकविताचलाचल-चलाचल जिंदगी के सफर में….

    चलाचल-चलाचल जिंदगी के सफर में….

    डॉ. शंकर सुवन सिंह

    जिंदगी घिरी,शैलाभों और चट्टानों से|
    ऐ जिंदगी फिर डरना क्या,आँधियों और तूफानों से||
    विचार शून्य हो,भाव भक्ति का हो|
    तो भगवान् हम सफर है,भक्त के सफर में||
    चलाचल-चलाचल जिंदगी के सफर में,
    हम सफर है तो सफर से क्या डरना||
    खंजर की क्या मजाल कि तेरे अरमानो को कुचल दे|.
    अरमान ही क्या करे कि तू खुद खंजर बन बैठा|
    चलाचल- चलाचल जिंदगी के सफर में,
    हम सफर है तो सफर से क्या डरना||
    ध्यान लगा कर के तो देख,तब तू नहीं|
    तेरे दर पे,भगवान् होंगे||
    कर कुछ ऐसा कि भगवान् तेरे दर पे हो हमेशा|
    भाव भक्ति का कर,ध्यान प्रभु का लगा|
    कट जाएगा सफर,हमसफ़र के सहारे||
    चलाचल- चलाचल जिंदगी के सफर में,
    हम सफर है तो सफर से क्या डरना||

    डॉ शंकर सुवन सिंह
    डॉ शंकर सुवन सिंह
    वरिष्ठ स्तम्भकार एवं विचारक , असिस्टेंट प्रोफेसर , सैम हिग्गिनबॉटम यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी एंड साइंसेज (शुएट्स) ,नैनी , प्रयागराज ,उत्तर प्रदेश

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